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महेंद्र सिंह धोनी की रिटायरमेंट पर एक 'धोनी हेटर' को कैसा लगा?

तारीख थी 15 अगस्त. शाम के 7 बजकर 38 मिनट हुए थे कि ग्रुप में मैसेज आया. मैसेज में एक स्क्रीनशॉट था और उस पर वो लाइंस लिखी थीं, जिसका इंतजार धोनी फैंस और हेटर्स, दोनों को था. हेटर एक बहुत बड़ा शब्द है. आमतौर पर मैं इसका प्रयोग करने से बचता हूं. ख़ैर, इससे आगे बढ़ें. मैसेज पर मेरा पहला रिएक्शन था- अरे नहीं. मेरे एडिटर के भेजे हुए मैसेज पर मुझे यकीन नहीं हुआ. मुझे लगा कि किसी ने मज़ाक किया होगा. मैं भागा धोनी के इंस्टा अकाउंट पर गया. वहां देखा, तो बात सच निकली.

ड्यूटी पर था, तो तुरंत रिएक्ट करना ही था. रिएक्ट किया और 7.50 पर धोनी के रिटायरमेंट की कॉपी लग गई. इसके बाद जैसे-तैसे उपलब्ध लोगों को टॉपिक्स पकड़ाए. उस कॉपी का वीडियो कराया. लेकिन दिमाग अभी तक स्थिर नहीं हो पाया था. पूरे शरीर पर जैसे लाखों चीटियां रेंग रही थीं और कुछ टूट-सा रहा था. अजीब-सी फीलिंग, जैसे कोई अपना क़रीबी मित्र हमेशा के लिए छोड़कर जा रहा हो. इन तमाम फीलिंग्स के बीच अब तक बात फैल चुकी थी.

# विषैला धोनी हेटर

सोशल मीडिया पर मुझसे जुड़े लोगों के मुताबिक मैं ‘विषैला धोनी हेटर’ हूं. सो, लोगों ने टैग करना शुरू कर दिया. आज़िज़ आकर मुझे फेसबुक पर लिखकर कहीं टैग न करने की रिक्वेस्ट करनी पड़ी. लेकिन जो इतनी आसानी से मान जाए, वो कट्टर फैन कैसा? लोग जारी रहे. इधर मैंने अपना काम जारी रखा. काम करते-करते कई बार दिमाग में आया कि धोनी पर कुछ लिखना चाहिए, लेकिन लिख नहीं पाया. 16 अगस्त भी बीत गया, रैना से जुड़ी एक छोटी सी याद लिखी भी, लेकिन धोनी पर अब भी नहीं लिख पाया.

इस बीच काफी कुछ पढ़ा. कई लोगों ने धोनी की तारीफ में कसीदे गढ़े थे. मैं कुछ लिख ही नहीं पा रहा था. फिर मैंने सोचा कि और कुछ तो नहीं, लेकिन ‘धोनी हेटर’ के टैग पर जरूर लिखना चाहिए. मेरा मानना है कि एवरेज भारतीय क्रिकेट फैन ने जीवन में कभी फुटबॉल नहीं देखी. मैंने देखी है और पढ़ता-लिखता रहता हूं. अपने उस अनुभव के आधार पर जोर देकर कह रहा हूं- ये लोग जानते ही नहीं कि हेटर क्या होता है. हेटर कैसे होते हैं, ये लुई फिगो से पूछिए, स्टीवन जेरार्ड या एरिक कैंटना से पूछिए.

हेटर का पूरा कॉन्सेप्ट क्लब फुटबॉल या नेशनल राइवलरी से जुड़ा है. धोनी चेन्नई सुपरकिंग्स से खेलते थे और मेरी टीम दिल्ली डेयरडेविल्स  थी. बाद में यह किंग्स XI सहवाग और फिर रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर हुई. इन तीनों टीमों के फैंस का धोनी से नफरत करने का कोई लॉजिक ही नहीं है. इनकी CSK के साथ कोई प्रतिद्वंद्विता ही नहीं है. CSK की टक्कर तो मुंबई इंडियंस से है. साथ ही नेशनल टीम के कैप्टन और अहम प्लेयर से हेट करने का कोई लॉजिक हो सकता है क्या?

