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भारत घूमने आई विदेशी लड़की ने घर लौटकर भारतीय लड़की को क्या बताया

मनुष्का
मनुष्का

हम हमेशा उसी टीचर से सबसे ज्यादा प्यार करते हैं, जो हमें बड़ी-बड़ी बातें चुटकियों में समझा देता है. मनुष्का उसी टीचर जैसी हैं. वैसे असल में टीचर नहीं हैं, वैज्ञानिक हैं. सुनकर घबराने की जरूरत नहीं, क्योंकि जो लिखती हैं, बड़ी मोहब्बत से लिखती हैं. जर्मनी से PhD की है और अभी इजराइल के टेल अवीव में कैंसर जीन थेरेपी पर रीसर्च कर रही हैं. पहाड़ों, पेड़ों, झीलों और नदियों से बेइंतेहा प्यार है.

दुनिया के लड़ाई-झगड़े इनके जरा भी पल्ले नहीं पड़ते, इसलिए जो भी देखती हैं, सब खूबसूरत ही देखती हैं. देश-दुनिया के किस्सों और हेल्दी नुस्खों के लिए इन्हें थैंक्स बोलना मत भूलिएगा.

लेकिन इस किस्त में कोई नुस्खा या किस्सा नहीं. आपस की कुछ बातें. इस साल की शुरुआत जैसे हुई, उन्हें बिल्कुल अच्छा नहीं लगा. पढ़िए और सोचिए.


आज लिखने कुछ और बैठी थी, पर मन अशांत है. कुछ और ही चल रहा है जेहन में. इन विचारों को शब्द देना ज़रूरी है आज. नए साल पर बेंगलुरु में लड़कियों के साथ छेड़खानी के बारे में पता चला. हम जैसे बेशर्म सुनकर सिर्फ कड़वा घूंट पीकर रह जाते हैं. बार-बार. न हिंदुस्तानी लड़के बदलते हैं, न हमारे पूज्य नेतागण. और नेता कोई आसमान से तो टपके नहीं हैं. हमारे-आपके बीच से ही आते हैं और हम-आप जैसे लोग ही चुनते हैं उन्हें. और हम अपने पिता-भाइयों-बेटों-नेताओं की गलतियां देखकर बदलने की कोशिश भी तो नहीं करते.

मेरी बहुत सी विदेशी सहेलियां हैं. कुछ भारत आ चुकी हैं, तो कुछ आने का मन रखती हैं. ये लड़कियां दुनिया के बहुत से देश अकेले घूम चुकी हैं, लेकिन भारत में आने से पहले हर किसी को चिंता होती है अपनी सुरक्षा की, अपनी इज्जत की और यहां तक कि अपनी जिंदगी की भी. वो तो लॉन्ग स्कर्ट, कुर्ता पहनने को तैयार है, पर उन निगाहों का क्या, जो कपड़ों को भेदते हुए सिर्फ गलत संकेत देती हैं. वो नजरें, जो हर समय, हर जगह उनका पीछा करती हैं. भारत घूम चुकी एक विदेशी सहेली ने मुझे बताया कि उसे अक्सर घबराहट बनी रहती थी कि लड़के उसे देखते रहते थे.


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मैंने हंसकर बोला, ‘हां तुम गोरी और सुंदर हो, इसलिए ध्यान गया होगा लड़कों का.’ थोड़ा और सोचकर कहा, ‘भारतीय लड़के के साथ थी, शायद इसलिए ज्यादा घूरा होगा.’ फिर उसने और विस्तार से बताया कि क्या-क्या हुआ.

दो दिन तक दिमाग में चलती रहीं उसकी बातें. घूरना, गंदी नज़रों से देखना, इशारे करना, छूने की भरपूर कोशिश करना. खूब सोचने-विचारने के बाद मैंने उससे बोला कि सच तो ये है कि जब से मुझे याद है, इन नजरों ने कभी मेरा पीछा नहीं छोड़ा. इशारे होते रहे, जुबान चलती रही, बदतमीजी और बदसलूकी होती रही. इन नज़रों के सामने रहते-रहते दिमाग ये भूल ही गया कि ऐसा भी कोई समाज होगा, जहां ऐसा नहीं होता है. अब कोई भी सहेली भारत जाती है, तो बोल देती हूं कि ध्यान रखना, ऐसा कुछ हो सकता है.

