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सहसपुर से निकल कोलकाता में टेंट में रहकर कैसे टीम इंडिया तक पहुंचे शमी?

साल था 2013 और महीना था नवंबर का. वेस्ट इंडीज़ की टीम दो टेस्ट और तीन वनडे के दौरे के लिए भारत आई हुई थी. जी हां, वही दौरा जिसके बाद से स्टैंड्स में से ‘सचिन… सचिन’ कि आवाज फिर कभी सुनने को नहीं मिलने वाली थी. वही दौरा जिसके बाद से एक ऐतिहासिक इंटरनेशनल करियर समाप्त होने वाला था. क्रिकेट के मास्टर-ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर हमेशा के लिए इंटरनेशनल क्रिकेट को अलविदा कहने वाले थे. हर भारतीय क्रिकेट फैन को वह दौरा अच्छे से याद होगा. सचिन का पिच को चूमना, आंखों में आंसू होना और आखिर में वो सचिन की दिल छूने वाली स्पीच. सब कुछ फैंस को याद होगा.

लेकिन आज बात उस करियर की नहीं करेंगे जो इस दौरे से समाप्त हुआ. आज बात करेंगे एक ऐसे करियर की जो इस दौरे से शुरू हुआ. एक ऐसे खिलाड़ी कि जो अगर दो हफ्ते लेट हो जाता तो कभी सचिन के साथ नहीं खेल पाता. एक ऐसे खिलाड़ी की जो महज़ बिरयानी के लिए बल्लेबाज़ों के छक्के छुड़वा देता था. एक ऐसे गेंदबाज़ की जिसके बड़े भाई की किडनी में अगर पथरी ना होती तो शायद उसका बड़ा भाई आज भारत के लिए खेल रहा होता. आज बात करेंगे भारत के लिए 350 से ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज़ मोहम्मद शमी की.

#रफ़्तार, एक्यूरेसी और सीम

सिम्पल एक्शन, तेज़ रफ़्तार, और सीम के तो क्या ही कहने. गेंद की सीम इतनी सीधी की तीर भी शरमा जाए. मॉडर्न क्रिकेट में शायद ही कोई ऐसा गेंदबाज़ हो जो गेंद को इतनी सीधी सीम के साथ फेंकता हो. एक्यूरेसी ऐसी की जनाब की 355 इंटरनेशनल विकेट में से 102 विकेट ‘क्लीन बोल्ड’ के रूप मैं आई हैं. 6 नवंबर 2013 को कोलकाता के ईडन गार्डन्स में अपने डेब्यू टेस्ट मैच में शमी ने पहली पारी में चार और दूसरी पारी में पांच विकेट चटकाए थे. इनमे से छह विकेट बोल्ड के रूप में और एक विकेट LBW के रूप में आया था. इससे शमी की एक्यूरेसी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

बंगाल के लिए डोमेस्टिक क्रिकेट खेलने वाले शमी उस मैच में लोकल बॉय कहलाए. यानी अपने होम ग्राउंड पर मैच खेल रहे थे. लेकिन कैसे उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर का लड़का जिसके पिता की स्पेयर पार्ट्स की दुकान थी, खेलते-खेलते ईडन गार्डन्स तक पहुंच गया? आज मोहम्मद शमी के 31वें जन्मदिन पर आपको बताएंगे कि कैसे उनकी मेहनत और उनके पिता की लगन के चलते उन्होंने सहसपुर से टीम इंडिया तक का सफर तय किया.

Shami Bowled
मोहम्मद शमी (पीटीआई)

#शुरुआत से मिला पिता का साथ

उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के छोटे से शहर सहसपुर से आने वाले मोहम्मद शमी को गेंदबाज़ी तो यूं समझिए विरासत में मिली. उनके पिता तौसिफ अली खुद एक तेज़ गेंदबाज़ थे. अच्छी-खासी रफ़्तार से गेंद करते थे. लेकिन सुविधाओं के अभाव के चलते रह गए. सहसपुर में ना कोई मैदान था ना पिच. ना ही कोई क्रिकेट की सुविधाएं. लेकिन वे नहीं चाहते थे कि जो उनके साथ हुआ वो उनके बेटे के साथ भी हो.

