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खेती और किसानों के लिए कैसा रहा मोदी सरकार 2.0 का पहला साल?

फरवरी का महीना और साल 2016. उत्तर प्रदेश का बरेली जिला. पीएम नरेंद्र मोदी ने किसान रैली को संबोधित किया. कहा कि साल 2022 तक किसानों की इनकम दोगुनी करना उनका सपना है. इसके लिए काम किया जाएगा. करीब चार साल बाद, 10 मार्च, 2020 को इस बारे में उन्होंने संसद में भी बयान दिया. अब मोदी सरकार 2.0 का एक साल पूरा हो चुका है. लेकिन किसानों की आय डबल होने के कितने करीब है, ये किसी को नहीं पता.

हालांकि सरकार दावे कर रही है कि उसने किसानों के लिए एक से बढ़कर एक योजनाएं बनाई हैं. लेकिन जानकार कहते हैं कि यह काफी नहीं. अभी कृषि मंत्रालय का जिम्मा नरेंद्र सिंह तोमर के पास है. खैर, देखते हैं कि 30 मई, 2019 से अब तक एक साल में किसान और खेती के लिए सरकार ने क्या किया.

बड़े फैसले

1. प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना 

योजना की शुरुआत 2019 लोकसभा चुनाव से पहले हुई. 24 फरवरी, 2019 को पीएम मोदी ने गोरखपुर में शुरुआत की. पहले यह केवल दो हेक्टेयर यानी करीब 12 बीघा जमीन वाले किसानों के लिए थी. दोबारा मोदी सरकार बनी, तो बदलाव किया गया. योजना को सभी किसानों के लिए लागू किया गया. किसान को एक साल में सरकार से 6000 रुपये मिलते हैं. यह पैसे तीन किश्तों में, हर चौथे महीने पर दिए जाते हैं. 14.5 करोड़ किसान इस योजना के तहत आते हैं. पैसा सीधे खाते में जाता है.

2. आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में बदलाव

कोरोना वायरस के चलते किसानों पर पड़े बुरे असर के चलते यह फैसला लिया गया. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 15 मई को ऐलान किया. अनाज, खाद्य तेल, तिलहन, दलहन, आलू और प्याज जैसी कृषि उपज को नियंत्रणमुक्त करने का फैसला किया. यानी इनके बाजार भाव में सरकार हस्‍तक्षेप नहीं करेगी. भारत जिस समय अनाज की कमी से जूझ रहा था, तब यह कानून बना था. इस एक्‍ट के तहत जो भी वस्‍तुएं आती हैं, सरकार इनके उत्पादन, बिक्री, दाम, आपूर्ति और वितरण को नियंत्रित करती है. अभी क्या होता कि जो सामान आवश्यक वस्तु अधिनियम में आता है, उसका तय सीमा से ज्याद स्टॉक नहीं रख सकते. कानून मेें बदलाव होने से खेती में प्राइवेट कंपनियों के आने की उम्मीद है.

3. प्रधानमंत्री किसान मान धन योजना

योजना 12 सितंबर, 2019 को अस्तित्व में आई. किसानों को पेंशन देने के लिए. सरकार ने बताया कि बुढ़ापे में किसानों के पास आजीविका के साधन नहीं होते हैं. योजना से उन्हें संबल मिलेगा. हर महीने 3000 रुपये की पेंशन दी जाएगी. इसके लिए किसान को हर महीने 55 से 200 रुपये के बीच प्रीमियम यानी किस्त देनी होगी. कितनी किस्त जाएगी, यह फैसला किसान की उम्र के हिसाब से होगा. 18 से 40 साल की उम्र का किसान शामिल हो सकता है. जितना पैसा किसान देगा, उतना ही सरकार भी जमा कराएगी. सरकार का कहना है कि 11 मार्च, 2020 तक 19.97 लाख किसान इस योजना में शामिल हुए हैं.

असम के बाकसा जिले में खेती के लिए जमीन को तैैयार करने में जुटा एक किसान. (Photo: PTI)
असम के बाकसा जिले में खेती के लिए जमीन को तैैयार करने में जुटा एक किसान. (Photo: PTI)

4. देश में कहीं भी फसल बेचने के लिए कानून

किसान फसल का उचित मूल्य न मिलने से परेशान रहते हैं. सरकार ने इस समस्या को दूर करने के लिए कानून बनाने का ऐलान किया है. निर्मला सीतारमण ने 15 मई को यह जानकारी दी थी. उनका कहना था कि कानून बनने पर किसान फसल को मंडियों के बाहर भी बेच सकेंगे. अभी वो केवल लाइसेंसधारी व्यापारियों को ही बेच सकते हैं. सरकार का कहना है कि इससे बिचौलिए खत्म होंगे. किसानों को सही भाव मिलेगा.

बड़ी नाकामी

# फसल बीमा योजना में बदलाव 

फसल बीमा योजना को 2016 में सभी किसानों के लिए कंपल्सरी किया गया था. इस योजना का पीएम मोदी ने काफी प्रचार किया था. लेकिन किसान लगातार शिकायतें कर रहे थे. जैसे प्रीमियम के मुकाबले भुगतान कम होना, समय पर मुआवजा न होना. किसानों की मदद की बजाए इससे इंश्योरेंस कंपनियों को ज्यादा फायदा हुआ. ऐसे में सरकार को पीछे हटना पड़ा. फरवरी, 2020 में योजना को ऐच्छिक बना दिया गया है.

