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नवाज़ की बेटी मरियम और जरदारी के बेटे बिलावल को एक बार जेल जाना चाहिए

nurul huda 1नवाज़ शरीफ की बेटी मरियम नवाज़ और आसिफ अली जरदारी के बेटे बिलावल भुट्टो पाकिस्तान की राजनीति में हर वक़्त निशाने पर रहते हैं. तो अगर उन्हें राजनीति करनी ही है तो इस सलाह पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए शायद ये उनके करियर के लिए काम आ जाए. ये लेख पाकिस्तान की मशहूर राइटर और टीवी के लिए ड्रामा लिखने वाली नूरुल हुदा शाह ने उर्दू में लिखा है. इस लेख को ‘हम सब’ वेबसाइट ने छापा है. यहां हम आपको इस लेख का हिंदी तर्जुमा पढ़वा रहे हैं. जाबड़ लिखती हैं. पढ़ो तो पढ़ते जाओ. 


 

ये हकीक़त है कि परी चेहरा मरियम नवाज़ की मौजूदगी, इस रूखे सूखे और दिन बा दिन फीके और तंग नज़र होते पाकिस्तान में किसी गनीमत से कम नहीं. और बिलावल की मौजूदगी बुड्ढे खूसट अंकल नुमा ही नहीं बल्कि ग्रैंड पा हो चुके चेहरों के बीच एक फ्रेश अहसास की तरह है. उन दोनों की पाकिस्तानी सियासत में मौजूदगी हवा के एक ख़ुशगवार झोंके की तरह है. वैसे भी ये तय है कि कोई कितना भी जले भुने, मगर उन दोनों ने हर कीमत पर सियासत करना ही है. मरियम नवाज़ को तो खुश किस्मती से हुकूमत करने का भी मौका मिल गया है.

इतनी बड़ी उपलब्धि शायद ही किसी खुश नसीब बच्चे को मिली हो कि मुल्क के प्रधानमंत्री अब्बा जी हो, मगर खेल खेल में और लाड प्यार में बच्चा अक्सर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाया करे. अब्बा जी कौम से ख़िताब क्या करें, इसके लिए अल्फाज़ बच्चा चुने. प्रधानमंत्री अब्बा जी किस तरह बीमार पड़ें ये भी बच्चा तय करे, और जब अब्बा जी को बीमार पड़ना सिखा दे तो खुद मुल्क को चलाए. पूरी कैबिनेट बच्चे के सामने हाथ जोड़ खड़ी रहे.

सियासतदानों की ऐसी क़ाबिल औलाद सिर्फ पाकिस्तान जैसे ख़ुशनसीब मुल्क में ही मुमकिन है. इसलिए इस बच्चे का भी हक बनता है कि कभी कभी अगर वो शरारत करते हुए अपने बचपने में अंदर की बात बाहर पहुंचा दे. तो इस काबिल बच्चे को बचाने के लिए पुराने वफादारों को ज़माने के सामने पेश कर दिया जाए.मरियम नवाज़ को देखकर मुझे एक सुना हुआ दिलचस्प वाकया याद आया करता है.

अमीर इमाम साहब पाकिस्तान टीवी के बड़े नामों में से एक थे. उन के आखिरी दिनों में हम जियो टीवी में एक ही फ्लोर पर बैठा करते थे. अक्सर उनके साथ गपशप रहती थी. ज़िया उल हक़ के दौर में वो पाकिस्तान टीवी, इस्लामाबाद सीनेटर में तैनात थे. एक दिन सरकारी फोन आया कि सदर-ए-पाकिस्तान की लाडली बेटी टीवी सीनेटर घूमने के लिए आना चाहती हैं. ज़िया की ये बेटी ज़हनी तौर पर एक कमज़ोर बच्ची थी. बाप की इतनी लाडली थी कि उसका पसंदीदा अदाकार शत्रुघ्न सिंहा को ख़ास तौर पर पाकिस्तान बुलाया जाता था. और सरकारी मेहमान की हैसियत से प्रेसिडेंट हाउस में ठहरते थे. जिया की ये बेटी अक्सर सरकारी प्रोग्राम की तस्वीरों में भी बाप के साथ बैठी नज़र आती थी. पीटीवी की सरकारी न्यूज़ रील में भी बाप के साथ साथ नज़र आ रही होतीं थीं. तो सरकारी प्रोटोकॉल में वर्दी वाले अफसरों के साथ इस्लामाबाद टीवी सीनेटर पहुंचीं. अमीर इमाम ने बताया था कि प्रोटोकॉल देखकर हमारे हाथ पांव फूल गए.

