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इस बात में फिलहाल केजरीवाल सरकार को कोई टक्कर नहीं दे सकता

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दिल्ली की केजरीवाल सरकार को बधाई पहुंचे. मुख्यमंत्री नंबर दो मनीष सिसोदिया को खूब बधाई पहुंचे. ये बड़े दिनों बाद हुआ कि शिक्षा जैसी चीज पर किसी सरकार को शाबाशी दी जा रही है. सिसोदिया को ‘फाइनेस्ट एजुकेशन मिनिस्टर’ का अवॉर्ड मिला है. माने, देश का नंबर वन शिक्षा मंत्री. ये खुशखबरी है. एजुकेशन और हेल्थ सेक्टर में दिल्ली सरकार ने जो काम किया, उसकी तारीफ विदेशी मीडिया में भी हुई. अमेरिकी मीडिया ने तो अपनी सरकार से कह दिया कि सीखना है, तो केजरीवाल सरकार से सीखो. UN के पूर्व प्रमुख कोफी अन्नान ने भी ‘मोहल्ला क्लीनिक’ की तारीफ की. नॉर्वे के पूर्व PM ने पीठ थपथपाई. ये सारी अच्छी चीजें हेल्थ सेक्टर में हो रही हैं. मगर साथ के साथ, एजुकेशन सेक्टर में भी बड़ा धांसू काम कर रही है ये सरकार. ये जो अवॉर्ड है, वो उसी काम का एक छोटा सा टोकन है. भारत की हर सरकार अगर पार्टी-विचारधारा और तेरा-मेरा का फर्क छोड़कर ऐसा करना शुरू करे, तो देश का भला हो जाएगा. कुछ हाइलाइट्स हैं इसके. आगे बढ़ने से पहले, नजर मार लीजिए:

– कुल सालाना बजट का 24 फीसद शिक्षा के सुपुर्द किया
– 10,000 नए क्लासरूम बनवाने का प्रस्ताव. पिछले साल 8,000 क्लासरूम बनवाए थे.
– 400 लाइब्रेरी शुरू करने का प्रपोजल
-शिक्षकों को टैबलेट, ताकि वो छात्रों के काम पर नजर रख सकें

जब सरकार किसी काम को गंभीरता से लेती है, तो पूरे सिस्टम पर असर दिखता है. मनीष सिसोदिया एक अच्छे शिक्षा मंत्री साबित हो रहे हैं. उम्मीद है कि उनकी सरकार आगे भी इसी तरह काम करती रहेगी.
जब सरकार किसी काम को गंभीरता से लेती है, तो पूरे सिस्टम पर असर दिखता है. मनीष सिसोदिया एक अच्छे शिक्षा मंत्री साबित हो रहे हैं. उम्मीद है कि उनकी सरकार आगे भी इसी तरह काम करती रहेगी.

पहले बच्चे सरकारी स्कूलों में जाकर कौए उड़ाते थे
कोई सरकार शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा काम करे, ये सुने जमाना बीत गया था. वरना सरकारों को लगता है कि इतनी चीजें हैं करने को. शिक्षा पर क्या ध्यान दें? उससे होगा क्या? इस तरह एजुकेशन सिस्टम साल-दर-साल सरकार की प्राथमिकताओं की लिस्ट से दूर होता गया. आबादी दो हिस्सों में बंट गई. सरकारी स्कूल वाले और प्राइवेट स्कूल वाले. भेद इतने पर खत्म नहीं हुआ. प्राइवेट स्कूलों में भी सबसे संभ्रांत माने गए कॉन्वेंट स्कूल वाले. पहले दर्जे के छात्र. इतना क्रेज हुआ इसे लेकर कि छोटे-छोटे कस्बों की गलियां ‘फलां फलां कॉन्वेंट स्कूल’ की तख्तियों से पट गईं. मगर वहां जाना भी सबके बस में तो था नहीं. करोड़ों मां-बाप इस हालत में भी नहीं कि मुफ्त की खिचड़ी खाने के लिए अपने बच्चों को सरकारी स्कूल जाने की आजादी दे दें. सरकारी में पढ़ने वाला बच्चा कुछ बेहतर करेगा, इसकी उम्मीद खुद मां-बाप और शिक्षकों ने छोड़ दी. बच्चे कौए उड़ाने के लिए स्कूल जाने लगे. टीचर स्कूल के घंटों में पैन कार्ड के फॉर्म भरकर पैसा कमाने लगे. टूटी-फूटी इमारतें. कई इतने बुरे कि सिर पर पक्की छत भी नहीं. इनमें कौन पढ़े और कौन पढ़ाए? कइयों को सरकारी स्कूलों से इतनी नाउम्मीदी थी कि वो बस थाली भर खिचड़ी और बस्ता-वर्दी के पैसों के लिए स्कूल जाने का मोह पाले रहे. सरकारी स्कूलों को इस हाल में पहुंचाने के पीछे जो इकलौती वजह थी, वो थी सरकार. सरकार. उसके मुखिया. उसके मंत्री. उससे वेतन पाने वाले अधिकारी. सब के सब. तो ऐसे दिन और ऐसी रात में एक सरकार आई. दिल्ली में. केजरीवाल सरकार. उसने कहा, शिक्षा और स्वास्थ्य, ये दो होंगे हमारी पहचान. ये दोनों चीजें बोलेंगी कि हमने कैसा काम किया.

