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वानखेडे और ईडन गार्डन्स को वणक्कम, अब मोटेरा बनेगा 'होम ऑफ इंडियन क्रिकेट'

अहमदाबाद के मोटेरा स्थित नरेंद्र मोदी स्टेडियम. पिछले कुछ दिनों/हफ्तों से लगातार चर्चा में बना हुआ है. लोग गंभीरता/मजाक में ही सही लेकिन लगातार इस स्टेडियम पर बात कर रहे हैं. इसे चर्चा में बनाए रखने के मसाले भी खूब सारे हैं. फिर चाहे वो ऐन वक्त पर इसका नाम बदलना हो, या इसकी झूमती पिच और या फिर कैप्टन कोहली द्वारा इसमें निकाली गई कमी.

अपने नाम के मुताबिक ये स्टेडियम चर्चा के केंद्र में बना हुआ है. इस चर्चा में एक और एंगल शामिल हो सकता है- इंडियन क्रिकेट का पावर शिफ्ट. जी हां, आपने शायद ध्यान ना दिया हो लेकिन इंडियन क्रिकेट का पावर शिफ्ट हो रहा है. वो जमाने गए जब जरूरी मैचों की तारीख से पहले वेन्यू तय हो जाता था. फिर चाहे वो मुंबई का वानखेडे स्टेडियम हो या फिर कोलकाता का ईडन गार्डन्स.

सालों से ये दोनों स्टेडियम भारतीय क्रिकेट के इतिहास में सबसे जरूरी रहे हैं. लेकिन अब मोटेरा का नरेंद्र मोदी स्टेडियम इनका तख्तापलट करने के लिए तैयार है. अगर अभी तक मैं और आप सेम पेज पर नहीं आ पाए हैं तो चलिए मैं आपको खींचने की कोशिश करता हूं.

# सबसे बड़ा स्टेडियम

ये वाली बात तो इतनी बार बोली जा चुकी है कि इस पर बहुत लिखने की जरूरत नहीं है. दुनिया का सबसे बड़ा स्टेडियम है. भारतीयों के साथ विदेशी क्रिकेटर भी यहां खेलने की सोचकर ही रोमांचित हुए जा रहे हैं. लाख से ज्यादा लोगों को बैठाने की क्षमता वाला भारत का इकलौता स्टेडियम अगर बड़े मैचों की मेजबानी नहीं करेगा, तो फायदा क्या है?

घरेलू मैचों मे ंदर्शकों का समर्थन बड़ा महत्वपूर्ण होता है. और लाख से ज्यादा लोगों के सपोर्ट को टीम इंडिया क्यों मना करेगी? ऐसे में स्टेडियम का साइज इस पावर शिफ्ट का बड़ा प्लेयर होगा. अब तक भारत के कुल 4 शहरों में फाइनल मुक़ाबले खेले गए हैं. ज्यादातर कोलकाता और मुंबई में.

1998 के पेप्सी कप का फाइनल (जिसमें अजय जडेजा सिर्फ एक बार आउट हुए- फाइनल में) दिल्ली में और 1999 के कोका-कोला कप का फाइनल बंगलौर (अज़हर महमूद के 5 विकेट वाला) में खेला गया था. इसके अलावा 1997 के इंडिपेंडेंस कप का पहला फाइनल शायद मोहाली में खेला गया था. सुविधाओं को देखते हुए कह सकते हैं कि अब नया सेंटर मोटेरा बनेगा.

# बॉस गुजराती छे

BCCI के प्रेसिडेंट सौरव गांगुली हैं. लेकिन अक्सर, सफल आयोजनों का क्रेडिट देते वक्त पहला नाम सेक्रेटरी जय शाह का आता है. गुजरात क्रिकेट असोसिएशन से जुड़े रहे जय शाह आजकल BCCI के सेक्रेटरी हैं. पॉलिसीमेकर हैं. उनकी राय हर फैसले में अहम होती है. कहते हैं कि पहले बड़े फैसले मुंबई या कोलकाता (डालमिया के काल में) से होते थे, लेकिन अब ये फैसले Amdavad (अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन अपने शहर को यही बुलाती है) से होते हैं.

जय शाह के पिताजी देश के गृहमंत्री हैं. उनके काका देश के प्रधानमंत्री. मोटेरा स्टेडियम का पुनर्निर्माण इन दोनों का सपना था. ऐसे में ये दोनों कभी नहीं चाहेंगे कि यह स्टेडियम किसी भी हाल में, किसी भी चीज में पीछे रहे. साथ ही यहां क्रिकेट से इतर की सुविधाएं भी सबसे बेहतरीन हैं. रहने से लेकर ट्रेनिंग तक की सुविधाओं में भारत का कोई भी स्टेडियम इसे टक्कर नहीं दे सकता.

# रोटेशन पॉलिसी का क्या?

अब कई लोग कहेंगे कि ऐसे थोड़ी ना होता है. रोटेशन पॉलिसी भी कोई चीज है. हर स्टेडियम को बराबर मौके देने होंगे. ऐसे थोड़ी ना होगा कि कोई स्टेडियम बड़ा है तो उसे ही सारे मैच मिल जाएंगे. ये सवाल हमारे दिमाग में भी आया था. ऐसे में हम पहुंचे अपने घरेलू विज़्डन अभिषेक जी के पास. अभिषेक जी ने हमारी शंका की यॉर्कर को स्टेप-आउट कर स्ट्रेट बाउंड्री के बाहर भेज दिया. उन्होंने कहा,

‘यह जब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर टूट जाती है तो राष्ट्रीय स्तर पर टूटेगी तो क्या हो जाएगा? रोटेशन पाॅलिसी के आधार पर तो 2011 का वर्ल्ड कप ऑस्ट्रेलिया को मिलना तय था. लेकिन शरद पवार ने BCCI की आर्थिक ताकत की धौंस दिखाकर इंडिया में शिफ्ट करवा दिया था.’

अब हमारे ज्ञानचक्षु खुल गए. और हमने सोचा- रोटेशन का तो नहीं पता लेकिन दर्शक क्षमता और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखते हुए 2011 वर्ल्ड कप का फाइनल तो ईडन गार्डन्स को मिलना चाहिए था. लेकिन नहीं मिला. अर्थात रोटेशन पॉलिसी, कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को देखकर रोटेट होती है.

इन तीन बड़े कारणों और IPL2021 के संभावित वेन्यू की लिस्ट को देखते हुए हम तो श्योर हैं कि अब हर आने वाली टीम को कहा जाएगा- ‘कुछ दिन तो गुजारिए गुजरात में’. और हर गुजरते टूर के साथ ये दिन बढ़ते ही जाएंगे क्योंकि क्राउड सपोर्ट की लत बहुत बुरी होती है. और इसका डोज जितना बड़ा हो, मौज उतनी ही आती है.


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