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ONGC ने ये कहकर नौकरी से निकाला कि तुम दौड़ नहीं पाओगे, अब गोल्ड जीता है ये बेरोजगार

साल 2000. हरियाणा का जींद जिला. तहसील नरवाणा. ओम प्रकाश चौटाला नरवाणा से चुनाव लड़े और जीते. मुख्यमंत्री भी बन गए. यहां के उझाणा गांव में उसी सरकार में एक स्पोर्ट्स नर्सरी भी बनी. गांव के बालकों को यहां ट्रायल के लिए बुलाया गया. 8-10 साल के बच्चों के लिए ये भैंसों और खेतों में काम से थोड़ा दूर भागने का एक सुनहरा मौका था. गांव में भैंसों के व्यापारी का 10 साल का छोरा मनजीत इस नर्सरी में पहुंचने वाला पहला लड़का था. ट्रायल हुए और मनजीत दौड़ में अव्वल आया. तब से वो दौड़ ही रहा है. दौड़ते दौड़ते अब 2018 में इंडोनेशिया के जकार्ता में 28 साल के मनजीत सिंह चाहल ने 800 मीटर की दौड़ में भारत के लिए गोल्ड मेडल जीत लिया है. मनजीत ने ये दौड़ 1 मिनट और 46.15 सेकंड में पूरी कर भारत के ही धावक जिनसन जॉनसन को पीछे छोड़ दिया. जॉनसन इस दौड़ में गोल्ड के दावेदार थे जिन्हें मनजीत ने 0.20 सेंकड के अंतराल से दूसरे स्थान पर धकेल कर ये जीत हासिल ली. इस तरह इंडिया को 800 मीटर की दौड़ में गोल्ड और सिल्वर दोनों मिले हैं. 1962 के बाद पहली बार भारत ने एथलेटिक्ट की इस स्पर्धा में गोल्ड और सिल्वर मेडल जीते हैं.

पूरा मुल्क मनजीत की इस सफलता का जश्व मना रहा है और इसी बीच आज यानी 29 अगस्त को नेशनल स्पोर्ट्स डे भी है. दी लल्लनटॉप ने मनजीत के पिता रणधीर सिंह चाहल से बात की. उन्होंने कहा कि मनजीत की 18 साल की मेहनत आज रंग लाई है. खुद स्टेट लेवल तक शॉर्टपुट खेल चुके रणधीर सिंह ने बताया कि “इस लड़के ने बहुत मेहनत की है. कई मौके ऐसे आए जब खुद मैंने कहा कि अब ये गेम छोड़ दे और मेडल नहीं आ रहे हैं. मगर ये माना नहीं. लगा रहा. मनजीत पिछले चार महीने से घर नहीं आया है. उसका तीन महीने का बच्चा है उसकी शक्ल तक नहीं देखी है. पहले डेढ़ महीना भूटान में ट्रेनिंग कर रहा था और पिछले साढे तीन महीने से तमिलनाडु के ऊटी में प्रैक्टिस करता रहा. फिर वहीं से सीधे एशियन गेम्स के लिए चला गया. मनजीत का ये गोल्ड उसकी इसी मेहनत का नतीजा है.”

Tally

साल 2010 में जब कॉमनवेल्थ गेम्स दिल्ली में हुए थे तो मनजीत सेमीफाइनल तक पहुंचे थे यानी कोई मेडल नहीं. फिर 2013 में पुणे में एशियन एथलेटिक्स चैंपियनशिप हुई, उसमें भी मनजीत चौथे स्थान पर रहे. फिर बीच में इंजरी हो गई और ONGC में एक कॉन्ट्रैक्चुअल नौकरी थी वो भी चली गई. ONGC ने ये कहकर कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू नहीं किया कि अब दौड़ में अपनी परफॉर्मेंस नहीं सुधार पाएगा ये धावक. मगर मनजीत ने हार नहीं मानी. बीता साल भी इस धावक के लिए बेहद खराब रहा था. क्ववालिफायर में वो 8वें स्थान पर रहा था और किसी भी नेशनल गेम्स में कोई मेडल नहीं मिला. मगर गुवाहाटी में इंटर स्टेट चैंपियनशिप और पटियाला में फेडरेशन कप में मनजीत ने जॉनसन को कड़ी टक्कर जरूर दी थी इसी के चलते मनजीत एशियन गेम्स के लिए क्वालिफाई कर पाए.

जकार्ता में 28 अगस्त को हुई इस दौड़ में एक अलग मनजीत दौड़ रहा था. आखिरी 100 मीटर में इस धावक ने गजब की फुर्ती दिखाई और पासा पलट दिया. तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि मनजीत ने उस हमवतन धावक को पीछे छोड़ दिया जिसने इसी साल गुवाहाटी में इंटर स्टेट चैंपियनशिप में रिकॉर्ड बनाया था. जॉनसन ने गुवाहाटी में 1976 के मोंट्रियल ओलंपिक्स में नेशनल रिकॉर्ड बनाने वाले भारतीय धावक श्रीराम सिंह का रिकॉर्ड तोड़ा था. वहीं इसी साल ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में जो कॉमनवेल्थ गेम्स हुए थे उसमें भी जॉनसन 1500 मीटर की रेस में 5वें स्थान पर रहे थे. गोल्ड जीतने के बाद दिए एक इंटरव्यू में मनजीत ने कहा, “जीत के लिए कोच अमरीश कुमार के साथ बनाई रणनीति में ये तय किया था कि आखिर के 100 से 150 मीटर का फासले पर जोर देना है. मैंने वही किया और अब नतीजा सामने है.”

Manjeet Singh
गांव के स्टेडियम में बाकी लड़कों को ट्रेन करते हैं मनजीत.

पिता रणधीर कहते हैं कि उझाणा गांव में इस वक्त एक स्टेडियम है जहां रोजाना 400-500 बच्चे प्रैक्टिस करते हैं. “साल 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स में मनजीत को तब की हुडा सरकार ने 2 लाख रुपए दिए थे. फिर पंचायत को 11 लाख रुपए दिए गए और जब मनजीत से पूछा गया कि इन पैसों का क्या करें, तो मनजीत ने इसे गांव के लिए स्टेडियम बनाने के लिए कहा. जमीन थी ही, बस बाउंड्री बना दी और इसका फायदा पूरे गांव को मिल रहा है. गांव में 10 हजार वोटर हैं, इसलिए नेताओं का भी ध्यान अब गांव पर रहने लगा है.” मनजीत ने अपने बुरे दौर में भी दौड़ना नहीं छोड़ा. गांव के तमाम लड़कों को भी अपने साथ ट्रेनिंग कराना जारी रखा. इस दौरान इस गांव का एक और एथलीट इस वक्त एशियन गेम्स में खेल रहा है और ऐसे कई और आने वाले सालों में बड़े लेवल पर खेलने के लिए तैयार हो रहे हैं.


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