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अगले कुछ दिनों तक संसद में होने वाली हर गतिविधि पर हर भारतवासी की नज़र टिकी रहेंगी

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‘मासिम’. अरबी का शब्द. इससे बना मॉनसून. आ गया. मॉनसून भी और संसद का मॉनसून सत्र भी. 18 जुलाई से 10 अगस्त तक. तो इन तारीखों पर क्या होगा? शोर शराबा. हल्ला गुल्ला. टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज आएगी. सदन स्थगित. दोपहर तक के लिए. कल तक के लिए. और फिर अनिश्चित काल के लिए.

इंसान को आशावादी होना चाहिए. हम मान लेते हैं कि इस बार ऐसा नहीं होगा. सर्वदलीय मीटिंग हो गई.

सुमित्रा ताई और वैकेंया ताऊ ने ‘कहा’ – सब शांति से बात करें.

कांग्रेस ने ‘सुना’ – सरकार की सुनें.

फिर कहा. हमारी सुनें. लिंचिस्तान से लेकर किसान तक पर बहस करें. लेकिन बीजेपी चाहती है कि ट्रिपल तलाक बिल पर बात हो. किसानों को दिए एमएसपी यानी अधिकतम समर्थन मूल्य पर बात हो. सब अपनी अपनी बात करना चाहते हैं क्योंकि 2019 दिख रहा है.

हमें दिख रहा है सदन का सत्र. और कुछ मुद्दे, जो छाए रहेंगे या छाए रहने चाहिए.

# मुद्दा नंबर 1: राहुल नहीं मायावती बनें पीएम

ये मुद्दा तेज़ पर आ रहे दी लल्लनटॉप शो के डेब्यू यानी 16 जुलाई रात 9 बजे से कुछ ही घंटे पहले पैदा हुआ. लखनऊ में बीएसपी के नेताओं की बैठक में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जय प्रकाश बोले. पीएम पेट से नहीं, पेटी यानी मतपेटी से तय होगा. फिर जो बोले, उसका तात्पर्य ये था कि राहुल का नाना घर इटली में है, इसलिए वह पीएम नहीं बन सकते जयप्रकाश मायावती को पीएम बनाने के फेर में वह मुद्दा ले आए, जिसे अब बीजेपी भी नहीं दोहराती और उनके नए बने दोस्त अखिलेश यादव के पापा मुलायम सिंह भी नहीं. इन्हीं सबने तो शुरुआत की थी इस मुद्दे की.

जब सोनिया 1998 में सियासत में आईं तो उनके इटली में मायके की बातें शुरू हो गईं. फिर जब 1999 में अटल सरकार गिरने के बाद उन्होंने वो यादगार दावा किया, मेरे पास नंबर है- 272. और फिर भी सरकार नहीं बना पाईं, तब जिन मुलायम सिंह यादव को जिम्मेदार ठहराया गया, उनकी भी यही टेक थी. सोनिया विदेशी मूल की हैं. और फिर इसके कुछ ही महीनों बाद उनकी पार्टी के तीन नेताओं – शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर, ने भी यही बात कही. सोनिया ने उन्हें एग्जिट डोर दिखा दिया.

आज फिर से दोस्त बन चुके सोनिया और शरद में पहले अदावत रही है.
आज फिर से दोस्त बन चुके सोनिया और शरद में पहले अदावत रही है.

विदेशी मूल का मुद्दा लौटा 2004 में बीजेपी की हार के बाद. सोनिया के पीएम बनने की संभावना देखते हुए सुषमा स्वराज बोलीं,’सिर मुंड़वा लूंगी. भूमि पर सोऊंगी.’

उमा भारती भी कहां पीछे रहतीं. उस वक्त वह एमपी की सीएम थीं. दनदनाते हुए भोपाल से दिल्ली आईं. पार्टी प्रेसिडेंट वैंकेया नायडू को इस्तीफा दिया और प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलीं,’जा रही हूं बद्रीनाथ और केदारनाथ.’

