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29 बच्चियों से बार-बार रेप और एक बच्ची की हत्या, फिर भी ये मामला दबा हुआ क्यों है?

मुंबई की एक संस्था है टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज. इसका काम है सोशल ऑडिट करना. इस संस्था की एक टीम कोशिश ने 2017-18 में बिहार में चल रहे सभी बालिका गृहों का सोशल ऑडिट किया था. ये सोशल ऑडिट बिहार सरकार के समाज कल्याण विभाग के आदेश पर किया गया था. कोशिश टीम ने सोशल ऑडिट के बाद 15 मार्च को बिहार सरकार को पूरी ऑडिट रिपोर्ट भेजी गई थी. 100 पन्नों की इस रिपोर्ट में पेज नंबर 51 पर दावा किया गया था कि मुजफ्फरपुर में चल रहे बालिका गृह सेवा संकल्प एवं विकास समिति में लड़कियों का यौन शोषण हो रहा है. टीम की ओर से भेजी गई रिपोर्ट में स्वयंसेवी संस्था सेवा संस्थान संकल्प एवं विकास समिति के खिलाफ तत्काल केस दर्ज करने और पूरे मामले की जांच करवाने की सिफारिश की गई थी.

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की संस्था कोशिश की ऑडिट रिपोर्ट में ये मामला सामने आया था.

इस रिपोर्ट की एक कॉपी मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन को भी सौंपी गई थी, लेकिन ये रिपोर्ट 26 मई को जिला प्रशासन को सौंपी गई थी. जिला प्रशासन ने भी अपनी प्राथमिक जांच में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की ओर से लगाए गए आरोपों की पुष्टि की. इसके बाद मुजफ्फरपुर के बाल संरक्षण के सहायक निदेशक दिवेश शर्मा के आवेदन पर महिला थाने में 31 मई 2018 को बालिका गृह सेवा संकल्प एवं विकास समिति के संचालक ब्रजेश ठाकुर और विनीत के साथ ही संस्था के कर्मचारियों और अधिकारियों पर यौन शोषण, आपराधिक षड्यंत्र और पॉक्सो ऐक्ट के तहत केस दर्ज करवा दिया गया. पूरे मामले की जांच महिला थाने की थानेदार ज्योति कुमारी को सौंप दी गई.

संस्था सेवा संकल्प एवं विकास समिति के खिलाफ महिला थाने में केस दर्ज किया गया था.

इसके बाद जांच शुरू हो गई. पुलिस अधिकारी महिला थानाध्यक्ष के साथ सेवा संकल्प एवं विकास समिति पहुंचे और जांच शुरू कर दी. मामले की जानकारी मुजफ्फरपुर  के समाज कल्याण विभाग के निदेशक दिलीप कुमार वर्मा को भी भी दे दी गई. वहीं केस दर्ज होने से ठीक एक दिन पहले 30 मई 2018 को ही समाज कल्याण विभाग के हस्तक्षेप के बाद बालिका गृह की 87 बच्चियों में से 44 बच्चियों को दूसरी जगहों पर ट्रांसफर कर दिया गया. इनमें से 14 लड़कियों को मधुबनी, 14 को मोकामा और 16 लड़कियों को पटना जिले में ट्रांसफर कर दिया गया.

