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कौन हैं ये 12-14 साल के बच्चे जिन्होंने 138 लोगों को मार डाला?

अंग्रेज़ी भाषा में एक बड़ा प्यारा शब्द है- चाइल्ड लाइक. जब किसी वयस्क को ‘चाइल्ड लाइक’ कहा जाए, तो इसका मतलब वो तारीफ़ पा रहा है. उसे बच्चों सा निर्दोष और सरल कहा जा रहा है. रवींद्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था. कि हर बच्चा एक संदेश लेकर दुनिया में आता है. संदेश ये कि ईश्वर अभी मनुष्य से निराश नहीं हुआ. उसे अब भी मानवों से उम्मीद है.

लेकिन क्या आप किसी बच्चे के हत्यारे होने की कल्पना कर सकते हैं? सोच सकते हैं कि कई बच्चे मिलकर एक हत्याकांड को अंज़ाम दें? दर्जनों लोगों को बेरहमी से मार डालें? मुझे बड़े अफ़सोस से बताना पड़ रहा है कि ये सारी बातें सच हैं. इस महीने की शुरुआत में एक भीषण क़त्लेआम हुआ. अब ख़बर आई है कि उसे अंज़ाम देने वाले ज़्यादातर हत्यारे बच्चे थे. ये क्या मामला है, विस्तार से बताते हैं.

पहले सुनिए ये लव स्टोरी

करीब 900 साल पुरानी बात है. कहते हैं कि उस दौर में एक राजकुमारी थी- येनगा. बहुत सुंदर, बड़ी प्यारी. अपने पिता की आंखों का तारा. उसे सज-संवरकर छुईमुई बने रहना पसंद नहीं था. वो अपने पिता और तीनों भाइयों की तरह योद्धा बनना चाहती थी. घुड़सवारी सीखना चाहती थी. मगर उसके समाज में लड़कियों को इन सबकी मनाही थी. येनगा ने बड़ी मिन्नतें करके पिता को मनाया. जल्द ही वो सबसे निपुण योद्धाओं में गिनी जाने लगी. उसके युद्ध कौशल ने कई युद्धों में उसके पिता को जिताया.

मोसे लोग येनगा को अपने कबीले की मां मानते हैं.
मोसे लोग येनगा को अपने कबीले की मां मानते हैं.

येनगा अप्रतिम योद्धा थी. मगर वो प्रेम भी करना चाहती थी. पिता उसे ख़ुद से दूर नहीं करना चाहते थे. उन्होंने येनगा को क़ैद कर दिया. बाग़ी येनगा एक रात घोड़े पर बैठकर जंगल में भाग गई. वहां उसकी भेंट हुई शिकारी रायेल से. दोनों में मुहब्बत हुई. उनका एक बेटा हुआ- ओजरेगू. उनकी भाषा में ओजरेगू मतलब था, घोड़ा.

जिस घोड़े पर बैठकर येनगा पिता की क़ैद से भागी थी, उसी के सम्मान में उसने बेटे का ये नाम रखा था. ओजरेगू बड़ा होकर अपनी मां जैसा ही कुशल योद्धा हुआ. उसने एक साम्राज्य की नींव डाली. उसके वंशजों का कबीला कहलाता है- मोसे. और ये मोसे ओजरेगू की मां येनगा को अपने कबीले की मां मानते हैं.

कहां रहता है ये कबीला? पश्चिमी अफ्रीका में एक देश है- बुरकिना फ़ासो. स्थानीय भाषा में इसका मतलब होता है, ईमानदार लोगों का देश. दुनिया के मैप पर इसकी लोकेशन देखिए. इसके उत्तर और पश्चिम में है, माली. पूरब में हैं नाइजर और बेनिन. दक्षिण में है घाना. और दक्षिण-पूर्व में है, आइवरी कोस्ट. बुरकिना फ़ासो की राजधानी है, वागाडुगु.

