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भारतीय मूल का वो निर्देशक जो हॉलीवुड में टॉप तक पहुंचा, फिर ज़लील हुआ, फिर से टॉप पर पहुंचा


सफलता प्राप्त करने का सबसे तेज़ तरीका है – असफलताएं. निर्देशक के तौर पर मेरी पहली दो फिल्में असफल रही थीं. और ये बड़ी बात थी. सभी संभव बातों में से सबसे बड़ी बात. इससे मैंने जल्दी से सीख लिया कि मेरी एप्रोच में कुछ ऐसा था, जो सही नहीं था. और इसके बाद मैं फ़िल्म निर्माण का विशेषज्ञ बन गया था.


2008 के एक इंटरव्यू के दौरान एम. नाईट श्यामलन ने अपने बारे में जब ये बातें कहीं थीं तब तक उनकी तीन बहुत बुरी फ़िल्में आ चुकी थीं – ‘दी विलेज’, ‘लेडी इन वाटर’ और ‘दी हैपनिंग’. लेकिन अभी उनकी दो और ऐसी फ़िल्में आनी बाकी थीं जो उन्हें हॉलीवुड के कुछ ‘सबसे बुरे’ निर्देशकों की कतार खड़ा करने वाली थी.

वो दो फ़िल्में थीं – ‘दी लास्ट एयरबेंडर’ (2010) और ‘आफ्टर अर्थ’ (2013)

दी लास्ट एयरबैंडर का पोस्टर
दी लास्ट एयरबैंडर का पोस्टर

कई पत्रकारों द्वारा ‘दी लास्ट एयरबेंडर’, को हॉलीवुड की अब तक की सबसे खराब मूवीज़ में शुमार किया गया था. ‘रॉटन टोमेटो’, जो फ़िल्म समीक्षा के क्षेत्र में जानी-मानी वेबसाइट है, में इस फ़िल्म को दर्शकों और समीक्षकों ने कुल मिलकर 10 में से 2.8 अंक दिए हैं.

31 वें ‘गोल्डन रेस्पबैरी अवार्ड्स’ में 8 कैटगरीज़ में इसका नॉमिनेशन हुआ था जिसमें से 4 पुरस्कार इसकी झोली में आए थे.

‘गोल्डन रेस्पबैरी अवार्ड्स’ को बेशक ऑस्कर के बराबर प्रसिद्धि नहीं हासिल है लेकिन ये सबसे बुरी फिल्मों के लिए वही है जो ऑस्कर साल की सबसे बेहतरीन फिल्मों के लिए है.

उस ‘साल के सबसे बुरे निर्देशक’ का पुरस्कार भी एम. नाईट श्यामलन को ही दिया गया था. इसी फ़िल्म के लिए.

उनकी ठीक अगली फ़िल्म ‘आफ्टर अर्थ’ को लेकर कहा जाने लगा कि इस मूवी ने श्यामलन के ‘प्रॉमिसिंग’ कैरियर के आगे ‘दी एंड’ का बोर्ड लगा दिया है.

'आफ्टर अर्थ' फ़िल्म का एक दृश्य
‘आफ्टर अर्थ’ फ़िल्म का एक दृश्य

इस फ़िल्म के चलते श्यामलन का उसी ‘कुख्यात’ अवार्ड के लिए फिर से नॉमिनेशन हुआ जो वो पहले भी दो बार जीत चुके थे – गोल्डन रेस्पबैरी अवार्ड्स. ‘वॉच मोजो’ जैसे प्रसिद्ध यू-ट्यूब चैनल से लेकर कई पत्र-पत्रिकाओं ने उन्हें हॉलीवुड के सबसे बुरे निर्देशकों में से एक घोषित किया.

‘कुओरा’ में एक सवाल तक है – एम. श्यामलन को अब तक फ़िल्में बनाने की इजाज़त और मौके कैसे मिल रहे हैं?

तो क्या ‘आफ्टर अर्थ’, एक ‘प्रॉमिसिंग निर्देशक’ का अंत था? उसे एक ‘प्रॉमिसिंग निर्देशक’ क्यूं कहा जा रहा था. लगातार फ्लॉप देने और समीक्षकों द्वारा अस्वीकार कर दिए जाने के बावज़ूद इस निर्देशक को क्यूं हॉलीवुड इतने सालों से झेल रहा था. और सबसे बड़ा प्रश्न कि अब ये निर्देशक क्या कर रहा है?

06 अगस्त, 1970 को भारत के एक केंद्र शासित प्रदेश पुदुच्चेरी डॉक्टर माता-पिता की फैमिली में जन्मे श्यामलन भारत में केवल अपने पहले छः हफ़्ते रहे, उसके बाद अपनी फैमिली के साथ यूएस शिफ्ट हो गए.