दिल्ली सरकार द्वारा बनवाए गए मॉडल स्कूलों में से एक की इमारत. इन स्कूलों में बच्चों की सुविधाओं का पूरा ख्याल रखा गया है. सरकारी स्कूलों को लेकर जैसी हमारी धारणा बन गई है कि बना दी गई है, वैसा बिल्कुल नहीं है ये.
दिल्ली सरकार द्वारा बनवाए गए मॉडल स्कूलों में से एक की इमारत. इन स्कूलों में बच्चों की सुविधाओं का पूरा ख्याल रखा गया है. सरकारी स्कूलों को लेकर जैसी हमारी धारणा बन गई है कि बना दी गई है, वैसा बिल्कुल नहीं है ये.

अब शिक्षा मंत्री खुद औचक निगरानी करने पहुंच जाता है
केजरीवाल सरकार ने यकीनन काम किया भी है. सरकारी स्कूलों की किस्मत बदलने के लिए मेहनत की है. अधिकारियों पर जिम्मेदारी छोड़कर निश्चिंत नहीं हुए. खुद भी शामिल हुए. हमने कई बार देखा. मनीष सिसोदिया औचक किसी स्कूल में पहुंच जाते थे. शिक्षकों से सवाल करते. बच्चों से बात करते. उनकी दिक्कतें सुनते. समाधान निकालने का वादा करते. एक वाकया बता रही हूं. 2016 की बात है. केजरीवाल सरकार ने एक सर्वे कराया. दिल्ली के स्कूलों में. मालूम चला कि 6ठी से 8वीं के करीब साढ़े तीन लाख बच्चों का अक्षरज्ञान बहुत कमजोर है. छठी में पढ़ने वाले करीब 74 फीसद बच्चे छोटी-छोटी क्लासों की किताब नहीं पढ़ सकते. कई तो ठीक से पढ़ना भी नहीं जानते. कइयों को तो अक्षरों की पहचान तक नहीं है. इन ‘नॉन रीडर’ बच्चों की पहचान की गई. सरकार ने सोचा, क्या किया जाए. इसे ‘चुनौती मिशन’ का नाम दिया गया. 5 सितंबर, 2016 यानी शिक्षक दिवस के दिन शिक्षकों और अधिकारियों को कसम खिलाई गई. कि वो ‘बाल दिवस’ यानी, 14 नवंबर तक बच्चों को पढ़ने लायक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. एक खास योजना शुरू की गई.

दिल्ली सरकार ने कुछ मॉडल स्कूल बनाए हैं. उनमें जाकर ऐसा नहीं लगता कि किसी दीन-हीन जगह पर आए हों. सरकारी स्कूलों के साथ सबसे बड़ी खराबी वहां का माहौल भी तो है. दूर से ही देखकर बदहाली महसूस हो जाती है.
दिल्ली सरकार ने कुछ मॉडल स्कूल बनाए हैं. उनमें जाकर ऐसा नहीं लगता कि किसी दीन-हीन जगह पर आए हों. सरकारी स्कूलों के साथ सबसे बड़ी खराबी वहां का माहौल भी तो है. दूर से ही देखकर बदहाली महसूस हो जाती है.

