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मंगल ग्रह की आवाज सुनाने से लेकर वहां ऑक्सीजन बनाने तक कई बेहतरीन काम करेगा नासा का रोवर

स्पेस एक्सप्लोरेशन में रोवर का किरदार बहुत खास होता है. रोवर यानी एक ऐसा वाहन जो दूसरे ग्रहों या उपग्रहों की सतह पर चल सके. अब तक मंगल ग्रह पर कुल चार रोवर चलाए गए हैं. और ये चारों चलाने का काम अमेरिकन स्पेस एजेंसी नासा ने किया है. 2020 में नासा ने मंगल पर अपना पांचवा रोवर भेजा. इसे मंगल पर जीवन की पहेली को हल करने में मदद करने के लिए भेजा गया था. इस नए रोवर में कुछ ऐसी चीज़ें हैं, जो इसे बेहद खास बनाती हैं. 30 जुलाई 2020 को नासा ने अपना मिशन ‘मार्स 2020’ लॉन्च किया था. 18 फरवरी 2021 की रात ये मिशन मंगल की सतह पर पहुंच गया. अगर आगे भी सब ठीक रहा तो मंगल पर कुछ ऐसी चीज़ें होंगी, जो पहले कभी नहीं देखी गईं.

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साइंसकारी के इस एपिसोड में हम नासा के मिशन Mars 2020 को समझने की कोशिश करेंगे.

मंगल पर जीवन की खोज

ये मिशन नासा के Mars Exploration Program का सबसे एड्वांस मिशन बताया जा रहा है. मार्स एक्सप्लोरेशन प्रोग्राम का उद्देश्य है मंगल की छान-बीन करना और वहां से पृथ्वी तक साइंटिफिक इन्फॉर्मेशन भेजते रहना. यही करने के लिए मंगल पर अलग-अलग ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर भेजे जाते हैं.

2011 में नासा ने मंगल पर ‘क्यूरियोसिटी’ रोवर भेजा था. तब हमें मंगल के बारे में बहुत सारी नई बातें पता चली थीं. उन बातों का निचोड़ ये रहा कि अतीत में मार्स पर लाइफ के लिए अनुकूल परिस्थितियां थीं. यानी पहले मंगल पर ऐसे हालात थे, जिससे वहां जीवन की संभावना बढ़ जाती है.

लेकिन मंगल पर लाइफ के लिए सूटेबल कंडीशन्स होना और लाइफ का होना ये दो अलग-अलग बातें हैं. ऐसे पहले कभी मंगल पर जीवन था या नहीं, क्या मंगल को कभी भी रहने लायक बनाया जा सकता है आदि कई सवालों के जवाब जानने के लिए ही नासा ने मार्स 2020 मिशन को मंगल पर भेजा है.

मंगल की ये तस्वीर नासा के क्यूरियोसिटी रोवर ने ली थी.
मंगल की ये तस्वीर नासा के क्यूरियोसिटी रोवर ने ली थी.

नासा के मार्स 2020 मिशन ने मंगल पर एक नए रोवर को तैनात किया. इस रोवर का नाम है Perseverance (पर्सिवियरेंस). हिंदी में पर्सिवियरेंस का मतलब है – दृढ़ता. इस रोवर का मुख्य काम है मंगल पर अतीत के जीवन के निशान ढूंढना और चट्टान व मिट्टी के सैंपल्स को इकट्ठा करना ताकि भविष्य में इन्हें पृथ्वी तक वापस लाया जा सके.

इस मिशन के लिए ULA के एट्लस वी रॉकेट का इस्तेमाल किया गया था. एट्लस वी वही रॉकेट है, जिसने 2011 में नासा के क्यूरियोसिटी रोवर और 2018 में इन्साइट लैंडर को मंगल तक पहुंचाया था.

लॉन्च डेट को लेकर हमेशा कन्फ्यूज़न रहता है. मौसम और दूसरी चीज़ों का ध्यान रखना होता है. लेकिन मंगल पर पर्सिवियरेंस की लैंडिंग डेट फिक्स थी. ये पहले से ही तय कर लिया गया था कि ये अंतरिक्ष वाहन 18 फरवरी, 2021 को मंगल पर लैंड करेगा. और ऐसा ही हुआ. इससे पहले ये मंगल के एक ऑर्बिट में चक्कर काट रहा था. और वैज्ञानिक इसके उपकरणों की जांच कर रहे थे.

लैंडिंग कैसे और कहां हुई?

लैंडिंग के लिए इस मिशन को अपने सबसे कठिन फेज़ से गुज़रना पड़ा, जिसे 2012 में क्यूरियोसिटी रोवर की लैंडिंग के दौरान “seven minutes of terror” कहा गया था. Perseverance की लैंडिंग को क्यूरियोसिटी की लैंडिंग से ही समझिए.

