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संसद के मानसून सत्र से देश को आखिर क्या कुछ हासिल हुआ?

संसद सत्र समाप्त हो गया. आम तौर पर ऐसे वक्त प्रेस संसद सत्र का एक राउंडअप बनाती है. कितने घंटे-मिनट काम हुआ. डेटा वाले लोकसभा-राज्यसभा की प्रॉडक्टिविटी बताते हैं. कि पहले उतने पास होते थे, इस बार इतने हो गए हैं. और इस आधार पर सरकार और विपक्ष के विधायी प्रदर्शन का मूल्यांकन होता है. लेकिन इस बार मॉनसून सत्र के दौरान सदन के अंदर और संसद के गलियारों में जो कुछ हुआ, उससे एकमुश्त हिसाब लगाना बहुत मुश्किल है कि सरकार करना क्या चाहती है और विपक्ष आलोचना या विरोध के लिए जो भाषा चुन रहा है, उसका नागरिकों के हित से कितना लेना-देना है.

खबरों की दुनिया की अपनी भाषा होती है. और जैसे बदलते मौसम के साथ तापमान, हवा की रफ्तार वगैरह बदलते हैं, वैसे ही अलग-अलग घटनाओं के हिसाब से ये भाषा बदलती रहती है. और जैसे बारिश के दौरान पकौड़ियां बनती ही हैं, खबरों के हर मौसम के लिए भी कुछ शब्द जैसे तय हैं. अब संसद के मॉनसून सत्र को ही ले लीजिए. जब ये आने को होता है तो पत्रकार कुछ जुमलों और मुहावरों को झाड़ पोंछकर अपनी गठरी से निकाल लेते हैं – विधेयक, बिल, स्टैंडिंग कमेटी, सर्वदलीय बैठक, ज़ोरदार चर्चा, भारी हंगामा, वेल, सदन, स्थगन और निलंबन वगैरह.

लेकिन इस बार इन सारे शब्दों की उतनी ज़रूरत नहीं पड़ी. क्योंकि तय वक्त से दो दिन पहले अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हुए सदनों की कार्यवाही कमोबेश रोज़ ही चार शब्दों में सिमट जाती थी – हंगामा, ज़िद, गतिरोध और स्थगन. ये सारी चीज़ें भी ज़रूरी हैं, लेकिन उतनी ही, जितनी खाने में नमक की ज़रूरत होती है- थोड़ी सी. लेकिन बीते तीन हफ्तों में संसद जिस तरह चली है, उसने देश में सभी के मुंह का स्वाद खराब कर दिया है.

लोकसभा और राज्यसभा अध्यक्ष ने जताया दुख

पूरे मॉनसून सत्र में 21 घंटे चली लोकसभा मात्र 22 फीसदी काम कर पाई और अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गई. स्थगन के बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला प्रेस के सामने आए. उन्होंने लोकसभा के न चल पाने और सदन के अंदर हुई अनुशासनहीनता पर दुख व्यक्त किया.

लोकसभा अध्यक्ष आज ही सभी पार्टियों के नेताओं से भी मिले जिनमें प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ-साथ कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी भी शामिल थीं. तृणमूल और वाईएसआरसीपी जैसे बाकी दलों के प्रतिनिधि भी पहुंचे थे. इस दौरान लोकसभा अध्यक्ष ने सदन में संवाद की ज़रूरत पर ज़ोर दिया.

राज्यसभा में कार्यवाही के नाम पर जो कुछ हो रहा है, उसपर तो सभापति वेंकैया नायडू 10 अगस्त की शाम को ही भावुक हो गए थे. उन्होंने कहा कि सदन में चल रहे हंगामे और गतिरोध के चलते उन्हें रात को नींद भी नहीं आती. उन्होंने ये भी कहा कि सदन की गरिमा का ख्याल नहीं रखा जा रहा है. आज राज्यसभा की कार्यवाही ओबीसी आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन के पास होने के बाद अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गई.

आज हम पांच अहम मुद्दों की बात करते हुए समझेंगे कि मॉनसून सत्र के दौरान सरकार और विपक्ष ने देशहित के नाम पर जो कुछ किया है, उसका असल देशहित से कितना संबंध है. ये पांच मुद्दे हैं – स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, सामाजिक न्याय, सामाजिक कल्याण और निजता.

