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बहुत हो गया, अब अयोध्या में मंदिर ही बना दो

मोहल्ला अस्सी फिल्म में सीन है. अस्सी के लोगों की अपने मखसूस अंदाज़ में परिचर्चा चल रही है. बैकग्राउंड में राम भक्तों के नारे गूंज रहे हैं. चुनावी माहौल है. चर्चा भी चुनावी है. हाल ही में बाबरी मस्जिद ढहाई जा चुकी है. ऐसे में अब्दुल के कदम पड़ते हैं वहां. पांडे जी अब्दुल से कहते हैं, तू तो देगा नहीं इनको वोट! अब्दुल – सर पे जालीदार टोपी लगाया हुआ और तहमद लपेटा हुआ अब्दुल – बेहद शांति से जवाब देता है,

“मैं इसी मोहल्ले में पला-बढ़ा, यहीं जवान हुआ. जहां-जहां मोहल्ले ने एकमत से वोट करने को कहा, मैंने किया. लेकिन आज अगर मैं जान दे कर भी कहूं कि मैंने मोहल्ले की बात ही माननी है, तो कोई यकीन नहीं करेगा. और हां, पहले मैं नमाज़ नहीं पढ़ता था लेकिन अब पढ़ने लगा हूं.”

इतना कह कर अब्दुल चला जाता है. पीछे मिश्रा जी अपने ठेठ बनारसी अंदाज़ में सब पर पिल पड़ते हैं. वो गाली देकर कहते हैं,

“इससे पहले अब्दुल अब्दुल था, तुमने इसको मुसलमान बना दिया.”

24 साल हो गए उस घटना को. वो घटना, जिसने इस देश की साझी विरासत को शायद सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाया. वो घटना, जिसने ना सिर्फ एक इमारत को बल्कि आपसी विश्वास को ढहा दिया. वो घटना, जिसने न जाने कितने अब्दुलों को मुसलमान बनाया. वो घटना, जो ना होती तो ज़्यादा बेहतर होता मुल्क के लिए. लेकिन घटना तो हो चुकी. बज चुकी घंटी को अनबजी तो नहीं किया जा सकता अब. काल का पहिया वापस तो नहीं मोड़ सकते हम. तो क्या ऑप्शन हैं हमारे पास? यही कि इसे एक अप्रिय घटना मान के भुला दें. ख़ास तौर से मुस्लिम समाज.

6 दिसंबर आते ही देशभर के माहौल में एक अजीब सी तल्खी घुलने लगती है. सोशल मीडिया के आगमन के बाद तो माहौल और भी गंदा हुआ जा रहा है. ‘शौर्य दिवस’ बनाम ‘कलंक दिवस’ का ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच पूरे दिन खेला जाता है. राम के अनुयायी प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं कि कुछ भी हो जाए मंदिर वहीं बनाएंगे. उधर जो जुमे के अलावा मस्जिद की शक्ल भी नहीं देखते, उनको भी बाबरी को फिर से खड़ा किया जाना ज़िन्दगी का मकसद लगता है. इस सर्कस में देश का माहौल बद से बदतर हुआ जाता है.

बाबरी के बाद इस देश में ऐसे कई सारे छोटे-मोटे परिवर्तन हुए, जिसने बहुत अंदर तक नफ़रत भर दी. 92 के बाद पैदा हुए मुस्लिम बच्चे भले ही ये न बता पाएं कि अयोध्या है किस राज्य में लेकिन उन्हें ये ज़रूर पता है कि हिन्दुओं ने उनकी मस्जिद शहीद – हां शहीद – की है. उधर हिंदू बच्चों को बाकी मुग़ल भले ही याद ना रहें, बाबर ज़रूर याद हो जाता है. आज उन्हीं बच्चों के हाथ में व्हाट्सऐप है, फेसबुक है. खून खौलाने वाली सच्ची-झूठी कहानियां बिजली की रफ़्तार से फैला दी जाती हैं. घृणा का, विद्वेष का ज़हर रगों में घुलता ही जाता है.

बाबरी के बाद श्रीराम जो सर्वमान्य, सर्वप्रिय थे वो कुछ लोगों से दूर हो गए. दहशत का प्रतीक हो गए. राजनैतिक कारणों से उनका हाइजैक हो गया और वो किसी एक ख़ास समूह की पहचान में सिमट कर रह गए. ये परिवर्तन हौले-हौले हुआ और शायद ही इससे ज़्यादा दुखद कुछ और हुआ हो भारत के इतिहास में.

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भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा, ये योगी जी के सीएम बनने से पहले लगा बैनर है . इमेज सोर्स: समाचार प्लस

इस घटना को भूतकाल में जा कर बदला तो नहीं जा सकता लेकिन भविष्य तो संभाला, संवारा जा सकता है. और इसमें सबसे ज़्यादा सहयोग करना होगा मुस्लिम समाज को. ये एक ऐसा मामला है, जो बरसों से अना का मसला बना हुआ है. मूंछों की इस लड़ाई में किसी एक पार्टी को तो पैर पीछे खींचने ही होंगे. और मुझे जेन्युइनली ये लगता है कि ये काम मुस्लिम समाज को करना चाहिए.

