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सुपरस्टार मामूटी की कहानी, जिन्होंने आम्बेडकर का रोल डरते-डरते किया और इतिहास बना डाला

साल था 1971. एक मलयालम फिल्म रिलीज़ हुई. नाम था ‘अनुभवंगल पालीचक्कल’. फिल्म में एक जूनियर आर्टिस्ट पहली बार कैमरा फेस करने जा रहा था. किसे पता था कि ये लड़का आगे चलकर मलयालम सिनेमा का टाइमलेस एक्टर बन जाएगा. ‘बिग एम’ के नाम से पुकारा जाएगा. वो एक्टर जिसने मोहनलाल के साथ करीब 50 फिल्मों में काम किया. तीन नैशनल अवॉर्ड, सात केरल स्टेट फिल्म अवॉर्ड्स और 13 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स अपने नाम किए. 1998 में उन्हें कला के क्षेत्र में दिए अपने योगदान की वजह से भारत सरकार ने पद्म श्री से भी सम्मानित किया.

06 अगस्त, 2021 को ‘अनुभवंगल पालीकचक्कल’ ने अपनी रिलीज़ के 50 साल पूरे किए. फिल्म की गोल्डन जुबिली के साथ उस जूनियर आर्टिस्ट ने भी सिनेमा में अपने 50 साल पूरे किए. जिसे हम सब आज मामूटी के नाम से जानते हैं. प्यार से, आदर से ममुक्का बुलाते हैं. बात करेंगे ममुक्का की करिश्माई जर्नी की. जिसने उन्हें इस देश के चहेते सितारों में से एक बना दिया. जिनके लिए मोहनलाल कहते हैं कि मामूटी का जन्म ही एक्टिंग के लिए हुआ है. साथ ही जानेंगे ममुक्का के करियर की कुछ डिफाइनिंग फिल्मों के बारे में.

Bharat Talkies


# घोड़े पर आते हीरो को देख एक्टर बनने की ठानी

तारीख 07 सितंबर, 1951. केरल के एक मध्यमवर्गीय परिवार में मुहम्मद कुट्टी का जन्म हुआ. पिता इस्माइल चावल की खेती और उसे बेचने का काम करते. वहीं उनकी मां फातिमा घर और बच्चों को संभालती. छह भाई-बहनों में सबसे बड़े मुहम्मद कुट्टी का बचपन बड़ा सामान्य था. स्कूल जाते. पढ़ाई करते. अपने दोस्तों के साथ समय बिताते. वही दोस्त जो उन्हें उनके नाम पर चिढ़ाते. मुहम्मद कुट्टी को लगातार बोल-बोल कर मामूटी कर देते. इसी मज़ाक और मसखरेपन के चलते मुहम्मद कुट्टी को अपने नाम से चिढ़ होने लगी. किसे पता था कि जिस नाम से बच्चे चिढ़ा रहे हैं. उसी नाम को दुनिया पलकों पर बिठाने वाली है.

Mamuty In Anubhavangal Palichakkal
मामूटी की पहली फिल्म का डिजिटली कलराइज़ किया गया शॉट.

उस समय मामूटी ने ऐसी किसी बात की कल्पना भी नहीं थी. क्योंकि नॉर्मल सी चलती उनकी लाइफ में कुछ आउट ऑफ द बॉक्स नहीं हुआ था. ज्यादातर एक्टर्स की बायोग्राफी खंगालेंगे तो एक बात कॉमन दिखेगी. कोई वाक्य जिसकी वजह से वो फिल्मों में आए. कोई फिल्म जिसने उनके मन पर अमिट छाप छोड़ दी. या कोई कलाकार जिसे देखकर मन किया हो कि यार, ऐसा ही बनना है बड़े होकर. मामूटी की लाइफ की स्टोरी में भी ऐसा मोमेंट आया. जब उन्होंने अपनी लाइफ की पहली फिल्म देखी. वो पहला सीन जो उन्हें जीवनभर याद रहा. हवा को चीरता हुआ एक घोड़ा दौड़ा चला आ रहा है. उस पर एक हीरो बैठा है. हीरो इसलिए क्योंकि हवा से उसकी टाई लहरा रही है. ये हीरो दौड़ते घोड़े पर से लपककर हीरोइन को बचा लेता है. बचपन में देखे इस सीन को देखकर मामूटी सब कुछ भूल गए. बस सवार थी तो एक धुन. उस घोड़े वाले हीरो जैसा बनने की धुन. लेकिन मामूटी की लाइफ किसी फिल्म का स्क्रीनप्ले नहीं थी. कि कोई जादू घट जाएगा. वो एक प्रैक्टिकल दुनिया में जी रहे थे. जहां पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी का रुख किया जाता है. रही बात उस घोड़े वाले हीरो की. तो मामूटी को याद नहीं कि वो कौन था. 2002 में करण थापर को दिए एक इंटरव्यू में मामूटी ने बताया कि उन्हें याद नहीं कि वो फिल्म कौन सी थी. साथ ही वो हीरो कौन था.