# ये मेरा धोनी नहीं

मुझे विरेंदर सहवाग बहुत पसंद थे. उन पर कभी भरोसा नहीं हुआ कि वह लंबी पारी खेलेंगे, लेकिन एक बात पक्की थी- जब तक क्रीज़ पर हैं, किसी को सांस नहीं लेने देंगे. शुरुआती धोनी भी सहवाग जैसे ही थे. बेलौस, किसी भी बोलर पर अपना चाबुक चला देने वाले. लेकिन बाद के बरस में एक बल्लेबाज के तौर पर मुझे धोनी पसंद नहीं रहे. उसकी कई वजहें हैं. सबसे बड़ी वजह तो ये कि साल 2014 के बाद धोनी की बैटिंग निहायत ही औसत दर्जे की हो गई थी.

साल 2014 और 15 की कुल 27 वनडे पारियों में 1058 रन बनाने वाले धोनी ने साल 2016 की 10 पारियों में 278, जबकि 2018 की 13 पारियों में 275 रन बनाए थे. इस बीच 2017 में धोनी ने 22 पारियां खेली और रन बनाए 788. साल 2019 की 16 पारियों में 600 रन बनाने वाले धोनी ने इस दौरान 16 और 18 में 27.80 और 25 की एवरेज से रन बनाए. ये आंकड़े उस दिग्गज के नहीं हैं, जयपुर में जिसके हर छक्के पर मैंने रॉकेट उड़ाए थे.

ये वाला धोनी मेरा धोनी नहीं था. स्पोर्ट्स की दुनिया बहुत क्रूर है. शायद सबसे ज्यादा क्रूर. जैसा कि युवराज ने भी कहा था- जब तक बल्ला चल रहा है, ठाठ है! और आंकड़े साफ दिखा रहे हैं कि धोनी का बल्ला पहले जैसा नहीं चल रहा था. और यहां तो धोनी का खुद मानना था कि अगर कोई प्लेयर मैदान पर अपना 100 परसेंट नहीं दे सकता, तो उसके लिए टीम में जगह नहीं बनती.

जैसा कि उन्होंने सीनियर प्लेयर्स के साथ किया भी था. सहवाग, सचिन और गंभीर को रोटेट करके खिलाने के पीछे धोनी का यही तर्क था कि वह फील्डिंग में अच्छे नहीं हैं. 2012 की सीबी सीरीज के दौरान उनके इस फैसले की खूब आलोचना हुई थी. सुनील गावस्कर से लेकर वसीम अकरम तक इसके खिलाफ थे. लेकिन धोनी नहीं माने. धोनी ने वही किया, जो टीम के लिए सही था.

# सेमीफाइनल का विलेन

ऐसे में सिर्फ विकेटकीपिंग और सलाह-मशविरे के लिए धोनी को ढोने वाले तर्क मेरी समझ से परे थे. जिस धोनी को मैं जानता हूं, वह मुझसे पूरी तरह सहमत होता. उस धोनी के लिए इंडियन टीम के हर प्लेयर को कम से कम दो विभागों में श्रेष्ठ होना ही था. लेकिन ये धोनी बैटिंग में असली धोनी के क़रीब भी नहीं था. वैसे तो धोनी का बल्ले के साथ स्ट्रगल 2014 से ही शुरू हो गया था, लेकिन 2019 वर्ल्ड कप में यह चरम पर पहुंच गया