इस देश की आबादी है करीब दो करोड़. इनमें करीब 45 पर्सेंट आबादी मोसे समुदाय की है. बाकी की आबादी में मुख्य पांच कबीले हैं- गुरुंसी, सेनुफ़ो, लोबी, बोबो और फुलानी. मेजॉरिटी मोसे समुदाय का प्रभाव आपको देश के राष्ट्रीय चिह्न में भी दिखता है. यहां का नैशनल ऐम्ब्लम देखिए. इसपर दो सफ़ेद घोड़े हैं. ये घोड़े मोसे समुदाय की प्रिय मातृशक्ति से जुड़े हैं. ये प्रतीक हैं उस बहादुर येनगा की, जिसके आज़ाद मन ने पिता, समाज और परंपराओं से जुड़ी किसी बेड़ी को नहीं माना.

जानिए बुरकिना फ़ासो का इतिहास 

अब थोड़ा ब्रीफ़ में बुरकिना फ़ासो की हिस्ट्री जान लेते हैं. साम्राज्यवाद के दौर से पहले यहां मोसे समुदाय का शासन था. ये भूभाग मोसे एम्पायर का अंग था. ये साम्राज्य असल में कई छोटी-छोटी कबीलाई राजशाहियों का सम्मिलित रूप था. इसकी गिनती सबसे मज़बूत प्राचीन अफ्रीकन साम्राज्यों में होती थी.

1896 में यहां फ्रेंच आए. उन्होंने बुरकिना फ़ासो को ग़ुलाम बनाया. कुछ साल तक ये सेनेगल-नाइजर फ्रेंच कॉलोनी का हिस्सा रहा. फिर 1919 में आकर फ्रांस ने इसे एक सेपरेट कॉलोनी का स्टेटस दिया. फ्रांस ने इसका नाम रखा- अपर वोल्टा. इस नाम का सोर्स है, वोल्टा नदी. ये नदी बुरकिना फ़ासो के दक्षिण-पश्चिम इलाके में, राजधानी वागाडुगु के पास से बहती हुई घाना पहुंचती है. चूंकि बुरकिना फ़ासो नदी की ऊपरी दिशा में बसा है, इसीलिए फ्रांस ने इसे ‘अपर वोल्टा’ का नाम दिया.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद धीरे-धीरे कोलोनिज़म के दिन लदे. 1957 में फ्रांस ने अपर वोल्टा को स्वायत्त रिपब्लिक का दर्जा दिया. उसके पास स्वशासन का अधिकार तो था, लेकिन अभी वो पूरी तरह आज़ाद नहीं हुआ था. उसे आज़ादी मिली तीन साल बाद 1960 में. इसके पहले राष्ट्रपति बने, मॉरिस यामेओगो.

बुरकिना फ़ासो के पहले राष्ट्रपति मॉरिस यामेओगो. तब इस देश का नाम था ‘रिपब्लिक ऑफ़ अपर वोल्टा’.
बुरकिना फ़ासो के पहले राष्ट्रपति मॉरिस यामेओगो. तब इस देश का नाम था ‘रिपब्लिक ऑफ़ अपर वोल्टा’.

अपर वोल्टा आज़ाद तो हो गया. मगर अफ्रीका के कई और मुल्कों की तरह इसको भी अच्छी शुरुआत नहीं मिली. इस अस्थिरता की बड़ी वजह थी, इकॉनमी. देश की माली हालत पस्त थी. नई सरकार से उम्मीद थी कि वो बेहतरी लाएगी. मगर यामेओगो सरकार भ्रष्टाचार में लिप्त थी. अभावग्रस्त जनता सरकार से नाराज़ थी. इस नाराज़गी का फ़ायदा उठाकर जनरल लमिज़ाना के नेतृत्व में सेना ने तख़्तापलट कर दिया. मगर लमिज़ाना भी बेहतर विकल्प नहीं निकले. उन्होंने युक्तियां भिड़ाकर कुर्सी अपने पास रखने पर ध्यान दिया. 1980 में उन्हें सत्ता से हटाने के लिए फिर एक तख़्तापलट हुआ. इसके बाद तीन साल के भीतर बैक-टू-बैक दो और तख़्तापलट हुए.