# पहला रोल, जिसका क्रेडिट नहीं मिला

मामूटी पढ़ाई के पायदान पर बढ़ते जा रहे थे. फिर भी दिल के एक कोने में एक्टिंग का कीड़ा घर कर चुका था. हीरो तो उन्हें बनना ही था. चाहे लाइफ के किसी भी पॉइंट पर हो. स्कूली पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. छुट्टी का समय था. उसी दौरान मामूटी को पता चला कि पास के एक इलाके में फिल्म की शूटिंग चल रही है. फिल्मों के नाम पर हमेशा उत्साहित रहने वाले मामूटी भी सैकड़ों लोगों की तरह शूटिंग देखने चले गए. सेट पर पहुंचकर पता चला कि फिल्म को उस दौर के फेमस डायरेक्टर के एस सेतुमाधवन बना रहे हैं. बस फिर क्या था. मामूटी की आंखें भी डायरेक्टर साब को खोजने लगीं. उन्हें लोकेट करने के बाद उनके पास पहुंचे. इतने बड़े डायरेक्टर के सामने उनकी ज़ुबान लड़खड़ा गई. हकलाकर पूछा कि क्या आप मुझे अपनी फिल्म में काम करने का मौका देंगे. सेतुमाधवन ने बिना ज्यादा सोचे अपनी हामी भर दी.

मामूटी का पहला सीन कड़ी धूप में शूट हुआ. सामने बड़े रिफ्लेक्टर्स लगे थे. हेवी लाइटिंग थी. जिसकी मामूटी को बिल्कुल भी आदत नहीं थी. लाइट के जोर से उन्होंने आंखें मींच ली. चूंकि ये एक इमोशनल सीन था, इसलिए सेतुमाधवन को लगा कि ये नया लड़का एक्टिंग करने की कोशिश कर रहा है. उन्होंने मामूटी को मना किया. कि तुम एक्टिंग मत करो. मामूटी ने अपना ब्लिंक एंड मिस किस्म का रोल पूरा किया. ये रोल बेहद छोटा था. इतना कि जब ये फिल्म 1971 में ‘अनुभवंगल पालीचक्कल’ के नाम से रिलीज़ हुई तब मेकर्स ने उन्हें क्रेडिट देने की जरुरत तक नहीं समझी. फिर भी छोटी-छोटी चीज़ों में बडी खुशी ढूंढ़नेवाले मामूटी के गांववालों ने उन्हें लोकल हीरो बना दिया.

Mamuti 2
मामूटी खुद को ‘एक्सीडेंटल लॉयर’ मानते हैं.

मामूटी मानते हैं कि उन्होंने सेतुमाधवन से जाकर बात की. और उस एक पल ने उनकी ज़िंदगी बदल दी. लेकिन अगर सेतुमाधवन मना कर देते तब भी मामूटी रुकने वाले नहीं थे. वो आगे किसी डायरेक्टर से काम मांगने जाते. तब तक अप्रोच करते जब तक उन्हें काम नहीं मिल जाता.


