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गंगा-जमुनी संस्कृति के पैरोकार रहे नरोत्तम मिश्रा इतने हार्डलाइनर कैसे हो गए?

गृहमंत्री बनने के बाद से नरोत्तम मिश्रा के बयान लगातार चर्चा में हैं. (फोटो- FB/Narootam Mishra

23 मार्च 2020. भोपाल में शिवराज सिंह चौहान ने चौथी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के पद की शपथ ली. 15 साल बाद मध्य प्रदेश की सत्ता में वापस लौटी कांग्रेस पार्टी केवल 15 महीने ही सत्ता में रह सकी. ये सब हुआ कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने के बाद. उनके पीछे कांग्रेस के 22 विधायकों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. इनमें से 6 कमलनाथ सरकार में मंत्री थे. इसके चलते अल्पमत में आए कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और सरकार गिर गई.

लेकिन बीजेपी का एक नेता इस काम में काफी पहले से लग गया था. ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा कमलनाथ की सरकार गिराने और शिवराज को दोबारा कुर्सी तक पहुंचाने में इस नेता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ये नेता हैं डॉ. नरोत्तम मिश्रा, जो सिंधिया की ही तरह ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से आते हैं.

शिवराज चौहान को फिर सीएम बनाने का उन्हें इनाम भी मिला. 13 साल तक शिवराज सरकार में मंत्री रहे नरोत्तम मिश्रा को इस बार गृह और स्वास्थ्य जैसे बड़े मंत्रालय दिए गए. अगले दिन अखबारों की हेडलाइन बनी, शिवराज सरकार में नंबर 2 बने नरोत्तम मिश्रा.

मंत्री पद की शपथ लेते नरोत्तम मिश्रा (फाइल फोटो- PTI)

चर्चा में क्यों हैं नरोत्तम मिश्रा?

गृहमंत्री बनने के बाद नरोत्तम मिश्रा का नाम पिछले एक-डेढ़ साल से खूब चर्चा में रहा है. उनके बयानों की वजह से. फिर चाहे वो लव जिहाद कानून का मसला रहा हो या फिर विज्ञापन-वेबसीरीज में हिंदू धर्म और संस्कृति को लेकर जारी उनकी चेतावनी. एक के बाद एक लगातार बयान देकर नरोत्तम मिश्रा ने उन नेताओं की कतार में खड़े होने की कोशिश की है जो हिंदुत्व की राजनीति करते हैं. गृहमंत्री बनने के बाद नरोत्तम मिश्रा के ऐसे बयानों पर एक नजर डालते हैं,

1. सब्यसाची

मशहूर फैशन और ज्वेलरी डिजाइनर सब्यसाची मुखर्जी ने कुछ दिनों पहले इंटीमेट फाइन ज्वेलरी के नाम से अपना न्यू ज्वेलरी कलेक्शन लॉन्च किया था. इसमें मंगलसूत्र पहने मॉडल्स नजर आई थीं. सब्यसाची के विज्ञापन के विरोध में मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने इसे हटाने के लिए 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया था. उन्होंने कहा था कि अगर इस विज्ञापन को 24 घंटे में नहीं हटाया गया तो सब्यसाची के खिलाफ केस दर्ज करके कानूनी कार्रवाई की जाएगी. जिसके बाद सब्यसाची ने विज्ञापन हटा लिया.

विज्ञापन हटने के बाद नरोत्तम मिश्रा ने कहा,

हिंदू धर्म के साथ खिलवाड़ करने वाले ऐसे कृत्य को हम पहली बार की भूल मान रहे हैं. अगर आगे ऐसा दोबारा हुआ तो चेतावनी नहीं, सीधे कार्रवाई होगी.

2. आश्रम

24 अक्टूबर को भोपाल में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने वेब सीरीज ‘आश्रम’ का नाम बदलने की मांग को लेकर हंगामा किया था. कई गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई और निर्देशक प्रकाश झा के ऊपर काली स्याही फेंक दी गई थी. इन सबके बीच गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने भी वेब सीरीज के नाम पर आपत्ति जताई थी. कहा,

आश्रम नाम क्यों? किसी दूसरे धर्म पर नाम रखकर बताओ. हमारी भावनाओं को आहत करने वाले दृश्य फिल्माते क्यों हो? हिम्मत है तो दूसरे धर्म के बारे में ऐसा करके बताओ.