जब क्यूरियोसिटी मार्स के वातावरण में दाखिल हुआ तब इसकी स्पीड 20000 किलोमीटर/घंटे की थी. इसमें नीचे की तरफ एक हीट शील्ड लगी होती है. जब मंगल के थिन एट्मॉस्फियर से घर्षण होने पर इसकी रफ्तार 1600 किलोमीटर/घंटे हुई, तब इसके पैराशूट खोल दिए गए.

पर्सिवियरेंस रोवर के साथ भी लगभग यही हुआ. लेकिन इस बार लैंडिंग के लिए एक नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया. इस नई तकनीक का नाम है Terrain-relative navigation. इसके ज़रिए रोवर अपने नीचे की ज़मीन देखेगा. अगर वो जगह लैंडिंग के लिए सेफ नहीं पाई जाती है, तो दिशा बदलकर वो कहीं और लैंड करने जाएगा.

स्काई क्रेन की मदद से रोवर को मंगल पर रखा जाएगा.
स्काई क्रेन की मदद से रोवर को मंगल पर रखा जाएगा.

पर्सिवियरेंस को हौले से मंगल की सतह पर रखने के लिए Sky Crane का इस्तेमाल किया गया. पहले बूस्टर्स की मदद से रोवर लैंड कराते थे. लेकिन इसे एक क्रेन से नीचे रखा गया, जो बूस्टर्स की मदद से हवा में उड़ रही थी. ये रोवर को मंगल पर उतारने का ज़्यादा सेफ मैथड है. एक बार रोवर ज़मीन को छू लेता है, तो इस क्रेन से केबल अलग हो जाती हैं. और ये क्रेन कहीं दूर ले जाकर लैंड करा दी जाती है.

पर्सिवियरेंस रोवर के लक्ष्य को देखते हुए इसे मंगल ग्रह के एक बहुत बड़े गड्ढे में उतारा गया. इसे जेज़ेरो क्रेटर कहा जाता है. क्रेटर मतलब बहुत बड़ा गड्ढा. वैज्ञानिकों को लगता है कि जेज़ेरो क्रेटर में पहले एक बहुत बड़ा तालाब हुआ करता था. इसका मतलब है कि ये सूक्ष्म जीवों के निशान ढूंढने के लिए एक पर्फेक्ट जगह है.

जेज़ेरो क्रेटर में एक पानी के अंदर आने का चैनल है और दूसरा पानी के बाहर जाने का. अनुमान है कि यहां ज़रूर पहने पानी भरा रहा होगा. इसके अलावा इस क्रेटर में डेल्टा डिपॉज़िट्स भी हैं, जो कि पानी के बहाव से ही बनते हैं.

ये क्रेटर फिलहाल सूखा पड़ा है. लेकिन वैज्ञानिकों को लगता है कि पहले ये ऐसा रहा होगा.
ये क्रेटर फिलहाल सूखा पड़ा है. लेकिन वैज्ञानिकों को लगता है कि पहले ये ऐसा रहा होगा.

वैज्ञानिकों को ऐसा लगता है कि अगर मंगल पर कभी जीवन हुआ करता था तो इस क्रेटर में कई सारे सूक्ष्म जीव रहे होंगे. और कई सौ करोड़ साल बाद भी यहां उन सूक्ष्म जीवों के सुराख हमें मिल सकते हैं.

मंगल पर क्या देखा जाएगा?

पर्सिवियरेंस का डिज़ाइन बहुत कुछ पुराने रोवर्स जैसा ही है. लेकिन इसमें कई चीज़ें नई और आधुनिक हैं. पर्सिवियरेंस रोवर में सात साइंस इस्ट्रमेंट लगाए गए हैं, जो इस मिशन के ऑब्जेक्टिव्स को पूरा करने के काम आएंगे.

रोवर में लगे साइंस इंस्ट्रूमेंट्स के नाम और काम.
रोवर में लगे साइंस इंस्ट्रूमेंट्स के नाम और काम.

मंगल पर इस मिशन के चार साइंटिफिक ऑब्जेक्टिव्स हैं, जो मार्स एक्सप्लोरेशन प्रोग्राम के लक्ष्यों को भी ध्यान में रखते हैं.

1. Habitability देखना. मतलब सूक्ष्म जीवों के पनपने के लिए पहले के वातावरण की पहचान करना.

2. Biosignatures तलाशना. कुछ खास चट्टानें, जो कई सालों तक जीवन के सुराग सहेजने के लिए जानी जाती हैं. पर्सिवियरेंस को उनमें प्राचीन सूक्ष्म जीवों के निशान ढूंढने हैं.