# स्टार बनने की शुरुआत

मामूटी एरणाकुलम के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से अपनी ग्रैजुएशन कर रहे थे. कॉलेज के आखिरी साल में थे कि उन्हें एक फिल्म का ऑफर आया. फिल्म थी ‘देवलोकम’. डायरेक्ट कर रहे थे एम टी वासुदेवन नायर. फिल्म की शूटिंग शुरू हुई. मामूटी को उम्मीद थी कि इस फिल्म से उन्हें इंडस्ट्री में ब्रेकथ्रू मिलेगा. लेकिन उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया. क्योंकि शूटिंग शुरू होने के कुछ दिन बाद ही फिल्म बंद हो गई. मतलब डिब्बा बंद और आज भी फिल्म का वही स्टेटस है. वसुदेवन ने मामूटी को निराश नहीं होने दिया. वो ‘विलकानंदु स्वपनांगल’ नाम की एक फिल्म पर बतौर राइटर काम कर रहे थे. उन्होंने मामूटी को इस फिल्म में काम करने का ऑफर दिया. मामूटी मान गए. रोल छोटा ही था. लेकिन ऐसा जिसने उनके एक्टर बनने की हसरत को पूरा कर दिया. मामूटी को लगा था कि फिल्म के बाद उन्हें छोटे-मोटे रोल ऑफर किए जाएंगे. तेजा डागा के भाड़े के टट्टू टाइप. लेकिन एक बार फिर उनका सोचना गलत साबित हुआ. क्योंकि उसके बाद उन्होंने 1980 में आई ‘मेला’ में काम किया.

बचपन से मामूटी अपने आप को परदे पर जिस हीरो के रूप में देखना चाहते थे. इस फिल्म में वो सारे एलिमेंट्स थे. उनका किरदार हीरो की तरह गाता. मोटरबाइक पर करतब दिखाता. फिल्म में मामूटी ने एक सपोर्टिंग किरदार निभाया. जिसे दर्शकों के बीच खूब पसंद किया गया. अब उन्हें किसी प्रड्यूसर या डायरेक्टर को अप्रोच करने की जरुरत नहीं थी. छोटा ही सही, पर उनके पास काम आने लगा था. मामूटी लगातार काम करते जा रहे थे. ‘मेला’ के बाद उन्होंने ‘स्पोदनम’ में काम किया. जिससे जुड़ा एक छोटा सा किस्सा है.

Deewar Wala Scene
दीवार कूदने वाला सीन जहां मामूटी को सुरक्षा नहीं दी गई.

फिल्म में शीला बतौर एक्ट्रेस काम कर रही थीं. उन्होंने बताया कि एक सीन में मामूटी और उनके साथी दो एक्टर्स को दीवार फांदकर दूसरी ओर जाना था. दीवार से गिरने का रिस्क था. इसलिए दूसरी ओर गद्दे बिछा दिए गए. लेकिन सिर्फ बाकी दोनों एक्टर्स के लिए. मामूटी के लिए नहीं. शीला ने इस भेदभाव पर प्रड्यूसर से बात की. प्रड्यूसर का दो टूक जवाब था कि ऐसे एक्टर्स तो आते जाते रहते हैं. आज ये है, कल यहां कोई और होगा. इतना बोलकर प्रड्यूसर ने खुद की हरकत को एक्सप्लेन करने की जरुरत नहीं समझी. मामूटी ने बिना गद्दे के अपना स्टंट किया. इस दौरान उनके पैर में चोट भी आई. फिर भी उन्होंने अपने हिस्से का शूट पूरा किया. आगे चलकर मामूटी सुपरस्टार बने. और जिस प्रड्यूसर ने उन्हें आती हवा जाती हवा समझा था, वो खुद उनके डेट्स लेने के लिए लाइन में सबसे आगे मिलता.

Mamuti In Mela 1
80 का दशक मामूटी के लिए गोल्डन डिकेड साबित हुआ.

