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लवर्स को प्रपोज क्यों करना पड़ता है. प्रपोज करते ही लव तो नहीं होता न

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लाइफ में कुछ चीजें अचानक आती हैं. कहीं एडमिशन के लिए अप्लाई किया और भूल गए. फिर एक दिन कॉल लेटर आ गया. अलमारी में अखबार के नीचे 100 रुपये का नोट मिल गया. या फिर पप्पू गुड़िया वाले की गली में वो दिख गई. तब जब आप तैयार नहीं थे. अपने बेस्ट रूप में नहीं थे. गोया होते तो वो वहीं निसार हो जाती. हल्लू चक्की वाले के डेक पर गाना बजने लगता. सारे रिश्ते नाते मैं तोड़ के आ गई. ले मैं तेरे वास्ते सब छोड़के आ गई.

आना तय करके कितना हो पाता है. और फिर वो अचानक की धुकधुकी भी तो नहीं होती उसके पास.

डीपीडी उर्फ दिव्य प्रकाश दुबे
डीपीडी उर्फ दिव्य प्रकाश दुबे

डीपीडी मेरा दोस्त अचानक से बन गया है. ये मेरी तरफ का बयान है. दी लल्लनटॉप शुरू होने के पहले हम फेसबुक पर जुड़ चुके थे. आधी हकीकत और आधा फसाना जहां मलबे से गुत्थमगुत्था हैं. फिर ये साइट शुरू हुई और इक रोज बात हुई.

कल रात हम देर तक बतियाते रहे. वो नाटक देखकर लौटा था. और मैं नेटफ्लिक्स का विक्टिम, बीवी की सुझाई एक सीरीज जेसिका जोंस निपटा रहा था.

और आज ये आपके सामने है. श्री दिव्य प्रकाश दुबे लखनऊ वाले की चिट्ठी. डीपीडी ये चिट्ठी हर इतवार लिखता है. बल्कि बांचता है. पहले ये उसके फेसबुक पेज पर होता था, अब यहां होगा.

अब इसके लिए थैंक्स नहीं बोलूंगा. मिलेगा तो एक चाय एक्स्ट्रा पी लूंगा. ये कोड वर्ड भी हो सकता है सिंगल मॉल्ट स्कॉच या वोडका शॉट का. पर शराब पर बात करना चरित्र के लिए हानिकारक है.

आप कहेंगे कि ये सौरभ सुबह सुबह किससे मिलवाने लगा. सही भी है. सब सब को नहीं जानते. दुरुस्त, वर्ना धऱती क्यों कर हचर मचर हिलती रहे.

डीपीडी इंजीनियर भी है. राइटर तो है ही. मसाला चाय और टर्म्स एंड कंडिशंस अप्लाई नाम से उनकी दो किताबें आ चुकी हैं. प्यार का नाता है, इसलिए झूठ नहीं बोलूंगा. मैंने एक भी नहीं पढ़ी.

पर हम दोनों ने कुछ साझा ढंग से पढ़ा है. कल ही सुराग लगा. राही मासूम रजा. शोख फरिश्ता. मंटो, इस्मत और कृष्णा सोबती की दुनिया का एक बाशिंदा. उसका बुत भी लगवा दो तो डर, कहीं भरे उजाले में चलन की बेकद्री कर किस्सा न सुनाने लग जाए संगतराश की बेहूदी मजेदार हरकतों का. वक्त को किरदार बनाने वाला गाजीपुरिया. अरे हां. डीपीडी भी वहीं से है.

और ये कोना तो उसका है. तो मैं क्यों मन पसेरी कर रहा हूं. आप खत पढ़िए. आज पढ़िए. हर इतवार पढ़िए.

इस सिलसिले का नाम है, संडे वाली चिट्ठी. और आज ये मिल रही है टी को. ये टी कौन. अपने रंग आप भरिए. झलक दिख जाएगी.

– सौरभ द्ववेदी


डियर टी,

मैं सबकुछ लिख के कुछ भी आसान नहीं करना चाहता न तुम्हारे लिए न अपने लिए।

कभी-कभी सामने दिखती खूबसूरत सड़कों के किनारे पड़ने वाली टुच्ची सी पगडंडियाँ हमें उन पहाड़ों पर लेकर जाती हैं जिसके बारे में हम लाख सोच के भी सोच नहीं सकते। वैसे भी सड़कों और पगडंडियों में बस इतना सा फर्क होता है। सड़कें जहां भी ले जाएँ वो हमेशा जल्दी में रहती हैं और पगडंडियों अलसाई हुई सी ठहरी हुई। वो ठहर कर हम सुस्ता सकते हैं, सादा पानी पी सकते हैं, बातें कर सकते हैं।