क्रिकेट वर्ल्ड कप 2019 में अफगानिस्तान, इंग्लैंड, न्यूज़ीलैंड, सिर्फ इन तीन मैचों में धोनी की बैटिंग देखिए. बब्बर शेर की तरह बैटिंग करने वाला धोनी शावकों की तरह डरा-सहमा खेल रहा था. बॉल कनेक्ट ही नहीं हो पा रही थी. लग ही नहीं रहा था कि ये वही बंदा है, जो मनचाहे अंदाज में बोलर्स को धुनता था. सेमीफाइनल में तो हद ही हो गई. भारत को 46 बॉल्स में 71 रन चाहिए थे और धोनी ने ऑफ स्टंप के बाहर की गेंद टेस्ट के अंदाज में छोड़ दी. वह स्क्रीनशॉट वानखेड़े 2011 के छक्के जैसा ही अमर हो गया है.

सोशल मीडिया पर अक्सर ही वह दिख जाता है. उस मैच में धोनी ने ऐसी तमाम गेंदें छोड़ीं. एक छोर से जडेजा प्लेस्टेशन की तरह ताबड़तोड़ बैटिंग कर रहे थे और दूसरे छोर से धोनी का स्ट्राइक रेट 50-60 के पार ही नहीं जा पा रहा था. जब जडेजा ने एक बॉल पर एक रन बनाया था, तब धोनी 25 बॉल्स में 11 रन बनाकर खेल रहे थे. भारत को 19 ओवर्स में 146 रन चाहिए थे.

लक्ष्य एकदम पकड़ में था. धोनी विकेट पर वनडे के लिहाज से अच्छा-खासा वक्त बिता चुके थे. अब उन्हें चार्ज करना चाहिए था. या कम से कम हर ओवर में एक बाउंड्री निकालने की कोशिश तो की ही जा सकती थी. आइडल बैटिंग यही होती. लेकिन धोनी एक छोर पर खड़े रहे. अगले नौ ओवर्स में कुल 56 रन बने. इसमें 39 जडेजा के थे, 34 बॉल्स में. जबकि धोनी 46 बॉल्स में 24 रन बनाकर खेल रहे थे. यानी 21 गेंदों पर उन्होंने 13 रन जोड़े.

लगभग 8 रन प्रति ओवर के रिक्वायर्ड रेट के सामने ऐसी बैटिंग भुलाई जा सकती है? विश्व कप सेमीफाइनल में इस प्रदर्शन पर आपको टीम में रखा जा सकता है? इसके बाद जब भारत को 7 ओवर में 69 रन चाहिए थे, तब जडेजा 43 में 54, जबकि धोनी 55 में 29 बनाकर खेल रहे थे. इतना स्ट्रगल? ठीक है पिच बैटिंग के लिए बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन क्या जडेजा राजकोट से अपनी पिच लेकर गए थे? उसी पिच पर उन्हीं बोलर्स को एक बोलिंग ऑलराउंडर कूट रहा था और बेस्ट फिनिशर सिर्फ डॉट बॉल्स और सिंगल्स में खर्च हो रहा था?

रिक्वायर्ड रेट लगातार बढ़ता रहा. 47वां ओवर खत्म हुआ, तो भारत को तीन ओवर्स में 37 रन चाहिए थे. जडेजा 57 पर 76, जबकि धोनी 65 पर 38 बनाकर खेल रहे थे. यानी जडेजा पूरी ताकत लगाकर जितना प्रेशर हटा रहे थे, धोनी उससे ज्यादा ताकत लगाकर प्रेशर बढ़ा रहे थे. इसी प्रेशर के चलते जडेजा 48वें ओवर की पांचवीं बॉल पर आउट हो गए. रिक्वायर्ड रेट 15 के पार था और धोनी ने लास्ट बॉल पर क्या किया? सिंगल निकाला.

आखिरी के दो ओवर्स में भारत को 31 रन चाहिए थे और अब जाकर धोनी ने अपनी पारी का पहला छक्का लगाया. अगली बॉल पर कोई रन नहीं और तीसरी बॉल पर धोनी रनआउट हो गए. भारत 18 रन से मैच हार गया. धोनी ने 72 बॉल्स में 50 रन बनाए. इस पारी में सिर्फ एक चौका और एक छक्का था.