80 का दशक मामूटी के लिए गोल्डन साबित हुआ. उसने उनकी फिल्मोग्राफी में ‘यवनिका’ और ‘पद्योत्तम’ जैसे नाम जोड़े. कुल मिला के वो इस दशक में पूरी तरह बिज़ी रहे. इतना कि 1982 से 1987 तक के पांच साल के अंतराल में उन्होंने करीब 150 फिल्में दे डाली. आज मामूटी की फिल्मोग्राफी में 400 के आसपास फिल्में हैं. जिनमें से अधिकतर उन्होंने एटीज़ में साइन की थी. इन फिल्मों की बदौलत उन्हें स्टारडम मिला. लेकिन इसका हर्जाना भी चुकाना पड़ा. हेक्टिक लाइफ के लिए अपनी पर्सनल लाइफ को कुर्बान करना पड़ा. लगातार बैक-टू-बैक शूटिंग करना उन्हें थका देता. उनके ऐसी हालत में शूटिंग करने का भी एक किस्सा है. वही आपको बताते हैं.


# जब चलते कैमरे के सामने सो गए

जोशी. मलयालम फिल्मों के डायरेक्टर हैं. अब तक करीब 75 से ज्यादा फिल्में बना चुके हैं. उन्होंने ममुक्का के साथ भी काम किया. ममुक्का के फैन्स मानते हैं कि उनके करियर की बेस्ट फिल्में में से ज्यादातर वो हैं, जिनमें उन्होंने जोशी के साथ काम किया. कहें तो दोनों के बीच मैजिकल पार्टनरशिप एस्टैब्लिश हो गई थी. लेकिन एक घटना के चलते इस पार्टनरशिप की नींव पड़ने से पहले ही ध्वस्त होने वाली थी. हुआ यूं कि 1983 में जोशी एक फिल्म पर काम कर रहे थे. ‘आ रात्रि’. लीड रोल में थे ममुक्का. ये वही फेज़ था जहां वो लगातार फिल्मों पर काम कर रहे थे. क्या सुबह और क्या रात.

Mamukka Sleeping 1
दिन राट शूट करने की वजह ममुक्का इतना थक गए कि खड़े-खड़े सो गए.

अपने दिनभर की शूटिंग निपटाकर ममुक्का रात को ‘आ रात्रि’ के सेट पर पहुंचे. उनका पहला सीन रात को ही शूट होना था. सेट रेडी था. जोशी ने उन्हें सीन समझा दिया. इस पॉइंट पर ममुक्का बुरी तरह थक चुके थे. वो बस अपना दिन खत्म करना चाहते थे. कैमरा ऑन हुआ. डायरेक्टर ने एक्शन चिल्लाया. लेकिन सामने खड़े ममुक्का ने कोई हरकत नहीं की. वो बस सीधे खड़े रहे. उनकी आंखें बंद थीं. थककर इतना चूर हो चुके थे कि खड़े-खड़े ही सो गए. ऐसा अनप्रोफेशनल बर्ताव देखकर जोशी तिलमिला गए. पैकअप का ऐलान किया और गुस्से में अपने रूम में चले गए. ममुक्का इस पूरे घटनाक्रम से बेखबर थे. अचानक से आंख खुली. देखा तो जोशी गायब थे. माज़रा समझते ज्यादा देर नहीं लगी. सीधा जोशी के कमरे की ओर दौड़े. अपनी व्यथा बताई. और उनसे माफी मांगी. जोशी मान गए और आगे फिल्म पर काम फिर से शुरू हुआ.


# सामने दो दिग्गज एक्टर्स को देख डायरेक्टर को एंडिंग बदलनी पड़ गई

हमने सुपरस्टार्स के कितने किस्से सुने हैं. उनकी राइवलरी के किस्से सुने हैं. कॉम्पिटिशन के किस्से सुने हैं. फिर चाहे वो राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की राइवलरी हो. दोनों सुपरस्टार्स आखिरी बार ऋषिकेश मुखर्जी की ‘नमक हराम’ में दिखाई दिए. वो फिल्म जिसकी एंडिंग दोनों ने अपने-अपने ढंग से बदलवाई. ताकि दोनों अपने फैन्स की नज़रों में बड़े बन सकें. नॉर्थ के सुपरस्टार्स से इतर मलयालम सुपरस्टार्स पर आते हैं. मोहनलाल और मामूटी. मलयालम सिनेमा के दो बिग एम. दोनों ने करीब 50 फिल्मों में साथ काम किया. इनके फैन्स आपस में भिड़ते रहते. लेकिन मामूटी और मोहनलाल के बीच कभी किसी किस्म की प्रतिस्पर्धा नहीं रही. एक हेल्दी कॉम्पिटिशन रहा. खुद को बेहतर करने का कॉम्पिटिशन. दोनों ने ‘हरीकृष्णनन्स’ नाम की फिल्म में काम किया. जिसे डायरेक्ट किया था फ़ाज़िल ने. जो फहद फ़ाज़िल के पिता हैं.