खैर अभी साहबज़ादी यानी बेटी टीवी स्टेशन घूमी ही थीं कि अचानक से उसने ज़िद कर ली कि मुझे तो कौम से ख़िताब करना है. मतलब लोगों को स्पीच देनी है. फौरन हुक्म की तामील में स्टूडियो में एक टेबल-कुर्सी लगा दी गई. साहबज़ादी अड़ गईं कि ये वो कुर्सी नहीं है. जैसी अब्बू की होती है. वही कुर्सी चाहिए. साथ आए अफसर भी ऑर्डर करने लगे. जिसकी वजह से टीवी स्टाफ और अमीर इमाम साहब की सांसें फूली हुई थीं. असल कुर्सी हाज़िर की गई. कैमरे ऑन किए गए. साहबज़ादी कुर्सी पर बैठीं. अचानक से फ़रमाया कि कायदे आज़म की तस्वीर कहा है, जो कुर्सी के पीछे लगती है. फौरन हुक्म को माना गया और कायदे आज़म को भी हाज़िर किया गया. फिर अचानक साहबज़ादी को याद आ गया पानी का गिलास कहां है. जो अब्बू के सामने रखा होता है कौम से ख़िताब के वक़्त. गिलास भी आ गया. अब याद आया कि झंडा कहां हैं. फिर परचम-ए-पाकिस्तान भी पेश किया गया. फिर राष्ट्रगान बजाने का भी हुक्म हुआ, वो भी किया गया. अब कहीं जाकर साहबजादी ने इस बदनसीब कौम से ख़िताब फ़रमाया.

एक कमज़ोर ज़हन बच्ची का वो जो भी ख़िताब था. उसको रिकॉर्ड किया हुक्म हुआ कि टेप एडिटिंग के बाद सदारती (प्रेसिडेंट) महल भेज दिया जाए. इमाम अमीर का कहना था कि जैसे तैसे साहबजादी रवाना हुईं और हमने अपना पसीना पोंछा. और टेप फौरी तौर पर एडिट करके प्रेसिडेंट हाउस भेज दिया गया.

ऐसे होते हैं हमारे हुक्मरानों के नटखट बच्चे. ऊपर से उन नटखट बच्चों के हाथ में ट्विटर जैसी गुलेल अगर आ जाएतो पाकिस्तान क्या चीज़ है. जर्मनी तक निशाना मारा जाता है.

इधर बिलावल भुट्टो को भी शरारती बच्चों की तरह पड़ोस के अंकल को छेड़ने में मज़ा आता है. हर अंकल तो मज़ाक बर्दाश्त नहीं कर सकता न. कुछ और नहीं तो अब्बू से तो शिकायत लगाने का तो हक़ बनता ही पड़ोस के अंकल का. कि भाई साहब अपने बच्चे को समझाएं. हमें अंकल अंकल कहकर छेड़ता है.

सच तो ये है कि औरतों को भी वो दुकानदार बहुत ही बुरे लगते हैं जो आंटी आंटी कहकर बुलाते हैं.

बिलावल भुट्टो (Photo: Reuters)
बिलावल भुट्टो (Photo: Reuters)

मेरा इन दोनों बच्चों को मुफ्त में मशविरा है कि अगर पाकिस्तानी सियासत का ज़हर पीना ही है तो एक बार जेल ज़रूर जाओ. इस जेल ने पाकिस्तान को बड़े बड़े कमाल के लीडर, सियासी वर्कर्स, कॉमरेड, लेखक, शायर और शातिर सियासतदां दिए हैं. जेल की तरबीयतगाह में जाए बगैर पाकिस्तानी सियासत का भारी पत्थर चूमा ही नहीं जा सकता.