पहला मुद्दा- स्वास्थ्य

सबसे पहले स्वास्थ्य की बात करते हैं. स्वास्थ्य के महत्व पर हम सबने बचपन में निबंध लिखे हैं. फिर 2021 का मॉनसून सत्र दो बड़ी घटनाओं के बाद हो रहा था – पहली थी कोरोना महामारी की दूसरी लहर. दूसरी घटना का ज़िक्र आगे होगा. ये संयोग की बात रही कि जब तक सत्र शुरू हुआ, तब तक दूसरी लहर का सबसे वीभत्स दौर बीत गया था. टीकाकरण को लेकर सबसे जटिल मुद्दों पर आखिरकार सरकार ने उस तरह के कदम उठा लिए थे, जिनकी बात विशेषज्ञ करते रहे. लेकिन संसद का काम सिर्फ प्रश्नों का जवाब दाखिल करना भर तो नहीं होता. उसका एक और काम है – जवाबदेही तय करना.

अब आप इन बातों की आलोक में संसद की कार्यवाही को देखिए. 20 जुलाई को राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री डॉ भारती प्रवीण पवार कहती हैं कि ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों पर राज्य सरकारों ने अलग से कोई जानकारी मुहैया नहीं करवाई. इसीलिए आंकड़ा नहीं है. इस बात को सुनकर जो हैरानी इस देश को हुई, उसका हिसाब नहीं लगाया जा सकता. मोदी सरकार ने दूसरी लहर के बाद अपने स्वास्थ्य मंत्री से इस्तीफा लिया था. क्यों, ये बताने की ज़रूरत नहीं. फिर भी सरकार तकनीकी पेंच की आड़ में महामारी के सबसे बड़े सवाल से पीछा छुड़ाकर भाग गई – कि वायरस ने किसकी जान ली और सिस्टम ने किसकी?

Covid Oxygen
ये तस्वीरें कोविड-19 की दूसरी वेव के दौरान की हैं. ऑक्सीजन के लिए भटकते लोगों की ऐसी तस्वीरें देश भर से आई थी.(फोटो- PTI)

कांग्रेस की तरफ से केसी वेणुगोपाल ने कहा ज़रूर कि वो डॉ भारती के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाएंगे. क्योंकि मंत्रीजी ने सदन को गलत जानकारी दी है. लेकिन वेणुगोपाल की अपनी पार्टी और उसके समेत पूरा विपक्ष ईमानदारी से सरकार की मुखालफत कर ही नहीं पाया. क्योंकि आंकड़े सिर्फ भाजपा शासित राज्यों ने नहीं छिपाए. न वाईएसआरसीपी ने आंध्र में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों का आंकड़ा दिया, न तृणमूल ने बंगाल में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों का आंकड़ा दिया और न कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों का आंकड़ा दिया. आम आदमी पार्टी हमेशा की तरह इसके लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर वाले बिंदु पर हमलावर हुई. लेकिन ये तथ्य है कि अपने यहां ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों का आंकड़ा तो उसने भी नहीं ही दिया.

एक हंगामेदार सत्र में बहुत ही विलक्षण तरीके से सरकार और तमाम विपक्षी पार्टियां जैसे साथ आ गए और महामारी के सबसे वीभत्स सच को पीठ दिखा दी गई. बाद के दिनों में विपक्ष दूसरे मुद्दों की तरफ बढ़ा तो सरकार ने ज़िद पकड़ ली कि कोरोना पर बात कर लीजिए. ये हुआ नहीं. और होता तो भी क्या बात हो जाती, हम ऑक्सीजन वाले उदाहरण में देख चुके हैं. राजद के मनोज झा के एक भावुक भाषण को छोड़ दें तो शायद ही किसी सांसद ने उस दुखद सच्चाई को कबूला, जिसे हम सबने जिया. टीकाकरण के मोर्चे पर नए नवेले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि अक्टूबर-नवंबर से नई फार्मा कंपनियां टीके बनाने लगेंगी. तब देश में टीकों की उपलब्धता सुधर जाएगी.

दूसरा मुद्दा- अर्थव्यवस्था

अब बात करते हैं अर्थव्यवस्था की. महामारी की दो लहरें आ चुकी हैं. तीसरी लहर का खतरा टला नहीं है. और न हम ये जानते हैं कि क्या अब वाकई दोबारा लॉकडाउन नहीं लगेगा. इसीलिए अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सरकार से बहुत सारी अपेक्षाएं थीं. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और उनके मंत्रालय ने इस सत्र में अपने सुधार के एजेंडे पर कई बेल पेश किए. दुनिया भर में भारत का नाम खराब कर रहे रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स को खत्म करने की विधायी कार्यवाही शुरू हो गई.

