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जहरीली शराब का पूरा तिया-पांचा समझ लीजिए, जानें कैसे खेला जा रहा है ये खेल

मध्य प्रदेश के मुरैना में जहरीली शराब के कारण 20 लोगों की जान चली गई, जबकि चंद रोज़ पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में जहरीली शराब 6 लोगों की मौत का कारण बन गई. ये तो बड़े मामले थे जो नजरों में चढ़े, कार्रवाई हुई, लेकिन कुछ दिनों बाद ही फिर से ऐसी खबरें देखने सुनने में आती हैं. आखिर ये जहरीली शराब क्या होती है? कैसे बिकती है? और क्यों सरकारी तंत्र इस लड़ाई को जीत नहीं पा रहा है? इस खबर में हम आपको यही बातें विस्तार से बताने वाले हैं.

सबसे पहले बात करेंगे मध्य प्रदेश के मुरैना की जहां जहरीली शराब से मरने वालों की संख्या 20 हो गई है. 11 जनवरी को कुछ गांव वालों की तबियत खराब हुई, फिर एक-एक करके मौत की खबर आने लगी और 13 जनवरी तक मरने वालों की संख्या 20 हो गई. राज्य सरकार ने इलाके के आबकारी अधिकारियों पर कार्रवाई की, पुलिसवालों पर कार्रवाई की, लेकिन ये कार्रवाई अवैध शराब के कारोबार पर लगाम क्यों नहीं लगा पाती? इससे पहले अक्टूबर 2020 में उज्जैन में भी 15 लोगों की मौत हुई थी. कार्रवाई तो तब भी हुई थी, लेकिन फिर क्यों इस कारोबार को रोका नहीं जा सका?

इन सवालों के जवाब जानने से पहले एक बार बुलंदशहर का मामला भी समझ लेते हैं. जिले के सिकंदराबाद इलाके का जीतगढ़ी गांव. दिल्ली से बमुश्किल 40-45 किलोमीटर दूर है. यहां आठ जनवरी को शराब पीकर 6 लोगों की मौत हो गई. इस इलाके में नकली या जहरीली शराब के कारण मौत होना कोई नई बात नहीं है. यहां के सांसियागढ़ी गांव में बड़े पैमाने पर नकली शराब बनाई जाने की बातें सामने आती रही हैं. हर साल जिले में कई ऐसे मामले सामने आते हैं.

कैसे बनाई जाती है नकली शराब?

नकली शराब के खेल को समझने के लिए हमने कई स्थानीय पत्रकारों से बातें कीं, आबकारी और पुलिस के लोगों से बातें कीं. पता चला कि नकली शराब माफिया गन्ने का रस, गुड़ जैसे पदार्थों को एक बर्तन में बंद करके 15 से 20 दिनों के लिए जमीन के नीचे दबा देते हैं. इसके बाद जब बर्तन को बाहर निकाला जाता है तो भट्टी पर चढ़ा दिया जाता है. इस बर्तन का मुंह अच्छे से बंद किया जाता है. एक पाइप के जरिए भाप बाहर निकलती है जो द्रव्य के रूप में टपकती है. ये द्रव्य शराब होता है. इसको कच्ची शराब कहा जाता है.

इस तरह से शराब का बनाया जाना पूरी तरह प्रतिबंधित है. कई बार जमीन के नीचे दबे बर्तन में सांप, छिपकली या अन्य कोई जीव गिर जाता है. ऐसे में ये शराब जानलेवा हो जाती है. कई बार कच्ची शराब की तीव्रता बढ़ाने के लिए इसे बनाने वाले लोग उसमें यूरिया मिला देते हैं, तो कई बार इथाइल एल्कोहल मिला देते हैं. ऐसे में मिक्सिंग जरा भी इधर उधर हुई तो शराब जानलेवा हो जाती है. इनके अलावा नशा बढ़ाने वाले केमिकल भी इस तरह की शराब में मिलाए जाने की बातें सामने आई हैं.

इथाइल एल्कोहल और मिथाइल एल्कोहल

अब गौर करने वाली बात ये है कि इथाइल एल्कोहल से नशा होता है लेकिन मिथाइल एल्कोहल विशुद्ध जहर है. कैमिकल से जुड़े उद्योगों में इसका इस्तेमाल होता है. रंग, गंध और स्वाद में मिथाइल एल्कोहल बिल्कुल इथाइल एल्कोहल जैसा लगता है लेकिन है नहीं. कई बार अवैध शराब के धंधे से जुड़े लोग मिथाइल अल्कोहल का इस्तेमाल शराब बनाने में करते हैं. इसमें गर्म पानी और रंग आदि मिलाकर बेच देते हैं. ऐसी स्थिति में शराब जहरीली हो जाती है और पीने वालों की मौत हो सकती है.

कैसे होती है शराब की सप्लाई?