धोनी के ‘फैंस’ यहां रोहित-विराट और टॉप ऑर्डर के फेल होने की दलील देने लगते हैं. यार, धोनी महानतम फिनिशर्स में से एक हैं, अगर टॉप ऑर्डर हमेशा क्लिक ही करे, तो लोवर मिडिल ऑर्डर वाले फिनिशर की जरूरत क्या है? धोनी महान ऐसे ही मैचों से बने, जहां टॉप ऑर्डर नहीं चला. मैं बस उसी पुराने धोनी को खोज रहा था, जो शायद जाने कब का गुम हो चुका था.

# लंबा था स्ट्रगल

धोनी की ये पारी एकाएक नहीं आई. उनका स्ट्रगल लंबे वक्त से चल रहा था. जैसा कि मैंने इसी आर्टिकल में ऊपर बताया कि वह 2014 के बाद से ही बैटिंग नहीं कर पा रहे थे. लेकिन इन तमाम आंकड़ों को जुटाने के पीछे मेरा मकसद धोनी को नकारना, या उन्हें नीचा दिखाना नहीं है. मैं बस धोनी और उनके फैन्स को याद दिलाना चाहता हूं कि अपने ही पैमाने पर धोनी टीम इंडिया की जर्सी डिजर्व नहीं करते थे.

उनका बेस्ट बीत चुका था और उन्हें ढोने का मतलब युवाओं के बेशकीमती साल बर्बाद करना था. हां ठीक है, ऋषभ पंत की कीपिंग बहुत अच्छी नहीं है. लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि धोनी भी शुरुआती दौर में बहुत अच्छे विकेटकीपर नहीं थे. उन्होंने सुधार किया और मिले मौकों का फायदा उठाकर महानायक बने. लेकिन जब उनसे अपेक्षाओं का बोझ नहीं ढोया गया, तो उन्हें ‘हैप्पी रिटायरमेंट’ बोलना ही उस टीम के हित में होगा, जिसे माही ने खड़ा किया.

मैं धोनी हेटर नहीं हूं. मैं बस धोनी के ही स्थापित किए उन उच्च मानदंडों का पालन होते देखना चाहता था, जिनकी बलि न जाने कितने लेजेंडरी क्रिकेटर्स चढ़े. मैं उसी टीम इंडिया की बेहतरी चाहता था, जिसे धोनी ने इन ऊंचाइयों पर पहुंचाया. मैं तो बस उसी पुराने धोनी को बैटिंग करते देखना चाहता था, जिसका हर छक्का हमारे लिए दिवाली जैसा होता था, धूम-धमाके और जश्न वाले पल.

‘बैटमैन’ देखने वालों को एक डायलॉग अच्छे से याद होगा. हार्वी डेंट ने कहा था- You Either Die A Hero, Or You Live Long Enough To See Yourself Become The Villain. अर्थात- या तो आप एक हीरो की मौत मर जाएं, या फिर लंबे वक्त तक जीवित रहकर खुद को विलेन बनता देखें.

बस मुझसे धोनी का विलेन बनना देखा नहीं जा रहा था. ये अलग बात है कि हार्वी डेंट और धोनी, दोनों का अंत एक जैसा हुआ. गॉथम और भारत के लिए उन्होंने चाहे जितना किया, लेकिन उनका अंत एक विलेन की तरह ही हुआ. जब भी 2019 वर्ल्ड कप याद आएगा, धोनी की पारियां भुलाई न जा सकेंगी.

हैप्पी रिटायरमेंट ‘BEST EVER CAPTAIN.’


धोनी के संन्यास लेने का वक्त 19:29 ही क्यों रहा, मैनेजर ने सब बता दिया

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