इसके कई फायदे हैं:

1) बरसों से लटकता चला आ रहा झगड़ा ख़त्म हो जाएगा. इसे मुद्दा बना कर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकती आई पार्टियों के मंसूबे ध्वस्त हो जाएंगे. हर बार इस देश की एक प्रमुख राजनैतिक पार्टी राम-मंदिर का मुद्दा उछालकर और बाकी की पार्टियां इसका विरोध कर वोटों की फसल काटती है. इस ध्रुवीकरण को काउंटर करने का इससे बढ़िया तरीका और कोई नहीं हो सकता कि मंदिर बनने दिया जाए. हर बार चुनाव आते ही फूलने लगते गुब्बारे की हवा एकबारगी ही निकल जायेगी.

2) मुसलमानों की अपनी छवि में बम्पर सुधार होगा. अविश्वास की खाई को पाटने में ज़बरदस्त मदद मिलेगी. कट्टर समाज के तौर पर जो उनकी इमेज बनाई गई है उसको नष्ट किया जा सकेगा. आगे से किसी की ये कहने की हिम्मत नहीं होगी कि मुसलमानों ने इस मुल्क के लिए किया क्या है? वो गर्व से कह सकेंगे कि हमने देश की फिज़ा में सुकून भरने के लिए झुकना कबूल किया. मस्जिद तो और भी कहीं बनाई जा सकती है. देश में हज़ारों मस्जिदें हैं भी. रामलला का जन्मस्थान एक ही हो सकता है. एक समझदार भाई की तरह उन्हें चाहिए कि अपना हक छोड़ दें. वो अंग्रेजी में कहते हैं न, ‘फॉर दी ग्रेटर गुड.’ इस एक कदम से मुस्लिम समाज इस देश की मुख्यधारा में दहाड़ मारता हुआ लौट आएगा. और शायद उनकी मुल्क के लिए प्रतिबद्धता पर अक्सर उठाए जाते सवालों पर हमेशा के लिए विराम भी लग जाए.

3) लोकल बाशिंदों की ज़िन्दगी पटरी पर लौटेगी और अयोध्या को एक पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित करने की राह खुलेगी. जिससे अंत-पंत वहां रहने वाले लोगों का ही भला होगा. वो लोग जिन्होंने बरसों वहां रहने की कीमत चुकाई है. जिनमे हिंदू-मुसलमान दोनों ही तरह के लोग हैं.

4) कुल मिलाकर ये एक बेहतरीन हल दिखाई पड़ता है इस अतिसंवेदनशील मुद्दे का. यहां हम जीत-हार की नहीं बल्कि एक हल तक पहुंचने की बात कर रहे हैं. एक कदम पीछे खींच कर मुस्लिम समाज कई मंजिलें आगे बढ़ जाएगा. ये किसी भी सूरत में हार नहीं बल्कि बहुत बड़ी जीत होगी मुस्लिम समाज की. इस एक मुद्दे ने बहुत ज़्यादा घृणा जनरेट की है भारतवर्ष में. इसके निपटारे से आपसी भाईचारा बहाल होने की सूरत बनेगी. जो कि मौजूदा हालात में सबसे बड़ी ज़रूरत है.

यूपी के नए शहंशाह योगी आदित्यनाथ अतीत में दर्जनों बार अयोध्या में मंदिर बनवाने का संकल्प दोहरा चुके हैं. अब तो प्रदेश के सर्वेसर्वा हो गए हैं. केंद्र में भी उन्हीं की पार्टी की सत्ता है. इससे ज़्यादा अनुकूल परिस्थितियां और क्या होंगी! मंदिर बनने की कोई संभावना है, तो अभी है. अगर योगी आदित्यनाथ मंदिर बनाने के लिए आगे बढ़ते हैं तो मुस्लिम समाज को चाहिए कि वो उनकी राह का रोड़ा न बनें. बल्कि अपनी सहमति दर्ज कराएं.

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ये मुल्क थक चुका है 6 दिसंबर 1992 को ढोते-ढोते. एक सर्वमान्य हल पर पहुंचना इसकी फौरी ज़रूरत है. वरना ये ज़ख्म जो बदतर होता जा रहा है, नासूर बन के रह जाएगा. हम और नफ़रत अफोर्ड नहीं कर सकते. इस देश की बहुसंख्य जनता ना तो शौर्य दिवस मनाना चाहती है और ना ही कलंक दिवस. वो तो बस अमन चाहती है. उसी दिशा में पहल हो. बात-बात पर देशप्रेम का सर्टिफिकेट मांगे जाने से आहत मुस्लिम समाज को इससे बेहतर मौका नहीं मिलेगा ये बताने का कि वो भी इस मुल्क की बेहतरी के लिए सोचता है. और उसके लिए अना को भी खूंटी पर टांग सकता है. दर्द की इन्तेहाई दुखद दास्तान को मिटा देने का सबसे बेहतर तरीका यही है कि एक नई इबारत लिखी जाए.


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