लॉकडाउन के दौरान देश के कई राज्यों में किसानों को सही भाव न मिलने के चलते सब्जियों को फेंकना पड़ा. इसी तरह महाराष्ट्र में तिरंगा वायरस के चलते टमाटर खराब हो गए. ऐसे में किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा. (Photo: PTI)
लॉकडाउन के दौरान सही भाव न मिलने के चलते कई राज्यों के किसानों को अपनी फसल फेंकनी पड़ी. इसी तरह महाराष्ट्र में तिरंगा वायरस के चलते टमाटर खराब हो गए. ऐसे में किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा. (Photo: PTI)

# किसानों को फसल का वाजिब दाम न मिलना

मोदी सरकार अपने पहले कार्यकाल से कह रही है कि किसानों को फसल लागत से ज्यादा पैसा मिलना चाहिए. लेकिन छह साल सरकार में रहने के बाद भी जमीन पर ऐसा नहीं हुआ है. ताजा उदाहरण लॉकडाउन का ही है. देश के कई हिस्सों में टमाटर, ककड़ी और प्याज जैसी उपज के दाम धड़ाम से गिर गए. गांवों में किसान एक से दो रुपये किलों में ये सब्जियां बेचने को मजबूर थे. वहीं दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में इनके भाव बढ़े हुए थे. यहां भाव 30-40 रुपये किलो के आसपास थे.

# eNAM प्लेटफॉर्म 

ई-नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट यानी ऑनलाइन फसल बेचने का जरिया. मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में इस बारे में ऐलान किया था. कहा था कि जैसे अमेजन से शॉपिंग होती है, वैसे ही इससे भी होगी. लेकिन मई, 2020 तक भी यह किसानों या व्यापारियों को लुभा नहीं पाई है. अभी भी किसान की फसल पुराने तरीके से मंडियों के चक्कर लगाते हुए बिकती है.

न्यूनतम समर्थन मूल्य में गेंहू की खरीद में सरकार के काम की ताऱीफ होती है. लेकिन बाकी फसलों में ऐसा नहीं होता है. (Photo: PTI)
न्यूनतम समर्थन मूल्य में गेहूं की खरीद में सरकार के काम की ताऱीफ होती है. लेकिन बाकी फसलों में ऐसा नहीं होता है. (Photo: PTI)

लॉकडाउन में नहीं दी आर्थिक मदद

कोरोना वायरस और लॉकडाउन के चलते मुख्य फसलों जैसे गेंहू, जौ, सरसों, चन्ने पर ज्यादा असर नहीं पड़ा. लेकिन सब्जियों, फलों और फूलों की खेती का भट्ठा बैठ गया. करीब एक महीने तक बाजार बड़े स्तर पर बंद रहे. इस वजह से ऐसे किसानों की उपज ज़ाया हो गई. लेकिन सरकार की ओर से आर्थिक मदद नहीं मिली. आर्थिक पैकेज में भी केवल क्रेडिट कार्ड से लोन लेने का ऐलान ही हुआ.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट-

(1)

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा

देविंदर शर्मा का कहना है कि खेती के लिए किसी सरकार का एक साल काफी कम होता है. किसान की दशा वैसी ही रहती है, बस सरकार बदलती रहती है. हालांकि वे किसान सम्मान निधि योजना की तारीफ करते हैं. वे कहते हैं,

जैसे यूपीए सरकार मनरेगा लाई थी, वैसे ही किसान सम्मान निधि योजना एनडीए सरकार का सबसे बड़ा कंट्रीब्यूशन है. मैं 8-10 साल से किसानों के लिए डायरेक्ट सपोर्ट की मांग कर रहा था. साल के 6000 रुपये बहुत कम हैं, लेकिन यह एक टेक्टोनिक शिफ्ट है. आज तक हम एमएसपी पर ही इनकम ही बात करते आए हैं. लेकिन देश में एमएसपी केवल छह प्रतिशत किसानों को मिलता है.

शर्मा का कहना है कि सरकार को किसानों के लिए कुछ फौरी कदम उठाने चाहिए. इसके तहत किसानों को कुल डेढ़ लाख करोड़ रुपये देने की जरूरत है. इसमें लॉकडाउन में हुए नुकसान के लिए प्रति किसान 10 हजार रुपये और प्रति क्विंटल गेहूं पर 100 रुपये बोनस शामिल है.

(2)

अर्थशास्त्री और कृषि विशेषज्ञ विजय सरदाना

विजय सरदाना का कहना है कि पहले साल में सरकार का काम औसत रहा है. अभी सिर्फ खेती को लेकर कदम उठाए. मुर्गी पालन, मछली पालन जैसे सहयोगी क्षेत्रों पर एक साल में काम नहीं हुआ. उन्होंने कहा,

मोदी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बात कही. इस हिसाब से तो अभी तक आय 60 प्रतिशत बढ़नी चाहिए थी. तभी सरकार की प्रोग्रेस पता चलती है. ये जांचने में अभी वक्त लगेगा. पहले साल में जो कदम उठाए हैं, वे जमीन पर कैसे रहेंगे, यह भी देखना होगा.

सरदाना ने बताया कि सरकार को डेयरी, पोल्ट्री के लिए भी कदम उठाने होंगे. जिससे किसानों को खेती के साथ ही दूसरे तरीकों से भी कमाई हो. भेड़-बकरियों के लिए भी सरकार को नीति बनाने की जरूरत है. इस पर अभी कुछ नहीं हुआ. यह मोदी सरकार की कमजोरी रही है.

वैसे देखें, तो कोरोना महामारी के चलते खेती-किसानी से जुड़े लोगों की समस्याएं और बढ़ चुकी हैं. ऐसे हालात में आने वाले दिनों में भी मोदी सरकार के सामने कई गंभीर चुनौतियां होंगी.


Video: कोरोना वायरस की वजह से हुए लॉकडाउन में देश के किसान इतने चिंतित क्यों हैं?

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