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क्या मोदी सरकार यूपी चुनाव के चलते OBC आरक्षण पर ये बड़ा फैसला लेने वाली है?

पचास और साठ के दशक में सोशलिस्ट नेता राम मनोहर लोहिया का एक नारा था- ‘पिछड़ा पाए सौ में साठ’. मतलब जितनी आबादी, उस हिसाब से पिछड़ों को उनका हिस्सा दिया जाए. सामाजिक न्याय की राजनीति को इस नारे ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया. लेकिन पिछड़ों के आरक्षण का मुद्दा सामाजिक न्याय और सोशल इंजीनियरिंग से ज्यादा कोर्ट-कचेहरी और संसद की खींच-तान में नजर आया. खबर है कि पिछड़ो के आरक्षण को लेकर अब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार एक ऐसा बिल लाने की तैयारी कर रही है, जिसके जरिए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के एक बड़े फैसले को निष्प्रभावी किया जा सके. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की वजह से राज्य सरकारों की वो शक्तियां छिन गईं, जिससे वो किसी भी जाति को ओबीसी में डाल कर आरक्षण का पात्र बना सकते थे.

आइए जानते हैं कि कौन सा है वो फैसला और मोदी सरकार यूपी इलेक्शन के मद्देनजर कौन सा बिल लाने की फिराक में है. उस संविधान संशोधन के बारे में भी बताएंगे जिसमें फिर संशोधन करने का प्लान बन रहा है.

सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला

5 मई 2021. सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर लगी हुई थीं जिसमें मराठा रिजर्वेशन का सवाल फंसा हुआ था. मराठा आरक्षण (Maratha Reservation) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया. उसने शिक्षा और नौकरी में मराठा आरक्षण को असंवैधानिक करार दे दिया है. अदालत के अनुसार,

“अब किसी भी नए व्यक्ति को मराठा आरक्षण के आधार पर कोई नौकरी या कॉलेज में सीट नहीं दी जा सकेगी. अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मराठा समुदाय को रिजर्वेशन के लिए सामाजिक, शैक्षणिक रूप से पिछड़ा घोषित करने का कोई आधार नहीं है. 2018 में लाया गया मराठा रिजर्वेशन का कानून संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में दिए समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन करता है.”

कोर्ट ने कहा कि वो 1992 के इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिए अपने फैसले की फिर से समीक्षा नहीं करेगा. इस फैसले में किसी भी आधार पर रिजर्वेशन का कोटा 50 फीसदी से ज्यादा होने पर रोक लगा दी गई थी. फैसले से ये बात भी स्पष्ट हो गई कि राज्य अपनी तरफ से रिजर्वेशन की लिस्ट में किसी का नाम नहीं जोड़ सकते. चाहें पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण केंद्र को देना हो या राज्य को, इस पर फैसला राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ही करेगा.

Supreme Court Of India
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को असंवैधानिक घोषित कर दिया है. 2018 में देवेंद्र फडणवीस की सरकार ये रिजर्वेशन लेकर आई थी. कोर्ट ने ये भी कहा कि पिछड़ा वर्ग का आरक्षण किसे मिलेगा या नहीं ये सिर्फ संवैधानिक संस्था राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग तय करेगा. (तस्वीर: पीटीआई)

कौन तय करता है पिछड़ा कौन है?

आरक्षण को लेकर जब इंदिरा साहनी के मामले में फैसला आया तब ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि केंद्र, राज्य और केंद्रशासित प्रदेश मिल कर ऐसी संस्था बनाएं जो पिछड़ेपन पर फैसला करे. सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि एक ऐसा पुख्ता मकैनिजम बनाया जाए जिसके जरिए पिछड़ेपन के आधार, जनसंख्या में उनके अनुपात और प्रतिनिधित्व पर ठोस फैसला लिया जा सके.

बरसों से चली आ रही ये कवायद साल 2018 में परवान चढ़ी. मोदी सरकार संविधान संशोधन 102 लेकर आई. इस संशोधन के जरिए एक राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Classes) बनाने की पहल की गई. 11 अगस्त 2018 को राष्ट्रपति ने संसद की मंजूरी के बाद इस संविधान संशोधन पर हस्ताक्षर कर दिए. इस तरह से भारतीय संविधान में अनुच्छेद 338B जुड़ा. इसके तहत राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा मिला और इसके स्थापना के नियम-कायदे तय किए गए. मतलब कि कमीशन में कितने मेंबर होंगे, किन-किन मसलों पर फैसला ले सकते हैं आदि.

सरकारों के लिए एक नई मुश्किल खड़ी हो गई

पिछड़ा आयोग को संवैधानिक दर्जा मिलने से एक ऐतिहासिक काम तो हुआ, लेकिन सरकारों के लिए नई मुश्किल खड़ी हो गई. अब तक राज्य सरकारें जातीय गणित के आधार पर पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान करके वोट की रोटियां सेक लेती थीं. लेकिन इस कमीशन के बन जाने के बाद ये मुश्किल हो गया. अब किसे पिछड़ा माना जाए, किसे न माना जाए ये सब तय करना राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग के जिम्मे आ गया. अब इससे राज्यों के लिए पिछड़ा वर्ग को लेकर चुनावी गुणा-गणित बिठाना मुश्किल हो रहा है.