अगर आपको लगता है कि बहुत से देश हमसे भी गए-गुज़रे हैं, तो आपको खुद वहां जाकर देखने की जरूरत है. आप ऐसे नहीं हैं कि आपसे अच्छी आदतें सीखी जा सकें. आप कभी आगे नहीं बढ़ सकेंगे. आप तो बस यही सोचकर खुश होने वालों में से हैं, जो पड़ोसी की तकलीफ देखकर पार्टी मनाते हैं. इसलिए नहीं कि आपके साथ कुछ बुरा नहीं हुआ, बल्कि इसलिए कि आपके पड़ोसी के साथ कुछ बुरा हो गया. आप तो पड़ोसी को एक ताना और मार आएंगे, लेकिन अपने गिरेबान में नहीं झांकेंगे.

भारतीय समाज की बखिया उधेड़ने वाली फिल्म 'एंग्री इंडियन गॉडेस' का पोस्टर
भारतीय समाज की बखिया उधेड़ने वाली फिल्म ‘एंग्री इंडियन गॉडेस’ का पोस्टर

‘जो लड़कियां छोटी स्कर्ट पहनें, वो रेप करने लायक हैं.’ अगर इस तरह आप अपनी भारतीय संस्कृति बचाने की कवायद करते हैं, तो मैं शर्मसार हूं.

क्यों स्कूल-कॉलेज में हजारों आशिक लड़की को देखकर उससे प्यार कर बैठते हैं. लड़की से हाय-हेलो भले न हुआ हो, पर प्यार जनम-जनम वाला हो जाता है? एक ही नज़र में. क्यों इन आशिकों की सोच इस बात तक नहीं जाती कि वो लड़की अपने कपड़ों, सूरत से कहीं बढ़कर है. उसकी सोच क्या है, वो कितनी उदार है. इंसान सूरत से नहीं, सोच से सुंदर होता है. और तो और, इन रोड-रोमियो का ईगो इतना बड़ा होता है कि ज़रा डांटा-फटकारा, रिजेक्ट किया, तो वो एसिड फेंक देते हैं. स्वाति जैसी कितनी लड़कियों को नुंगमबक्कम स्टेशन पर दिन-दहाड़े मार देते हैं. ये सब देख-सुनकर एक ही ख्याल आता है, ‘अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो!’

क्यों आज भी बेटे-बेटी में भेदभाव होता है? क्यों लड़केवाले लड़की को देखने आते हैं? वो क्या दिखाने की कोई चीज है? लड़कियों के पिता क्यों नहीं पूछते लड़केवालों से कि मेरी बेटी नौकरी करती है, क्या आपके लड़के को खाना बनाना आता है? क्यों आज भी दहेज-प्रथा चली आ रही है? ‘मैं बेटी दे रहा हूं, तो आप पर बड़े एहसान हैं, ये लीजिए दहेज उसके खर्चे-पानी का.’ आप जो इस समय पढ़ रहे हैं, अगर आपने अपनी जिंदगी में ये सब नहीं होने दिया, तो अच्छी बात, पर क्या आपने अपने आसपास होने वाली घटनाओं का विरोध किया? अगर नहीं किया, तो सवाल करें. खुद से. फेसबुक पर लिखने और लाइक करने से बदलाव नहीं आएगा. अपने आस-पास के समाज से बात करने से बदलाव आएगा.

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इन सबका कारण ढूंढने निकलो, तो सबसे पहले अपने घरों में ही देखने को मिलेगा कि पुरुषों को पहले खाना दिया जाता है. उनकी गलतियों को नज़रअंदाज़ किया जाता है. घर में उनकी ही हुकूमत चलती है. क्या उम्मीद कर सकते हैं आप ऐसे समाज से? हम क्यों आज भी महिलाओं की इज्जत करना नहीं सीख पाए? हर दिन दिल दहला देने वाली रेप और फिर मर्डर की खबरें आती हैं. कोई फर्क नहीं पड़ता, चाहे उन्होंने बुरका पहना हो, चाहे वो बच्ची हो या 80 साल की वृद्धा. और हिम्मत इतनी कि मारकर पेड़ पर टांग देते हैं लाश और हमारा समाज मूकदर्शक बना देखता रहता है. हम कैसे इतने निर्दयी हो गए? क्या इन पुरुषों के लिए औरत कोई चीज है, जिसमें कोई फीलिंग्स नहीं हैं! न उसकी चीख सुनाई देती है, न उसका दर्द दिखता है? या इसका लेनादेना भी कन्या भ्रूण हत्या से है? आज कई राज्यों में पुरुषों की संख्या कहीं ज़्यादा बढ़ चुकी है, जिससे शादी न हो पाने के चलते ये मर्द कुंठित हैं. दूसरे प्रदेशों से वधुओं का व्यापार होने लगा है.