नरोत्तम मिश्रा ने ये भी कहा कि मध्य प्रदेश सरकार शूटिंग को लेकर स्थायी गाइडलाइन लाएगी. जिसमें शूटिंग से पहले प्रशासन को स्टोरी देकर अनुमति लेनी होगी. उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में शूटिंग करने वालों का स्वागत है लेकिन धार्मिक भावनाएं आहत न करें.

3. चूड़ी विक्रेता विवाद

23 अगस्त 2021 को एक वीडियो वायरल हुआ. जिसमें कुछ लोग एक चूड़ी बेचने वाले शख्स को घेरकर पीट रहे थे. हमलावर चूड़ी बेचने वाले को मुसलमान बता रहे थे और हिंदू क्षेत्र में दोबारा न आने की धमकी देते नजर आते हैं. वीडियो वायरल हुआ तो मारपीट करने वालों की खोजबीन शुरू हुई. पता चला कि वीडियो इंदौर का है. मारपीट करने वालों ने चूड़ी विक्रेता पर महिलाओं के साथ गलत व्यवहार करने और अपनी पहचान छुपाने का आरोप लगाया. जबकि पीड़ित चूड़ी विक्रेता तस्लीम ने कहा कि लोगों ने पहले उसकी जाति पूछी और फिर उसकी पिटाई करने लगे. इस पूरे मामले पर मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का भी बयान आया. उन्होंने कहा,

युवक अपना धर्म और नाम छिपा कर चूड़ियां बेच रहा था, लेकिन विवाद की शुरुआत हाथ पकड़ने पर हुई. इसके बाद जब उसका आधार कार्ड देखा गया तो उसके धर्म का पता चला. सवाल ये है कि उसने अपना धर्म क्यों छिपाया? सही नाम से घूमे जहां घूमना है. कौन रोक रहा है? लेकिन उसने ऐसा क्यों किया?

4. तांडव

तांडव वेब सीरीज पर जारी विवाद को लेकर उत्तर प्रदेश में वेब सीरीज के निर्माताओं पर केस दर्ज हुआ तो मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने भी कार्रवाई की बात कही. उन्होंने कहा,

OTT पर जारी तांडव में जिस प्रकार से हिंदू धर्म की भावनाओं से खिलवाड़ करने की कोशिश की गई है, विपक्षियों को जवाब देना चाहिए कि आखिर किसी दूसरे धर्म के संबंध में फिल्मकार इस प्रकार की टिप्पणी या फिल्मांकन क्यों नहीं करते हैं. ये विशुद्ध तुष्टीकरण की नीति है. हम इसकी निंदा करते हैं.

5. ‘भून देंगे’

18 दिसंबर 2020. मीडिया से बात करते हुए मध्य प्रदेश के गृहमंत्री ने अपराधियों को भून देने की बात कही. नरोत्तम मिश्रा ने कहा,

हमें नक्सल गतिविधियों में बड़ी सफलता मिली है. नक्सल गतिविधियों पर विराम और हमारा अभियान समानांतर चल रहे हैं. एक दौर था, वो शायद दिग्विजय सिंह का था. जब पूरे प्रदेश में अशांति थी. कोई भी अपराधी अब मध्य प्रदेश में शरण नहीं ले पाएगा. हम भून देंगे.

योगी ब्रांड पॉलिटिक्स का असर?

एक के बाद एक इन्हीं बयानों की वजह से नरोत्तम मिश्रा को अचानक से मध्य प्रदेश की राजनीति में हिंदुत्व के चेहरे के रूप में देखा जाने लगा है. मध्य प्रदेश के पत्रकार बताते हैं कि अब तक राज्य में ऐसे दो ही चेहरे थे. एक प्रज्ञा सिंह ठाकुर और दूसरे रामेश्वर शर्मा. लेकिन गृहमंत्री बनने के बाद पिछले एक साल में नरोत्तम मिश्रा काफी आगे आ गए हैं. इसकी एक प्रमुख वजह मीडिया के लिए उनकी सहज उपलब्धता बताई जाती है. इंडिया टुडे-आजतक के एसोसिएट एडिटर रवीश पाल सिंह बताते हैं,