मामूटी के किरदार का नाम था हरी और मोहनलाल बने थे कृष्णन. दोनों वकील. मीरा नाम की लड़की के प्यार में पड़ जाते हैं. जिसका किरदार निभाया जूही चावला ने. आगे उसे इम्प्रेस करने की कोशिश करते हैं. कहानी क्लाइमैक्स तक पहुंचती है. जहां मीरा दोनों दोस्तों में से किसी एक को सिलेक्ट करती है. फ़ाज़िल मामूटी और मोहनलाल के स्ट्रॉंग फैन बेस से परिचित थे. जानते थे कि किसी एक किरदार की हैप्पी एंडिंग हुई तो दूसरे के फैन्स बरस पड़ेंगे. इसलिए उन्होंने बीच का रास्ता निकाला. फिल्म रिलीज़ हुई. तिरुवनंतपुरम के हॉल्स में फिल्म खत्म होने को आई. और हीरोइन ने कृष्णन का हाथ थाम लिया. लेकिन कोल्लम जिले में रिलीज़ हुई ‘हरीकृष्णनन्स’ का सीन अलग था. यहां 90 पर्सेन्ट फिल्म लगभग सेम थी. लेकिन एंड में मीरा कृष्णन की जगह हरि को चुन लेती है.

Shah Rukh Khan In Harikrishnans
फिल्म में शाहरुख जूही के लव इंटरेस्ट प्ले करने वाले थे, लेकिन लास्ट टाइम पर आइडिया ड्रॉप कर दिया गया.

फ़ाज़िल ने फिल्म को दो एंडिंग्स के साथ रिलीज़ कर दिया. ताकि दोनों सुपरस्टार्स के फैन्स के बीच झगड़े की गुंजाइश ही न बचे. फ़ाज़िल की इस स्ट्रैटेजी से फिल्म को फायदा भी हुआ. क्योंकि ‘हरीकृष्णनन्स’ उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली मलयालम फिल्म साबित हुई. फिल्म से जुड़ा एक और छोटा सा ट्रिविया बताते हैं. नाइंटीज़ में शाहरुख और जूही की जोड़ी सुपरहिट थी. यही सोचकर मेकर्स ‘हरीकृष्णनन्स’ में भी शाहरुख को अहम किरदार में रखना चाहते थे. शाहरुख भी इस कॉलेबोरेशन के लिए मान गए. उनके साथ प्रोमोशनल फोटोज़ भी शूट कर ली गईं. लेकिन अंत में किसी वजह से शाहरुख फिल्म का हिस्सा नहीं बन पाए.


# क्यों आंबेडकर का रोल नहीं करना चाहते थे मामूटी?

जब्बार पटेल. मराठी थिएटर और फिल्मों के डायरेक्टर. जातिप्रथा पर गुम चोट करती उनकी फिल्म ‘जैत रे जैत’ खोजकर देखनी चाहिए. नाइंटीज़ के आखिरी सालों की बात है. जब्बार बाबासाहेब आंबेडकर की कहानी को परदे पर दर्शाना चाहते थे. फिल्म को NFDC प्रड्यूस कर रही थी. जो चाहती थी कि फिल्म का स्केल रिचर्ड अटेनबोरो की ‘गांधी’ जैसा हो. जब्बार एक्टर्स की तलाश में जुट गए. 100 के करीब एक्टर्स को शॉर्टलिस्ट किया. उस लिस्ट में हॉलीवुड एक्टर रॉबर्ट डि नीरो का नाम भी था. रॉबर्ट खुद भी इस रोल को करने के लिए इच्छुक थे. लेकिन जब रॉबर्ट को बताया गया कि फिल्म के लिए उन्हें अपना अमेरिकन एक्सेन्ट छोड़कर इंडो-ब्रिटिश एक्सेन्ट अपनाना होगा, तब उन्होंने इस प्रोजेक्ट से दूरी बना ली. बहरहाल तलाश जारी रही. तभी एक दिन जब्बार की नजर एक मैगजीन पर पड़ी. जिसमें मामूटी का फोटो था. उन्होंने तभी डिसाइड कर लिया कि यही उनके आंबेडकर होंगे.