श्यामलन की पहली फ़िल्म का पोस्टर
श्यामलन की पहली फ़िल्म का पोस्टर

पिताजी चाहते थे कि लड़का मेरी तरह डॉक्टर बने. मां चाहती थी कि श्यामलन अपना पैशन फॉलो करे. और लड़के का पैशन क्या था?

एल्फर्ड हिचकॉक और स्टीवन स्पीलबर्ग का बड़ा वाला फैन ‘मनोज’ सोलह साल का होने तक 40 से ज़्यादा शॉर्ट फ़िल्में बना चुका था. ये सारी फ़िल्में उसने गिफ्ट में मिले 8 एमएम कैमरा से बनाई थीं. इन्हें वो ‘मनोज नाईट श्यामलन’ होने के बाद अपनी सुपरहिट फिल्मों के डीवीडी वर्ज़न में दर्शकों के सामने लाने वाला था.

लेकिन अभी ऐसा होने में देर थी. अभी उसने टिस्क स्कूल ऑफ़ आर्ट्स, न्यूयॉर्क से अपना ग्रेजुएशन पूरा करना था और वहीं पर अपने नाम में नाईट (जिसका मतलब ‘सूरमा’ होता है) जोड़ना था.

इसके बाद, जैसा कि श्यामलन ने अपने इंटरव्यू में कहा था – दो फ्लॉप फ़िल्में दीं.

एक थी ‘प्रेईंग विद एंगर’ (1992) जिसमें अपने दोस्तों के पैसे लगाए, और दूसरी थी ‘वाइड अवेक’ (1998) जिसमें अपने मम्मी-पापा के पैसे लगाए. ‘वाइड अवेक’, श्यामलन के हिसाब से एक ऐसी कॉमेडी फ़िल्म थी जो लोगों की रुला देती है. न जाने इसने लोगों को रुलाया या नहीं लेकिन इसमें पैसा लगाने वालों को ज़रूर रुलाया.

'दी सिक्सथ सेंस' का एक सीन
‘दी सिक्सथ सेंस’ का एक सीन

बस! यहां पर श्यामलन को लेकर सारी ‘कथित’ नेगेटिव बातें ख़त्म हो जाती हैं.

फिर आई उनकी फ़िल्म ‘दी सिक्सथ सेंस’ (1999) मने छठी इंद्री. फ़िल्म में अंत में जो ट्विस्ट आता है केवल उसने ही श्यामलन को हॉलीवुड के बेहतरीन निर्देशकों की कतार में खड़ा कर दिया. उनकी तुलना अतीत के सबसे प्रसिद्ध संस्पेंस मूवी डायरेक्टर ‘अल्फ्रेड हिचकॉक’ से की जाने लगी. इस फ़िल्म के अंत को लेकर अमेरिका में जो क्रेज़ पैदा हुआ, उसने ‘स्पॉइलर्स’ के क्षेत्र में भी एक नया कीर्तिमान स्थापित किया. यानी इसकी काफी संभावना थी कि आपने फ़िल्म भी न देखी हो और फ़िल्म की ‘शॉकिंग’ एंडिंग भी आपको पता हो.

अपनी अगली फ़िल्म की स्क्रिप्ट लेकर जब वो ‘हॉलीवुड फिल्म्स’ के पास पहुंचे तो वहां से उन्हें चार करोड़ डॉलर मिल गए अगली फ़िल्म बनाने के लिए. फ़िल्म का नाम था – ‘अनब्रेकेबल’ (2000). ये एक अलग तरह ही ‘सुपरहीरो’ फ़िल्म थी. जिसने इसके निर्माताओं को मालामाल कर दिया था. होने को क्रिटिक्स ने भी इस फ़िल्म को काफी पसंद किया था, लेकिन अब लगभग दो दशक बाद इस फ़िल्म ने ‘कल्ट’ का दर्ज़ा हासिल कर लिया है. अट्ठारह साल बाद वही चीज़ें अब समीक्षकों को ‘रियलिज्म’ का क्लासरूम उदाहरण लगती है.

'अनब्रेकेबल' का एक सीन
‘अनब्रेकेबल’ का एक सीन

इस फ़िल्म को टाइम मैगज़ीन ने हॉलीवुड की 10 सबसे बेहतरीन सुपरहीरो मूवीज़ में से एक माना था. क्वेंटिन टेरेंटीनो ने भी इसे अपनी 20 फ़ेवरेट मूवीज़ में शुमार किया था.

इसके बाद आई साइंस फिक्शन ‘साइंस’ (चिन्ह) (2002) के बारे में एक समीक्षक ने कहा था – इस फ़िल्म की एक मात्र कमी ये है कि ये दर्शकों की कल्पना के ऊपर कुछ नहीं छोड़ती.