कहानी थॉमस संकारा की 

इनके बाद 1983 में देश के राष्ट्रपति बने, कैप्टन थॉमस संकारा. उन्हें बड़े सम्मान से याद किया जाता है. कई लोग उन्हें अफ्रीका का ‘चे ग्वेरा’ कहते हैं. संकारा रेवॉल्यूशनरी थे. उनके सत्ता में आने के समय अपर वोल्टा दुनिया के सबसे गरीब देशों में गिना जाता था. संकारा आते ही देश की इकॉनमी दुरुस्त करने में जुट गए.

इसके लिए उन्होंने खेती को प्रमोट किया. ताकि देश खाद्य आपूर्ति में आत्मनिर्भर बने. मैन्युफ़ैक्चरिंग को बढ़ाया. देश में बने उत्पादों के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया. हेल्थ और एज़ुकेशन को भी दुरुस्त करने की कोशिश की. महिलाओं की दशा सुधारने से जुड़ी नीतियां बनाईं.

कैप्टन थॉमस संकारा, जिन्हें अफ्रीका का ‘चे ग्वेरा’ कहा जाता है.
कैप्टन थॉमस संकारा, जिन्हें अफ्रीका का ‘चे ग्वेरा’ कहा जाता है.

संकारा ही थे, जिन्होंने 1984 में अपने देश का नाम बदलकर ‘बुरकिना फ़ासो’ रखा. कहा, अपर वोल्टा तो साम्राज्यवादी फ्रांस का दिया नाम है. उनका देश क्या बस वोल्टा नदी के पास की एक लोकेशन भर है कि ये नाम ढोता रहे? संकारा साम्राज्यवाद के चलते अफ्रीका को हुए नुकसान पर ख़ूब मुखर थे. इंटरनैशनल मंचों पर वो साम्राज्यवादी ताकतों की बड़ी मजम्मत करते. इसी क्रम में उन्होंने ऐलान किया कि बुरकिना फ़ासो वर्ल्ड बैंक और इंटरनैशनल मॉनेटरी फंड का कर्ज़ नहीं चुकाएगा. उन्होंने कहा-

इन कर्ज़ों का संबंध साम्राज्यवाद से है. जिन्होंने हमें कर्ज़ दिया, वो वही हैं जिन्होंने हमें ग़ुलाम बनाया था. उन्होंने ही हमारी अर्थव्यवस्था पर कब्ज़ा किया हुआ था. उन्होंने हमारे नाम पर अपने महाजन भाई-भतीजों से पैसा लिया और वो कर्ज़ अफ्रीका के माथे पर लाद दिया. हमारा उस कर्ज़ से कोई ताल्लुक नहीं. इसीलिए हम वो कर्ज़ नहीं भरेंगे.

जानकार कहते हैं कि अगर संकारा सत्ता में रहते, तो बुरकिना फ़ासो बेहतर होता. मगर ऐसा होने नहीं दिया गया. 15 अक्टूबर, 1987 को कभी उनके करीबी दोस्त रहे ‘ब्लेज़ कुपाओरे’ ने संकारा की हत्या करके सत्ता हथिया ली. इस हत्या के पीछे फ्रांस पर भी उंगली उठती है.

कुपाओरे का राज 

संकारा को मारकर कुपाओरे 27 साल तक सत्ता में बना रहा. इस लंबी तानाशाही के दौरान बुरकिना फ़ासो की हालत और बिगड़ती गई. इकॉनमी ठप थी. लोगों के लिए पेट तक भरना मुश्किल था. देश के राजस्व का सबसे बड़ा ज़रिया थी, सोने की खदानें. वो भी बंद हो गईं. महंगाई, बेरोज़गारी, और भूख के खिलाफ़ जनता आएदिन सड़कों पर उतरने लगी. इनकी हालत सुधारने की जगह कुपाओरे प्रदर्शनकारियों पर हिंसा करवाता.

