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माली में हुए तख़्तापलट के पीछे की पूरी कहानी

कल रात जब आप सो रहे थे, तब एक देश में तख़्तापलट हो गया. उस देश की सेना ने अपनी ही सरकार के खिलाफ़ हथियार उठा लिए. देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को बंदी बना लिया गया. इसके बाद ख़बर आई कि राष्ट्रपति ने इस्तीफ़ा दे दिया है. ये कहकर कि उनके पास और चारा ही क्या है. क्या है ये मामला, विस्तार से बताते हैं आपको.

मधुबाला और किशोर कुमार की एक फिल्म है- झुमरु. इसमें एक मज़ेदार गाना है- गेगेगे गेली ज़रा टिंबकटू. ये हंसी-हंसी का गाना था. ऐसे में लोगों के बीच टिंबकटू किसी चुटकुले की तरह चल निकला. कई फिल्मी डायलॉग्स और गानों में भी इसका ज़िक्र आया. मसलन, गोविंदा की फिल्म भाग्यवान में एक सॉन्ग है- अक्कड़ बक्कड़ टिंबकटू, यू लव मी ऐंड आई लव यू.

क्या आपने कभी सोचा कि ये टिंबकटू क्या है?

ये असल में एक शहर है. कहां? अफ्रीका के देश ‘रिपब्लिक ऑफ माली’ में. 18 अगस्त को इसी माली में सरकार का तख़्तापलट हो गया. इससे पहले भी माली में तीन बार तख़्तापलट हो चुका है. एक लाइन में समझिए तो इन्हीं तख़्तापलटों ने माली की कहानी लिखी है. कभी इन्होंने हालात संवारे, तो कभी बिगाड़े. कैसे, ये बताने के लिए शुरू से शुरू करते हैं.

माली
माली देश के एक शहर का नाम है टिंबकटू. लाल घेरे में माली देश. (गूगल मैप्स)

1898 से लेकर 1960 तक माली फ्रांस का ग़ुलाम था. तब इसको कहते थे फ्रेंच सूडान. 1960 में आज़ादी मिलने पर इसने अपना नाम बदलकर रखा- माली. चीन की तरह यहां भी वन पार्टी सिस्टम बना. ये सिस्टम ख़त्म हुआ 1968 में. इस बरस हुआ माली का पहला तख़्तापलट. ये तख़्तापलट अपने साथ तानाशाही लेकर आया. लेफ़्टिनेंट मूसा ट्राओरे बन गए देश के डिक्टेटर.

इस तानाशाही व्यवस्था से माली को मुक्ति मिली 1991 में. इस बरस फिर से माली की सेना ने तख़्तापलट किया और ट्राओरे से गद्दी छीन ली. इसके बाद माली में आया लोकतंत्र. 1992 में यहां पहली बार लोकतांत्रिक चुनाव हुए. 1992 से 2011 तक डेमोक्रेसी की ये व्यवस्था चलती रही.

लेफ़्टिनेंट मूसा ट्राओरे
लेफ़्टिनेंट मूसा ट्राओरे बन गए देश के पहले डिक्टेटर. (एएफपी)

हालात बिगड़े 2012 में. कैसे?

इसका जवाब है लीबिया. यहां के तानाशाह थे मुअम्मर गद्दाफ़ी. फरवरी 2011 में उनके खिलाफ़ सिविल वॉर शुरू हुआ. उसमें लड़ने के लिए अगल-बगल के देशों से भी लोग गए. इनमें माली के भी लोग थे. लीबियन सिविल वॉर ख़त्म होने के बाद ये लोग माली वापस लौटे. लौटने के बाद इन्होंने माली में भी टेंशन बढ़ाई. देखते ही देखते माली में कई मिलिशिया ग्रुप्स बन गए. इस अराजकता का फ़ायदा उठाया तुआरेग जनजाति के लड़ाकों ने. ये तुआरेग पहले भी समय-समय पर हिंसा करते आए थे. जनवरी 2012 में इन विद्रोहियों ने उत्तरी माली में नया देश बनाने का ऐलान कर दिया.

मुअम्मर गद्दाफ़ी
लीबिया के तानाशाह थे मुअम्मर गद्दाफ़ी. (एएफपी)

इस वक़्त माली के राष्ट्रपति थे अमादू तोमानी. वो इस विद्रोह को ठीक से हैंडल नहीं कर पा रहे थे. ऐसे में हुआ एक और तख़्तापलट. मार्च 2012 में माली की सेना ने राष्ट्रपति तोमानी को सत्ता से बेदखल कर दिया. ये बड़ी अफ़रातफ़री की स्थिति थी. एक तरफ तो माली में सिविल वॉर के हालात थे. दूसरी तरफ, अल-क़ायदा समेत कई आतंकी संगठनों ने यहां पैठ बना ली थी. इनसे निपटने के लिए माली को राजनैतिक स्थिरता चाहिए थी. ऐसे में माली के पड़ोसी देशों ने बीच-बचाव किया. उनके ज़ोर बनाने पर माली की सेना ने एक सिविलियन गवर्नमेंट को पावर सौंप दी.