शराब के व्यापार से जुड़े एक शख्स ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि बोतलें, ढक्कन, रैपर, सील, सब कुछ नकली बनाई जाती है. शराब इसमें भरी जाती है और फिर गावों में सस्ते दामों में बेच दी जाती है. कई बार ठेकों पर काम करने वाले सेल्समैन लालच में बेच देते हैं, कई बार परचून और चाय आदि की दुकानों पर शराब को बेच दिया जाता है. सील वाले ढक्कन और रैपर आदि को देख कर किसी को शराब के नकली होने का शक नहीं होता. उन्होंने कहा,

“ऐसा नहीं कहेंगे कि सरकार ने इसको रोकने का प्रयास नहीं किया. लेकिन नकली शराब के कारोबारी थैली भी बना लेते हैं और बोतल भी. रैपर और ढक्कन भी असली जैसे बनाते हैं. सरकार ने हॉलमार्क बनाया तो इन्होंने भी बना लिया, सरकार ने क्यूआर कोड बनाया तो इन्होंने भी बना लिया. सब कुछ एकदम असली लगता है. अब टेट्रा पैकिंग का ही विकल्प है सरकार के पास. कई शराब इस पैकिंग में आने भी लगी है. देसी को अगर टेट्रा पैक में बेचा जाएगा तो शायद इस पर 80 से 90 प्रतिशत तक लगाम लग सकेगी.”

कहां होता है नकली शराब का कारोबार

शराब को जब जमीन से निकाल कर भट्टी पर चढ़ाया जाता है, तब इससे बेहद तेज गंध निकलती है जो पूरे गांव में फैल जाती है. ये गंध आसानी से अवैध शराब के कारोबारियों को पकड़वा सकती है. इसलिए अवैध शराब बनाने वाले सुनसान इलाकों को अपने काम के लिए चुनते हैं. जंगल, बीहड़ और खादर के इलाके इस काम के लिए पनाहगार बनते हैं. गंगा खादर के क्षेत्रों में अवैध शराब की भट्टियां अक्सर सुलगती हैं.

जानकारी के मुताबिक यूपी और एमपी बॉर्डर पर ये काम खासा फलता-फूलता रहा है. बुंदेलखंड से लेकर पूर्वांचल तक और रुहेलखंड वाले इलाके से लेकर पश्चिमी यूपी तक हर जिले में अवैध शराब से जुड़े मामले सामने आते रहे हैं. लेकिन पश्चिमी यूपी में ये काम थोड़ा अधिक देखने को मिलता है. पश्चिमी यूपी में हस्तिनापुर का खादर इसका बड़ा केंद्र माना जाता है.

वेस्ट यूपी अवैध शराब का कितना बड़ा केंद्र है ये आप इस बात से समझ सकते हैं कि 8 जनवरी से 15 जनवरी तक आबकारी विभाग ने मेरठ मंडल में अभियान चलाया तो 27 हजार 374 लीटर अवैध शराब बरामद हुई. इस मामले में 868 मुकदमे दर्ज किए गए और 284 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया. यही नहीं, जिस सामग्री (लहन) से अवैध शराब बनती है, वो भी 1 लाख 31 हजार 550 किलो पकड़ी गई. इसको नष्ट किया गया और 14 वाहनों को जब्त किया गया.

शराब से किसी भी राज्य की सरकार को भरपूर फायदा होता है. 2015-16 में मध्य प्रदेश सरकार को आबकारी विभाग से 7926.29 करोड़ रुपये की आय हुई थी. 2019-20 में ये आंकडा 10773.29 करोड़ रुपये पर पहुंच गया. यूपी सरकार की वेबसाइट पर 2018-2019 के आंकड़े महीने के हिसाब से मौजूद हैं. किसी महीने हजार करोड़ से कम की आमदनी नहीं हुई. 2019-20 में ये आंकडा यकीनन बढ़ गया होगा.

मौत की सजा तक हो सकती है लेकिन फिर डर क्यों नहीं?

आजतक की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2017 में आजमगढ़ में जहरीली शराब पीने से 12 लोगों की मौत हुई थी. इसके बाद यूपी सरकार ने आबकारी अधिनियम-1910 में संशोधन किया. सितंबर 2017 में इस अधिनियम में धारा 60 (क) जोड़ी गई. जिसके तहत जहरीली शराब से होने वाली मौत पर मृत्यु दंड तक का भी प्रावधान किया गया. यानी हर वो काम किया गया जिससे अवैध शराब बनाने और बेचने वालों में डर पैदा हो लेकिन ये डर कहीं दिखता नहीं.

अवैध शराब बनाने वालों की सिस्टम में पहुंच?

ऐसा माना जाता है कि अवैध शराब बनाने वालों की सिस्टम में पहुंच है. आबकारी विभाग और पुलिस विभाग में इन लोगों की पहुंच को कोई नहीं नकारता. जब ऐसी घटनाएं होती हैं तो आबकारी और पुलिस एक दूसरे पर दोष लगाते हैं, सरकार ट्रांसफर और निलंबन की कार्रवाई करती है लेकिन फिर थोड़े दिनों के बाद जहरीली शराब से मौत का कोई ना कोई कांड सामने आ जाता है.


 

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