नरोत्तम सुर्खियों में ज्यादा रहते हैं. क्योंकि मीडिया का अप्रोच हर बार मुख्यमंत्री तक होता नहीं है. जबकि नरोत्तम मिश्रा आसानी से मिल जाते हैं. वो मध्य प्रदेश सरकार के अधिकृत प्रवक्ता भी हैं. उनकी रोज सुबह एक प्रेस मीटिंग भी तय रहती है. इस वजह से इनके बयान हमेशा पहले आ जाते हैं. जैसे ही बयान आता है वो चल जाता है.

थोड़ा पीछे जाने पर हमें दतिया की वो खबरें भी मिलती हैं जिनमें नरोत्तम मिश्रा साम्प्रदायिक सौहार्द्र और आपसी भाई चारे की बात कर रहे हैं. 22 अप्रैल 2015 को नई दुनिया अखबार की वेबसाइट पर छपी खबर के मुताबिक एक सामूहिक विवाह कार्यक्रम में नरोत्तम मिश्रा कहते हैं,

ये गंगा-जमुनी संस्कृति नहीं तो और क्या है. हिंदुस्तान में मध्य प्रदेश ही एक ऐसा प्रदेश है जहां एक ही पंडाल में निकाह भी हो रहा है और विवाह भी.

नई दुनिया अखबार की ही 2 अप्रैल 2017 की खबर बताती है कि नरोत्तम मिश्रा ने हज से लौटे लोगों के लिए सम्मान समारोह का आयोजन किया और दतिया को साम्प्रदायिक सद्भाव की नगरी बताया.

योगी आदित्यनाथ से प्रेरित?

नरोत्तम मिश्रा के बयानों और छवि में आए इस बदलाव को मध्य प्रदेश के पत्रकार पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रेरित भी बताते हैं. इसके कई उदाहरण भी हैं. जैसे- लव जिहाद कानून, गुंडों-माफियाओं की संपत्ति जब्त करना और ध्वस्तीकरण, हिंदू धर्म और संस्कृति की रक्षा पर जोर देना आदि. 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद बीजेपी के नेताओं में खुद को हार्डलाइनर दिखाने का चलन बढ़ा है.

2018 के विधानसभा चुनाव पर ‘चुनाव है बदलाव का’ और 2020 में कमलनाथ की सरकार के गिरने और शिवराज के सत्ता संभालने पर ‘वो सत्रह दिन’ नाम से किताब लिख चुके एबीपी न्यूज के ब्रजेश राजपूत इसे नरोत्तम मिश्रा का नया अवतार बताते हैं. ब्रजेश बताते हैं,

ये नया अवतार हुआ है. ‘पहले तो आप ऐसे न थे’ वाला मामला है. योगी ने जो नया ट्रेंड शुरू किया है. उसके बाद से मध्य प्रदेश बीजेपी में एक हार्डलाइनर की कमी महसूस की जा रही थी. पहले ये भूमिका कैलाश विजयवर्गीय निभाते थे. सबके खिलाफ खुल के बोलते थे. उनके बाद जगह खाली थी. लोगों को लग रहा है कि आने वाला जमाना योगी और उनके जैसे हार्डलाइनर का है. उन सबमें नरोत्तम अपने को फिट कर रहे हैं. बहुत सारे कानून वहीं (उत्तर प्रदेश) से लिए जा रहे हैं. मध्य प्रदेश में योगी ब्रांड पॉलिटिक्स को बढ़ा रहे हैं. शुरू से वे ऐसे नहीं थे. 