3. Samples इकट्ठे करना. हमेशा से वैज्ञानिक ये कहते आए हैं कि मंगल पर जीवन का अंदाज़ा लैबोरेटरी में ही लगाया जा सकता है, जो कि फिलहाल पृथ्वी पर ही हैं. तो इसके लिए मंगल से कुछ सैंपल्स को पृथ्वी तक लाना पड़ेगा. इस रोवर में पहली बार ड्रिल मैकेनिज़्म का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसके ज़रिए ये मंगल की चट्टानों और मिट्टी के सैंपल्स को ड्रिल करके इकट्ठा करेगा और उन्हें सहेज कर ट्यूब्स में रखेगा. ऐसा प्लान है कि भविष्य में कोई मार्स मिशन से ये सैंपल्स धरती तक लेकर आएगा.

4. Human Missions के लिए तैयारी करना. अगर कभी मनुष्य मंगल पर जाते हैं तो वहां रहने के लिए उन्हें ऑक्सीजन की ज़रूरत होगी. पृथ्वी से एक सीमित मात्रा में ही ऑक्सीजन ले जाई जा सकती है. लेकिन अगर कोई ऐसा तरीका ईजाद कर लिया जाता है, जिससे मंगल पर ही ऑक्सीजन बनाई जा सके तो एक बहुत बड़ी अड़चन सामने से हट जाएगी. इसे In-Situ Resource Utilization कहा जाता है. इस मिशन में पहली बार यही कोशिश होने वाली है.

मंगल पर मानव बस्ती का नासा का प्लान.
मंगल पर मानव बस्ती का नासा का प्लान.

सबसे शानदार एक्सपेरिमेंट

सारे साइंस इंस्ट्रमेंट में से सबसे ज़्यादा ध्यान खींचने वाली चीज़ है MOXIE. पूरा नाम है Mars Oxygen In-Situ Resource Utilization Experiment. इस एक्सपेरिमेंट में पहली बार मंगल पर ऑक्सीजन बनाई जाएगी. उसके वातावरण में पाई जाने वाली गैसों में लगभग 96 प्रतिशत कार्बनडाइऑक्साइड है. ऑक्सीजन नाम मात्र की है. इस एक्सपेरिमेंट के ज़रिए मंगल पर कार्बनडाइऑक्साइड से ऑक्सीजन बनाने की कोशिश की जाएगी.

यही वो बक्सा है जिसमें ऑक्सीजन बनाई जाएगी.
यही वो बक्सा है जिसमें ऑक्सीजन बनाई जाएगी.

कार्बनडाइऑक्साइड में एक कार्बन का एटम होता है और दो ऑक्सीजन के. यहां से इन दो ऑक्सीजन एटम को अलग करके, दोनो को जोड़कर ऑक्सीजन गैस बनाई जाती है. जो काम पेड़-पौधे पृथ्वी पर करते हैं, लगभग वही काम वैज्ञानिक MOXIE के ज़रिए मंगल पर करना चाहते हैं.

बड़े वैज्ञानिक यंत्रों के अलावा इस रोवर में पहली बार माइक्रोफोन भी लगाया गया है. हम पहली बार मंगल की आवाज़ सुन पाएंगे. इससे पहले हमें पता ही नहीं था कि मंगल से कैसी आवाज़ आती है.

आखिर में इस मिशन की सबसे कूल चीज़. वो ये कि पर्सिवियरेंस रोवर के नीचे एक हेलीकॉप्टर भी लगाकर भेजा जाएगा, जिसका नाम है Ingenuity (इन्जेनुइटी).

मंगल पर लैंड करने के बाद पर्सिवियरेंस इसकी सतह पर हेलीकॉप्टर रखेगा और खुद वहां से दूर चला जाएगा. फिर ये हेलीकॉप्टर उड़ान भरेगा. इसके बाद रोवर में लगे कैमरे से पहली बार किसी दूसरे ग्रह पर हेलीकॉप्टर की उड़ान देखी जाएगी.

ये बस एक फ्लाइट डेमॉन्सट्रेशन एक्सपेरिमेंट है. ये देखने के लिए कि मंगल पर हेलीकॉप्टर उड़ाना कितना मुमकिन है. दरअसल, मंगल का एट्मॉस्फियर पृथ्वी के मुकाबले बहुत पतला है. इसलिए हेलीकॉप्टर के पंखों को वहां हवा से वो बल नहीं मिलेगा जो पृथ्वी पर मिलता है.

मंगल पर भेजने से पहले इस हेलीकॉप्टर को टेस्टिंग के दौरान एक खास माहौल में डिज़ाइन बदल-बदलकर उड़ाया गया है. अगर मंगल पर ये सफल होता है तो आगे के मिशन्स में हम रोवर के साथ हेलीकॉप्टर जाते देख सकते हैं. चूंकि इसका फील्ड ऑफ व्यू बड़ा होता है, इसलिए वो ज़्यादा दूर तक देख सकता है और रोवर को बेहतर गाइड कर सकता है.


वीडियो –  चीन के इस मंगल मिशन में अनोखी बात क्या है?

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