प्यार और सुस्ताने में मुझे कोई फर्क नहीं लगता है।

जब सब कुछ मिल जाये तो आदमी पहली चीज यही कर सकता है। थोड़ा ठहर कर जी भर सुस्ता सकता है। आगे कहाँ जाना है उसके बारे में चाहे तो सोच सकता है। पिछली गलतियाँ याद करके हँस सकता है, रो सकता है। और इन सबसे ज़्यादा जरूरी काम कर सकता है। वो उस पूरे पल में थोड़ा ‘सुस्ता’ सकता है या फिर अपने अधूरेपन वाले सैकड़ों पलों को सुस्ताकर पूरा कर सकता है।

पता नहीं जो मैं लिख रहा हूँ वो तुम समझोगी या नहीं। मैं समझा पाऊँगा या नहीं। कोई और पढ़ेगा कभी तो वो वहाँ तक पहुँचेगा भी या नहीं जहां पर आज हम खड़े हैं।

जब मैं स्कूल, कॉलेज, ट्यूशन में किसी लड़के को किसी लड़की से प्रपोज़ करते हुए देखता था तो हमेशा सोचता था कि कितना टुच्चा है इनका प्यार कि अगर लड़के ने बोला नहीं होता तो लड़की कभी मानती ही नहीं। या फिर ऐसे सोचता था कि प्यार लड़के के बोलने की वजह से हुआ है क्या? और अगर लड़की भी प्यार नहीं करती थी तो वो क्या सोचकर हाँ बोल रही थी। बोलने से ऐसा क्या हो गया कि वो मान गयी। मुझे लड़कियों का ऐसे मान जाना हमेशा झूठ लगता रहा, लगता है और शायद लगता रहेगा। मुझे हमेशा ही लगता था कि जब तक दो लोगों में एक ऐसी स्टेज न आ जाये कि जब बोलना उस पूरे रास्ते का बहुत छोटा हिस्सा हो जाये तब होता होगा प्यार।

ये जो शब्द प्यार है न, इसको इतने लोग इतनी बार बोल चुके हैं कि मुझे ये दुनिया का सबसे खराब शब्द लगता है। मैं तुम्हारे लिए कोई नया शब्द गढ़ना चाहता हूँ। एक ऐसा शब्द जो हमारे बीच का सबकुछ समेट ले। हमेशा तो खैर कुछ नहीं नहीं रहता लेकिन मैं चाहता हूँ कि हम जब इस दुनिया से जाएँ न तो एक दूसरे की वसीयत में बस वो एक शब्द लिख जाएँ।

मैं तुम्हें जहां तक छू चुका, मैं जानता हूँ कोई और नहीं छू पाएगा। तुम लाख कोशिश कर लो। मैं ये बात तुम्हें बताना नहीं चाहता था लेकिन अगर मैं नहीं बताता तो ये ‘तिल’ जितनी बात मुझको हमेशा बेचैन करती रहती।

पता है हम पगडंडी के उस हिस्से में खड़े होकर दुनिया को देख रहे हैं, जहां पर हमारा एक दूसरे को गले लगा लेना, अपने हाथ से एक बार सही में छूकर देख लेना इतना पीछे छूट चुका है कि अब बचकाना लगता है।

मुझे मालूम है जब तुम लौटोगी तो मुझे सबसे ज़्यादा याद नहीं करोगी। तुम्हें मेरी याद उस दिन आएगी जिस दिन तुम्हें ये एहसास होगा कि तुम जो जिंदगी जी रही हो वो ऐसी है जैसे सड़क पे चलना, जहां चाहकर भी तुम अपनी रफ्तार धीमे नहीं कर सकती। तुम्हारी गाड़ी में अब पहिये दो हैं और तुम उस दुनिया में होगी जहां स्पीड पहिये नहीं जिंदगी डिसाइड करती है।

खैर, तुम आओ कभी हम मिलेंगे। मैं आया तो मिलूंगा। कहीं घूमने चलेंगे। तुम घर पे आकर खाना बनाना। या मैं तुम्हारे होटल में रुक जाऊंगा। ये सारी बातें बस एवें ही हैं। ये सब कुछ कभी असली में नहीं भी होगा तो गम नहीं क्यूंकि मुझे हमेशा लगता है ये सबकुछ तो हम दोनों पता नहीं कितनी बार जी चुके हैं।

इन तमाम बातों में बस एक बात सच है कि मैं 2032 तक तुम्हारा नहीं ‘हमारा’ इंतज़ार करूंगा। तुम्हीं ने कहा था मिलने के 15 साल तक अगर हम टच में रहे तो तुम सब छोड़ कर आ जाओगी मेरे पास

तुम इसका जवाब अभी तुरंत मत लिखना। कभी बाद में लिखना।

मिलते है कभी किसी पगडंडी पर…

दिव्य प्रकाश

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