मामूटी को अप्रोच किया. लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया. उन्हें लगा कि वो किसी भी ऐंगल से आंबेडकर जैसे नहीं लगते. जब्बार ने इसका भी सॉल्युशन खोज निकाला. उन्होंने मामूटी की फोटो को डिजिटली स्कैन किया. और उससे उनकी मूंछें हटा दी. अब मामूटी काफी हद तक डॉक्टर आंबेडकर जैसे लग रहे थे. ये फोटो लेकर जब्बार उनके पास पहुंचे. किसी भी तरह उन्हें मना ही लिया. आगे जब्बार अपने एक इंटरव्यू में हंसते हुए बताते हैं कि अपनी मूंछों को कटवाने के डर से मामूटी ये रोल नहीं करना चाहते थे.

Mamuti As Ambedkar 1
या तो मामूटी आंबेडकर नहीं बनना चाहते थे, या फिर ऐसे बने कि लोग पांव छूने लगे.

ये रोल करते वक्त मामूटी के सामने एक बड़ा चैलेंज था. उस दौर से आंबेडकर की वीडियो फुटेज उपलब्ध नहीं थी. जिससे उनके हाव-भाव, चाल और बोलने के लहज़े को स्टडी किया जा सकता. उन्होंने आंबेडकर के बारे में रिसर्च की और जितना कुछ उनके बारे में लिखा गया था, उसे समझकर अपने किरदार में ढाला. मामूटी को चिंता थी कि जनता उनके आंबेडकर को शायद एक्सेप्ट नहीं कर पाए. लेकिन उनकी सारी चिंताएं हवा हो गईं. जब नागपुर में फिल्म की शूटिंग शुरू हुई तो आंबेडकर बने मामूटी को देखने लोगों की भीड़ जमा हो गई. लोग उन्हें देखकर हैरानी में थे. शूटिंग खत्म होने के बाद उनके पास आकर लोग उनके पांव तक छूते. जब बाबासाहेब आंबेडकर की पत्नी ने मामूटी को देखा तो वो भी अचंभित रह गईं.

फिल्म शुरू होने से पहले जब्बार ने मामूटी से वादा किया था कि ये रोल उनके करियर के यादगार रोल्स में से एक होगा. ऐसा ही हुआ भी. रिलीज़ के बाद फिल्म ‘डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर’ और मामूटी के हिस्से सिर्फ तारीफ़ें ही आईं. यहां तक कि उन्हें अपने करियर के तीसरे नैशनल अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया.


# करियर की बेस्ट फिल्में

मामूटी ने अपने करियर में मलयालम समेत तमिल, तेलुगु, कन्नड, इंग्लिश और हिंदी भाषी फिल्मों में भी काम किया है. हालांकि, उनकी इकलौती हिंदी फिल्म थी 1993 में आई ‘धरतीपुत्र’. उनकी लंबी-चौड़ी फिल्मोग्राफी में से हमने उनकी कुछ यादगार फिल्में चुनी हैं. संभावना नहीं बल्कि हमें पूरा यकीन है कि हमसे बहुत सारे नाम छूटे हैं. अपने बचाव में बस यही कहेंगे कि ममुक्का के करियर का कैनवास इतना बड़ा है कि सबको एक जगह समेटना मुमकिन नहीं.

