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अमेरिका में माइक्रोसॉफ्ट-टिकटॉक डील होते ही क्या भारत में फिर से शुरू हो जाएगा टिकटॉक?

टिकटॉक मुश्किल में है. भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में कई जगह इस पर बैन का खतरा मंडरा रहा है. हालिया बैन अमेरिका में लगा है. इसे चलाने वाली कंपनी ‘बाइट डांस’ इसे बचाने के लिए हर तरह का ‘डांस’ करने को राजी है. फिलहाल अमेरिका से सुगबुगाहट सुनाई दे रही है. दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसॉफ्ट टिकटॉक के अमेरिकी ऑपरेशंस को खरीदने पर विचार कर रही है. अगर माइक्रोसॉफ्ट टिकटॉक को खरीद लेती है, तो इसके बिजनेस में क्या बदलाव आएगा? सबसे बड़ा सवाल, क्या इससे भारत में टिकटॉक पर लगा बैन हट जाएगा? आइए डालते हैं नजर इन बारीकियों पर.

अथश्री टिकटॉक बैन कथा

पहले शॉर्ट में टिकटॉक बैन की कहानी याद दिला दें. टिकटॉक चाइना का एक वीडियो शेयरिंग प्लैटफॉर्म है. मतलब वीडियो बनाओ, एडिट करो, उसमें कुछ जोड़ो-घटाओ, मजेदार बनाओ और डाल तो टिकटॉक पर. भारत में यह बहुत पॉपुलर हुआ. तकरीबन 20 करोड़ यूजर्स के साथ चीन के बाहर भारत सबसे बड़ा यूजर बना गया. इसके बाद की क्रोनोलॉजी समझिए.

पहले कोरोना आया. इसे अमेरिकी प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप ने चीनी वायरस कहना शुरू किया. बात इतने पर ही रुक गई. इतने में भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव बढ़ने लगा. तनाव इतना बढ़ा कि LAC पर भारत के 20 जवान शहीद हो गए. भारत ने सख्त कदम उठाते हुए चीन के 59 ऐप बैन कर दिए. इनमें से एक टिकटॉक भी है. बैन के पीछे का कारण यूजर्स का पर्सनल डाटा शेयर करना बताया गया. बताया गया कि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है. चीन पर दबाव बनता देख अमेरिका ने भी चोट की और अमेरिका में भी टिकटॉक पर बैन का मन बना लिया. उधर माइक्रोसॉफ्ट ने कहा कि हम इसे खरीदने की बातें कर रहे हैं. तब जाकर प्रेसिडेंट ट्रंप ने 15 सितंबर तक महोलत दे दी. अब इस ऐप को चलाने वाली कंपनी बाइट डांस के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति बन गई है.

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MEITY) ने भारत में बैन 59 ऐप्स को नोटिस भेजा है. साथ ही 79 सवालों की एक लिस्ट भेजी है.
केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MEITY) ने भारत में बैन 59 ऐप्स को नोटिस भेजा है. साथ ही 79 सवालों की एक लिस्ट भेजी है.

अमेरिका में क्यों बैन हुआ है टिकटॉक

अमेरिका ने हालांकि टिकटॉक के बैन के पीछे डेटा सेफ्टी और नेशनल सिक्योरिटी वाले कारण ही बताए हैं, लेकिन इसका दूसरा एंगल भी है. असल में डॉनल्ड ट्रंप पहले ही चीनी से दो-दो हाथ करने के मूड में हैं. वह लगातार चीन से जुड़े मामलों को हवा देते रहे हैं. उन्होंने हॉन्ग-कॉन्ग से लेकर दूसरे देशों में चीनी दखल पर सवाल उठाए हैं. इसके अलावा जानकारों का मानना है कि टिकटॉक जैसे बड़े (अमेरिका में टिकटॉक के 10 करोड़ यूजर) सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डॉनल्ड ट्रंप के खिलाफ बड़े कैंपेन चल रहे हैं. सारा कूपर जैसी बड़ी टिकटॉक स्टार उनकी नकल करके लोगों को उनके खिलाफ वोट करने को प्रेरित करती रहती हैं. ऐसे में टिकटॉक से ट्रंप व्यक्तिगत रूप से भी काफी खफा रहते हैं. वह भी टिकटॉक के विरोध की बहती गंगा में हाथ धोना चाहते हैं.

फिलहाल ट्रंप ने माइक्रोसॉफ्ट के भारतीय मूल के सीईओ सत्य नडेला से टिकटॉक को खरीदने को लेकर बातचीत की है. उन्होंने नडेला से साफ कह दिया है कि वह 15 सितंबर तक टिकटॉक को खरीद लें, वरना वह इसे अमेरिका में बैन कर देंगे.

