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मलिक मीर सुल्तान खान, भारत का वो शतरंज खिलाड़ी जिसकी कहानी भुला दी गई

आजादी से पहले भारत ने खेलों में केवल 4 बार धमाल मचाया था. हमारी हॉकी की टीम ने 1928, 1932 और 1936 में ओलंपिक का गोल्ड मेडल जीता था. और मोहन बागान ने 1911 में फुटबॉल में ईस्ट यॉर्कशायर रेजीमेंट को हराकर इतिहास रचा था. गुलामी के अंधेरे में ये ऐतिहासिक जीतें सितारा बनकर चमकी थीं. लेकिन भारत का दुर्भाग्य कह लीजिए, एक अपार प्रतिभाशाली भारतीय की कहानी छुपी की छुपी ही रह गयी.

ये कहानी है एशिया के पहले ग्रैंडमास्टर माने जाने वाले मलिक मीर सुल्तान खान की.

ब्रिटेन के चेस चैंपियन विलियम विंटर ने लिखा है,

एक मैच चल रहा था. ऑस्ट्रेलिया के इंटरनेशनल विनर हैन्स केमौच चिढ़ रहे थे. उनके सामने मीर सुल्तान बैठे थे. केमौच उनसे जितने भी सवाल पूछ रहे थे, मीर उसके जवाब में सिर्फ मुस्करा देते थे. केमौच झल्लाकर बोले कि ये आदमी कौन सी भाषा समझता है यार? उस वक्त मैंने बोला कि सिर्फ शतरंज की भाषा. और इसके कुछ ही देर बाद मीर की चालों के सामने मौच को हार माननी पड़ी.

ब्रिटिश चैंपियनशिप ट्राफी के साथ मीर सुल्तान, 3 सितंबर 1932 की फोटो
ब्रिटिश चैंपियनशिप ट्राफी के साथ मीर सुल्तान, 3 सितंबर 1932 की फोटो

शतरंज उनकी खून में था

मलिक मीर सुल्तान खान. वो न मीर थे, न ही सुल्तान, और न ही मलिक. वो एक घरेलू नौकर थे. उन्हें पंजाबी के अलावा और कोई भाषा नहीं आती थी. वो एक मेजर जनरल की हवेली में छोटे-मोटे काम करते थे. उन्होंने 9 साल की उम्र में अपने पिता से शतरंज खेलना सीखा था.

मलिक मीर यूनाइटेड पंजाब प्रोविंस के सरगोधा में पैदा हुए थे. वो उस वक्त भारत में था. उन्होंने सरगोधा में ही अपनी आखिरी सांसें भी गिनीं. सरगोधा अब पाकिस्तान का हिस्सा है.

29 दिसंबर 1930 की तस्वीर, मिशेल हेस्टिंग्स के साथ खेलते मीर सुल्तान
29 दिसंबर 1930 की तस्वीर, मिशेल हेस्टिंग्स के साथ खेलते मीर सुल्तान

मीर सुल्तान को हरा पाना किसी के बस की बात नहीं थी

मीर सुल्तान ने 1928 में ऑल इंडिया चैंपियनशिप जीत ली थी. शतरंज में उनकी इस काबिलियत को देखते हुए 1929 में सर उमर हयात खान उन्हें इंग्लैंड आ गए. इसके बाद से ही शतरंज की दुनिया में भूचाल आ गया. वो 4 साल इंग्लैंड में रहे. इस दौरान उन्होंने दुनिया के कई शतरंज मास्टरों को पटखनी दे दी. उन्होंने दो बार ब्रिटिश चैंपियनशिप जीती. मीर सुल्तान पढ़े-लिखे नहीं थे, न ही उन्हें अंग्रेजी आती थी. ऐसे में उनके लिए वर्ल्ड चेस के नियमों को समझना काफी मुश्किल था.

ग्रैंड मास्टर अलेक्जेंडर एलेकाइन और होजे कैपाब्लांका दुनिया के सबसे महान शतरंज खिलाड़ी माने जाते थे. मीर सुल्तान ने उनको भी हरा दिया था. इसके बावजूद वर्ल्ड चेस फेडेरेशन ने उन्हें एक भी ग्रैंडमास्टर टाइटल से नहीं नवाजा. हालांकि उनके समकक्ष शतरंज खिलाड़ियों ने उन्हें हमेशा एक ग्रैंडमास्टर ही माना. डेविड हूपर और नीथ व्हाइल्ड ने उन्हें मॉडर्न दौर का सबसे महान खिलाड़ी बताया था, जिसके खून में ही शतरंज था. 

सर उमर हयात खान के साथ मीर सुल्तान
सर उमर हयात खान के साथ मीर सुल्तान

मुफलिसी में जीता रहा शतरंज का हीरा

अमेरिका के ग्रैंडमास्टर रूबन फाइन ने मीर सुल्तान से अपनी मुलाकात का जिक्र अपनी किताब में किया है,

‘हम जब महाराजा मलिक उमर हयात खान के महल में पहुंचे. उन्होंने उनका स्वागत करते हुए कहा, ‘आप बहुत लकी हैं कि हम आपसे मिल रहे हैं. वरना इस वक्त मैं अपने कुत्तों के साथ वक्त बिता रहा होता.’ इसके बाद उन्होंने हमें एक बुकलेट थमा दी, जिस पर महाराजा की जिंदगी के बारे में लिखा था. तब तक हम समझ चुके थे कि महाराजा के नाम पर उनके मुकुट में हीरे ही थे, वो दिल से महाराजा नहीं थे. फिर हमने मीर सुल्तान को देखा, जो हमारे असल मेजबान थे. महाराजा उनके साथ गुलामों जैसा बर्ताव कर रहे थे. हम बड़ी ऊहापोह में थे. शतरंज का बादशाह हमारे सामने वेटर बना खड़ा था.’

सुल्तान के बड़े बेटे के मुताबिक, अब्बा ने उनको कभी शतरंज नहीं खेलने दिया. वो कहते थे कि शतरंज खेलने से अच्छा तुम कुछ काम की चीज कर लो. उनकी ये बात दुनिया भर में शतरंज को चाहने वाले, खेलने वाले लोगों की नाकामयाबी है.

7 अगस्त 1955 के टाइम्स ऑफ इंडिया के पेज नं. 7 पर मीर सुल्तान पर छपा फीचर
7 अगस्त 1955 के टाइम्स ऑफ इंडिया के पेज नं. 7 पर मीर सुल्तान पर छपा फीचर

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