शमी के बड़े और छोटे दोनों भाई गेंदबाज़ी करते थे. बड़े भाई तो शमी से भी तेज़ थे. लेकिन गुर्दे में पथरी होने के चलते उन्हें क्रिकेट से किनारा करना पड़ा. पिता के साथ कारोबार में हाथ बटाने लगे. लेकिन शमी के लिए उनके पिता चाहते थे कि वे अपने इस तेज़ गेंदबाज़ी के हुनर को लेकर आगे बढ़ें. शमी के पिता ने कहा भी था,

”मैंने उसमें रफ़्तार के साथ गेंदबाज़ी के बाकी गुण भी देखे. उसका बड़ा भाई भी तेज़ गेंद करता था. लेकिन उसके गुर्दे में पथरी थी तो वह मेरे साथ कारोबार में जुड़ गया. छोटा भाई भी तेज़ गेंद करता था लेकिन शमी के पास अच्छी रफ़्तार थी. मैं चाहता था कि वह इसपर ज़ोर लगाए.”

#सहसपुर से कोलकाता

शमी के कॉलेज खत्म होने के बाद तौसिफ उन्हें मुरादाबाद के एक कोच बदरुद्दीन सिद्दीकी के पास ले गए. शमी एक साल तक मुरादाबाद में सिद्दीकी की कोचिंग में खेलते रहे. लेकिन शमी के पिता जानते थे कि यूपी से इंटरनेशनल तक पहुंचने में काफी अड़चने आएंगी. शमी के पिता का कहना था,

”यूपी में कोई क्लब सिस्टम नहीं है. यहां आपको बार-बार ट्रायल्स देने जाना पड़ता है. जहां कई बार तो ऐसा होता है कि आपसे दो-तीन गेंद फिंकवा कर ही आपको रिजेक्ट कर दिया जाता है. मैं नहीं चाहता था कि इसकी कहानी भी ट्रायल्स तक ही रह जाए. बदरुद्दीन, कोलकाता में कुछ लोगों को जानते थे तो हमने उसे वहां भेज दिया.”

शमी को उनके पिता की क्रिकेट में रुचि होने का बहुत फायदा मिला. वे जानते थे कि शमी में वो लगन है जो क्रिकेट के खेल में आगे बढ़ने के लिए सबसे जरुरी है. वे ये भी जानते थे कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है. और उन्होंने अपने 16 साल के बेटे को कोलकाता के लिए रवाना कर दिया.

Shami Test
मोहम्मद शमी की फाइल फ़ोटो(पीटीआई)

# कोच ने अपने घर में रखा

कोलकाता के ईडन गार्डन्स से एक किलोमीटर दूर था डलहौज़ी एथलेटिक क्लब. ये क्लब क्रिकेट के लिए नहीं पहचाना जाता था. इस कल्ब में एक प्रैक्टिस पिच थी. आधी मिट्टी, आधी सीमेंट से बनी. मैदान के बाहर एक टेंट था. शमी उस टेंट में रहते, खाते और उस प्रैक्टिस पिच पर अपनी गेंदबाज़ी का अभ्यास करते. एक रोज़ डलहौज़ी एथलेटिक क्लब के सुमोन चक्रवर्ती ने टाउन हॉल क्लब के कोच देबब्रता दास को फ़ोन लगाया. दास CAB के पूर्व असिस्टेंट सेक्रेटरी रह चुके थे. वैसे भी टाउन हॉल क्लब का क्रिकेट में अच्छा नाम था.

सुमोन चक्रवर्ती ने दास को फ़ोन लगाया और कहा,

”जल्दी राजस्थान क्लब आइए. एक नया गेंदबाज़ दिखाना है. एक हीरा है. नहीं तो खो जायेगा.”

दास क्लब पहुंचे और उन्होंने खेलते हुए बच्चों को देखा और जौहरी की तरह उस हीरे को पहचान लिया. दास ने नाम पूछा. कहां से हो ये भी पूछा. फिर पूछा खेलना चाहोगे. शमी ने तुरंत हां कर दिया. दास बोले,

”तुम्हे साल के 75 हज़ार मिलेंगे और दिन के 100 रुपए खाने के लिए.”

शमी के पास रहने के लिए घर नहीं था. उन्होंने दास से ये बात कही तो दास ने उन्हें अपने घर में रहने की परमिशन दे दी. यहां से शमी टाउन हॉल क्लब के लिए खेलने लगे.

#बिरयानी मिलेगी?