सरकार के पास कर्मचारियों तक का वेतन देने के पैसे नहीं थे. ख़बरें आती थीं कि सैनिकों और राष्ट्रपति के गार्ड्स ने वेतन न मिलने पर बग़ावत कर दी है. देश में इतनी अराजकता फैल गई कि पुलिस और सेना के बीच हिंसक झड़पें होने लगीं. दोनों एक-दूसरे पर गोलियां दागने लगे.

ब्लेज़ कुपाओरे ने 1987 में संकारा की हत्या करके सत्ता हथिया ली थी.
ब्लेज़ कुपाओरे ने 1987 में संकारा की हत्या करके सत्ता हथिया ली थी.

इस व्यापक निराशा के बीच जुलाई 2013 में हुई एक डिवेलपमेंट का देश पर बहुत असर हुआ. ख़बर आई कि कुपाओरे कार्यकाल बढ़ाने के लिए संवैधानिक संशोधन करने जा रहा है. ये जानकर जैसे लोगों का सब्र ख़त्म हो गया. देश के कई शहरों में जनता सड़कों पर उतर आई. महीनों तक प्रोटेस्ट चलते रहे. इस ज़बर्दस्त जन विद्रोह के चलते अक्टूबर 2014 में कुपाओरे को गद्दी छोड़नी पड़ी. पता है, इस बग़ावत में जनता ने किसे अपना नायक माना? करीब तीन दशक पहले मारे गए अपने पूर्व राष्ट्रपति संकारा को.

नवंबर 2015 में यहां राष्ट्रपति चुनाव हुए. इसमें जीतकर राष्ट्रपति बने- रॉक मार्क क्रिस्टियन काबोरे. वो पहले भी देश के प्रधानमंत्री रह चुके थे. इस सरकार का कार्यकाल नवंबर 2020 में पूरा हुआ. इस महीने हुए फिर से चुनाव हुए. इसमें भी काबोरे को ही जीत मिली.

2015 में चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बने- रॉक मार्क क्रिस्टियन काबोरे.
2015 में चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बने- रॉक मार्क क्रिस्टियन काबोरे.

ये सब हम आपको आज क्यों बता रहे हैं ?

अब आता है सवाल कि हम ये इतिहास आज क्यों सुना रहे हैं? इसकी वजह जुड़ी है करीब 20 दिन पुरानी एक वारदात से. बुरकिना फ़ासो में यागहा नाम का एक प्रांत है. इसमें सोलहान नाम का एक गांव है. ये जगह नाइजर और बुरकिना फ़ासो की सीमा के पास पड़ती है. 4 जून, 2021 की बात है. देर शाम कई हथियारबंद हमलावरों ने सोलहान गांव पर अटैक किया. उन्होंने निहत्थे ग्रामीणों को गोलियों से भून डाला. कई घरों को आग लगा दी. रातभर चले इस हमले में 138 से ज़्यादा लोग मारे गए. मृतकों के अलावा करीब 50 लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए. सरकार ने इस घटना के बाद देश में 72 घंटे के राष्ट्रीय शोक का ऐलान किया.

अब इसी हत्याकांड से जुड़ी एक ख़ौफनाक जानकारी सामने आई है. यूनाइटेड नेशन्स और बुरकिना फ़ासो की सरकार के मुताबिक, इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले हमलावरों में ज़्यादातर बच्चे थे. ये बच्चे 12 से 14 साल की उम्र के थे. किस हिंसक संगठन ने इन बच्चों से ये हत्याएं करवाई हैं, इसके बारे में अभी जानकारी नहीं है.

