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मणिपुर में बीजेपी सरकार खतरे में आ गई, इसके पीछे की पूरी पिच्चर क्या है?

कांग्रेस ने मणिपुर में सरकार बनाने का दावा पेश किया है. 17 जून को मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह की गठबंधन वाली बीजेपी सरकार से कुल नौ विधायक अलग हो गए. इनमें बीजेपी के तीन विधायकों ने विधानसभा और पार्टी से इस्तीफा दे दिया. तीनों कांग्रेस के पाले में चले गए. विधानसभा में अब बीजेपी के 18 विधायक बचे हैं. इसके अलावा सरकार से समर्थन खींचने वाले छह विधायकों में चार नेशनल पीपल्स पार्टी (NPP) से हैं. एक तृणमूल कांग्रेस से है और एक निर्दलीय है. दल-बदल कानून के तहत तीन बीजेपी विधायकों को अयोग्य भी ठहराया जा सकता है. हालांकि अभी स्पीकर यमनाम खेमचंद सिंह ने इस्तीफे पर फैसला नहीं लिया है.

कांग्रेस का दावा- हमारे पास संख्याबल

मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता ओकराम इबोबी सिंह ने राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला से सदन का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है, ताकि सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सके. इस बारे में उन्होंने राज्यपाल को पत्र लिखा है. उनका दावा है कि बीरेन सिंह सरकार अल्पमत में है. ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस के पास 30 विधायकों का समर्थन है. वहीं, बीजेपी के मणिपुर प्रभारी प्रह्लाद सिंह पटेल ने कहा कि हमारे पास संख्या है. तीन बीजेपी विधायकों ने इस्तीफा दिया है, लेकिन पार्टी और विधानसभा स्पीकर ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया है. कांग्रेस ने स्पीकर को हटाने के लिए मणिपुर विधानसभा के सचिव को नोटिस दिया है.

पू्र्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह सदन में कांग्रेस विधायक दल के नेता भी हैं. फोटो: India Today
पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह सदन में कांग्रेस विधायक दल के नेता भी हैं. फोटो: India Today

कौन से विधायक सरकार से अलग हुए हैं?

बीजेपी के तीन विधायक- एस. सुभाषचंद्र सिंह, टी.टी. हाओकिप और सैमुअल जेंदई

NPP के चार विधायक- वाई. जॉय कुमार सिंह (उपमुख्यमंत्री), एन. कयिशी, लेतपाओ हाओकिप और एल. जयंत कुमार सिंह. ये चारों सरकार में मंत्री थे.

तृणमूल कांग्रेस के एक विधायक-टी. रॉबिन्द्रो सिंह

एक निर्दलीय- शहाबुद्दीन

2017 विधानसभा चुनाव

मणिपुर विधानसभा में सीटों का गणित समझने के लिए 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजे देखते हैं. मणिपुर विधानसभा में 60 सीटें हैं. बहुमत के लिए 31 सीटों की ज़रूरत होती है. 2017 के चुनाव में कांग्रेस 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. बीजेपी को 21 सीटें मिली थीं. नेशनल पीपल्स पार्टी (NPP) को चार सीटें, नागा पीपल्स फ्रंट (NPF) को चार सीटें, लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को एक सीट, तृणमूल कांग्रेस को एक सीट और निर्दलीय को भी एक सीट मिली. किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला था. मतलब त्रिशंकु विधानसभा हुई.

बीजेपी ने दावा किया कि उसके पास बहुमत का आंकड़ा (31 सीटें) है. राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला ने बीजेपी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. बीजेपी ने गैर कांग्रेसी दलों के साथ मिलकर सरकार बना ली. मतलब NPP, NPF, लोजपा, तृणमूल कांग्रेस और एक निर्दलीय के साथ मिलकर. इस पर विवाद भी काफी हुआ था.

मणिपुर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होकर भी सरकार नहीं बना सकी. जैसे महाराष्ट्र में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होते हुए सरकार नहीं बना सकी. फोटो: विकीपीडिया
मणिपुर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी होकर भी सरकार नहीं बना सकी. जैसे महाराष्ट्र में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होते हुए सरकार नहीं बना सकी. फोटो: विकीपीडिया

अब विधानसभा का गणित क्या है?

