Submit your post

Follow Us

मायावती ने कांशीराम के जमाने से बसपा में रहे इन नेताओं को पार्टी से क्यों निकाल दिया?

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती ने 4 जून को दो बड़े नेताओं को पार्टी से निकाल दिया. लालजी वर्मा और रामअचल राजभर. ये एक बड़ा फ़ैसला है, क्योंकि दोनों नेताओं की गिनती पार्टी के सफल और वरिष्ठ नेताओं में होती रही है. दोनों नेता कांशीराम के समय से बसपा के साथ जुड़े थे. दोनों नेता वर्तमान में विधायक हैं. लालजी वर्मा अंबेडकर नगर के कटेहरी से और राजभर अकबरपुर सीट से विधायक हैं. फिर ऐसे में जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में एक साल से भी कम का समय बचा है, मायावती ने इन दोनों दिग्गज नेताओं को बाहर करने का फ़ैसला क्यों लिया? बसपा की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि –

“दोनों विधायकों को उनके द्वारा पंचायत चुनाव के दौरान पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के कारण पार्टी से निष्कासित किया जा रहा है.”

ऐसा क्या हुआ था पंचायत चुनाव के दौरान? क्या वाकई इनके बाहर होने का यही कारण है या कोई अंदरखाने की वजह भी है? समझेंगे, लेकिन पहले संक्षेप में दोनों नेताओं के बारे में जान लेते हैं.

कांशीराम, मायावती दोनों के करीबी रहे

राजभर और लालजी वर्मा का पार्टी से बाहर होना चौंकाता है, क्योंकि ये नेता कांशीराम से लेकर मायावती तक के करीबियों में शुमार रहे हैं. 2017 तक समीकरण इन दोनों नेताओं के पक्ष में थे. तभी इनको विधायकी का टिकट मिला भी और दोनों ने भाजपा के जबरदस्त प्रदर्शन के बीच सीट भी निकाली.

छात्र राजनीति से राजनीतिक करिअर की शुरुआत करने वाले लालजी वर्मा बसपा के बनने के साथ ही इससे जुड़े. 1986 में वे पहली बार MLC बने. तबसे लेकर अब तक 5 बार विधायकी जीत चुके हैं. 1991, 1996, 2002, 2007 और 2017 में. 2014 में उन्होंने श्रावस्ती सीट से लोकसभा चुनाव भी लड़ा था, लेकिन हार गए थे. इसके बाद वापस विधानसभा का रुख़ कर लिया था. बसपा की सरकारों में मंत्री भी रहे. वित्त तक का प्रभार संभाला. वर्तमान में बर्ख़ास्तगी से पहले वे बसपा के विधायक दल के नेता थे.

वहीं रामअचल राजभर 1993 में पहली बार विधायक बने थे. इसके बाद 1996, 2002, 2007 और 2017 में विधायकी जीती. लेकिन रामअचल राजभर की इससे भी बड़ी पहचान ये है कि ये नेता 2 जून 1995 को मायावती के साथ था. ये तारीख़ उत्तर प्रदेश के चर्चित गेस्ट हाउस कांड की है.

Lalji Rajbhar
राम अचल राजभर (बाएं) और लालजी वर्मा (दाएं)

पंचायत चुनाव के टिकट पर था असंतोष!

दोनों नेताओं की पार्टी से बर्ख़ास्तगी के बाद पंचायत चुनाव का ज़िक्र बार-बार आ रहा है. ख़बरें आ रही हैं कि लालजी वर्मा अपनी पत्नी सहित कुछ करीबियों के लिए टिकट चाहते थे. पत्नी को तो टिकट मिला, लेकिन बाकियों को नहीं. इससे ख़फा लालजी ने पंचायत चुनाव से पूरी तरह कन्नी काट ली. हालांकि लालजी का कहना है कि वे स्वास्थ्य कारणों से पंचायत चुनाव में सक्रिय नहीं रहे थे और वे मिलकर ये बात ‘बहन जी’ को बताएंगे.

