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सीक्रेट पन्नों में छुपा है पुरी के रथ बनने का फॉर्मूला, जो किसी के हाथ नहीं आता

हर साल पुरी से श्री जगन्नाथ और उनके भाई-बहन बलभद्र और सुभद्रा की रथ यात्रा निकाली जाती है. ये हिंदुओं के लिए बहुत बड़ा पर्व होता है. हर साल लकड़ी के 3 नए रथ बनाए जाते हैं. श्रीमंदिर के देवी-देवताओं को इन रथों पर बैठाकर गुंडिचा मंदिर ले जाया जाता है. दो हफ्ते बाद इन्हें सारी रस्में खत्म करके वापस लाया जाता है. रथ कब से बनने शुरू हुए, इसकी कई कहानियां फेमस हैं. जिन्हें आप नीचे पढ़ सकते हैं. इनमें कौन सी लकड़ी इस्तेमाल होगी, रथ के अलग-अलग हिस्सों का साइज़ क्या रहेगा, सब फिक्स है.

स्कॉलर्स कहते हैं कि कुछ ऐसे टेक्स्ट हैं, जिनमें रथ बनाने के फंडे लिखे हुए हैं. जैसे- मनसिर, अपराजिता पुछ, शुल्व सूत्र, विश्वकर्मिया रथ निर्माण पद्धति, गृह कर्णिका और शिल्प सार संगृह. हालांकि जो आर्टिस्ट अब रथ बनाते हैं, उन्हें इन टेक्स्ट में लिखे प्रोसेस का कुछ नहीं पता. वो बस अपने ट्रेडिशनल ज्ञान का इस्तेमाल करते हैं.

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कुछ लोग मानते हैं कि रथ बनाने का बेसिक आइडिया ‘रथ निर्माण पद्धति’ से लिया गया है. इस टेक्स्ट की कोई भी कॉपी पब्लिक के लिए नहीं है. लेकिन माना जाता है कि ये टेक्स्ट रथ बनाने वालों में एक जनरेशन से दूसरे जनरेशन को दिए जाते हैं. ये डाउटफुल है कि ऐसा कोई टेक्स्ट आज के टाइम पर है भी या नहीं. लेकिन एक स्टेंडर्ड साइज़ है जिसे बहुत पहले से फॉलो किया जा रहा है.

वसंत पंचमी, सरस्वती माता की पूजा का दिन. इस दिन से रथ बनने शुरू होते हैं, यानी फरवरी के महीने से. वसंत पंचमी के चार महीने बाद रथ यात्रा निकलनी होती है. इसी दिन पहली बार रथ के लिए लकड़ी लाई जाती है. इससे पहले टेंपल ऑफिस की एक टीम, जिन्हें ‘महाराणा’ कहते हैं, वो उन पेड़ों का सलेक्शन करते हैं, जिनकी लकड़ी से रथ तैयार करने होते हैं. ये लकड़ी ऐसे ही कहीं से भी उठाकर नहीं लाई जाती. ओडिशा के दसपल्ला ज़िले से ही पेड़ चुने जाते हैं. सबसे पहले बाड़ा रौला ठकुराइन के मंदिर जाकर उनकी पूजा की जाती है. ये गांव की देवी हैं. पहला पेड़ काटने से पहले ये उस जगह पर छोटी सी पूजा करते हैं.

A Hare Krishna devotee is seen aboard a chariot during the Rathayatra Chariot Carnival in London, June 20, 2004. The traditional Jagannath Ratha Yatra is a celebration over 5000 years old, observed in the ancient holy city of Jaganath Puri in Orissa, India making it the oldest street festival in the world. The festival first came to London in 1969, where it has been faithfully observed every year since. REUTERS/David Bebber BEB/DBP/CRB

हर चीज़ का ध्यान रखा जाता है. इसलिए इन पेड़ों के तनों का साइज़ भी स्टैंडर्ड होता है. कुछ को काट-छांटकर सही किया जाता है. बाकियों को टेंपल ऑफिस के पास लाया जाता है. बांस की लकड़ी पर, नारियल के पत्ते डालकर टेंट सा तैयार किया जाता है. इसी के अंदर रथ के अलग-अलग हिस्से तैयार होते हैं. इस पूरी जगह को ‘रथ खाल’ या ‘महा खाल’ कहते हैं. अक्षय तृतीया के दिन रथ बनने शुरू होते हैं. इसलिए इससे पहले-पहले सारी लकड़ियां आनी ज़रूरी हैं.

जिस दिन से रथ बनने शुरू होते थे, उसी दिन से चंदन यात्रा भी शुरू होती है. कटे हुए तीन तनों को टेंपल ऑफिस के बाहर रखा जाता है. पंडित तनों को धोते हैं, मंत्र पढ़ते हैं और भगवान पर चढ़ाई गई माला इन पर डाल देते हैं. कारपेंटरों का चीफ इन तीनों तनों पर चावल और नारियल चढ़ाता है. इसके बाद वन यज्ञ होता है. वन यज्ञ के बाद, पंडित एक चांदी की कुल्हाडी तनों से टच कराते हैं. इस तरह ये रस्म पूरी हो जाती है.

रथ को हमेशा ‘विश्वकर्मा सेवक’ कहलाने वाले लोग बनाते हैं. शुरू से ही उनके पूर्वज रथ तैयार करते आए हैं. हालांकि रथ बनाने में बहुत सारे कलाकारों का हाथ होता है. ये अलग-अलग काम संभालते हैं और उसके अकॉर्डिंग ही इन्हें अलग-अलग कैटेगरी में भी बाटा गया है.

1. गुणकार:                                         ये साइज़ वगैरह देते हैं.
2. पहि महाराणा:                                पहिए के मेन हिस्से फिक्स करते हैं.
3. कमर कंट नायक/ओझा महाराणा: ये कील, पिन, बाकी लोहे की चीज़े तैयार करते हैं.
4. चंदाकार:                                          बाकी के मेन पार्ट्स इकट्ठा करने और उन्हें लगाने का काम करते हैं.
5. रूपकार और मूर्तिकार:                   रथ में लगाने के लिए लकड़ी को सही शेप में काटने का काम करते हैं.
6. चित्रकार:                                        लाइनें बनाते हैं और बाकी की चित्रकारी करते हैं. साथ ही रथ के पार्ट्स पर पेंट भी यही करते हैं.
7. सुचिकार/ दरजी सेवक:                  सजावट के लिए जितने भी कपड़े तैयार करने होते हैं, ये वो सब करते हैं.
8. रथ भोई:                                         ये बाकी मजदूरों वाले काम करते हैं, ताकि दूसरे आर्टिस्टों को मदद हो सके. इनके लीडर को भोई सरदार कहते हैं.

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इस स्टोरी के लिए इनपुट सुभाष पाणी’ की बुक ‘रथ यात्रा’ से लिए गए हैं.

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‘रथ यात्रा’ बुक का कवर

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