तुआरेग समुदाय का लड़ाका
तुआरेग जनजाति का एक लड़ाका. (एएफपी)

क्या इसके बाद हालात ठीक हो गए माली में?

जवाब है, नहीं. माली की सरकारें बहुत टाइम से एक ग़लती करती आ रही थी. इनका सारा ध्यान देश के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से पर था. क्यों? क्योंकि यहां हैं सोने की खदानें. सोना और कपास, ये ही दो चीजें माली की इकॉनमी का आधार हैं. ऐसे में कुछेक इलाकों को छोड़कर बाकी माली उपेक्षित था. इस असंतोष ने इस्लामिक कट्टरपंथियों के हाथ मज़बूत किए. अलगाववादी तुआरेग विद्रोहियों ने भी इनसे हाथ मिला लिया. उत्तरी माली का एक बड़ा हिस्सा इनके हाथ में आ गया.

इन लड़ाकों का अगला निशाना थी राजधानी बमाको. माली की सरकार अकेले इनसे निपटने की स्थिति में नहीं थी. ऐसे में उन्होंने माली के पुराने मालिक फ्रांस से मदद मांगी. फ्रांस ने माली की मदद के लिए अपनी सेना भेजी. संयुक्त राष्ट्र ने भी अपनी पीसकीपिंग फोर्स को माली भेजा. इन्होंने कई अहम शहरों को लड़ाकों के कब्ज़े से निकाला. इस लड़ाई-झगड़े के बीच ही सितंबर 2013 में माली में चुनाव करवाया गया. इसमें जीतकर राष्ट्रपति बने इब्राहिम बोबकार केटा. इनका नाम याद रखिएगा. ये हमारी आज की कहानी के एक बड़े पात्र हैं.

इब्राहिम बोबकार केटा
2013 माली चुनाव में जीतकर राष्ट्रपति बने इब्राहिम बोबकार केटा. (एएफपी)

चुनाव हुए. नई सरकार बनी. इस सरकार ने तुआरेग अलगाववादियों से बातचीत शुरू की. 2015 में तुआरेग और सरकार के बीच एक शांति समझौता हुआ. इस पीस अग्रीमेंट से तुआरेग अलगाववादी तो शांत हो गए, मगर आतंकियों और बाकी मिलिशिया ग्रुप्स से लड़ाई जारी रही. कभी वहां किसी होटेल पर आतंकी हमला होता. कभी ख़ुद को ऐंटी-जिहादी कहने वाले लड़ाके दूसरे समुदाय के लोगों का क़त्ल करते. क़त्ल हो रहे समुदाय के लोग भी जवाबी हिंसा करते. पूरे माली में मार-काट मच गई.

इसी मार-काट के बीच 2018 में फिर से हुआ राष्ट्रपति चुनाव. इब्राहिम बोबकार केटा फिर से राष्ट्रपति चुने गए. विपक्षी पार्टियों ने उनपर चुनावी धांधली का आरोप लगाया. मगर फिर भी केटा पद पर बने रहे.

अब कहानी को करते हैं फास्ट फॉरवर्ड और आते हैं 2020 पर

क्या हुआ इस साल? इस साल मार्च 2020 में माली के संसदीय चुनाव हुए. इसमें बड़ी गड़बड़ियां हुईं. मसलन, वोटिंग से तीन दिन पहले विपक्षी नेता सोमाइला सिसे अगवा कर लिए गए. इसके अलावा कई चुनावी अधिकारी और कम्यूनिटी लीडर्स की भी किडनैपिंग हुई. गड़बड़ी इतनी ही नहीं हुई. अप्रैल 2020 में एक अदालत ने 31 विपक्षी उम्मीदवारों के नतीजे भी पलट दिए. इससे विपक्ष की सीटें घट गईं और केटा की पार्टी ‘रैली फॉर माली’ की सीटें बढ़ गईं.

सोमाइला सिसे
विपक्षी नेता सोमाइला सिसे. (एएफपी)

एक तरफ ये चुनावी गड़बड़ियां. ऊपर से राष्ट्रपति केटा पर पहले से लग रहे भ्रष्टाचार और निरंकुशता के आरोप. और इन सबके ऊपर कोरोना के कारण पहले से बदतर हुई इकॉनमी. इन सारी वजहों से केटा के प्रति नाराज़गी बढ़ गई. इसी बैकग्राउंड में 5 जून, 2020 से शुरू हुआ केटा के खिलाफ़ जनविद्रोह. कहां? राजधानी बमाको में. ये प्रोटेस्ट कहलाया जून 5 मूवमेंट. जल्द ही ये मूवमेंट हिंसक हो गया. बढ़ते विरोध के बीच राष्ट्रपति ने विपक्ष से सुलह करने की कोशिश की. उन्हें सरकार में शामिल होने का प्रस्ताव दिया. मगर विपक्ष नहीं माना. उसने कहा कि जब तक केटा इस्तीफ़ा नहीं देते, वो प्रदर्शन करते रहेंगे.

