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सरकार ने रबी फसलों की MSP तो बढ़ाई लेकिन 12 साल में सबसे कम

नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन को 287 दिन हो चुके हैं. इस बीच बुधवार 8 सितंबर को केंद्र सरकार ने रबी के आगामी सीज़न के लिए फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP बढ़ाने का फ़ैसला किया. सरकार ने गेहूं, जौ, सरसों, मसूर जैसी फ़सलों के दाम बढ़ाने की बात कही है. इस फ़ैसले के बावजूद किसान संगठनों ने सरकार के इस ऐलान को धोखा करार दिया है. उनका कहना है कि ये बढ़ोतरी बहुत ही कम है और इससे किसानों को कोई भी फ़ायदा नहीं होगा. आइए इस पूरे मामले को इन्फ़्लेशन यानी महंगाई से जोड़ कर देखते हैं.

तिलहन में 8.6 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट में कहा कि सरकार ने रबी फसलों की MSP में बढ़ोतरी कर किसानों के हित में एक और बड़ा फैसला लिया है. उन्होंने लिखा,

“किसान भाइयों और बहनों के हित में सरकार ने आज एक और बड़ा निर्णय लेते हुए सभी रबी फसलों की MSP में बढ़ोतरी को मंजूरी दी है. इससे जहां अन्नदाताओं के लिए अधिकतम लाभकारी मूल्य सुनिश्चित होंगे, वहीं कई प्रकार की फसलों की बुआई के लिए भी उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा.”

Msp Rabi
सरकार द्वारा जारी रबी फसलों के लिए MSP के आंकड़े

वहीं, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि ये फैसला इस बात का सबूत है कि सरकार MSP सिस्टम को लेकर प्रतिबद्ध है. केंद्र सरकार द्वारा जारी बयान के मुताबिक़ 2022-23 के आगामी सीज़न के लिए गेहूं के उत्पादन की लागत 1,008 रुपए प्रति क्विंटल होगी. जिसका मतलब है कि 2,015 रुपए का नया MSP तय किए जाने से किसानों को 100 प्रतिशत रिटर्न मिलेगा. रेपसीड और सरसों के लिए MSP में 400 रुपये प्रति क्विंटल यानी 8.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. सरकार का दावा है कि इसमें भी किसान 100 प्रतिशत रिटर्न मिलने की उम्मीद कर सकते हैं. मसूर दाल में भी 400 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई यानी कि क़रीब 7.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी.

किसान संगठनों ने कहा- क्रूर मज़ाक़

हालांकि किसान संगठनों का मानना है कि MSP की इस बढ़ोतरी को महंगाई की दर से जोड़कर देखें, तो असल में किसानों को नुक़सान हुआ है. स्वराज पार्टी और संयुक्त किसान मोर्चा के नेता योगेन्द्र यादव ने ट्वीट कर दावा किया कि गेहूं की MSP में हुई बढ़ोतरी 12 सालों में सबसे कम है. उन्होंने लिखा,

“किसानों के साथ मोदी जी का एक और क्रूर मज़ाक! मोदी सरकार ने गेंहू के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर सिर्फ और सिर्फ 2.03 प्रतिशत की वृद्धि की जो पिछले 12 वर्षों में सबसे कम बढ़ोतरी है. जबकि महंगाई के बढ़ने की दर 5 से 6 प्रतिशत अनुमानित है.”

 

सरकार के आंकड़े क्या कहते हैं?

कमीशन फ़ॉर एग्रीकल्चरल कॉस्ट्स एंड प्राइसेस (CACP) भारत सरकार के कृषि मंत्रालय से जुड़ी संस्था है. इसके आंकड़ों पर गौर करें तो योगेंद्र यादव का दावा सही लगता है. 2012-13 में MSP में सबसे ज्यादा 9.83 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई थी. आंकड़े बताते हैं कि इस बार की गई 2.03 फीसदी की बढ़ोतरी पिछले 12 सालों में सबसे कम है.

लेकिन ये बात सिर्फ़ गेहूं के लिए ही लागू होती है. जहां तक सरसों और मसूर का सवाल है, तो आंकड़े कुछ और ही बताते हैं. सरसों की MSP में पिछले साल 5.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी जबकि इस साल 8.6 प्रतिशत की हुई है. वहीं मसूर में पिछले साल 6 फीसदी बढ़ोतरी हुई थी, जो इस बार 7.84 प्रतिशत रही.

अगर इस बढ़ोतरी को भारत में इन्फ़्लेशन यानी महंगाई की दर के साथ जोड़कर देखें तो तस्वीर और साफ़ नज़र आती है. 2011 से 2021 तक महंगाई की दर औसतन 6.01 प्रतिशत रही. 2013 के नवंबर में महंगाई दर सबसे ज़्यादा 12.17 फीसदी थी और 2017 के जून में 1.54 प्रतिशत के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई. अगर जुलाई 2021 की महंगाई दर देखें तो ये 5.6 प्रतिशत है. ऐसे में महंगाई दर के नज़रिए से किसान संगठनों के दावे में कुछ सच्चाई तो नज़र आती है.

इंडिया टुडे हिंदी के एडिटर अंशुमान तिवारी के मुताबिक़, ये सरकार की नीतियों को भी दिखाता है. वो कहते हैं-  “सरकार लगातार कहती रही है कि गेहूं, चावल भारत में पर्याप्त हैं और एक्सपोर्ट के लिहाज़ से भी ये उतना फ़ायदेमंद नहीं है. इस वजह से इनके MSP में काफ़ी कम बदलाव हुआ है. लेकिन वहीं सरसों में हुई बढ़ोतरी दिखाती है कि तिलहन की तरफ़ सरकार का झुकाव है.”


वीडियो-खर्चा-पानी: MSP की नई दरों के बीच चीन की महंगाई और अमेरिकी डॉलर की कमजोरी का भारत पर असर?

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