छोटी कंपनियों को इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड IBC का फायदा देने के लिए सरकार एक संशोधन भी लेकर आई. सरकार का कहना है कि महामारी की दो लहरों के चलते नुकसान झेल रहे छोटे उद्योगों को इससे कुछ राहत मिलेगी. दिवालिया होने की स्थिति में वो अपनी तरफ से भी सुलह की पेशकश कर पाएंगे, सिर्फ बैंकों की शर्तों से ही बंधे नहीं रहेंगे. ये बिल दोनों सदनों से पास हो गया.

सरकार ने एक और विधेयक पेश किया, जिसे सुधार कहा जाए या न कहा जाए, इसपर अलग अलग मत हैं. जनरल इंश्योरेंस बिजनेस (नेशनलाइज़ेशन) अमेंडमेंट बिल, 2021 के ज़रिए केंद्र, सरकारी बीमा कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी कम करने जा रहा है. इंश्योरेंस एक भावुक मुद्दा है. और इससे जुड़े किसी भी कानून पर इतिहास में भारी बहस हुई है. लेकिन इस बार बिल हंगामे के भीतर ही पेश होते रहे और मिनिटों में पास भी. और ये सिर्फ इंश्योरेंस सेक्टर से जुड़े इस कानून की बात नहीं है. जितने भी बिल पेश हुए, उनका यही हाल रहा. देश को मालूम ही नहीं चला कि उसकी किस्मत में क्या लिख दिया गया.

तीसरा मुद्दा- सामाजिक न्याय

सामाजिक न्याय के मामले में मॉनसून सत्र के दौरान और पहले काफी सारी चीज़ें हुईं. सत्र से पहले सरकार ने अपने मंत्रिमंडल में छंटनी भी की और नई भर्ती भी. और इस नई भर्ती को लेकर एक कीवर्ड की खूब चर्चा हुई – ओबीसी. मंत्रिमंडल विस्तार से पहले पत्रकार बूझो तो जाने टाइप पहेलियां बुझा रहे थे कि कौनसे मंत्री इन हुए, कौन आउट. लेकिन जैसे ही कार्यक्रम शुरू हुआ, लंबी लंबी लीड्स सूत्रों के हवाले प्रेस के पास पहुंचने लगी. लंबे लंबे टेबल भेजे गए, ये बताने के लिए कैसे सरकार ने इस मंत्रिमंडल में वंचित तबकों को प्रतिनिधित्व दिया. ओबीसी मंत्री बढ़ा दिए.

फिर जब सत्र चल ही रहा था, सरकार ने NEET परीक्षा के केंद्रीय कोटे में ओबीसी आरक्षण लागू कर दिया. इसे लेकर सोशल मीडिया में खूब हंगामा हुआ, लेकिन सरकार अपने निर्णय पर अडिग रही. और सरकार ओबीसी वर्ग के लिए एक और बिल ले आई – संविधान संशोधन नंबर- 127. इसके तहत राज्यों को अपने यहां ओबीसी सूची में जातियां जोड़ने का हक वापस मिल जाएगा. जो कि सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद से अधर में था. इस बिल पर आज राज्यसभा में चर्चा भी हुई. ये बिल दोनों सदनों में पास हो चुका है. अब राष्ट्रपति की मुहर के लिए जाएगा. पूरे सत्र में ये इकलौता ऐसा मुद्दा रहा जिसपर सत्ता और विपक्ष एक ही तरफ थे.

जब जाति और आरक्षण की बात हुई तो जाति आधारित जनगणना की मांग कैसे पीछे रह जाती. विपक्ष ने तो पूछा ही कि सरकार जाति आधारित जनगणना क्यों नहीं करा लेती, लेकिन एक आवाज़ तो पार्टी के भीतर से भी आ गई. भाजपा नेता और योगी कैबिनेट में श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी और बदायूं से भाजपा की ही सांसद संघमित्र मौर्य ने 10 अगस्त को लोकसभा में कह दिया कि राज्यवार और ज़िला वार पशुओं तक की गिनती हो चुकी है. लेकिन पिछड़े वर्ग की गिनती नहीं हो पाई.