2 जून को सरकार की ओर से इस मामले की जांच के लिए एसआईटी बना दी गई, जिसका नेतृत्व एसपी सिटी यूएन वर्मा कर रहे थे. टीम ने 2 जून को बालिका गृह में छापेमारी की. इसके बाद बालिका गृह के संचालक ब्रजेश ठाकुर और विनीत के साथ ही वहां की आठ महिलाओं को महिला थाने ले जाकर पूछताछ की गई. इस दौरान डीएसपी मुकुल रंजन और महिला थाने की थानेदार ज्योति कुमारी साहू रोड स्थित सेवा संकल्प के ऑफिस पहुंचे और वहां से विजिटर रजिस्टर, स्टाफ रजिस्टर, एक कैसेट और कई कागजात अपने कब्जे में ले लिया. 2 जून की दोपहर में ही तीन बजे के करीब टीम एसएसपी हरप्रीत कौर के साथ बालिका गृह पहुंची और बालिका गृह का निरीक्षण कर बालिका गृह पर ताला लगा दिया. अगले ही दिन यानी 3 जून को पुलिस ने बालिका गृह के संरक्षक ब्रजेश ठाकुर के साथ ही बालिका गृह में काम कर रही किरण कुमारी, चंदा कुमारी, मंजू देवी, इंदु कुमारी, हेमा मसीह, मीनू देवी और नेहा को गिरफ्तार कर लिया. इस दौरान महिला आयोग ने भी इस मामले का स्वत: संज्ञान ने लिया. आयोग की अध्यक्ष दिलमणि मिश्रा ने बालिका गृह का निरीक्षण किया और कहा कि यहां की व्यवस्था जेल से भी बदतर है.

रिपोर्ट में दावा किया गया था कि सात साल से लेकर 14 साल तक की बच्चियों से रेप हुआ है. मेडिकल में भी इस बात की पुष्टि हुई है. (सांकेतिक फोटो)

इस कार्यवाही के दौरान यही लग रहा था कि बालिका गृह में कुछ गड़बड़ियां हैं और बच्चियों का यौन शोषण हुआ है. लेकिन जब बच्चियों ने मुंह खोला, तो पता चला कि इस बालिका गृह में न सिर्फ बच्चियों का यौन शोषण हुआ है, बल्कि यहां की 29 बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ है, एक बच्ची की हत्या कर शव दफना दिया गया है और यहां की बच्चियों को कई सफेदपोशों के पास भी भेजा जाता रहा है. इसके अलावा तीन बच्चियों के गर्भवती होने की भी पुष्टि हुई. अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स में इन दावों की पुष्टि की गई है.

मुजफ्फरपुर में मामला सामने आने के बाद वहां से 44 बच्चियों को पटना, मोकामा और मधुबनी भेज दिया गया था.

दरअसल जब बाल संरक्षण गृह पर केस दर्ज हुआ और जांच शुरू हुई तो बाल संरक्षण गृह से मधुबनी, मोकामा और पटना भेजी गई लड़कियों से पुलिस ने पूछताछ शुरू की. पहले तो बच्चियां कुछ भी बोलने से डरती रहीं, लेकिन जब उन्हें लगा कि वो सुरक्षित हैं, तो उन्होंने मुंह खोल दिया. 25 जून को कोर्ट में धारा 164 के तहत दिए बयान में बच्चियों ने बताया कि बाल संरक्षण गृह में बच्चियों को पॉर्न दिखाया जाता था. पॉर्न दिखाने के बाद उन बच्चियों को नशे का इंजेक्शन दिया जाता था. ये इंजेक्शन उन्हें एक आंटी देती थी, जो बाल संरक्षण गृह में काम करने वाली मधु थी. इंजेक्शन देने के बाद एक शख्स उन्हें बागीचे में ले जाता था, जहां उनके साथ गलत काम होता था. इसके अलावा बाल संरक्षण गृह में काम करने वाली औरतें भी बच्चियों के साथ गलत काम करती थीं. लड़कियों ने कोर्ट को बताया कि उनके लिए सबसे भयानक दिन मंगलवार का होता था. मंगलवार को उन बच्चियों की काउंसलिंग होती थी. काउंसलिंग के नाम पर उन बच्चियों को बाहर ले जाया जाता था, जहां उनके साथ गलत काम होता था. हालांकि बच्चियां ये नहीं बता पाईं कि उन्हें बाहर कहां ले जाया जाता था. बच्चियों के इस बयान के बाद उनका मेडिकल करवाया गया. कोर्ट के आदेश पर बिहार के सबसे बड़े अस्पताल पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पीएमसीएच) में सभी लड़कियों का मेडिकल हुआ.