शमी का बिरयानी के लिए प्यार अलग ही लेवल का है. उन्हें बिरयानी इस कदर पसंद है कि वे टाउन हॉल की टीम से खेलते वक़्त हर बड़े मैच से पहले बिरयानी की फरमाइश करते थे. और खाकर ही खेलते थे. दास बताते हैं कि उन्हें जब भी शमी से विकेट चाहिए होती थी तो उस समय बिरयानी ही काम आती थी. दास कहते हैं,

”जब भी हमें विकेट चाहिए होती थीं तो मैं कहता था ‘शमी फाड़ दे यार’ तो शमी तुरंत पूछते थे ‘बिरयानी मिलेगी?’ और मैं बोलता था हां. शमी फट से बोलता था ‘अच्छा गेंद दो’ और तुरंत हमे विकेट निकाल कर देता था.”

दास बताते हैं कि ना उन्हें कभी पैसा चाहिए होता था और ना ही कुछ और सुख सुविधाएं. सिर्फ बिरयानी और सोना.

#दादा की नज़र में आए शमी

दास की छत्रछाया में शमी ने बंगाल की अंडर-22 टीम तक का सफर तय कर लिया था. तभी पूर्व भारतीय कप्तान सौरव गांगुली की निगरानी में एक कैंप लगा. जहां गांगुली की नज़र शमी पर पड़ी. शमी की गेंदबाज़ी ने वहां सबको प्रभावित किया जिसके बाद उनका बंगाल की रणजी ट्रॉफी के लिए सलेक्शन हो गया. फिर क्या था, शमी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और डोमेस्टिक में बेहतरीन प्रदर्शन करते गए.

अपने डोमेस्टिक के प्रदर्शन के दम पर उनका सलेक्शन साल 2012 के वेस्ट इंडीज ‘ए’ टूर के लिए हुआ. वहां भी शमी ने अपनी गेंदबाज़ी से आग बरसाई. शमी ने उस दौरे पर भारत की फ्लैट पिचों पर एक बेहतरीन तेज़ गेंदबाज़ी का नमूना पेश किया. ईडन गार्डन्स में 10 और इंदौर में 11 विकेट चटकाए.

Shami
मोहम्मद शमी की फाइल फ़ोटो(पीटीआई)

# इंडियन टीम में एंट्री

6 जनवरी 2013. आखिर वो दिन आ ही गया जब सहसपुर का लड़का पहली बार भारतीय टीम की जर्सी पहनने वाला था. पकिस्तान की टीम भारत आई हुई थी. दो मैचों की T20 सीरीज़ 1-1 की बराबरी पर समाप्त हो चुकी थी. शमी उस सीरीज़ में अपनी जगह नहीं बना पाए थे. वनडे सीरीज़ के पहले दो मैचों में भी शमी को मौका नहीं मिला. भारत दोनों मैच हार गया था. तीसरे मैच में आखिरकार धोनी ने शमी को खिलाने का फैसला किया.

भारत उस मैच को 10 रन से जीता. शमी ने विकेट भले ही एक ली लेकिन तेज़ गेंदबाज़ी की बेहतरीन कला का प्रदर्शन किया. अपने 10 ओवरों में महज़ 23 रन दिए. भारत ने 167 बनाकर भी मैच को जीत लिया. साल के अंत में आते-आते जब सचिन के जाने की सबसे ज़्यादा चर्चा थी तो शमी की टीम में एंट्री हो गई. छह नवंबर 2013 को उन्होंने सचिन के साथ भारत के लिए मैदान पर कदम रखा. सचिन की आखिरी सीरीज़ में उन्होंने लाजवाब गेंदबाज़ी की. जबकि सचिन को विदाई देने वाले खिलाड़ियों के साथ वो भी मैदान पर मौजूद थे.

उसके बाद से शमी ने कभी भी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. शमी कुछ ही समय में भारत के लिए वनडे में सबसे तेज़ 50 विकेट लेने वाले दूसरे गेंदबाज़ बन गए. डेब्यू के दो साल बाद ही वर्ल्ड कप भी खेल गए. साल 2015 के वर्ल्ड कप में चोट लगे घुटने के साथ 17 विकेट चटकाकर शमी ने अपनी काबिलियत का लोहा पूरी दुनिया में मनवाया. पिछले कुछ सालों में शमी और बेहतर गेंदबाज़ बने हैं. आज शमी तीनों फॉर्मेट में भारत की गेंदबाज़ी के एक अहम अंग हैं. शमी भारत के लिए 54 टेस्ट खेल कर 198 विकेट ले चुके हैं. वहीं वनडे और T20 में शमी 79 और 12 मैच खेल कर 148 और 12 विकेट चटका चुके हैं.


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