कौन थे ये बच्चे? ये थे चाइल्ड सोल्ज़र्स. इसका मतलब होता है, 18 साल से कम उम्र के ऐसे लड़के-लड़कियां जिन्हें किसी आर्म्ड ग्रुप ने रिक्रूट कर लिया है. उन्हें अपनी फ़ौज में शामिल कर लिया है. ऐसा नहीं कि चाइल्ड सोल्ज़र्स बस युद्ध करते हों. आतंकी संगठन और मिलिशिया ग्रुप्स इन्हें जासूसों और मानव कवच की तरह भी इस्तेमाल करते हैं. इनके शरीर में बम बांधकर आत्मघाती हमले करवाए जाते हैं.

12-14 साल की उम्र में अगवा कर मिलिशिया ग्रुप्स में शामिल किए गए बच्चे
12-14 साल की उम्र में अगवा कर मिलिशिया ग्रुप्स में शामिल किए गए बच्चे

दुनिया में इस समय तीन लाख से ज़्यादा चाइल्ड सोल्ज़र्स हैं. इनमें तकरीबन 40 फीसदी संख्या लड़कियों की है. ये लड़कियां ज़्यादातर दो तरह से इस्तेमाल होती हैं. या तो इन्हें सेक्स स्लेव बनाया जाता है. या फिर सूसाइड बॉम्बर. डेमोक्रैटिक रिपब्लिक ऑफ़ कॉन्गो, सोमालिया, सीरिया, यमन, नाइजर, नाइजीरिया समेत करीब 20 देश हैं, जहां चाइल्ड सोल्ज़र्स ऐक्टिव हैं.

कैसे बनते हैं चाइल्ड सोल्ज़र ?

इसकी एक बड़ी वजह है, किडनैपिंग. आतंकवादी संगठन और मिलिशिया ग्रुप्स बचपन में उन्हें अगवा कर लेते हैं. छह-सात साल के बच्चों को हथियार थमा देते हैं. बच्चों के आगे शर्त होती है कि ज़िंदा रहना है, तो क़ातिल बनना होगा. कई बच्चे गरीबी और अभाव के चलते भी इन ग्रुप्स में शामिल होते हैं. कइयों के तो मां-बाप पैसों के लिए उन्हें आर्म्ड ग्रुप्स को बेच देते हैं.

आपने कोविड से हो रहे कई तरह के नुकसान के बारे में सुना होगा. मगर शायद आपको ये न मालूम हो कि कोविड ने भी हज़ारों बच्चों को चाइल्ड सोल्ज़र बनाया है. कैसे? पिछले साल कोरोना के चलते कई देशों में लॉकडाउन लगा. महीनों तक स्कूल बंद रहे. लॉकडाउन के चलते दुनियाभर की इकॉनमी लुढकी.

गरीब देशों का हाल और बुरा था. जब पेट भरना मुश्किल हो, तो स्कूल लक्ज़री लगता है. इस वजह से कई बच्चे कामगार बन गए. स्कूल जब दोबारा खुले, तब तक लाखों बच्चे स्कूल से बहुत दूर हो गए थे. ऐसे ही कई बच्चे आर्म्ड ग्रुप्स के चंगुल में फंसकर चाइल्ड सोल्ज़र बन गए. UN के मुताबिक, केवल सेंट्रल और पश्चिमी अफ्रीका में ही पिछले साल तीन हज़ार से ज़्यादा बच्चे चाइल्ड सोल्ज़र बनाए गए.

स्कूल बंद हो जाने के कारण शिक्षा से दूर हुए बच्चे आर्म्ड ग्रुप्स के चंगुल में फंसकर बन जाते हैं चाइल्ड सोल्ज़र.
स्कूल बंद हो जाने के कारण शिक्षा से दूर हुए बच्चे आर्म्ड ग्रुप्स के चंगुल में फंसकर बन जाते हैं चाइल्ड सोल्ज़र.