मेडिकल रिपोर्ट में 29 बच्चियों के साथ रेप की पुष्टि हुई है. (सांकेतिक फोटो)

मेडिकल जांच में पता चला कि बालिका गृह में कुल 29 बच्चियों के साथ रेप हुआ है, जिनमें से एक की उम्र तो महज सात साल है. इसके अलावा मेडिकल जांच में तीन लड़कियों के गर्भवती होने की भी पुष्टि हुई. इसी दौरान 20 जुलाई को पटना के बाल संरक्षण गृह भेजी गई एक लड़की ने पुलिस को बताया कि एक बच्ची ने गलत काम का विरोध किया, तो उसकी पिटाई की गई. उसे इतना पीटा गया कि उसकी मौत हो गई. बाथरूम में उसकी लाश बरामद होने के बाद बाल संरक्षण गृह की ओर से उसे बाल संरक्षण गृह के लीची के बागीचे में दफना दिया गया. अब पुलिस उस लाश को बरामद करने के लिए बाल संरक्षण गृह की खुदाई करने जा रही है. पाक्सो कोर्ट ने इसके लिए एक मैजिस्ट्रेट को नियुक्त कर दिया है. कोर्ट ने मुजफ्फरपुर के डीएम मोहम्मद सुहैल को आदेश दिया है कि मैजिस्ट्रेट की निगरानी में पूरी खुदाई की वीडियोग्राफी करवाई जाएगी और बाल संरक्षण गृह में खुदाई कर लाश को बरामद किया जाएगा.

जिनके जिम्मे बच्चियों की सुरक्षा थी, उन्होंने ही हैवानियत की

Brajesh Ravi
बालिका गृह का संचालक ब्रजेश ठाकुर और बाल संरक्षण अधिकारी रवि रोशन.

बालिका गृह में उन बच्चियों को रखा जाता है, जिनके साथ कोई अपराध होता है या फिर जो अपराध में शामिल होती हैं. ऐसी बच्चियों को तीन महीने से लेकर छह महीने तक बालिका गृह में रखा जाता है. यहां बच्चियों को शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक की सुविधा मुहैया करवाई जाती है. इसके अलावा चित्रकारी से लेकर दूसरे कौशल विकास की भी ट्रेनिंग दी जाती है. मुजफ्फरपुर के बालिका गृह में भी ऐसी ही बच्चियों को रखा गया था, जिनकी उम्र सात साल से 14 साल के बीच थी. इस बालिका गृह का संरक्षक ब्रजेश ठाकुर था, जिसे पुलिस ने केस दर्ज होने के बाद ही गिरफ्तार कर लिया था. उसके बाद ब्रजेश ठाकुर के साथ ही बच्चियों से पूछताछ होती रही. जैसे-जैसे बच्चियां मुंह खोलती रहीं, पता लगता रहा कि जिन लोगों के जिम्मे इन बच्चियों की सुरक्षा थी, सबसे ज्यादा हैवानियत उन्हीं लोगों ने की. फोटो के जरिए जब बच्चियों से आरोपियों की शिनाख्त की गई तो पता चला कि बच्चियों के साथ शोषण में पहला नाम ब्रजेश ठाकुर का ही थी, जो इस बालिका गृह को चलाता था. उसके अलावा बाल कल्याण समिति का सदस्य विकास कुमार भी इन बच्चियों का यौन शोषण करता था. पता चलने पर पुलिस ने विकास कुमार को भी गिरफ्तार कर लिया. जब विकास से पूछताथ हुई तो पता चला कि बाल संरक्षण का एक और अधिकारी रवि रोशन भी इसमें शामिल था और वो भी बच्चियों का यौन शोषण करता था. पुलिस ने 24 जून को उसे भी गिरफ्तार कर लिया.