क्या नरोत्तम मिश्रा ऐसा खुद को फ्यूचर लीडर लीडर के तौर पर स्थापित करने के लिए कर रहे हैं? इस सवाल के जवाब में ब्रजेश कहते हैं,

नरोत्तम मिश्रा जिन मुद्दों पर अड़ते हैं, अड़ जाते हैं. खुल कर बोलते हैं. कहने को तो मंत्रिमंडल में इतने सालों से थे लेकिन उन्हें कभी बहुत बड़ा पोर्टफोलियो मिला नहीं. अब जाकर मिला है. पहले उन्होंने मुख्यमंत्री पद की आस लगाई हुई थी. वो नहीं मिला. उपमुख्यमंत्री पद की आस थी, वो भी नहीं मिला. फिर जो दूसरा सबसे बड़ा पोर्टफोलियो होता है, वो जाकर मिला. हर बार उनके साथ ‘आस निराश भई’ टाइप मामला हो जाता है. अब इसी कोशिश में कि अगर आने वाले समय में RSS बीजेपी हार्डलाइनर को पसंद करेगी तो उसमें सबसे पहला नाम नरोत्तम मिश्रा का ही रहेगा.

जून 2020 में हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान आपस में बात करते शिवराज सिंह चौहान और नरोत्तम मिश्रा (PTI)

छात्र राजनीति से शुरुआत

डॉ. नरोत्तम मिश्रा के राजनीतिक सफर की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई. ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने राजनीति में कदम रखा. साल 1977-78 में वे जीवाजी विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के सचिव बने. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले डॉ. नरोत्तम मिश्रा इसके बाद बीजेपी युवा मोर्चा के प्रान्तीय कार्यकारिणी सदस्य बने. साल 1985-87 के दौरान मध्य प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी के सदस्य रहे.

साल 1990 में पहली बार ग्वालियर की डबरा विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे और चुनाव जीतकर मध्य प्रदेश की नौवीं विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए. उन्होंने विधानसभा में सचेतक की भूमिका भी निभाई. वे साल 1998 में दूसरी बार, 2003 में तीसरी बार भी डबरा से निर्वाचित हुए. 2008 में डबरा विधानसभा सीट आरक्षित होने के बाद नरोत्तम मिश्रा दतिया सीट पर आ गए और यहीं से 2008 में चौथी बार, 2013 में पांचवीं बार और 2018 में छठवीं बार मध्य प्रदेश विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए.

2005 में पहली बार बने कैबिनेट मंत्री

नरोत्तम मिश्रा जून 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के मंत्रिमंडल में राज्य मंत्री के रूप में शामिल हुए थे. इसके बाद दिसंबर 2005 में शिवराज मुख्यमंत्री बने तो नरोत्तम मिश्रा उनके मंत्रिमंडल में भी शामिल हुए. इसके बाद से लगातार नरोत्तम मिश्रा, 2018 तक शिवराज की सरकार में मंत्री पद पर बने रहे.

2018 के विधानसभा चुनाव में बहुमत से पीछे रह गई भारतीय जनता पार्टी को दोबारा सत्ता में बिठाने में नरोत्तम मिश्रा का अहम किरदार रहा. इस साल अक्टूबर में उन्हें बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह मिली है. गृहमंत्री बनने से पहले भी नरोत्तम मिश्रा का नाम अलग-अलग वजहों से चर्चा में रहा है. इनमें पेड न्यूज मामला और ई-टेंडर घोटाला प्रमुख है.

जब चुनाव आयोग ने ठहराया अयोग्य

साल 2008. मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए. नरोत्तम मिश्रा दतिया सीट से चुनाव जीते. दूसरे स्थान पर रहे पूर्व विधायक राजेंद्र भारती ने 2009 में चुनाव आयोग से शिकायत की. राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा पर चुनाव के दौरान पेड न्यूज पब्लिश कराने का आरोप लगाया. चुनाव आयोग ने पाया कि नरोत्तम मिश्रा ने चुनाव में पेड न्यूज पर खर्च की गई रकम को अपने चुनावी खर्च में नहीं दर्शाया था. पेड न्यूज यानी वो खबर जिसे प्रकाशित करने के लिए पैसे दिए गए हों. 8 साल बाद फैसला आया और 2017 में चुनाव आयोग ने तत्कालीन जल संसाधन और जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा को दोषी मानते हुए उन्हें विभानसभा के लिए अयोग्य करार दिया.

इसके अलावा 3 साल तक उनके चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी गई. जिसके बाद नरोत्तम मिश्रा राष्ट्रपति चुनाव में वोट नहीं डाल पाए थे. हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट की डबल बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए नरोत्तम मिश्रा को बरी कर दिया था.