इन तीन फिल्मों के बाद श्यामलन की गिनती हॉलीवुड के सबसे बेहतरीन निर्देशकों में होने लगी. उनके पास तब ऐसे-ऐसे प्रोजेक्ट आने लगे थे, जो हॉलीवुड के दिग्गजों के लिए भी सपना थे.

उन्होंने अलग-अलग समय में हैरी पॉटर सीरीज़ की दो फ़िल्में रिजेक्ट की. एक बार वो ‘अनब्रेकेबल’ में बिज़ी थे और एक बार ‘दी विलेज’ बनाने में. ‘स्पाइडर मैन’ और ‘बैट मैन’ के लिए स्क्रिप्टिंग और निर्देशन करने का ऑफर ठुकराया (2000 और 2002 में). ‘लाईफ ऑफ़ पाई’ को अपनी फ़िल्म लेडी इन वाटर के चक्कर में छोड़ा. ‘क्रोनिकल ऑफ़ नार्निया’ को डायरेक्ट करने का भी ऑफर मिला और उसे भी ठुकरा दिया.

'दी विज़िट' का एक सीन
‘दी विज़िट’ का एक सीन

बहरहाल इन तीन फिल्मों से उन्हें प्रसिद्धि और पैसा तो मिला लेकिन वो ‘टाइपकास्ट’ भी हो गए. अब दर्शक उनकी फिल्मों को देखने के लिए इसलिए थियेटर जाते थे ताकि कोई ‘अद्भुत’ क्लाइमेक्स देखने को मिले, स्टोरी में कोई कमाल का ट्विस्ट हो. शायद उनकी लगातार फ्लॉप होती फिल्मों का एक कारण दर्शकों की ये अपेक्षाएं भी थीं.

बहरहाल उनके बुरे दौर की और उस दौरान आई उनकी फिल्मों की बातें तो हम पहले ही कर चुके हैं. फिर लगातार पांच-छः बुरी फिल्मों को दे चुकने के बाद उनकी एक यूनिक ही विधा, ‘फाउंड फुटेज’, की एक फ़िल्म आई. नाम था ‘दी विज़िट’.

‘फाउंड फुटेज’, फ़िल्ममेकिंग की ऐसी विधा है जिसमें फ़िल्म ऐसे चलती है गोया ये फ़िल्म डायरेक्ट न की गई हो बल्कि कोई वीडियो-फुटेज कहीं कूड़े में, स्टोररूम में या सूने पड़े किसी घर में मिली हो और फ़िल्म देखने वाले दर्शकों को वो वीडियो जस की तस परोस दी जाए.

ऐसा वाकई में नहीं होता है, बस निर्देशन और स्पेशल इफेक्ट्स के आधार पर ऐसा दर्शाया जाता है कि ऐसा ही हुआ है.

बहरहाल, ‘दी विज़िट’ के बाद फिर से श्यामलन ने खोई हुई प्रतिष्ठता फिर से प्राप्त कर ली. कुओरा के उस सवाल के जवाब को लोगों ने एडिट करना शुरू कर दिया जिसमें पूछा गया था कि श्यामलन को अब तक फ़िल्में बनाने की इजाज़त और मौके कैसे मिल रहे हैं?

‘गोल्डन रेस्पबैरी अवार्ड्स’ देने वालों ने उन्हें ‘रेज़ी रिडीमर अवार्ड’ दिया. ‘रेज़ी रिडीमर अवार्ड’ अवार्ड उसे दिया जाता है जिसे अतीत में ‘गोल्डन रेस्पबैरी अवार्ड’ दिया गया था, लेकिन अब वो अपनी प्रतिष्ठा फिर से हासिल करने में कामयाब रहा है.

इसके बाद 2016 में आई अनब्रेकेबल की सिक्वल ‘स्प्लिट’. ये कमाई के हिसाब से पूरे हॉलीवुड इतिहास की ग्यारहवीं सबसे ज़्यादा फायदेमंद मूवी बनी. इसने हर सौ रुपए के इन्वेस्टमेंट में निर्माताओं को दो हज़ार रुपए कमा के दिए.

एक समीक्षक ने इस फ़िल्म के बारे में कहा – यह फ़िल्म ‘हिचकॉक, डर और थेरेपी सेशन’ का उत्कृष्ट मिश्रण है.

यूं एक कलाकार ने, एक जीनियस ने फिर से बातों से नहीं अपने काम से अपने समीक्षकों को जवाब दे दिया. हो सकता है कि ये लास्ट लाइन पढ़कर आपको भारत के किसी क्रिकेटर की याद हो आए!

अंततः – इस सब के बाद उनकी एक और फ़िल्म आ रही है. नाम है – ‘ग्लास‘. ये अनब्रेकेबल और स्प्लिट का सिक्वल है. ट्रेलर आपन नीचे देख सकते हैं –


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