मणिपुर विधानसभा में फिलहाल सीटों की मौजूदा संख्या 59 है. क्यों? 2017 के विधानसभा चुनाव के तुंरत बाद आंद्रो से चुने गए कांग्रेस विधायक टीएच श्यामकुमार कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आ गए थे. वन मंत्री बन गए थे, लेकिन मार्च, 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें मंत्री पद से हटाया जाए. दल-बदल कानून के तहत बाद में स्पीकर ने उन्हें विधानसभा के लिए अयोग्य करार दिया.

अयोग्य करार दिए गए कांग्रेस विधायक टीएच श्यामकुमार. फोटो: PTI
अयोग्य करार दिए गए कांग्रेस विधायक टीएच श्यामकुमार. फोटो: PTI

इसके अलावा सात कांग्रेस विधायक बीजेपी में शामिल हो गए थे. इनमें सानासाम बीरा, जिनसुआनहऊ, ओइनाम लुखोई, न्गामथांग हाओकिप, येंगखोम सुरचंद्र, क्षेत्रिमयूम बीरा और पाओनम ब्रोजन के नाम थे. पिछले दिनों 9 जून, 2020 को मणिपुर हाईकोर्ट ने इन सात विधायकों के विधानसभा में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी. दल-बदल कानून के तहत स्पीकर की तरफ से उन पर अंतिम फैसला होना बाकी है. अगर इन सात लोगों को भी विधानसभा से बाहर रखें, तो मणिपुर में मौजूदा सीटों की संख्या घटकर 52 हो जाती है.

मणिपुर हाईकोर्ट ने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए सात विधायकों के विधानसभा में एंट्री पर बैन लगा दिया था. फोटो: Hcimphal.com
मणिपुर हाईकोर्ट ने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए सात विधायकों के विधानसभा में एंट्री पर बैन लगा दिया था. फोटो: Hcimphal.com

तो ये सब बवाल अभी क्यों?

‘इंडियन एक्सप्रेस’ के मुताबिक, सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे वाई जॉयकुमार ने कहा,

मुख्यमंत्री ने पांच किलो चावल हरेक को बांटने का वादा किया था और विश्वास दिलाया था कि लॉकडाउन में कोई कमी नहीं आएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मैंने मुद्दा उठाया. इसके बाद, उन्होंने मेरे पोर्टफोलियो ले लिए. बीजेपी सदस्यों ने हमें सरकार से इस्तीफा देने के लिए फोन किया. हाल ही में मुख्यमंत्री ने हमसे कहा कि राज्यसभा चुनाव के बाद NPP के मंत्री कैबिनेट से हटा दिए जाएंगे. बीजेपी अपने संगठन के साथियों पर हमलावर रहती है. हम ये व्यवहार कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं?

यहां पर एक कीवर्ड है- राज्यसभा चुनाव. इस हलचल के पीछे एक बड़ी वजह ये भी है. 19 जून को मणिपुर की एक सीट पर राज्यसभा चुनाव होना है. इसके लिए बीजेपी से महाराजा संजाओबा लिसीम्बा, कांग्रेस से पूर्व मंत्री तोंगब्रम मंगिबाबू और नगा पीपल्स फ्रंट से होनरीकुई काशुंग के बीच मुकाबला है.

सरकार में अब तक 39 विधायक थे. सरकार से नौ विधायक अलग हो गए हैं. हाईकोर्ट के आदेश के बाद जिन सात विधायकों पर पाबंदी लगी है, संभव है कि वो वोट न डाल पाएं. विपक्ष में 20 सदस्य हैं. राज्यसभा सीट जीतने के लिए 26 वोट की ज़रूरत है. ऐसे में मामला पेचीदा हो गया है. कौन किस तरफ जाएगा, ये देखने वाली बात होगी.

19 जून को राज्यसभा चुनाव से ठीक दो दिन पहले मणिपुर में ये हलचल शुरू हुई.
19 जून को राज्यसभा चुनाव से ठीक दो दिन पहले मणिपुर में ये हलचल शुरू हुई.

अगर फ्लोर टेस्ट होता है, तो क्या होगा?

अयोग्य करार दिए गए एक विधायक और सात विधायक, जिन पर पाबंदी लगी है, उनको हटा दें, तो विधानसभा सीटों की संख्या 52 होती है. तब बहुमत के लिए 27 सीटों की ही ज़रूरत होगी. कांग्रेस 30 विधायकों का साथ होने का दावा कर रही है. अगर उसका दावा सही साबित होता है, तो ओकराम इबोबी सिंह की फिर से सत्ता में वापसी हो सकती है. हालांकि अब मामला राज्यपाल के हाथ में है.


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