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'क्यों नहीं लिखूं वेश्याओं पर'

‘जो चीज जैसी है, उसे वैसी ही पेश क्यों न किया जाए. टाट को रेशम क्यों कहा जाए.’

इन दो आसान लाइनों में ही सआदत हसन मंटो ने अपनी पूरी आइडियोलॉजी समझा दी. ये बात मंटो एक कॉलेज के क्लास रूम में लेक्चर देते हुए कह रहे हैं. और ये सीन है नंदिता दास की शॉर्ट फिल्म ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे’ का. मुंबई में हुए इंडिया टुडे कॉन्क्लेव-2017 में ये फिल्म दिखाई गई. नंदिता दास एक्ट्रेस भी हैं और डायरेक्टर भी. वही ‘फायर’, ‘अर्थ’ वाली नंदिता दास. और जो ‘फिराक़’ फिल्म आई थी 2008  में, इसको डायरेक्ट किया था.

मंटो भारत-पाकिस्तान विभाजन से आहत, समाज के दोगलेपन से बौराए हुए, औरतों से होने वाले दोयम दर्जे के बर्ताव से ग्लानि और गुस्से में डूबे हुए वो दास्तानगो थे. जिनकी कलम से निकले हर एक हर्फ ने स्याह पड़ चुकी सच्चाइयों को बेरहमी से बेपरदा किया है. मंटो पर अश्लीलता फैलाने के बारहा आरोप लगते रहे. उनकी कहानी ‘बू’, ‘खोल दो’ समेत 6 कहानियों पर कोर्ट में मुकदमा चला था. लेकिन हर बार अदालत ने उन्हें बरी करती गई. काले चरित्र वाले सफेदपोश मंटो की कलम से ऑफेंडेड होते रहे. लेकिन तरक्कीपसंद और खुले दिल-दिमाग के लोगों ने मंटो को हमेशा सिर-आंखों पर चढ़ाए रखा.

नंदिता दास की इस शॉर्ट फिल्म में मंटो लोगों की पर्दानशीन खामियों के धागे खोलते नजर आ रहे हैं. वो कहते हैं,

‘क्यों न लिखूं वेश्याओं के बारे में, क्यों वो हमारे माश्शरे (समाज) का हिस्सा नहीं हैं? उनके यहां मर्द नमाज या दुरुह पढ़ने तो नहीं जाते हैं, उन्हें वहां जाने की पूरी इजाजत है लेकिन हमें उनके बारे में लिखने की नहीं. क्यों नहीं?’

अब हम इस फिल्म के बारे में ज्यादा नहीं लिख रहे. हां, फिल्म की आखिरी लाइन है न. वैसे तो मंटो के व्यक्तित्व को बताने में कई किताबें और सिनेमा खर्च किए जा सकते हैं. लेकिन उस एक आखिरी लाइन ने मंटो की ताउम्र बेचैनी के आलम को समेट लिया है.

अब यहां देखो, ‘बोल के लब आज़ाद हैं तेरे’:


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