मरियम नवाज़ (Source: Aaj TV)
मरियम नवाज़ (Source: Aaj TV)

अगर मरियम नवाज़ के शरीफ, नाज़ुक मिज़ाज अब्बा जी जरा जम के जेल में बैठते तो आज यूं बार-बार आवाज़ भर न आती. एक ठोकर मारते माइक को. और एक सचमुच के शेर की तरह दहाड़कर कहते मेरे सिर पर बन्दूक की नोक रखी है… बताओ मेरे साथ मरोगे? जनता हम आवाज़ होकर कहती कि मरेंगे. जनतंत्र के लिए लड़ोगे? जनता दहाड़ती, लड़ेंगे. उन्हें दुखी आवाज़ में असली शेर की जगह नकली शेर की मरी हुई कहानी न सुनानी पड़ती.

जेल के प्रोग्राम बनाना मरियम नवाज़ के लिए कोई मुश्किल ही नहीं. जेल में पीएम हाउस से एक कॉल चली जाएगी कि साहबजादी जेल में कुछ वक़्त गुज़ारना चाहती है. एक खोली तैयार कर दी जाए. बस बिलावल को थोड़ी सी मुश्किल पेश आएगी. जेल जाने के लिए बिलावल को ऊपरी मंजिल वाले अंकल को अंकल कहकर छेड़ना पड़ेगा… कि देखिये अंकल अंकल… आसमान से चांद झांक रहा है हमारे घरों में. फिर शायद जेल जाने का कोई बहाना निकल आए. मुसीबत ये है कि उसे अब्बू ने समझाया हुआ है कि किसे अंकल कहना है और किसे सर कहना है.

मगर इन दोनों बच्चों को जेल की तरबीयत की बहुत ज़रूरत है. बाहर की दुनिया से कटकर जेल की खोली में जब बंदा पिघलता है तो अपने ही पिघले वजूद को नए सिरे से मरोड़ मरोड़ के बनता है. जेल की खोली की तन्हाई में एक अजीब जहान बस्ता है. नंगे पांव. मेले, फटे कपड़ों में लोगों का हुजूम मिलता है, जिन की रगों में खून नहीं हेपेटाइटिस सी दौड़ता है. बेदम होकर खटमल से भरे बिस्तर पर सीधे पड़ जाओ तो खोली की छत पर वो अलफ़ाज़ कतार बनाए गुज़र रहे होते है. जिन्हें अगर जनता के सामने बोल दिया जाए तो जनता आग से उबलता हुआ लावा बन जाती है. फिर न तो सियासत की जंग के मैदान में क्रिकेट के मैदान के अल्फाज़ बोलने की ज़रूरत पड़ती कि वो रही अंपायर की उंगली और ये रहा कप्तान. न ही ट्विटर पर जर्मनी के लोगों को क़त्ल करने की नौबत आती है. खोली की छत पर धमाल डालते अल्फाज़ से फिर शायर शायरी के सुर्ख हार नेताओं के गले में डालते हैं मरियम बीबी के… डरते हैं बंदूकों वाले, एक निहत्थी लड़की से… और ये कि… निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन के जहां… चली है रस्म के कोई न सर उठा के चले…. जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले… नज़र चुरा के चले, जिस्म ओ जां बचा के चले.

गरीब आवाम खोली की सलाखों को झंझोड़ते हुए मिलती है… कि उठ ऐ दीदावर… उठ… और बोल, बोल कि ज़बां अब तक तेरी है.

कुछ नहीं, कुछ नहीं तो जेल काटने के बाद सियासत की बिसात पर चल तो सकता ही है.

मरियम नवाज़ अगर जेल का कोर्स कम नंबरों से ही पास कर लें तो कम से कम न तो अब्बा जी की ट्विटर से जान जाएगी और न ही खुद उन्हें ट्विटर की गुलेल से गलत निशाने लगाने पड़ेंगे. और अगर बिलावल ने जेल काट ली तो अंकल उसे बच्चा कहना छोड़ देंगे. क्योंकि ये जेल ही थी जिसने उस कम उम्र मां का कद अंकल से ऊंचा कर दिया था और किसी की मजाल नहीं थी कि कोई उसे बच्ची कहे.


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