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सरकार हमें 'न्यूड' फिल्म क्यों नहीं देखने देना चाहती?

ये आर्टिकल ‘डेली ओ’ के लिए गौतमन भास्करन ने लिखा है. वेबसाइट की इजाज़त से हम आपको इसका हिंदी अनुवाद पढ़वा रहे हैं. 'दी लल्लनटॉप' के लिए ये अनुवाद श्वेतांक ने किया है.

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गोवा में 20 से 28 नवंबर तक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI) आयोजित होने वाला है. इसके लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने एक ज्यूरी नियुक्त की थी. इसमें बैठे थे निखिल आडवाणी, ज्ञान कोरिया और सुजॉय घोष जैसे सयाने लोग. जिन्हें फिल्में देखने-बनाने की समझ है. लेकिन मंत्रालय को इनकी समझ पर भरोसा नहीं. शायद इसीलिए बिना ज्यूरी को बताए मंत्रालय ने IFFI में स्क्रीन होने वाली 21 फिल्मों की सूची में से दो को चुपचाप बदल दिया.

सुजॉय ने विद्या बालन के साथ 'कहानी' जैसी फिल्म बनाई थी.
सुजॉय ने विद्या बालन के साथ ‘कहानी’ जैसी फिल्म बनाई थी. निखिल ने अभी-अभी ‘लखनऊ सेंट्रल’ प्रोड्यूस की थी.

IFFI की ज्यूरी में कुल 13 सदस्य हैं. इन्हें मुंबई के एक पांच सितारा होटल में ठहराया गया. हम जानते हैं कि इसके लिए हमारे ही पैसों का इस्तेमाल किया गया है. मुझे इससे कोई शिकायत नहीं है. लेकिन इतने पैसे और वक्त खर्च करने के बाद सरकार ने जो फैसला लिया, वो उसकी कमज़ोर सोच को ही दिखाता है. सरकार ने ज्यूरी की चुनी 21 फिल्मों की लिस्ट में से ‘एस दुर्गा’ (जिसका नाम पहले सेक्सी दुर्गा था लेकिन सरकारी आदेश पर उसका नाम बदल दिया गया)  और ‘न्यूड’ जैसी फिल्म को बाहर कर दिया.

'एस दुर्गा' और 'न्यूड' का पोस्टर.
‘एस दुर्गा’ और ‘न्यूड’ का पोस्टर.

ऐसी खबर है कि ये कदम इंडियन पैनोरमा 2017 रेगुलेशन के क्लॉज़ 8.5 का उल्लंघन है. इस क्लॉज़ में ये साफ शब्दों में लिखा हुआ है, ‘ज्यूरी का फैसला आखिरी होगा और इसके खिलाफ किसी भी तरह की कोई अपील या पत्राचार मान्य नहीं होगी.’

ज्यूरी के सदस्य इस बात से नाराज़ हैं कि उन्होंने अपने व्यस्त शेड्यूल से वक्त निकालकर घंटों तक स्क्रीनिंग में बैठकर जो लिस्ट बनाई, उसके साथ इस तरह का बर्ताव किया गया. ज्यूरी के सदस्यों ने कहा कि लिस्ट से हुई किसी भी तरह की छेड़छाड़ या बदलाव की जानकारी और स्पष्टीकरण उन्हें भी दिया जाना चाहिए था. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं. उससे भी बड़ी बात ये कि हटाई गई फिल्मों ‘एस दुर्गा’ और ‘न्यूड’ की जगह पर जो फिल्में लाई गईं उनके बारे में भी ज्यूरी से कोई बात नहीं की गई.

ये फिल्म फेस्टिवल हर साल आयोजित किया जाता है.
ये फिल्म फेस्टिवल हर साल आयोजित किया जाता है.

‘न्यूड’, नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीतने वाले डायरेक्टर रवि जाधव की फिल्म है. ये फिल्म मैंने देखी नहीं है, लेकिन उसके बारे में पढ़ा है. ‘न्यूड’ रवि के उन अनुभवों पर बनी है, जो उन्होंने सर जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स में बतौर स्टूडेंट अर्जित किए थे. फिल्म में एक गरीब लड़की की कहानी दिखाई गई है, जो अपने परिवार को बिना बताए मॉडलिंग करती है. जाधव बताते हैं कि फिल्म ‘न्यूडिटी’ के सौंदर्यबोध (एस्थेटिक्स) पर है, इसमें कुछ भी अश्लील नहीं है.