ऐसी योजना बनाई कि न पढ़ने वालों का भी मन लग जाए
इन ‘नॉन रीडर्स’ पर खास ध्यान दिया गया. हर दिन उनके ऊपर अलग से दो घंटे खर्च किए गए. पढ़ाई को और सीखने को उनके लिए आसान बनाया गया. कभी कहानियां सुनाकर, कभी तस्वीरें दिखाकर, उनके दिमाग में अक्षरों को बिठाने की कोशिश की गई. स्कूलों में एक घंटे का खास ‘रीडिंग आवर’ शुरू किया गया. इस एक घंटे में शिक्षक बच्चों को साथ बिठाता. उन्हें किताबें पढ़कर सुनाता. एजुकेशनल वीडियो दिखाता. बच्चे तस्वीरें बनाते. कागज पर तस्वीरें उकेरकर शब्दों को समझने की कोशिश की जाती. इसका असर हुआ. बच्चों में सुधार दिखने लगा. पढ़ने में उनकी दिलचस्पी पैदा हुई. अक्षरों से दोस्ती होने लगी. इस अभियान के अच्छे नतीजे आए. सरकार ने बेहतरी के जो आंकड़े दिए, उनपर विवाद भी हुआ. मगर हम तो इस बात को देख रहे हैं कि सरकार ने कोशिश की. ईमानदार कोशिश की. ऐसी कोशिशें होती रहनी चाहिए. बंद नहीं होनी चाहिए. मनीष सिसोदिया ने खुद भी माना था ये.

रीडिंग आवर योजना काफी अच्छी थी. रोचक तरीके से अक्षरज्ञान करवाना. इसका असर रातोरात महसूस नहीं किया जा सकता. लेकिन अगर हम अपनी शिक्षा व्यवस्था को इस तरह विकसित कर सकें कि वो रोचक हो, स्किल डिवेलपमेंट करे और हर बच्चे की जरूरत पूरी करे, तो आगे आने वाले समय में इसके बेहद शानदार नतीजे मिलेंगे.
रीडिंग आवर योजना काफी अच्छी थी. रोचक तरीके से अक्षरज्ञान करवाना. इसका असर रातोरात महसूस नहीं किया जा सकता. लेकिन अगर हम अपनी शिक्षा व्यवस्था को इस तरह विकसित कर सकें कि वो रोचक हो, स्किल डिवेलपमेंट करे और हर बच्चे की जरूरत पूरी करे, तो आगे आने वाले समय में इसके बेहद शानदार नतीजे मिलेंगे.

दिल्ली सरकार कहती है: शिक्षा और स्वास्थ्य पर है फोकस
केजरीवाल सरकार शिक्षा पर बहुत ध्यान दे रही है. 2017 की गणतंत्र दिवस परेड में दिल्ली की जो झांकी थी, उसका थीम भी एजुकेशन ही था. दिल्ली सरकार ने अपने मॉडल स्कूलों और मेगा पैरेंट-टीचर मीटिंग को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना. मेगा पैरेंट टीचर मीटिंग के द्वारा शिक्षकों और पैरेंट्स के बीच नियमित तौर पर मुलाकात होती है. मां-बाप फीडबैक देते हैं. शिक्षक अपनी कहते हैं. इस तरह ये तय होता है कि बच्चों के लिए क्या बेहतर किया जा सकता है. कोई सरकार ये कर रही है, ये छोटी बात नहीं है. दिल्ली सरकार ने 500 नए स्कूल बनाने का वादा किया था. वो नहीं हो सका है. उसका कहना है कि जमीन नहीं मिल रही है. इसकी कमी पूरी करने के लिए नए क्लासरूम बनाए जा रहे हैं. ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चे दाखिला ले सकें. उनके लिए जगह कम न पड़े. सरकार का कहना है कि उसने 8,000 नए क्लासरूम बनाए हैं. 2014-15 में जहां दिल्ली के अंदर 1,007 सरकारी स्कूल थे, वो अगले साल 2016 में बढ़कर 1,024 हो गए. नए क्लासरूम अलग हैं. सरकार का कहना है कि नए स्कूलों के लिए 29 जगहों पर जमीन मिल गई हैं. यानी, 29 नए स्कूल और. कम से कम. इसके अलावा, 10 हजार क्लासरूम और बनाए जाएंगे. सरकार ने 54 पायलट स्कूल भी बनाए. इनके तहत, पूरे स्कूल को दोबारा खड़ा किया गया. इन स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम बनाए गए हैं. प्रॉजेक्टर्स हैं. बैठने की अच्छी सुविधा है. सरकारी स्कूलों में अनुशासन और गंभीरता बढ़ाने के लिए सिस्टम विकसित किया गया है. उनका नियमित निरीक्षण किया जाता है. शिक्षा मंत्री खुद औचक निरीक्षण के लिए किसी भी समय आ सकते हैं, ये डर भी टीचर्स को ज्यादा जिम्मेदार बनाता है. इतना करने पर भी अभी बहुत सारा काम बाकी है. कई स्कूल अब भी खराब स्थिति में हैं. उन्हें ठीक करना और पटरी पर लाना जरूरी है. वो भी जल्द से जल्द.