फिलहाल सबसे नजदीक उत्तर प्रदेश का विधानसभा इलेक्शन है. सभी दलों को पता है कि केंद्र में सरकार बनाने का रास्ता यूपी से होकर ही जाता है. ऐसे में वहां हर हाल में मजबूती कायम रखनी होगी. यूपी उन राज्यों में आता है जहां वोट बैंक जातियों के आधार पर बंटा हुआ है. पिछड़ी जातियों के बड़े हिस्से का वोट जिसकी तरफ जाएगा कामयाबी उसके हिस्से आएगी. इन जातियों का वोट आकर्षित करने के लिए सबसे मुफीद तरीका है, आरक्षण.

उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ सर्वे में टॉप पर हैं.
उत्तर प्रदेश के बिहार जैसे राज्यों में चुनावों के फैसले में पिछड़ा वर्ग बड़ी भूमिका निभाता है. राज्यों के पिछड़ा वर्ग तय करने के अधिकार के छिनने से राजनीति की गुणा-गणित गड़बड़ा रही है.

नए बिल के जरिए एक तीर से दो शिकार?

जानकारों का कहना है कि चुनाव को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार 102वें संविधान संशोधन से बच निकलने का रास्ता निकालने की कोशिश में है. इसीलिए एक बिल लाने पर विचार कर रही है. ये बिल 102वें संविधान संशोधन में संशोधन लाने के लिए होगा. टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि सोशल जस्टिस मिनिस्ट्री ने एक कैबिनेट नोट तैयार किया है जो राज्य के पिछड़ा वर्ग चिह्नित करने के अधिकार को बहाल करेगा. आने वाले बिल में इस तरह का प्रावधान होगा कि राज्य अपने यहां किसी को पिछड़ा वर्ग घोषित कर सकते हैं. जैसा कि 5 मई के फैसले से पहले किया करते थे.

ऐसा नहीं है कि सरकार ने इससे पहले ये प्रयास नहीं किए. मोदी सरकार ने जुलाई 2021 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि वो अपने 5 मई के फैसले में सिर्फ राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के पिछड़ा वर्ग तय करने की बात को वापस ले ले. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने से इंकार कर दिया था. ऐसे में सरकार बिल लाने का रास्ता चुन रही है. खबरें हैं कि इस बिल को संसद के मानसून सत्र में ही लाए जाने की योजना है. कहा जा रहा है कि बिल के जरिए सरकार एक तीर से दो निशाने लगाने की फिराक हैं.

1. पेगासस जासूसी कांड की वजह से संसद में पैदा हुआ डेडलॉक खत्म करने के लिए इसे सदन के पटल पर रखा जाएगा. चूंकि मामला पिछड़ी जातियों और सामाजिक न्याय से जुड़ा हुआ है, ऐसे में कोई भी दल इससे मुंह नहीं मोड़ सकता. इस तरह से सदन फिर से चल सकेगा.
2. ये बिल पास होने के बाद यूपी में पिछड़ी जातियों को लेकर बड़े फैसले भी लिए जा सकते हैं. इससे इलेक्शन में मदद मिलेगी.

उत्तर प्रदेश में 40 फीसदी आबादी ओबीसी की है. यूपी में पिछड़ी जातियों के प्रभाव के बारे में हमने जीबी पंत सोशल साइंस इंस्टिट्यूट के प्रोफेसर बद्री नारायण से बात की. उन्होंने कहा,

“पिछड़ों को पहले सोशलिस्ट पार्टियों से जोड़ कर देखा जाता था. लेकिन 2014 के बाद ओबीसी का छुकाव हिंदुत्व की तरफ दिखा है. 2014 के बाद साफ देखा जा सकता है कि बीजेपी ने पिछड़ी जातियों को राजनीति और पावर-शेयरिंग में जगह दी है. बीजेपी अलग-अलग पिछड़े वर्गों के कई नेताओं को सामने लेकर आई है. एक नया आधार तय करने के लिए कुर्मी, लोध, मौर्या, कुशवाहा और चौरसिया जैसी पिछड़ी जातियों को ज्यादा जगह दी गई है. अब बीजेपी धीरे-धीरे अति पछड़े वर्ग जैसे निषाद, मल्लाह और राजभर के बीच पैठ बनाने की कोशिश में है. हो सकता है अगले कुछ वर्षों में उनका भी ज्यादा प्रतिनिधित्व देखने को मिले. हाल ही में मोदी मंत्रिमंडल में इस प्रयास की झलक भी दिखी है.”

अब देखने वाली बात ये होगी कि मानसून सत्र के इस हंगामे के बीच सरकार इस बिल को कैसे पेश करती है और इसके पास होने के क्या असर दिखाई देते हैं.


वीडियो – सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण को असंवैधानिक करार देते हुए क्या कहा?

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