हालांकि बाद में लोगों ने चुटकी ली. उमा दीदी को छुट्टी चाहिए थी. इस्तीफा देना होता तो गवर्नर को देतीं.

मगर सोनिया ने इनकार कर दिया. मनमोहन आए और ये मुद्दा मौन हो गया. हमें लगा हमेशा के लिए. मगर नेता जी हमेशा चौंकाने को तैयार रहते हैं. कहां तो सोनिया मायावती का हाथ उठाकर बेंगलुरु के मंच पर लहरा रही थीं और कहां उनके नेता बेइज्जती कर रहे हैं. हालांकि बयान के 24 घंटे बाद डैमेज कंट्रोल करते हुए मायावती ने जयप्रकाश को बर्खास्त कर दिया. पर अपने या राहुल के पीएम बनने पर कुछ न बोलीं. चुप्पी जरूरी गुंजाइशों के लिए जरूरी है.

# मुद्दा नंबर 2: ट्रिपल तलाक बिल

ये मोदी सरकार का एक अच्छा फैसला है. मजहब और परंपरा की आड़ में किसी का भी शोषण बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए. ये मुल्क संविधान से चलेगा कट्टरपंथियों के कुतर्कों से नहीं. ये ‘कट्टरपंथी‘ शब्द ध्यान रखिएगा, अभी आगे भी इनका जिक्र दूसरे संदर्भ में आएगा.

ट्रिपल तलाक बिल लोकसभा के पिछले शीत सत्र में पास हो चुका है. अब ये राज्यसभा में अटका है. क्योंकि यहां एनडीए के पास बहुमत नहीं है. अब फिर पेश होगा. बहुमत जुटाया जाएगा. फिलहाल तो नरेंद्र मोदी जनमत जुटा रहे हैं. कुछ दिनों पहले एक रैली में वह बोले, एक अखबार में मैंने ऐसा पढ़ा कि ‘नामदार’ ने कहा कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है. लेकिन मैं पूछना चाहता हूं कि वह सिर्फ मुस्लिम पुरुषों की पार्टी है या फिर महिलाओं की भी. क्योंकि वह ट्रिपल तलाक बिल का विरोध कर रहे हैं.

ट्रिपल तलाक कानून के लोकसभा से पास होने पर जश्न मनाती महिलाएं.
ट्रिपल तलाक कानून के लोकसभा से पास होने पर जश्न मनाती महिलाएं.

(आपने गौर किया, जब प्रधान सेवक रंग में होते हैं तो राहुल गांधी को नए नए नाम देते हैं. कभी शहजादे, कभी नामदार.)

खैर. राहुल गांधी ने भी काउंटर मारा. बोले, महिला आरक्षण बिल पारित करवाइए. कांग्रेस पूरा सपोर्ट देगी. इस पर बीजेपी सही जवाब तलाश रही है. तब तक उनके प्रवक्ताओं ने ये कहकर काम चलाया है कि कांग्रेस उन दलों से कट्टी करे जो इसका विरोध कर रहे हैं.

# मुद्दा नंबर 3: क्या है ये महिला आरक्षण बिल को लेकर विरोध और समर्थन की कहानी?

इसकी शुरुआत होती है 1993 में. स्थानीय निकाय और पंचायतों में महिलाओं को 33 फीसदी रिजर्वेशन दिया गया. फिर बात उठी, विधानसभा और लोकसभा में रिजर्वेशन की. देवेगौड़ा सरकार में पहली बार जब इस बिल पर चर्चा हुई. तब शरद यादव ने चर्चित बयान दिया था. बोले, अगर इस बिल में अगर ओबीसी एससी-एसटी को आरक्षण नहीं मिला तो सिर्फ ‘परकटी महिलाओं‘ को ही फायदा होगा. परकटी यानी जो बाल कटाती हैं. फिर देवेगौड़ा की कुर्सी के पाये ही कट गए चचा केसरी के समर्थन वापस लेने से.

…और बिल भी ढह गया.

