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अगर आप कह दें कि मनोज तिवारी तो गवैया है, तो आप नहीं जानते इनको

सतीश उपाध्याय को हटाकर नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी को भाजपा दिल्ली यूनिट का प्रेसिडेंट बनाया गया है. सितंबर के महीने में आम आदमी पार्टी के कपिल मिश्रा के साथ एक प्रोग्राम में जाने पर कहा गया था कि मनोज तिवारी के पैर काटे जा रहे हैं. अब औकात में आयेंगे. पर दो महीने बाद मनोज ने सबको याद दिला दिया कि वो क्या चीज हैं. ये कोई छोटी पोस्ट नहीं है. सतीश से पहले डॉक्टर हर्षवर्धन थे प्रेसिडेंट. इनके पहले थे विजय गोयल.

नाम है मनोज तिवारी मृदुल. गायक हैं. मीठी आवाज है. पर अंदाज बेहद जुदा है. मनोज ने अपनी जिंदगी में जिस बेबाकी से अपने को खड़ा किया है, वो राजनीति और संगीत के शोर में गुना नहीं गया है. पर वो काबिले तारीफ है. इस आदमी ने यूनिवर्सिटी पॉलिटिक्स, गीत-संगीत, एक्टिंग, क्रिकेट, राजनीति और रियल एस्टेट में अपने खंभे गाड़े हैं. आप ये नहीं कह सकते कि ये गवैया है. कुछ जानता नहीं. तब आप मनोज को नहीं जानते.

2009 में समाजवादी पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़ा. गोरखपुर से. योगी आदित्यनाथ के खिलाफ. हार गये. पर पांच साल बाद भाजपा से ही खड़े हुए और दिल्ली से सांसद बने. तब से दिल्ली के हर इवेंट में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है. अमूमन माना जाता है कि सिनेमा-संगीत की दुनिया से आये लोग राजनीति का ज्ञान नहीं रखते. साउथ इंडिया में तो नेताओं ने इस बात को कब का झूठा साबित कर दिया. नॉर्थ में भी कह रहे हैं. मनोज इसका बेहतरीन उदाहरण हैं.

1971 में बिहार में पैदा हुए मनोज. बीएचयू में पढ़ने वाले मनोज छात्रसंघ में सक्रिय थे. इतनी मोहक पर्सनैलिटी का आदमी चुप बैठ ही नहीं सकता. वहां क्रिकेट भी खेलते थे. मनोज ने कई बार कहा है कि उन्होंने उस दौर के बड़े-बड़े रणजी क्रिकेटरों के साथ खेला है. पर गाने की तलब बहुत थी. अच्छा गाते थे. भोजपुरी गाते थे. उस वक्त भोजपुरी में क्लासिकल सिंगर हुआ करते थे. जो धुन-तान और स्वर लहरियों में गाते थे. अपने में मगन वो जनता से कटे जा रहे थे. ये वो दौर था जब भारत में आर्थिक सुधार हुए थे. और देश कॉर्पोरेट की तरफ मुड़ रहा था. देश का युवा वर्ग चकाचौंध खोज रहा था. बेरोजगारी और पढ़ाई से परेशान युवा समाजवाद और विरह पर बने गाने नहीं सुनना चाहता था. किसी को माटी, ओस और धान के खेतों के रंग की तासीर नहीं भाती थी. ना तो समझने का वक्त था, ना ही सुनने का जज्बा.

ऐसे में मनोज ने वो गाने गाये जो कला की दृष्टि से कमजोर पर लोगों की नजर में बेहद ताकतवर थे. अस्सिये से बीए कर के बचवा हमार कंपटीशन देता का गाना पूर्वांचल के लोगों का एंथम बन गया. ये वो दौर था जब लोग बनारस, इलाहाबाद और पटना में सालों रमे रहते थे सरकारी नौकरियों की तैयारी में. मनोज ने नई पीढ़ी के रोमांस को भी कैप्चर किया अपने गानों में. गांवों से शहर की तरफ आया युवा जो पहनावे और बोलचाल से शहरी पर आत्मा से गंवई था, वो अपने रोमांस और इमोशन को पहचान नहीं पा रहा था. फ्रस्ट्रेशन थी. ऐसे में मनोज के गाये गाने बेहद पॉपुलर हुए. हालांकि ये गाने बहुत प्रोग्रेसिव नहीं थे. ज्यादातर तो लड़कियों को ऑब्जेक्टिफाई करते हुए बने थे, पर जो पॉपुलर है, वो चलता है. यही चीज बाद में राजनीति में काम आई.

मनोज का सफर आसान नहीं रहा था. मनोज खुद कई जगह बता चुके हैं कि टी-सीरीज के दफ्तर में अखबार बिछा के सोना पड़ा था उनको. लोग रिजेक्ट कर देते थे. पर मीठी आवाज का जादू छाता गया. बक्सर के गौरीशंकर मंदिर में मनोज ने कई बार परफॉर्मेंस दी. वजह थी कि इनको संतान चाहिए थी. मन्नत मांगी और दो बेटे हुए. इसका कर्ज उन्होंने गाना गाकर चुकाया. मनोज बोलने में भी बहुत तेज हैं. मीठे-मीठे में बहुत गहरा बोल जाते हैं.

बाद में मनोज तिवारी ने अपने दम पर भोजपुरी सिनेमा को उठा दिया. 2003 में महज 22 लाख रुपये में बनी फिल्म ससुरा बड़ा पईसावाला बेहद ही बचकानी था. पर चली बहुत. 22 करोड़ रुपये कमाये. उसके बाद तो भोजपुरी में फिल्मों की लाइन लग गई. पूरी इंडस्ट्री खड़ी हो गई. लोगों ने खुद रोजगार के साधन ढूंढ लिये थे. और पॉपुलैरिटी इतनी बढ़ी कि टीवी-सिनेमा में भी पूर्वांचल की कहानियां दिखाई जाने लगीं. मनोज को नींव का पहला पत्थर रखने का श्रेय तो जाता ही है. स्टार ऑफ द डीकेड का अवार्ड मिला है मनोज को. बिग बॉस 4 में भी गये थे.

इसके बाद मनोज ने छलांग मारी राजनीति में. बावरा मन मानता कहां है. टैलेंट छुपता नहीं है. बोरियत होने लगती है. कुछ नया करने की तलब होने लगती है. टिकट मिला सपा से. 2009 में लोकसभा लड़े और हार गये. 2011 में अन्ना के आंदोलन में शामिल हुये. वहां से राजनीति चेंज की. भाजपा जॉइन की और 2014 में दिल्ली से सांसद बने. तब से लगातार सीढ़ियां चढ़ते जा रहे हैं.

इसी बीच मनोज तिवारी ने रियल एस्टेट में हाथ डाला. वास्तु-विहार के नाम से. छोटे शहरों में अपार्टमेंट बनाने को लेकर शुरू हुआ था ये प्रोजेक्ट. तमाम तरह के विवादों से घिरा हुआ है. पर यूपी, बिहार, एम पी, छत्तीसगढ़, झारखंड और उड़ीसा तक फैला हुआ है. अब ये छोटा प्रोजेक्ट नहीं है. ये भविष्य को देख पाने का मनोज का हुनर था.

यही हुनर अब काम आ रहा है. अगर मनोज के टैलेंट को देखें तो ये समझ आ रहा है कि ये गाड़ी रुकने वाली नहीं है. राजनीति की समझ मनोज को बहुत पहले से है. और समझाना अब शुरू किया है.

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