वहीं रामअचल भी कथित तौर पर पूर्व ब्लॉक प्रमुख शारदा राजभर के लिए टिकट चाहते थे. नहीं मिला तो उन्होंने भी पंचायत चुनाव में पार्टी की कोई मदद नहीं की. रामअचल ने भी यही कहा कि ज़रूर बहन जी को कोई गलतफहमी हुई है, जिसे वे मिलकर दूर करेंगे.

हालांकि अभी भी दोनों नेता लगातार यही कह रहे हैं कि वे पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता हैं और मायावती से मिलकर वे गिले-शिकवे दूर कर लेंगे.

बढ़ता कद बना बर्ख़ास्तगी की वजह?

लेकिन क्या यही वजह है इन दोनों नेताओं की रुख़सती की? इस पर और विस्तार से जानने के लिए हमने बात की लेखक बद्री नारायण से. वे बसपा के संस्थापक कांशीराम पर किताब लिख चुके हैं – Kanshiram: Leader of the Dalits. उन्होंने कहा –

“मायावती का ये धीरे-धीरे स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स बनता जा रहा है. वो पार्टी के भीतर किसी भी नेता को अपने कद तक पहुंचने का मौका नहीं देती हैं. यही वजह है कि पार्टी पर अपना वो आधार खोने का ख़तरा भी दिखने लगा है, जो कांशीराम जी ने दिया था. ये कांशीराम के समय के पहले ऐसे नेता नहीं हैं, जिन्हें मायावती ने एक झटके में हटा दिया है. स्वामी प्रसाद मौर्या से लेकर आरके चौधरी और नसीमुद्दीन तक लंबी लिस्ट है. यही वजह है कि आज आप बसपा के अंदर कोई सेकंड लाइन नहीं देखेंगे. ये दो बर्खास्तगी भी इसी स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स का नतीजा हैं. दोनों नेताओं को पार्टी में सेकंड लाइन का सबसे बड़ा चेहरा माना जा रहा था.”

हालांकि जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रॉफेसर विवेक कुमार, बद्री नारायण की बातों से इत्तेफ़ाक नहीं रखते. वे कहते हैं –

“आप देखिए कि ये दोनों नेता अब कितने प्रासंगिक थे. बसपा का अपना एक जनाधार है, जो बरकरार रहता है. पंचायत चुनाव को लेकर दोनों नेताओं पर जो आरोप लगे हैं, वो बातें तो कहने-सुनने की रहती हैं. ऐसी बातें जल्दी खुलकर नहीं आ पाती हैं. लेकिन आप ये देखिए कि बर्ख़ास्तगी के बाद भी दोनों नेता कितने अनुशासन के साथ अपनी बात रख रहे हैं. इससे आप बसपा के अंदर का कल्चर समझ सकते हैं. पार्टी अनुशासन के लिए जानी जाती है. ये ठीक है कि कांशीराम के समय के अधिकतर नेता अब पार्टी से जा चुके हैं, लेकिन ये कोई एक  झटके में नहीं हुआ. जैसे-जैसे नेताओं ने अपनी प्रासंगिकता खोई, वो पार्टी से हटे.”

2022 में कितना असर पड़ेगा?

बसपा के इस फ़ैसले का UP चुनाव-2022 पर कितना असर पड़ेगा? इस पर बद्री नारायण कहते हैं –

“मायावती को यकीन होगा कि वो एक साल में दूसरा नेता खड़ा कर देंगी. ऐसा नहीं है कि ये हो नहीं सकता. एक वर्मा की जगह दूसरे वर्मा को प्रोजेक्ट कर दिया जाएगा. लेकिन ये भी ध्यान रखना होगा कि कोविड काल में किसी नए चेहरे को लाकर उसका ज़मीनी आधार तैयार कर देना इतना भी आसान नहीं होगा.”