सुजॉय घोष और उनकी टीम का तो ये मानना था कि ‘न्यूड’ से ‘इंडियन पैनोरमा’ की शुरुआत हो. इंडियन पैनोरमा, IFFI का एक खास हिस्सा है, जो गोवा में दिखाया जाता है. अब इंडियन पैनोरमा की शुरुआत विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पीहू’ से होगी. ये एक दो साल की बच्ची की कहानी है, जो घर पर अकेली है. ये हॉलीवुड फिल्म ‘होम अलोन’ की याद दिलाती है.

फिल्म 'पिहू' का पोस्टर और फिल्म का एक दृश्य.
फिल्म ‘पिहू’ का पोस्टर और फिल्म का एक दृश्य.

मुझे एक बात समझ नहीं आती कि हमें फिल्मों में न्यूडिटी को लेकर क्या समस्या है. लोगों को सेक्स और किसिंग सीन्स पर भी आपत्ति है. लेकिन फूहड़ आइटम सॉन्ग और भद्दे डांस से किसी को कोई दिक्कत नहीं है. ये चीज़ फिल्मों को लेकर हमारे दोहरे मापदंडों का उदाहरण है.

ये गाने अश्लील होने के साथ-साथ महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले होते हैं. बावजूद इसके, हमारे यहां बनने वाली हर दूसरी फिल्म में आइटम सॉन्ग होते हैं. इन गानों में लड़कियां तंग कपड़े पहनकर भड़कीले स्टेप करती हैं. उनके साथ अधनंगे लड़के भी होते हैं, जो नाचने के साथ-साथ भद्दे इशारे भी करते हैं. इन गानों को फिर भी फिल्मों में रखा जाता है और लोगों को इससे कोई ऐतराज़ भी नहीं है.

जैसे ये गाना ही देख लीजिए:

मैंने ‘एस दुर्गा’ देखी है. सनल ससिधरन की ‘एस दुर्गा’ में कहीं भी, किसी भी तरह की कोई गलत बात, गंदगी या हिंसा नहीं दिखाई गई है. इसके बावजूद इसे इंडियन पैनोरमा से ड्रॉप कर दिया गया. ससिधरन इससे पहले ‘ओड़िवुदिवस्थे कलि’ (अंग्रेसी में इसका नाम ‘एन ऑफ डे गेम’ था) बनाई थी. इस फिल्म की ही तरह ‘एस दुर्गा’ में भी ससिधरन ने हमें हैरान किया है. इस फिल्म में एक यंग कपल आधी रात को घर से भागता है. दोनों चेन्नई जाना चाहते हैं. स्टेशन जाने के रास्ते में जो कुछ भी घटता है, फिल्म में उसे बड़े ज़बरदस्त तरीके से दिखाया गया है.

रास्ते में वो एक वैन से लिफ्ट लेते हैं. वैन में दो आदमी बैठे हुए हैं, जो शराब के नशे में हैं. ये सब उस रात घर से भागे कपल के लिए एक बुरा सपना बन जाता है. फिल्म में किसी भी तरह का कोई विवादित सीन नहीं है. न कोई रेप सीन है, न कोई खतरनाक फाइट सीन. लेकिन ससिधरन जिस तरह से हिंसा की ओर इशारा करते हैं, वो न सिर्फ कपल को डराती है, बल्कि एक दर्शक के तौर पर हमें भी डर से भर देती है.

फिल्म देखते हुए मैंने इस डर से उपजी असहजता को महसूस किया. मैं उन लाखों चीज़ों के बारे में सोचता रहा जो उस घर से भागे कपल के साथ घट सकती थीं. क्या लड़के को पीटा जाएगा? क्या लड़की का रेप हो जाएगा? लेकिन फिल्म में ऐसा कुछ नहीं हुआ.

ससिधरन अपनी फिल्म में हमें ‘डर के डर’ से रूबरू कराते हैं. कुछ-कुछ वैसे ही जैसे अल्फ्रेड हिचकॉक ने अपनी फिल्मों में दिखाया है. कुछ गलत होने का डर असल हिंसा से कहीं ज़्यादा विचलित करने वाला होता है.

फिल्म 'एस दुर्गा' का पोस्टर.
फिल्म ‘एस दुर्गा’ का पोस्टर.

‘एस दुर्गा’ जैसी किसी फिल्म का IFFI के इंडियन पैनोरमा से बाहर होना बहुत खलता है. ये फिल्म दुनियाभर के कई फिल्म फेस्टिवल्स में सराही गई है. इसने रॉटरडैम फिल्म फेस्टिवल जैसे प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल में अवॉर्ड भी जीता है. लेकिन इसका दुर्भाग्य कि जहां ये बनी है, वहीं इसके प्रदर्शन पर रोक है. ये दुर्भाग्य उस फिल्म का नहीं बल्कि हमारा है. हमसे एक ऐसी फिल्म छूट रही है, जिसका देखा जाना हमारे लिए बहुत ज़रूरी था.


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