फिर अटल सरकार ने 12वीं लोकसभा में इसे पेश किया. बिल पास होता उससे पहले सरकार पास हो गई यानी गुजर गई. उससे पहले एक तमाशा भी हुआ था लोकसभा में. 13 जुलाई 1998 को एनडीए सरकार के कानून मंत्री एम थंबीदुरै ने बिल पेश किया. लालू प्रसाद यादव की पार्टी के एमपी सुरेंद्र यादव आगे बढ़े. उन्होंने मंत्री से बिल छीना और चिंदी-चिंदी कर दिया.

संसद के बाहर महिला आरक्षण बिल का विरोध करती लालू-मुलायम की जोड़ी.
संसद के बाहर महिला आरक्षण बिल का विरोध करती लालू-मुलायम की जोड़ी.

फिर बातें होती रहीं. कुछ खास हुआ नहीं. जब 2008 में हुआ, 108 वां संशोधन, तब कांग्रेस ने ये चिंदी-चिंदी दांव याद रखा. 6 मई, 2008 को जब बिल अपने संशोधित रूप में राज्यसभा में पेश हुआ तब महिलाओं की तगड़ी घेरेबंदी की गई. बिल पेश करने के लिए खड़े हुए उस समय देश के कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज. उनको चारों तरफ से घेरकर बैठी थीं कुमारी शैलजा, अंबिका सोनी, जयंती नटराजन और अलका बलराम. सपा के अबू आजमी वगैरह आगे बढ़े, मगर उन्हें महिला और बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी ने परे धकेल दिया. बिल राज्यसभा में बीजेपी और लेफ्ट दलों के सहयोग से पास हो गया. मगर तब से अब तक लोकसभा में धक्के ही खा रहा है.

नरेंद्र मोदी और बीजेपी ने 2014 में पिंकी प्रॉमिस किया था. बिल पास कराएंगे. उनके पास लोकसभा में बहुमत भी है. मगर अब तक नहीं कराया. क्यों नहीं कराया. नरेंद्र मोदी जानें. अब तक उन्होंने इस मसले पर अपने मन की बात शेयर नहीं की. पर हमें लगता है कि अब किसी किस्म का एक्सक्यूज बचा नहीं है. अब ये बिल लागू हो ही जाना चाहिए. बाकी राहुल और मोदी आपस में तय कर लें, कौन इसका पॉलिटिकल फायदा कैसे उठाएगा. रहे शरद यादव, तो उन्हें तो सांसदी के भी लाले पड़े हैं. बसपा का अभी भी वही रुख है. महिला आरक्षण में भी एससी एसटी के लिए अलग से आरक्षण हो. सपा- राजद का कहना है कि ओबीसी और अल्पसंख्यकों के लिए भी आरक्षण हो.

तो क्या नरेंद्र मोदी ऐसा करेंगे. मगही में एक कहावत है. ‘सुतल आदमी के न जगावल जा हई, जगल आदमी के के जगईतई’ अर्थात सोये आदमी को जगाया जाता है, जो जगा हुआ है उसको क्या जगाना.

वैसे कई बार सोते आदमी को जगाकर बीफ के शक में मार भी दिया जाता है. शास्त्रों में इसे लिंचिंग कहा गया है. अब देश के सबसे बड़े शास्त्र संविधान के रखवाले सुप्रीम कोर्ट ने कुछ कहा है. चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने सरकारों को फटकार लगाई. क्योंकि सरकार ने पिछली तारीख पर दिए आदेश पर लापरवाही दिखाई. 21 जुलाई को कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से कहा था. गाय की रक्षा के नाम पर गुंडई करने वालों पर सख्ती करो. गाइडलाइंस बनाओ. अभी तक नहीं बनीं. अब गुडों की एक भीड़ बच्चा चोरी के शक में लोगों को मार रही है. और इन सबसे मर रहा है सरकार और देश का इकबाल. सुप्रीम कोर्ट की निगाह है. 20 अगस्त को फिर पूछा जाएगा. बताओ, जो काम दिया था वो किया या नहीं.


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