वहीं विवेक कुमार कहते हैं –

“कोई फर्क नहीं पड़ेगा. अभी मायावती अपने भतीजे को अगर फ्रंट पर ला देती हैं तो युवा समीकरण मैनेज हो जाएंगे. महिला वोट हमेशा से मायावती मैनेज करने की क्षमता रखती ही हैं.”

लालजी और रामअचल से पहले भी बसपा के तमाम ऐसे नाम रहे हैं, जो कांशीराम के समय से पार्टी के साथ थे, लेकिन मायावती के कमान संभालने के बाद सभी बाहर होते गए. आरके चौधरी, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, स्वामी प्रसाद मौर्य, सोनेलाल पटेल, रामवीर उपाध्याय, जुगल किशोर, बृजेश जयवीर सिंह और इंद्रजीत सरोज जैसे नेताओं की ये लंबी-चौड़ी लिस्ट है. क्या वजह है कि इसके पीछे? विवेक कुमार कहते हैं कि कांशीराम ने पैन इंडिया लेवल से को-ऑर्डिनेटर तैयार किए थे. पंजाब से हरभजन लाखा, महाराष्ट्र से सुरेश माने वगैरह. UP से भी उन्होंने ऐसे नेता तैयार किए जो अच्छी-ख़ासी अपील रखते थे. लेकिन मायावती के आने के बाद ये ट्रेंड बदल गया. को-ऑर्डिनेटर UP से ही निकलने लगे. बाकी राज्यों की भूमिका कम हुई. कांशीराम की तरह नेता तैयार करने का चलन कम हुआ और पावर सेंटर एक होने से तमाम नेताओं ने धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खो दी.

ख़ैर, अब एक साल बाद सूबे में चुनाव है और यहां जिस तरह से जातिगत समीकरण काम करते हैं उसमें ये देखना दिलचस्प होगा कि बसपा का ये बड़ा फैसला क्या असर डालता है. और क्या तब तक ये दोनों नेता बसपा में वापस आते हैं या किसी और पार्टी के साथ जुड़ जाते हैं.


गेस्ट हाउस कांड: मायावती ने मुलायम सिंह के खिलाफ केस वापस लेने का फैसला किया है

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

कर लिया योगा? अब क्विज खेलने से होगा

आन्हां, ऐसे नहीं कि योग बस किए, दिखाना पड़ेगा कि बुद्धिबल कित्ता बढ़ा.

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

तमिल जनता आखिर क्यों कर रही है 'फैमिली मैन-2' का विरोध, क्या है LTTE की पूरी कहानी?

जब ट्रेलर आया था, तबसे लगातार विरोध जारी है.

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

माधुरी से डायरेक्ट बोलो 'हम आपके हैं फैन'

आज जानते हो किसका हैप्पी बड्डे है? माधुरी दीक्षित का. अपन आपका फैन मीटर जांचेंगे. ये क्विज खेलो.

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

जिन मीम्स को सोशल मीडिया पर शेयर कर चौड़े होते हैं, उनका इतिहास तो जान लीजिए

कौन सा था वो पहला मीम जो इत्तेफाक से दुनिया में आया?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

पार्टियों को चुनाव निशान के आधार पर पहचानते हैं आप?

चुनावी माहौल में क्विज़ खेलिए और बताइए कितना स्कोर हुआ.

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

लगातार दो फिफ्टी मारने वाले कोहली ने अब कहां झंडे गाड़ दिए?

राहुल के साथ यहां भी गड़बड़ हो गई.

रोहित शेट्टी के ऊपर ऐसी कड़क Quiz और कहां पाओगे?

रोहित शेट्टी के ऊपर ऐसी कड़क Quiz और कहां पाओगे?

14 मार्च को बड्डे होता है. ये तो सब जानते हैं, और क्या जानते हो आके बताओ. अरे आओ तो.