वापस आते हैं बुरकिना फ़ासो पर. सोलहान नरसंहार में बच्चों के शामिल होने की ख़बर से पूरा देश सदमे में है. ऐसा नहीं कि चाइल्ड सोल्ज़र्स के बारे में उन्हें पहली बार पता चला हो. मगर उनके हाथों इतना बड़ा नरसंहार होना शॉकिंग था.

क्या ये पहला बड़ा आतंकी हमला था यहां? नहीं. पिछले करीब छह साल से ये देश आतंकी हिंसा की चपेट में है. इस्लामिक स्टेट और अल-क़ायदा जैसे कई आतंकी संगठन यहां सक्रिय हैं. वो कई बार राजधानी वागाडुगु को भी निशाना बना चुके हैं.

मसलन, जनवरी 2016 में राजधानी स्थित एक कैफ़े पर हुआ आतंकी हमला. इसमें 29 लोग मारे गए थे. दिसंबर 2016 में आतंकियों ने एक मिलिटरी बेस में घुसकर 11 सैनिकों की हत्या कर दी थी. अगस्त 2017 में फिर से राजधानी स्थित एक रेस्तरां को निशाना बनाया गया. इसमें 18 लोग मारे गए. मार्च 2018 में आतंकियों ने फ्रेंच दूतावास को टारगेट किया. इस घटना में 16 लोगों की जान गई थी. हालात इतने ख़राब हैं कि नवंबर 2020 में हुए राष्ट्रपति चुनाव के दौरान आतंकियों के डर से देश के उत्तरी भाग का बहुतायत हिस्सा वोट नहीं कर पाया.

आतंकियों द्वारा होने वाली हिंसा यहां रूटीन बन गई है. इसके चलते पिछले दो सालों में ही करीब 15 लाख लोग बेघर हो चुके हैं. 20 हज़ार से ज़्यादा लोग तो केवल पड़ोसी माली में शरणार्थी बनकर रह रहे हैं. इतनी आम हो चुकी मारकाट में जब ये पता चले कि छोटे-छोटे बच्चे हत्यारे बनकर घूम रहे हैं, तो सारी उम्मीदें टूटती सी लगती हैं.

हिंसा के चलते देश में करीब ढाई हज़ार स्कूलों पर ताला लग चुका है. इन सबको मिला दें, तो प्रभावित होने वाले बच्चों की संख्या तीन लाख तक है. सोचिए, इनमें से कितने बच्चे आर्म्ड ग्रुप्स का शिकार होंगे. ये उसी हिंसा का बारूद बनेंगे, जिसने इनकी और इनके परिवारों की ज़िंदगी बर्बाद की.

आख़िरी में एक फ़िल्म का ज़िक्र करूंगा. 2006 में ‘ब्लड डायमंड’ नाम की एक फ़िल्म आई थी. ये कहानी एक हीरे की तो है ही. साथ में, एक मछुआरे और उसके 12 साल के बेटे की भी कहानी है. मछुआरे की ख़्वाहिश है, उसका बेटा एक दिन डॉक्टर बने. मगर ये सपना पूरा नहीं होता. एक दिन शहर में हथियारबंद लड़ाके घुस आते हैं. पूरे शहर में ख़ून-ख़राबा करते हैं. मछुआरे का परिवार मरने से तो बच जाता है. लेकिन उसका बेटा उन शैतान बाग़ियों के हाथ लग जाता है. कहां उसे डॉक्टर बनना था. और कहां उसके हाथ में बंदूक थमा दी जाती है. उसे हत्यारा बना दिया जाता है. चाइल्ड सोल्ज़र्स पर और भी कई फ़िल्में हैं, जैसे- बीस्ट्स ऑफ़ नो नेशन, वॉर विच, जॉनी मैड डॉग. समय मिले, तो देखिएगा.


वीडियो देखें: एंटीवायरस बनाने वाले जॉन मैकफ़ी जैसा सिरफिरा अरबपति बिज़नसमैन शायद ही कोई होगा-

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