हम एक डरावना समाज बनते जा रहे हैं. हम ऐसे नेता चुनते हैं, जो इन घटनाओं का विश्लेषण अपनी छिछोरी प्रवृत्ति के अनुसार करते हैं. कुछ लोगों से बात करो, तो कहते हैं, ‘तुम्हें क्या, मत चिंता करो? तुम क्या बदल लोगी? समाज का ठेका ले रखा है?’ मैं सोचती हूं कि क्या वो लोग रोबोट हैं और चाहते हैं कि मैं भी रोबोट बन जाऊं? अगर आप भी ऐसी सोच रखते हैं कि सब गलती कपड़ों की है, तो मुझे आपकी सोच पर तरस आता है. ये तो ऐसा हुआ कि आतंकवादियों ने हमला किया और आप मारे गए, तो गलती आपकी है, क्योंकि बुलेटप्रूफ जैकेट आपने नहीं पहनी थी.

ये ऐसा दौर है कि हर भारतीय लड़की को सेल्फ-डिफेंस आना ही चाहिए. इसके अलावा तो कोई चारा ही नहीं है. 16 दिसंबर के हादसे के बाद मैं भारत आ रही थी, तो मेरी जर्मन मकान-मालिकिन ने मुझे पेपर-स्प्रे दिया. मैंने भी बिना बहस किए रख लिया. पर शर्मिंदगी हुई कि मैं ऐसे समाज से आती हूं, जो एक तरफ देवियों की पूजा करते हैं और दूसरी तरफ अपने घर की औरतों का शोषण, उत्पीड़न, हिंसा. हमारा कानून तो मैरिटल रेप को अपराध ही नहीं मानता.

अक्षय कुमार ने एक पहल की है. वो लड़कियों को सेल्फ-डिफेंस सिखाते हैं. फ्री में.

हर लड़की को नाक पर पंच मारना तो ज़रूर आना चाहिए. एक बार मेरी एक सहेली ने हिदायत दी थी, ‘अपने बैग में सेफ्टीपिन ज़रूर रखना. पब्लिक प्लेस में या ट्रेन में बहुत काम आता है. जो ज़्यादा छुए-छाए, तो धीरे से चुभा दो. आपका मेसेज उस तक पहुंच जाएगा.

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हाल ही में एक लड़की का पोस्ट पढ़ा. एक रात लड़कों ने उसे घेर लिया. उसे कुछ समझ नहीं आया कि क्या करे. फिर डरते-डरते उसने उन दोनों को चुड़ैल बनकर डराना शुरू किया. उसने लड़कों के बाल नोंचने और गाल खरोंचने शुरू किए और लड़कों को डराकर भगा दिया. ये तो थी डर के आगे जीत वाली बात, पर आशा करती हूं कि आप कभी ऐसी सिचुएशन में न फंसें. लेकिन अगर ऐसा हो, तो नाखून और मुक्का, जोर-जोर से चिल्लाना काम आ सकता है.

जर्मनी गई, तो बहुत खुशी हुई. न लड़के छेड़ते हैं, न लड़कियों का अपमान होता है. आजादी का अहसास, अपने वजूद का अहसास. इज़राइल में भी ऐसा ही माहौल है. यहां तो लड़कियां उन लड़कों से शादी करना पसंद करती हैं, जो खाना बनाने में पारंगत हों. फेमिनिज्म का अर्थ लड़कों को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि ये अहसास दिलाना है कि जो नियम उन पर लागू होते हैं, वही लड़कियों पर भी लागू होने चाहिए. लड़का-लड़की समान हैं. इंसान हैं. हमें कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडू जैसे नेता चाहिए, जो फेमिनिज्म की हिमायत करें. हमें कीनन-रयूबेन जैसे लड़के चाहिए, जो लड़कियों की इज्जत के लिए समाज से लड़ सकें और एक मिसाल कायम कर सकें.

कोई भी देश भारत की इज्जत इसलिए नहीं करेगा कि हमारी इकॉनमी कितनी आगे है, पर तब जरूर इज्जत करेगा, जब हम आपस में और अपनी महिलाओं की इज्जत करना सीख जाएंगे. ट्रूडू की कैबिनेट में करीब 50% महिलाएं हैं. जब उनसे पत्रकारों ने पूछा कि जेंडर इक्वलिटी क्यों रखी, तो उन्होंने कहा, ‘क्योंकि ये 2015 है.’


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