#1. न्यू दिल्ली

सूरज चाहे आकाश की ऊंचाइयां क्यों न नाप ले, पर दिन खत्म होने पर उसे ढलना ही पड़ता है. एक्टर्स के केस में भी कुछ ऐसा ही होता है. जितनी जल्दी फेम आती है. कई बार उतनी ही जल्दी जाने भी लगती है. एटीज़ का दशक मामूटी के लिए सुनहरा दशक था. लेकिन इसी एटीज़ ने उन्हें उनके करियर का सबसे बुरा दौर भी दिखाया. जब उनकी फिल्में लगातार फ्लॉप होने लगीं. एटीज़ के मिड में वो एक साल में करीब 30 फिल्में दे रहे थे. लेकिन इनमें से ज्यादातर को जनता नकार रही थी. वजह थी मामूटी का स्टीरियोटिपिकल रोल्स प्ले करना. वो हर दूसरी फिल्म में बिज़नेसमैन या मार-धाड़ करने वाले हीरो बने दिखते. जनता का नेगटिव रिस्पॉन्स देख अब उन्हें जरुरत थी एक बड़े कमबैक की. जो उन्हें दिया डायरेक्टर जोशी ने. अपनी फिल्म ‘न्यू दिल्ली’ के जरिए. फिल्म एक बडी कमर्शियल सक्सेस साबित हुई और मामूटी के करियर के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई.

Jeetendra In New Delhi
फिल्म के हिंदी रीमेक में मामूटी का रोल जीतेंद्र ने निभाया था.

आगे चलकर जोशी ने इसी टाइटल से फिल्म को हिंदी में भी बनाया. जहां मामूटी वाला रोल जीतेंद्र ने निभाया.


#2. मदिलुकल

ब्रिटिश राज के दौरान लेखक और स्वतंत्रता सेनानी वैकम मुहम्मद बशीर जेल में रहे. वहां हुए अपने अनुभव को उन्होंने एक आत्मकथा का रूप दिया. जो इस फिल्म का आधार बनी. जेल में मेल और फीमेल कैदियों के बीच एक बडी दीवार थी. फिल्म का टाइटल यानी मदिलुकल का मतलब भी दीवार ही होता है. बशीर की एक महिला कैदी से बातचीत शुरू हो जाती है. दोनों एक दूसरे को कभी देख नहीं पाते. फिर भी दोनों के बीच प्यार पनपने लगता है. आगे फिल्म के बारे में कुछ नहीं बताएंगे. बस इतना कि इसके क्लाइमैक्स को भूलना आसान नहीं. फिल्म यूट्यूब पर है. वो भी इंग्लिश सब्टाइटल्स के साथ. ऐसा सिनेमा देखना चाहते हैं जो आपके ज़ेहन में बस जाए तो इस फिल्म को जरुर देखिए.

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मस्ट, मस्ट वॉच फिल्म.

इंडियन मेनस्ट्रीम सिनेमा से इतर पैरेलल सिनेमा मूवमेंट का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे अदूर गोपालकृष्णन ने फिल्म को डायरेक्ट किया था. फिल्म में अपने काम के लिए मामूटी ने बेस्ट एक्टर का नैशनल अवॉर्ड भी जीता. मामूटी को अपना अगला नैशनल अवॉर्ड भी अदूर गोपालकृष्णन की फिल्म के जरिए ही मिला. फिल्म थी 1994 में आई ‘विधेयन’.


#3. थलपति

इंडियन सिनेमा के दो मजबूत स्तंभ रजनीकान्त और मामूटी यहां एक साथ थे. फिल्म को डायरेक्ट किया था ‘नायकन’, ‘इरुवर’ और ‘रोजा’ जैसी फिल्में बना चुके मणि रत्नम ने. महाभारत के पात्र दुर्योधन और कर्ण की दोस्ती को बेस बनाकर रची गई ये फिल्म एक बडी सक्सेस साबित हुई. करीब 3 करोड़ रुपए की लागत में बनी ‘थलपति’ उस समय तक साउथ इंडिया में बनी सबसे महंगी फिल्म थी. मामूटी ने तमिल सिनेमा में जितना भी काम किया, उसमें से ‘थलपति’ एक लैंडमार्क फिल्म साबित हुई.


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