जब शिक्षकों और अधिकारियों को ये एहसास हो कि खुद शिक्षा मंत्री कभी भी औचक निरीक्षण के लिए आ सकते हैं, तो उनमें एक अनुशासन की भावना आएगी. चीजों को लेकर ज्यादा संजीदगी दिखाएंगे वो. ये तस्वीर ऐसे ही एक वाकये की है, जब सिसोदिया एक स्कूल में पहुंच गए थे.
जब शिक्षकों और अधिकारियों को ये एहसास हो कि खुद शिक्षा मंत्री कभी भी औचक निरीक्षण के लिए आ सकते हैं, तो उनमें एक अनुशासन की भावना आएगी. चीजों को लेकर ज्यादा संजीदगी दिखाएंगे वो. ये तस्वीर ऐसे ही एक वाकये की है, जब सिसोदिया एक स्कूल में निरीक्षण के लिए पहुंच गए और सवाल करने लगे.

शिक्षा को सबसे ज्यादा बजट देने वाली सरकार
2016-17 में केजरीवाल सरकार ने अपने कुल बजट का 22.8 फीसद शिक्षा को दिया. भारत में अब तक किसी भी सरकार ने एजुकेशन को इतना फंड नहीं दिया. भारत का औसत देखें, तो ये आंकड़ा 15.6 फीसद है. 2017-18 में कुल बजट का 24 फीसद शिक्षा के नाम किया गया है. पिछले साल जहां ये 10,690 करोड़ था, वहीं इस साल 11,300 करोड़ है. ऐसा नहीं कि बस सरकारी स्कूलों पर ही ध्यान दिया हो. निजी स्कूलों से भी भिड़ी सरकार. बेतहाशा फीस बढ़ाने पर सख्ती दिखाई. शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए खास फंड आवंटित किया. नए शिक्षकों की भर्ती करने और खाली पड़े पदों को भरने की भी तत्परता दिखाई जा रही है. दिल्ली सबऑर्डिनेट सर्विसेज सिलेक्शन बोर्ड (DSSSB) ने 5,000 शिक्षकों के पदों को भरने के लिए परीक्षा आयोजित कराई थी. इनपर भर्ती भी हो चुकी है. इसके अलावा सरकार ने 9,500 टीचर्स के नए पद भी बनाए हैं. इनकी भर्ती का काम फिलहाल पूरा नहीं हुआ है. 17,000 अस्थायी शिक्षकों को परमानेंट करने का भी प्रस्ताव है. जब तक वो स्थायी नहीं हो जाते, तब तक के लिए उनकी तनख्वाह बढ़ा दी गई है. अभी बहुत कुछ है, जो करना बाकी है. सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के सिर पर चस्पां ‘दूसरे दर्जे का छात्र’ के दाग को मिटाना है. उन्हें मुख्यधारा के लायक बनाना है. उन्हें रोजगार के लिए तैयार करना है. ताकि हर हाथ को काम मिले. कोई बेरोजगार न रहे. पैसे की कमी और आर्थिक तंगी के कारण मां-बाप अपने बच्चे को सरकारी स्कूल न भेजें. सरकारी स्कूलों के मुंह में दांत लगाने हैं. उन्हें असरदार बनाना है. मॉडल बनाना है.  ये सारी चीजें हो जाएं, तो ताली बजाएंगे. पूरे न हों, तो आलोचना करेंगे. मगर फिलहाल तो खुशी इस बात की है ये एजुकेशन सेक्टर भी सरकार की वरीयताओं में शामिल हुआ. और ऐसी सरकार के शिक्षा मंत्री को पुरस्कार मिला. काम को पहचान मिली. घूरे के दिन तो फिरे. 


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