मुजफ्फरपुर में बच्चियों से हैवानियत के खिलाफ पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन हुए. (सोशल मीडिया)

उससे पूछताछ हुई तो उसने कहा कि मुजफ्फरपुर के बाल संरक्षण के सहायक निदेशक दिवेश शर्मा को मामले की पूरी जानकारी थी और वो भी इस मामले में शामिल था. पुलिस जैसे-जैसे जांच करती जा रही थी, उसके होश उड़ते जा रहे थे. इसके बाद पुलिस को पता चला कि इस पूरी वारदात का मास्टरमाइंड कोई और नहीं, बल्कि जिला बाल विकास समति का अध्यक्ष दिलीप वर्मा है. इसके बाद तो पुलिस के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं बचा था. पुलिस दिलीप वर्मा की गिरफ्तारी की कोशिश में लग गई. नाकामी हाथ लगने पर पुलिस कोर्ट पहुंची, जहां कोर्ट ने दिलीप वर्मा के खिलाफ गैर जमानती वॉरंट जारी कर दिया. इसके बाद भी दिलीप वर्मा ने सरेंडर नहीं किया तो पुलिस कोर्ट से उसके खिलाफ कुर्की का वॉरंट लेकर आ गई, लेकिन अब भी उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई है.

कई और बड़े अधिकारी भी मिले हुए हैं

मुजफ्फरपुर में लड़कियों ने रैलियां निकालकर दोषियों के लिए फांसी की मांग की.

स्वयंसेवी संस्था सेवा संस्थान संकल्प एवं विकास समिति को पहली बार 31 अक्टूबर 2013 को काम मिला था. नियम कहता है कि हर तीन साल में ऐसी संस्था का ऑडिट होता है और उसके बाद ही फंड जारी किया जाता है. लेकिन इस संस्था का ऑडिट नहीं किया गया और लगातार फंड जारी होता रहा. हर छह महीने पर इस संस्था को 19 लाख रुपये का फंड दिया जाता रहा. हर साल इस संस्था को 50 बच्चों के रखरखाव के लिए 13 लाख 55 हजार 200 रुपये का फंड दिया जाता रहा. इसके अलावा इस संस्था के कर्मचारियों और अधिकारियों को वेतन के लिए हर साल 14 लाख दो हजार रुपये मिलते रहे हैं. इस पूरी संस्था के ऑडिट का जिम्मा रवि रोशन के पास था, जो बिना ऑडिट के ही इस संस्था को पैसे दिला देता था. रवि रोशन गिरफ्तार हो चुका है. मुजफ्फरपुर की पूरी बाल कल्याण समिति को भंग किया जा चुका है. रेप पीड़िता बच्चियों की हालत खराब है. वो डरी हुई हैं और कुछ भी बोलने से बच रही हैं और पुलिस दिलीप वर्मा की गिरफ्तारी के लिए हाथ-पैर मार रही है. लेकिन स्थानीय लोग बताते हैं कि इस पूरे मामले के तार बहुत ऊपर तक जुड़े हुए हैं. जैसे-जैसे जांच बढ़ती जाएगी और भी नए खुलासे होंगे और बड़ी मछलियों के नाम सामने आएंगे. हालांकि इस मामले में खुद मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने कहा है कि किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा. इससे उम्मीद जगती है कि जल्दी ही बच्चियों को न्याय मिलेगा.

विपक्ष ने उठाए थे सवाल

नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए थे.
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए थे.

इस पूरे मामले पर विपक्ष लगातार सवाल उठाते रहा है. नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कहा था कि मुख्यमंंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंंत्री सुशील मोदी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं. तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया था कि बच्चियों को मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों के पास भेजा जाता था. इस पूरे मामले में सत्ताधारी दलों के दिग्गज शामिल हैं, इसलिए कोई कुछ नहीं बोल रहा है.


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