यूपी चुनाव सिर पर हैं. ऐसे में जाति आधारित जनगणना का जिन्न बोतल में बंद रहे, यही भाजपा चाहती है. अपने सांसदों और विपक्ष के अलाव भाजपा पर दबाव एक और दिशा से है – पार्टी के दोस्त और अंतरआत्मा की आवाज़ सुनने वाले बिहार सीएम नीतीश कुमार. इन्होंने कह दिया है कि केंद्र फैसला नहीं ले पा रहा तो राज्य स्तर पर कोई कदम उठाने के बारे में सोचा जा सकता है. खैर, जाति और पिछड़ों के सामाजिक कल्याण का मुद्दा इस बार चर्चा में रहा.

चौथा मुद्दा- सामाजिक कल्याण

सदन के अंदर चल रहे गतिरोध और आलोचना को सरकार ने सदन के बाहर से बैलेंस करने की खूब कोशिश की है. किसानों को किसान सम्मान निधि की एक और किस्त दे दी गई है. 2017 के यूपी चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के लिए फायदे का सौदा साबित हुई उज्जवला योजना का दूसरा चरण आ गया है, जिसमें प्रवासियों से एड्रेस प्रूफ नहीं मांगा जाएगा, देश में 100 फीसदी एलपीजी कवरेज पर काम किया जाएगा. माने हर घर में गैस का सिलेंडर. सरकार राशन से संबंधित योजनाओं का भी ज़ोर शोर से प्रचार कर रही है. माने सरकार ये भरोसा दिलाना चाहती है, कि वो वंचितों के साथ खड़ी है.

सामाजिक कल्याण के मोर्चे पर सरकार से जो भी अपेक्षाएं होती हैं, उनका एक बड़ा हिस्सा किसानों का जीवन प्रभावित करता है. तीन कृषि कानूनों को लेकर आंदोलनरत किसान न सिर्फ 8 महीने से दिल्ली की सीमा पर डटे हुए हैं, बल्कि उन्होंने संसद के पास ही किसान संसद भी चलाई. मोदी सरकार MSP पर ज़ुबानी गारंटी दे रही है, न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा भी रही है. लेकिन गतिरोध है, कि बना हुआ है. किसान जिस इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट बिल को लेकर भी चिंतत थे, वो सरकार ने पेश कर दिया है. कुल जमा सरकार ने सुधार के अपने एजेंडे पर टिके रहने की इच्छाशक्ति दिखाई है. लेकिन अपनी नीयत पर भरोसा वो आंदोलनरत पक्षों को दिला नहीं पाई है.

पांचवां मुद्दा- निजता

आखिरी मुद्दा जिसपर हम बात करने वाले हैं, वो है भारत के नागरिकों की निजता. बजट सत्र और मॉनसून सत्र के बीच महामारी के बाद दूसरा सबसे बड़ा भूचाल पैदा किया पेगासस खुलासे ने. पेगासस प्रोजेक्ट के तहत दुनिया भर के मीडिया संस्थानों ने खुलासा किया कि एक इज़रायली सॉफ्टवेयर के निशाने पर 50 हज़ार से ज़्यादा लोग थे. भारत में कई पत्रकार, न्यायपालिका से जुड़े लोग, केंद्रीय मंत्री, राहुल गांधी जैसे विपक्ष के नेता और CBI समेत सेना तक के लोग निशाने पर थे.

समाचार संस्थानों ने अपनी रिपोर्ट्स में कुछ फोन्स में पेगासस होने की पुष्टि की. फ्रांस में इसी मामले में सुरक्षा एजेंसियों को उनके यहां पेगासस होने के प्रमाण भी मिल गए. इज़रायल ने भी जांच बैठा दी. लेकिन सरकार सदन के अंदर चर्चा के लिए नहीं मानी तो नहीं मानी. डेढ़ पेज के जवाब में केंद्रीय सूचना प्रोद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सिर्फ इतना बताया कि जासूसी के लिए नियम बने हैं, और कोई नियम तोड़ा नहीं गया. रक्षा मंत्रालय के अलावा सरकार के दूसरे अंगों ने साफ नहीं बताया कि उन्होंने पेगासस खरीदा या नहीं. इसके बाद सरकार कभी चर्चा के लिए राज़ी ही नहीं हुई. न सरकार ने जांच बिठाई.

