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नाथूराम गोडसे को फांसी नहीं मिलनी चाहिए थी

हमारी मैथिली में एक कहावत है. जे क्यो नई केलकई, से नाथूराम केलकई. यानी, जो किसी ने नहीं किया, वो नाथूराम ने किया. मुझे यकीन है कि भारत की ज्यादातर भाषाओं में नाथूराम पर एक-आध मुहावरा पक्का होगा. जो अब भी कहा-सुना जाता होगा. वजह? वही. नाथूराम ने जैसा किया, वो शायद कोई और कभी नहीं करता. 15 नवंबर की ये तारीख नाथूराम की यादों से सनी है. मगर उसके हर जिक्र से पहले गांधी का जिक्र होना लाजिमी है. पहले गांधी की तारीख आएगी. फिर नाथूराम की तारीख. पहले गांधी आएंगे. तब नाथूराम आएगा.


30 जनवरी. साल 1948. जगह थी राजधानी दिल्ली. नए बने देश की नई-नवेली राजधानी. इस तारीख का 15 नवंबर की इस तारीख से बड़ा करीबी रिश्ता है. ऐसे ही जैसे दूध और मलाई का होता है. जैसे आग और तपिश का होता है. एक नहीं होता, तो दूसरा भी नहीं याद किया जाता.

गांधी की शवयात्रा में लाखों लोग शामिल हुए थे. उस दौर के लोगों से पूछिएगा. वो बताएंगे आपको कि देश में कुछ गिनती के लोगों को छोड़कर एक भी जोड़ी ऐसी आंख नहीं थी जो गांधी की मौत पर रोई न हो.
गांधी की शवयात्रा में लाखों लोग शामिल हुए थे. उस दौर के लोगों से पूछिएगा. वो बताएंगे आपको कि देश में कुछ गिनती के लोगों को छोड़कर एक भी जोड़ी ऐसी आंख नहीं थी जो गांधी की मौत पर रोई न हो.

सदियों पुराना देश, पांच महीने पुरानी आजादी
जुम्मा-जुम्मा पांच महीने पुराना देश. बहुत सर्दी थी उन दिनों. ठिठुरती सर्दियां. जिसके लिए दिल्ली मशहूर है. सर्द बस मौसम नहीं था. लोग भी सर्द हो गए थे. जैसे सर्दियां खाल की नमी सोख लेती है, वैसे ही रुखे-सूखे. बंटवारे के पांच महीने बीत चुके थे. मगर सीमा पार से शरणार्थियों के जत्थे आने का सिलसिला रुका नहीं था. दिल्ली रोज पसरती जा रही थी. लगता था, पूरा शहर शरणार्थियों से ही भरा हो. बंटवारे से पहले किसी का इस शहर से ताल्लुक रहा हो, ऐसा कोई जैसे दिखता भी नहीं था. सब अजनबियों सा बरतते थे. मुल्क के लोगों की शांति, उनका सुकूं सब बंटवारा भकोस चुका था. लील गया था हर अच्छी चीज को. ऐसे अभागे माहौल में भी कुछ नाम संकटमोचन बने हुए थे. उनका नाम सुनकर एक हौसला बंधता था. लगता, चंद दिनों की बात है. फिर सब ठीक हो जाएगा. गांधी सब ठीक कर देंगे.

गांधी के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ लोगों को हुजूम.
गांधी के अंतिम संस्कार में शामिल हुआ लोगों को हुजूम.

खुद मरना और जबरन मारना, बहुत फर्क है दोनों में
मगर उस 30 जनवरी को ये रहा-सहा हौसला भी जाता रहा. गांधी मरे नहीं. मार दिए गए. उनकी मौत का वो दिन मुकर्रर हुआ नहीं था. मुकर्रर किया गया था. गांधी के हिस्से की सांसें खत्म नहीं हुई थीं. किसी ने जबरन उनका दम घोंट दिया था. जिस शख्स ने इस अभागे काम को अंजाम दिया, वो शख्स था गोडसे. पूरा नाम, नाथूराम गोडसे. मरने-मारने पर उतारू देश की आंखों में खून उतर आया था. गांधी अपनी धोती के कोर से ये खून साफ करने निकले थे. मगर खुद उनका शरीर खून से रंग दिया गया. वो शख्स कभी मांसल नहीं रहा. उसके शरीर पर मांस भी कंजूसी से चढ़ा था. कम-कम. दुबला-पतला. उसमें जो कुछ छटांक खून था, वो गोली से हुए छेद से बाहर फव्वारा बनकर फूटा.

गांधी के शव के साथ चलते जवाहरलाल नेहरू.
गांधी के शव के साथ चलते जवाहरलाल नेहरू.

उस शाम प्रार्थना में 15 मिनट देर से पहुंचे थे गांधी
गांधी की दिनचर्या तय थी. सबकुछ इधर-उधर हो जाए, मगर प्रार्थना नहीं टलती थी. जाने क्या इंसान था? प्रार्थना से सबका मन शुद्ध करने की बात करता था. आम दिनों की ही तरह उस दिन भी शाम को पांच बजे बिड़ला भवन में प्रार्थना होनी थी. उससे पहले गांधी सरदार से मिले. सरदार पटेल से. बातचीत लंबी खिंच गई. घड़ी पांच के पड़ाव से आगे बढ़ गई थी. 5: 10 हो गए थे. गांधी शौच गए. हाथ-पैर धोया. फिर जल्दी-जल्दी डेग बढ़ाते हुए प्रार्थना सभा की ओर बढ़े. पूरे 15 मिनट देर थे वो. वक्त का पाबंद इंसान इतनी देरी भी बर्दाश्त नहीं कर पाता था. 250 के करीब लोग वहां हॉल में बैठे गांधी की राह देख रहे थे. सबकी नजरें रस्ता देख रही थीं. फिर नजर आए गांधी. हड़बड़ाकर तेज-तेज कदम बढ़ाते हुए. लोगों की बांछें खिल गईं. फुसफुसाहट शुरू हो गई. ‘वो देखो, बापू आ गए’. बापू के साथ उनकी दो भतीजियां भी थीं. गांधी उनसे थोड़ा नाराज थे. कह रहे थे, बताया क्यों नहीं कि प्रार्थना के लिए देर हो रही है. मुझे देर पसंद नहीं. मनु ने कहा, ‘आप जरूरी बात कर रहे थे. सो आपको तंग नहीं किया’. गांधी ने थोड़ा डपटने के अंदाज में कहा:

नर्स का काम है सही समय पर मरीज को दवा देना. अगर दवा देने में देर होगी, तो मरीज मर जाएगा.

गांधी का अंत ऐसा जघन्य होगा, इसकी शायद कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. यहां तक कि अंग्रेजों ने भी नहीं की होगी.
गांधी का अंत ऐसा जघन्य होगा, इसकी शायद कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. यहां तक कि अंग्रेजों ने भी नहीं की होगी.

आस्तीन में पिस्तौल छुपाकर खड़ा था नाथूराम
सामने लोग खड़े थे. सम्मान से हाथ जोड़े. लोग उन्हें आगे बढ़ने के लिए जगह दे रहे थे. इसी भीड़ में वो हत्यारा भी था. आस्तीन में पिस्तौल छुपाए. घात लगाकर इंतजार कर रहा था. वहां सामने की ओर लकड़ी का एक तख्त सा लगा था. वहीं बैठते थे गांधी. इससे पहले कि वो अपनी जगह तक पहुंच पाते, नाथूराम ने गोली मारी. बहुत करीब से गोली मारी थी गोडसे ने उनको. गांधी पीछे की ओर गिरे. सिर के बल. खून का फव्वारा सा निकला उनके भीतर से. चश्मा एक ओर गिरा. चप्पल एक ओर. वो खुद एक ओर गिर गए. कुछ घड़ियां भी नहीं मिलीं उनको. कि कुछ समझ पाते. गांधी कहा करते थे. कि मरते समय उनकी जुबां पर ‘हे राम’ होगा. मगर जब मौत आई, तो गांधी को ये इच्छा पूरी करने भर की भी मोहलत नहीं मिली.

गांधी की मौत के साढ़े 22 महीने बाद नाथूराम भी मारा गया
गोडसे ने गांधी को मारा. उस तारीख के साढ़े 22 महीने बाद का एक दिन. तारीख, 15 नवंबर. साल, 1949. इस दिन गांधी के हत्यारे की हत्या हुई थी. उसे फांसी चढ़ाया गया था. इस आजाद देश की पहली फांसी थी वो. कोर्ट केस चला था लंबा. किसने सोचा था कि एक दिन ये मुल्क ‘गांधी मर्डर केस’ का ट्रायल भी देखेगा! ऐसा भी कोई दिन आएगा जब गांधी की हत्या हो जाएगी! खैर, अदालतों में लंबी बहस चली. पूरी साजिश का खुलासा हुआ. मालूम चला, वो दिन अकेला दिन नहीं था जब गांधी को मारने की कोशिश हुई.

जब जवाहरलाल नेहरू ने गांधी की हत्या का समाचार दिया था, तो उनकी आवाज रुंधी हुई थी. आवाज जैसे उनका साथ नहीं दे रही थी.
जब जवाहरलाल नेहरू ने गांधी की हत्या का समाचार दिया था, तो उनकी आवाज रूंधी हुई थी. आवाज जैसे उनका साथ नहीं दे रही थी.

गांधी का हत्यारा था, फांसी कैसे दी जा सकती थी उसको!
गोडसे को फांसी नहीं मिलनी चाहिए थी. उसे यूं पलभर में मुक्त नहीं किया जाना चाहिए था. उसका अपराध आम नहीं था. उसने गांधी को मारा था. उसे वक्त तो दिया जाना चाहिए था. ताकि वो महसूस कर सके कि उसने क्या कर दिया है. गांधी के हत्यारे की सजा गांधी के आदर्शों के मुताबिक तय की जानी चाहिए थी. गांधी हत्या के खिलाफ थे. ये ही भावुकता गांधी की पहचान थी. गांधी से नफरत करने वाले उनकी इस भावुकता से भी चिढ़ते थे. नफरत करने वालों में एक नाम गोडसे का भी तो था. इसीलिए जरूरी था कि गोडसे को सजा देते समय गांधी की मिसालों को ध्यान में रखा जाए. ये सजा गांधी के मुताबिक होनी चाहिए थी. गोडसे के लिए सबसे बेहतर सजा होती उम्रकैद. और एक बहुत-बहुत लंबी जिंदगी. कैद जिंदगी.

गोडसे को फांसी नहीं दिए जाने का तर्क देते समय एक और बात बतानी जरूरी है. साल 1931 में ब्रिटिश हुकूमत ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी थी. इसके बाद इसी साल कराची में कांग्रेस का एक अधिवेशन हुआ. इसमें एक प्रस्ताव पेश किया गया. इसमें फांसी की सजा का सिस्टम खत्म करने की मांग की गई. उस समय तो चीजें अंग्रेजों के हाथ में थीं. मगर आगे चलकर जब देश आजाद हुआ और कांग्रेस सत्ता में आई, तब उसे अपना वो प्रस्ताव याद रखना चाहिए था.


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