ई-टेंडर घोटाला

अप्रैल 2019 में मध्य प्रदेश की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने पूर्ववर्ती शिवराज सरकार के कार्यकाल में जारी पांच विभागों के 9 टेंडर्स में टेंपरिंग को लेकर एक FIR दर्ज की. इसे ईं-टेंडर घोटाला कहा गया. इन पांच विभागों में एक नरोत्तम मिश्रा का जल संसाधन विभाग भी था. EOW ने नरोत्तम मिश्रा के दो निजी सहयोगियों को इस मामले में गिरफ्तार भी किया था. जिसके बाद नरोत्तम मिश्रा ने इसे राजनीति से प्रेरित कार्रवाई बताते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ को चुनौती देते हुए कहा था कि अगर उनके खिलाफ सबूत हैं तो कार्रवाई करके दिखाएं. साल भर के भीतर सरकार बदल गई और मामला फिलहाल ठंडे बस्ते में है.

विधानसभा सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक के दौरान नरोत्तम मिश्रा और कमल नाथ. (फाइल फोटो- PTI)

अमित शाह के नजदीकी

नरोत्तम मिश्रा को अमित शाह का करीबी माना जाता है. शाह ने बंगाल चुनाव के लिए अपनी जो कोर टीम बनाई थी 7 लोगों की, उसमें एक नाम नरोत्तम मिश्रा का भी था. इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में नरोत्तम मिश्रा को कानपुर लोकसभा का प्रभारी बनाया गया था. 2017 के विधानसभा चुनाव में भी नरोत्तम मिश्रा को कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया था. उनका नाम मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ स्टार प्रचारकों की लिस्ट में था. नरोत्तम मिश्रा के प्रभार वाली अधिकतर सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी. इसकी वजह से वे अमित शाह के नजदीक आए.

इसके अलावा बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद 2017 में अमित शाह जब भोपाल आए तो नरोत्तम मिश्रा के घर ही भोजन करने गए. नरोत्तम मिश्रा तब जल संसाधन मंत्री हुआ करते थे. इसके बाद से लोगों को नरोत्तम मिश्रा की अमित शाह से नजदीकी का अहसास हुआ.

2017 में चुनाव आयोग ने नरोत्तम मिश्रा को अयोग्य घोषित कर दिया था. कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन और पार्टी के एक धड़े की मांग के बावजूद नरोत्तम से इस्तीफा देने के लिए नहीं कहा गया. 2020 में जब कमलनाथ की सरकार गई तो शिवराज के अलावा मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में जो नाम सबसे आगे थे, उनमें नरोत्तम मिश्रा का नाम प्रमुख था. इसकी वजह भी थी, कि वे शुरू से ही सरकार बनाने में लगे हुए थे. वे सार्वजनिक मंचों से इस बात को खुलकर बोलते भी थे कि जिस दिन हमारे ऊपर के लोग बोल देंगे, हम सरकार गिरा देंगे. मध्य प्रदेश के पत्रकार उन्हें एकमात्र ऐसा नेता मानते हैं जो खुलकर इस काम में लगे हुए थे.

कांग्रेस और सपा-बसपा के कई विधायकों को लेकर एक बार वे गुरुग्राम पहुंच भी गए थे. जहां जयवर्धन सिंह और जीतू पटवारी भी पहुंच गए थे और प्लान गड़बड़ हो गया था. प्लान ए सफल नहीं हुआ तो फिर प्लान बी आया, जिसमें सिंधिया और उनके साथ के लोग बीजेपी में आए और फिर सरकार बनी. सरकार बनी तो मुख्यमंत्री पद को लेकर भी उनका नाम चला. लेकिन शिवराज के मुकाबले वे पीछे रह गए. आगे 28 सीटों पर उपचुनाव थे. इसलिए बीजेपी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. इस वजह से शिवराज मुख्यमंत्री बने और इनको गृह मंत्रालय का जिम्मा दिया गया. फिलहाल शिवराज सिंह चौहान राज्य के मुख्यमंत्री हैं. लेकिन सारी लड़ाई फ्यूचर लीडर की है कि शिवराज के बाद अगला नेता कौन?

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