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बैन किए गए चीनी ऐप्स से तो महीनों से ख़तरा था, मोदी सरकार ने अभी प्रतिबंध क्यों लगाया?

मामला है कि 59 ऐप्स पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है. सरकार ने सीधे तौर पर चीन का नाम तो नहीं लिया, लेकिन तथ्य है कि ये सारे ऐप चीनी कम्पनियों के हैं. ऐसे में किस नियम के तहत इन ऐप्स को प्रतिबंधित किया गया है? क़ानून क्या है? और क्या इन कम्पनियों के पास कोई और क़ानूनी रास्ता है? इस आर्टिकल में हम इन सारे सवालों के जवाब खोजने की कोशिश करेंगे.

किस क़ानून के तहत इन कम्पनियों को प्रतिबंधित किया गया है?

सरकार ने बैन लगाने के लिए इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 के सेक्शन 69 A का हवाला दिया है. इस सेक्शन में बताया गया है कि पब्लिक द्वारा किसी भी कम्प्यूटर रिसोर्स के ज़रिए जानकारी एक्सेस करने पर केंद्र सरकार या उसके अंग रोक लगा सकते हैं. किस स्थिति में? आगे पढ़िए :

उस स्थिति में कि केंद्र सरकार या इसका कोई अधिकारी इस बात को लेकर आश्वस्त है कि ऐसा करना ज़रूरी है, देश की एकता और संप्रभुता के हित में, देश की सुरक्षा के लिए, विदेशों से दोस्ताना संबंध बनाए रखने के लिए, या फिर पब्लिक ऑर्डर बनाए रखने के लिए, या फिर पब्लिक ऑर्डर को बिगाड़ने के लिए किए जाने वाले अपराधों को रोकने के लिए.”

यानी इन परिस्थितियों में 69A का इस्तेमाल करके किसी भी कम्प्यूटर रिसोर्स से मिलने वाली सूचना को प्रतिबंधित किया जा सकता है. अगर इस प्रतिबंध का पालन नहीं होता है तो 7 साल तक का कारावास और जुर्माना देना पड़ सकता है. केंद्र सरकार ने भी देश की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता को ख़तरा बताया है. लिहाज़ा 59 चीनी ऐप बंद हैं. 

सवाल उठता है कि ये प्रतिबंध क़ानूनी है?

सवाल इसलिए कि 69A का उपयोग आमतौर पर वेबसाइट्स के लिए किया जाता है. और सरकार ने इसका उपयोग ऐप्स को प्रतिबंधित करने के लिए किया है. इसका जवाब सलमान वारिस देते हैं. सलमान टेक और साइबर मामलों के वक़ील हैं, और टेकलेजिस नाम की संस्था संचालित करते हैं. सलमान बताते हैं,

“सरकार को सुरक्षा और ख़ुफ़िया एजेंसियों से लगातार इन ऐप्स को लेकर सूचनाएं मिल रही होंगी. इसलिए सरकार ने 69A के तहत ऐप्स को प्रतिबंधित करने का निर्णय लिया, जो अमूमन वेबसाइटों के लिए यूज किया जाता है. सरकार ऐसा इसलिए कर सकी क्योंकि 69A के तहत किसी भी कम्प्यूटर रिसोर्स से डेटा या सूचना का आदान प्रदान प्रतिबंधित किया जा सकता है. और यहां पर वो कम्प्यूटर रिसोर्स आपका मोबाइल फोन है. और ऐप्स सूचना कलेक्ट करने या उसे भेजने का ज़रिया हैं.”

सलमान वारिस ज़ूम कॉलिंग ऐप का भी उदाहरण देते हैं. लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में ज़ूम कॉलिंग ऐप पर भी सरकार की ओर से सवाल उठे थे. सरकार ने कहा था कि ये ऐप भारी मात्रा में देश का डेटा कलेक्ट करता है और देश के बाहर ले जा रहा है. इसका इस्तेमाल न करने की हिदायत भी आयी थी. 

लेकिन एक सवाल और है. वो ये कि लम्बे समय से इन ऐप्स पर डेटाचोरी के आरोप लगते रहे हैं. सरकार ने पहले क्यों नहीं प्रतिबंध लगाया. सलमान वारिस कहते हैं,

“ये बड़ा सवाल है. क्योंकि इन ऐप्स की वजह से सुरक्षा को ख़तरा हो रहा था, और सरकार चुप थी. सरकार को इसी समय ये निर्णय लेना था, जिससे साफ़ होता है कि ये निर्णय इस समय दोनों देशों के बीच की राजनीति से प्रेरित है.”

अगला सवाल : क्या जिन कम्पनियों के ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया गया है, उनके सारे रास्ते बंद हो गए हैं?

सवाल का जवाब है, नहीं. अभी तो फ़ौरी तौर पर इन कम्पनियों को सरकारी एजेंसियो के सामने अगले 48 घंटे के भीतर अपना तर्क पेश करना है, सफ़ाई देनी है. TikTok ने अपने आधिकारिक बयान में दावा भी किया है कि वो किसी भी क़िस्म का डेटा नहीं चुराता है, और सरकार के सामने भी अपनी बात रखेगा.

लेकिन अगर सरकार बात नहीं सुनती है, तो भी कम्पनियों के पास कोर्ट का सहारा है. सलमान वारिस बताते हैं,

“कुछ कम्पनियों के भारत में ऑफ़िस हैं, कुछ के नहीं हैं. लेकिन दोनों ही परिस्थितियों में कंपनियां कोर्ट में अपनी बात रख सकती हैं. अपना पक्ष रख सकती हैं. याचिका दायर कर सकती हैं. ये अलग मुद्दा है कि वो अदालतों को बैन को हटाने या परिवर्तन करने के लिए राज़ी कर पाती हैं या नहीं.”

इसके पहले भी 2019 में मद्रास हाईकोर्ट ने TikTok पर प्रतिबंध लगाया था. TikTok बनाने वाली कम्पनी ByteDance ने इस फ़ैसले को चुनौती दी थी. जिसके बाद हाईकोर्ट ने ही ख़ुद बैन हटा भी लिया था. इस बार भी कंपनियां बेहाथ नहीं हैं. क़ानून है. ज़रिया है. आज़माने की संवैधानिक छूट भी है ही.


वीडियो : मोदी सरकार के 59 चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने के बाद टिकटॉक ने अपने चिट्ठी में क्या लिखा है?

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