जून 5 मूवमेंट
जून 5 मूवमेंट. (एपी)

इन्हीं विरोधों के बीच 18 अगस्त को माली से आई एक और तख़्तापलट की ख़बर. क्या हुआ इस दिन? राजधानी बमाको से करीब 15 किलोमीटर दूर काटी नाम का एक शहर है. यहां माली की सेना का एक बड़ा कैंप है. 18 अगस्त की दोपहर इसी बेस पर माली सेना के धड़े ने बग़ावत कर दी.

काटी आर्मी बेस पर कब्ज़े के बाद सेना के ये लोग राजधानी बमाको पहुंचे. यहां राष्ट्रपति का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों ने इनका स्वागत किया. पूरे शहर में जुलूस निकालने के बाद आर्मी के लोग राष्ट्रपति के घर पहुंचे. यहां राष्ट्रपति केटा के अलावा प्रधानमंत्री बूबू सीसे भी मौजूद थे. आर्मी ने इन दोनों को बंदी बना लिया. आधी रात के समय राष्ट्रपति केटा सरकारी टीवी चैनल के मार्फ़त अपने इस्तीफ़े का ऐलान करने आए. उन्होंने कहा-

पिछले सात बरस से मैं इस देश को मज़बूत बनाने की कोशिश कर रहा था. मगर आज हमारी सेना के एक हिस्से ने दखलंदाज़ी करने की ज़रूरत समझी. क्या मेरे पास पद छोड़ने के अलावा कोई विकल्प है? मैं पद पर बने रहने के लिए कोई ख़ून-ख़राबा नहीं चाहता.

काटी शहर और विद्रोह
काटी शहर है और माली सेना के सैनिक. (एपी)

इस तख़्तापलट के बाद क्या हो रहा है माली में?

वहां सेना ने देश की सीमा सील कर दी है. केटा का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारी जश्न मना रहे हैं. तख़्तापलट में शामिल सैनिक ख़ुद को जनता का मुक्तिदाता बता रहे हैं. इन सैनिकों का पक्ष बताने के लिए माली वायुसेना के डेप्युटी चीफ टीवी पर आए. उन्होंने कहा-

हम सत्ता पर कब्ज़े के लिए नहीं आए हैं. हमारा मकसद केवल इस देश को स्थिरता देना है. हम इस देश की जनता के साथ हैं. हम सब मिलकर इस देश को वापस इसका खोया हुआ मकाम दिलाएंगे. एक तयशुदा समय में चुनाव करवाए जाएंगे, ताकि माली को मज़बूत सरकार मिले. ऐसी सरकार, जो बेहतर कामकाज कर सकेगी. जनता का भरोसा जीत सकेगी.

सेना के डेप्युटी चीफ
सैनिकों का पक्ष बताने के लिए माली सेना के लोग टीवी पर आए. (एपी)

बाकी देशों की क्या प्रतिक्रिया रही इस घटना पर?

फ्रांस और यूरोपियन यूनियन समेत ज़्यादातर देशों ने इस तख़्तापलट की आलोचना की है. संयुक्त राष्ट्र ने भी इसकी निंदा की है. इस घटनाक्रम पर 19 अगस्त को सिक्यॉरिटी काउंसिल एक इमरजेंसी बैठक भी करने वाला है.

यूरोपियन यूनियन
यूरोपियन यूनियन समेत ज़्यादातर देशों ने इस तख़्तापलट की आलोचना की है. (एपी)

2012 के तख़्तापलट ने इस्लामिक आतंकवादी संगठनों को माली में जमने का मौका दिया. इसका असर केवल माली पर ही नहीं पड़ा. अल्जीरिया, निज़ेर, बुरकिना फासो और मॉरिशानिया जैसे उसके पड़ोसी देशों में भी आतंकवाद एक्सपोर्ट हुआ. पड़ोसियों को डर है कि कहीं माली के हालात और बदतर न हो जाएं. अगर ऐसा हुआ, तो केवल पश्चिमी अफ्रीका पर असर नहीं पड़ेगा. बल्कि इससे सटे यूरोपीय देशों के लिए भी ख़तरा पैदा हो जाएगा. शॉर्ट में मतलब ये समझिए कि माली में होने वाली इस तरह की कोई भी घटना अकेले माली की दिक्कत नहीं है. एक चौथाई दुनिया इसके चपेटे में आ सकती है.


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