विपक्ष ने भी इस मुद्दे को ऐसे खींचा कि इसके शोर में दूसरे सारे मुद्दे दफन हो गए. लेकिन विपक्ष इस दौरान व्यापक जनमानस में इस मुद्दे को लेकर संवेदनशीलता पैदा ही नहीं कर पाया. ग्रीक मिथकों में पेगासस एक घोड़ा है. लेकिन भारत में ये डायनासॉर बनकर आया. पूरे सत्र को खा गया. सदन का न चलना भी एक स्टेटमेंट है. लेकिन इस स्टेटमेंट से पेगासस मामले पर लोकहित का काम हुआ कि नहीं, इसका जवाब देना बड़ा आसान है.

Pegasus 2
पैगासस प्रोजेक्ट को लेकर तमाम तरह की चर्चाएं अभी भी हो रही हैं. फोटो- आजतक

विपक्ष की ये शिकायत रही कि सदन में उसे बोलने नहीं दिया जाता. लेकिन जब भी मौका मिला, उसने क्या किया, हमने देखा. कभी आसन पर कागज़ फाड़कर उड़ाए गए तो कभी सदस्यों ने बोलते-बोलते ही मुद्दा बदल दिया. यहां तक की दुश्मनी वहां तक निभाई गई, जहां इससे पहले तू-तू मैं-मैं की परंपरा नहीं रही – संसदीय समितियां. पेगासस मामले में आईटी समिति को लेकर भाजपा सांसदों की चिंता को चाहे जिस चश्मे से देखा जाए, लेकिन उसे खारिज नहीं किया जा सकता. विपक्ष का कहना है कि चर्चा न करके सरकार नियमों को तोड़ रही है. लेकिन क्या उसका अपना आचरण बिलकुल ठीक था? ट्विटर पर पड़े सैंकड़ो वायरल वीडियो इसका जवाब नहीं में दे रहे हैं.

कुल मिलाकर चर्चा के अभाव और हंगामे की आड़ का पूरा मज़ा विपक्ष ने भी लिया और सरकार ने भी. बात चली है तो संसद के इर्द गिर्द जो हुआ, उसकी भी बात कर लें. राहुल गांधी कभी ट्रैक्टर से संसद गए, तो कभी साइकिल से. तो कभी उन्होंने अपने यहां विपक्षी नेताओं को नाश्ते पर बुला लिया. बार बार विपक्षी एकता की दुहाई दी गई. लेकिन ममता बनर्जी जब दिल्ली आईं तो उन्होंने लाइम लाइट ज़रा देर के लिए अपने से हटने नहीं दी. सत्र आते जाते रहेंगे. हम उनका हिसाब भी लेते रहेंगे. आप भी हिसाब रखिए. क्योंकि नेतागण अपनी लीला करके जा चुके. हमने उस लीला का बखान भी कर दिया. अब नंबर आपको देने हैं.

देश भर की बड़ी खबरें

कश्मीर में पत्रकार के पास से दो जिंदा ग्रेनेड बरामद

बीते दिन यानी 10 अगस्त को राजधानी श्रीनगर के लाल चौक से पुलिस ने आदिल फारुक भट नाम के एक युवक को गिरफ्तार किया. पुलिस ने बताया कि युवक के पास से दो जिंदा ग्रेनेड बरामद किया गया है. न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक आदिल एक लोकल न्यूज एजेंसी में पत्रकार है. दरअसल 10 अगस्त की दोपहर श्रीनगर के भीड़भाड़ वाले इलाके हरी सिंह स्ट्रीट में एक ग्रेनेड धमाका हुआ था. जिसमें करीब 10 लोग घायल हो गए थे. जिसके बाद सुरक्षा बलों ने इलाके को सील कर सर्च ऑपरेशन चलाया था. इसी दौरान आदिल के बैग से पुलिस ने ग्रेनेड बरामद किया. आदिल को इससे पहले फरवरी 2019 में भी गिरफ्तार किया जा चुका है. इंडिया टुडे से बात करते हुए एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि उससे पूछताछ की जा रही है और आगे की जांच जारी है.

केंद्र ने ऑक्सीजन की कमी से मौतों की बात मानी

केंद्र सरकार ने पहली बार ये बात स्वीकार की है कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कमी से लोगों की मौत हुई थी. टेक्निकली सरकार ने सीधे-सीधे इस बात को नहीं स्वीकार किया है बल्कि काफी घुमा-फिरा कर बताया है. आंध्र प्रदेश से राज्यसभा सांसद और तेलुगूदेशम पार्टी के नेता के. रविंद्र कुमार ने सरकार से पूछा था कि क्या सरकार ने आंध्र प्रदेश में ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों पर कोई जांच कराई? ख़ासकर रुइया अस्पताल को लेकर. अगर हां तो इसकी डिटेल्स दी जाएं.

