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नक्सलियों का वो सच, जिसे जान के घिन आती है

नक्सलवाद भारत की ऐसी समस्या है जो लगभग नासूर बन चुकी है. अभी हाल में हुए सुकमा मामले में जो दरिंदगी सामने आयी हम सबने देखा. न सिर्फ जवानों पर गोलियां बरसायी गयीं बल्कि एक दैनिक समाचार पत्र के अनुसार उनमें से कुछ के गुप्तांग भी काट लिए गये.

नक्सली तथाकथित तौर पर मजदूरों और दबे कुचले लोगों की बात करते हैं. पर ये लड़ाई अन्याय और शोषण के खिलाफ न रहकर सत्ता और पावर को पाने की हो गई है. लेकिन बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि इस लड़ाई का कुछ और भी भयानक और घिनौना सच है.

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(नीचे सारे नाम बदले गये हैं)

कमजोरों की दुहाई देते हुए इन लोगों पर बच्चों की जिंदगी बर्बाद करने का आरोप है

महिलाओं और बच्चों की दुहाई देने वाले माओवादी लड़ने के लिए और खुद को मजबूत बनाने के लिए बच्चों का अपहरण कर रहे हैं. वो इनको ट्रेनिंग देते हैं- हथियार चलाने की. इनको सिखाते हैं क्रूरता करना और लोगों को मारना. इन पर बच्चियों का रेप करने के भी आरोप हैं.

इंडिया टुडे ने रिपोर्ट की है मान्या की कहानी. मान्या अपनी दुख भरी कहानी बताती है कि वो कॉलेज में एडमीशन लेने वाली थी कि अचानक एक दिन कुछ माओवादी आये और उसका अपहरण करके ले जाने लगे. जब उसकी मां को इस बात का पता लगा तो वह रोती-चिल्लाती उनके पास दौड़ती हुई आई और पैरों पर गिर पड़ी. उसके पास और कोई चारा नहीं था. लेकिन उनका दिल नहीं पसीजा और वो मान्या को लेकर चले गये. कुछ दिनों बाद वो गर्भवती हो गयी. उसकी मां के पास इस बाबत संदेश भेजा गया. मां के सामने माओवादी नकुल यादव ने उस लड़की से शादी की लेकिन उसके बाद वो मान्या से कभी मिलने भी नहीं आया. मान्या की मां बताती है कि मान्या आज भी लंबे समय तक कहीं दूर एकटक देखती रहती है और किसी से जल्दी बोलती भी नहीं.

यूएन की एक रिपोर्ट बताती है कि बिहार, झारखण्ड, महाराष्ट्र, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल से बच्चों का अपहरण किया जाता है और उन्हें बाल दस्तों में शामिल किया जाता है. हालांकि यूएन ने बच्चों के साथ हो रहे 6 अपराधों को दर्ज किया है. जिसमें बच्चों को मारना या उनका कोई अंग काट लेना, अपने प्रयोग के लिए बच्चों का रिक्रूटमेंट करना, सेक्शुअल वॉयलेंस, अपहरण, स्कूल और हॉस्पिटल पर अटैक करना और मानवीय अधिकारों का हनन है.

ये सारे अपहरण मुख्य रूप से झारखण्ड के गुमला, लातेहार, लोहरदग्गा और सिमडेगा से हो रहे हैं. एक पुलिस आकलन के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में हज़ारों बच्चों का अपहरण हो चुका है.

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सरकार के एक्शन के बाद माओवादियों की क्रूरता बढ़ जाती है

दरअसल, पिछले दो वर्षों में पुलिस ने नक्सलवादियों के खिलाफ जो एक्शन लिया उसके कारण काफी नक्सलवादी मारे गये. माना जा रहा है कि इस समय कुल 400 हार्डकोर माओवादी बचे होंगे जो कि पिछले दशक में 1200 के लगभग थे. इसी कमी को पूरा करने के लिए माओवादी बच्चों का अपहरण करते हैं.

कुछ ज़िलों में हर एक गांव से 5 बच्चों की मांग की जाती है. गांव वालों के पास कोई विकल्प नहीं है सिवाय उनकी बात मान लेने के, क्योंकि पुलिस को वहां तक पहुंचने में कई दिन लग जाते हैं जबकि माओवादी वहीं आस-पास ही रहते हैं.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक लच्छू जब अपनी कहानी बताता है तो उसकी आंखें खुली रह जाती हैं. लच्छू इस समय 16 साल का है. जब वो सिंहभूम जिले के टूटीकट में पांचवीं में पढ़ रहा था, उसे माओवादी जबरदस्ती उठा के ले गये थे. अभी वह रांची में अपहरण करने वालों से करीब 200 किमी दूर रहता है. लच्छू बताता है कि वे उसे उठाकर सरदाना के जंगलों में लेकर गये. वहां माओवादियों ने उससे कहा कि ये लड़ाई गरीबों और अमीरों के बीच है. और इसका एक ही रास्ता है कि उन्हें हथियारों के दम पर उखाड़ फेंका जाए.

जितने बच्चों का अपहरण किया जाता है उनमें से औसतन 5 में से 2 लड़कियां होती हैं. इंडिया टुडे के मुताबिक लिंग समानता की बात करने वाले ये माओवादी इन बच्चियों पर अत्याचार करते हैं,  उनसे लगभग सेक्स स्लेव जैसा व्यवहार करते हैं और उनका शारीरिक शोषण करते हैं. आमतौर पर कैम्पों में उनसे खाना भी बनवाया जाता है.

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बच्चों को अपहरण के बाद ये उन्हें अपराध की ट्रेनिंग देते हैं. इनकी ट्रेनिंग माओवादियों की जन-अदालतों के साथ शुरू होती है जिसमें न्याय के नाम पर अमानवीय हिंसा की जाती है. बच्चों से कहा जाता है कि वे जन-अदालतों मे दोषी पाये गये लोगों के नाक और कान काट लें. लोगों को नंगा करके उन्हें गन्ने से पीटने के लिए कहा जाता है.

सुनैना बताती है कि कटारी गांव से माओवादी उन्हें अपहरण करके ले गये और दो सालों तक चाइल्ड सोल्जर बना के रखा. वह बताती है कि उसको माओवादियों के ही एक दूसरे विरोधी धड़े के साथ लड़ाई के लिए इस्तेमाल किया गया.

पूरे विश्व में चाहे ISIS की बात हो या अफ्रीकी सिविल वॉर की बात हो, इन सभी में देखा गया है कि बच्चों को बाल सैनिकों के रूप में प्रयोग किया जाता है. विचारधारा कोई भी हो लेकिन बच्चे हमेशा इसके शिकार होते आये हैं.

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लेकिन जो माओवादी समर्पण करते हैं प्रशासन के स्तर पर उनके पुनर्वास के लिए कई तरह के उपाय किए जाते हैं, सहायता दी जाती है. उनके बच्चों के लिए फ्री स्कूली व्यवस्था की जाती है, पर जो बच्चे वहां से बच कर निकल आते हैं उनके लिए पॉलिसी के स्तर पर कोई व्यवस्था नहीं है. हालांकि झारखण्ड पुलिस ने अपने स्तर से इस तरह के कदम उठाये हैं. विमला भाग्यशाली है कि उसे चाइल्ड कॉन्स्टेबल के रूप में रिक्रूट कर लिया गया है. उसे कॉन्स्टेबल को दी जाने सैलरी की आधी सैलरी भी दी जाती है. बाकी कुछ और बच्चों को भी स्कूलों में एडमीशन दिलाया गया है.

ये स्टोरी शिव ने की है.

(इंडिया टुडे से इनपुट)

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