माइक्रोसॉफ्ट को टिकटॉक में दिलचस्पी क्यों है

माइक्रोसॉफ्ट मूलरूप से सॉफ्टवेयर कंपनी रही है. इसका बड़ा व्यापार ऑफिस सॉफ्टवेयर रहा है. हालांकि वह तकनीक की रेस में तब पिछड़ गई, जब दुनिया में मोबाइल डिवाइस की रेस शुरू हुई. माइक्रोसॉफ्ट से संस्थापक बिल गेट्स ने भी माना था कि कंपनी सिर्फ सॉफ्टवेयर पर ही अटकी रह गई और उसन मोबाइल डिवाइसेज की दुनिया को समझने में देरी कर दी.

नाडेला के आने के बाद कंपनी ने माइक्रोसॉफ्ट को सिर्फ ऑफिस सॉफ्टवेयर कंपनी की छवि से बाहर निकालने की कोशिश की. इसके लिए कंपनी माइनक्राफ्ट जैसा मशहूर वीडियो गेम बनाने वाली स्वीडिश कंपनी को खरीदा. 2014 में माइक्रोसॉफ्ट ने 24 बिलियन डॉलर की डील करके सबसे बड़ी प्रोफेशनल नेटवर्किंग साइट लिंक़्डइन को खरीद लिया. माइक्रोसॉफ्ट अपने गंभीर पोर्टफोलियो में टिकटॉक को जोड़कर इसे ज्यादा विविधतापूर्ण बनाना चाहती है. फिलहाल माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्य नडेला के पाले में गेंद है. उन्हें ही फैसला करना है कि टिकटॉक अमेरिका में जीवित रहेगा या नहीं.

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माइक्रोसॉफ्ट सिर्फ एक ऑफिस सॉफ्टवेयर कंपनी बन कर नहीं रह जाना चाहती. उसकी टिकटॉक में दिलचस्पी का यह भी एक कारण है.

माइक्रोसॉफ्ट टिकटॉक को खरीदेगा, तो क्या भारत में भी टिकटॉक शुरू हो जाएगा

इस डील में फिलहाल भारत के लिए कुछ नहीं है. माइक्रोसॉफ्ट अगर टिकटॉक को खरीदता है, तो उसमें अमेरिका, कनाडा, न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के ऑपरेशन ही शामिल होंगे. ऐसे में भारत पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा. मतलब भारत में टिकटॉक का डिब्बा अभी बंद ही रहेगा. कई एक्सपर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई है कि टिकटॉक इंडिया जैसे बड़े यूजर बेस वाले मार्केट को डील का हिस्सा नहीं बनाया गया है. हालांकि कुछ इसे चीन की आगे की रणनीति का हिस्सा मान रहे हैं.

थिंक टैंक आईटीफॉर चेंज के डायरेक्टर परमिंदर जीत सिंह का कहना है –

हो सकता है कि टिकटॉक ने डील के तौर पर माइक्रोसॉफ्ट को भारत के ऑपरेशंस ऑफर ही न किए हों. ऐसे में माइक्रोसॉफ्ट इसे खरीदने के लिए आगे नहीं आ सकता. भारत की मार्केट के लिए बाइट डांस के पास भारत में टिकटॉक के लिए दूसरे प्लान हो सकते हैं.

कितने में बिकेगा टिकटॉक

इसे लेकर भी अमेरिकी मीडिया में कयास लगाए जाने लगे हैं. अमेरिकी एक्सपर्ट इसे 50 बिलियन डॉलर यानी 37 खरब रुपए की डील बता रहे हैं. टिकटॉक अमेरिकी मार्केट में हर साल तकरीबन पांच बिलियन डॉलर यानी 3 खरब 74 करोड़ रुपए का रेवेन्यू पैदा करता है. इसे ऐसे समझें कि रिलायंस के जियो ने मार्च में खत्म हुए साल में 2.5 बिलियन यानी तकरीबन 1.8 खरब रुपए का रेवेन्यू ही पैदा किया था. अमेरिकी शेयर मार्केट भी इस डील को लेकर काफी उत्साहित है. जब से माइक्रोसॉफ्ट ने टिकटॉक को खरीदने को लेकर चर्चा की बात की पुष्टि की है, कंपनी की वैल्यू 77 बिलियन डॉलर यानी तकरीबन 57 खराब रुपए बढ़ गई है. ऐसे में माना जा रहा है कि माइक्रोसॉफ्ट इस डील में काफी आगे तक बढ़ चुका है.


 

वीडियो – टिकटॉक पर वायरल इस लड़की की हाथ वाली ट्रिक पर जनता क्यों मीम्स बनाए पड़ी है?

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