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री डॉ. प्रवीण भारती पवार ने इस सवाल का लिखित जवाब दिया. कहा,
“10 मई 2021 को आंध्र प्रदेश के श्री वेंकटेश्वर रामनारायण रुइया हॉस्पिटल में कुछ मरीज वेंटिलेटर सपोर्ट पर थे, जिनकी कोविड-19 ट्रीटमेंट के दौरान मौत हो गई थी. इस संबंध में प्रारंभिक जांच से पता चला है कि एक ऑक्सीजन टैंक के खाली होने, और दूसरे बैकअप टैंक को स्विच ऑन किए जाने के बीच में ऑक्सीजन का प्रेशर कम हो गया था. ऑक्सीजन लाइन का प्रेशर गिरने से वेंटिलेटर सपोर्ट पर बने मरीजों के लिए ऑक्सीजन की कमी हो गई थी.”

इसके आगे स्वास्थ्य मंत्रालय ने ये भी कहा है कि स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है यानी इसकी ज़िम्मेदारी राज्यों की रहती है. स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने 10 अगस्त को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये जानकारी दी कि केंद्र सरकार ने सभी राज्यों से कहा है कि वो अपने यहां ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों का ब्योरा भेजें. अभी तक केवल एक राज्य ने ऑक्सीजन की कमी से हुई मौत के बारे में बताया है. संयुक्त सचिव ने राज्य का नाम नहीं बताया लेकिन न्यूज एजेंसी ANI ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि अब तक 13 राज्यों ने केंद्र को अपनी रिपोर्ट भेजी है और इसमें केवल पंजाब ने ऑक्सीजन की कमी से मौत की बात स्वीकार की है.

हिमाचल के किन्नौर में लैंडस्लाइड

हिमाचल के किन्नौर से आज दोपहर एक बड़े हादसे की खबर आई. लैंडस्लाइड की वजह से यात्रियों से भरी एक बस और कुछ दूसरी गाड़ियां मलबे में दब गईं. अब तक 10 लोगों को बचाया जा चुका है. जिसमें बस का ड्राइवर भी शामिल है. ड्राइवर ने कुछ वाहनों के सतलज नदी में भी गिरने की बात कही है. घटनास्थनल पर NDRF और ITBP की टीम रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही है. लेकिन बारिश, खराब मौसम और पहाड़ से टूटकर गिर रहे टुकड़ों से रेस्क्यू ऑपरेशन में दिक्कत आ रही है. आईटीबीपी ने मलबे में करीब 40 लोगों के फंसे होने की आशंका जताई है. किन्नौर पुलिस ने लोगों की मदद के लिए हेल्पलाइन नंबर (1786-222-873) जारी किया है. केंद्रीय गृहमंत्री और प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से फोन पर बात की है और हादसे के बारे में जानकारी ली है. प्रधानमंत्री ने हरसंभव मदद करने की बात कही है.

आदर्श नगर पुलिस स्टेशन के SHO सस्पेंड

आदर्श नगर पुलिस स्टेशन के SHO सीपी भारद्वाज को सस्पेंड कर दिया गया है. कुछ दिन पहले उनका एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें आजादपुर फ्लाई ओवर पर बने एक मजार को लेकर उनकी कुछ लोगों से बहस हो रही थी. कुछ युवक मज़ार पर आकर एक शख्स से सवाल जवाब कर रहे थे. तब भारद्वाज ने कहा था कि इस तरह से सवाल जवाब करने की बजाय उन्हें आधिकारिक शिकायत दर्ज करानी होगी. जब युवक नहीं माने तो उन्होंने कार्रवाई की. इसके बाद सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ कैंपेन चलाकर उन्हें गिरफ्तार करने की मांग की गई थी. आजतक की खबर के मुताबिक दिल्ली पुलिस के अधिकारियों का कहना है कि मजार मामले से सस्पेंशन का कोई लेना-देना नहीं है. एसएचओ के खिलाफ काफी शिकायतें थीं.


 

वीडियो- बिजली पर मोदी सरकार के बिल में ऐसा क्या है कि राज्य और किसान विरोध कर रहे हैं?

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