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हर दो मिनट पर फोन चेक करते हो तो खतरे की घंटी बज चुकी है!

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vineet singh विनीत दी लल्लनटॉप के रीडर और पक्के वाले दोस्त हैं. बलिया से हैं. जहां से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे. उन्हीं ने देवस्थली विद्यापीठ स्कूल खोला था जिस स्कूल में पढ़े हैं विनीत. आजकल मुंबई में रहते हैं और वहीं से दुनिया देख रहे हैं. अपने देखे सुने का तमाम एक्सपीरिएंस लल्लन के साथ भी बांटते हैं. अपने दोस्त मकालू से परेशान रहते हैं, उसके किस्से भेजते हैं. आप भी पढ़िए.


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आज मेरा मूड ठीक नही था, आफिस में भी काम में मन नही लग रहा था. अजीब सी बेचैनी थी, बहुत झुंझलाहट हो रही थी, सीने में भी कुछ भारीपन सा था, अब आपको लगेगा की कोई वजह जरूर होगी इसके पीछे, लेकिन यकिन मानिए ऐसा कुछ भी नही था. सब कुछ तो ठीक है. घर में भी सब स्वस्थ हैं, मजे में हैं. आफिस में भी सब कुछ बढ़िया चल रहा है.

फिर दिक्कत क्या है?- ये प्रश्न मैं बार बार खुद से पूछ रहा हूं, लेकिन समझ नहीं पा रहा कि भावनाओं का ऐसा नकारात्मक आवेग कहां से पैदा हो रहा है और ये कोई नई बात नहीं है, अब तो अक्सर ही ऐसा होने लगा है.

कहीं मैं डिप्रेशन का शिकार तो नहीं हो रहा हूं, सोच के ही डर गया. सोचा किसी से शेयर करना चाहिए. मुझे मेरा दोस्त मकालू याद आया. वैसे तो वो बहुत इरिटेटिंग इंसान है लेकिन शायद वो मनोचिकित्सक का काम भी कर दे, कभी उसके कुतर्क भी काउंसलिंग कर देते हैं.

खैर इसी उधेड़बुन में मैंने मकालू को व्हाटसऐप किया. काफी वक्त गुजर गया लेकिन मकालू ने मैसेज ही नहीं पढा. फिर मैंने फेसबुक पर देखा तो पाया कि मकालू आफलाइन था. मुझे लगा चूंकि ये टीवी के प्राइमटाइम कार्यक्रमों​ का वक्त है, जरूर मकालू समाचार देखने में व्यस्त होगा. फोन करने से बेहतर होगा कि उसके घर ही चले चलता हूं. बात भी हो जाएगी और वहीं मैं भी न्यूज देख लूंगा, सो चल दिया. लेकिन उसके घर पहुंच कर मैने जो नजारा देखा उस पर मुझे यकीन ही नहीं हुआ.

मकालू का टीवी बंद था, फोन साइलेंट मोड में बेड से दूर टेबल पर रखा हुआ था. पुराने गाने बज रहे थे. मकालू कोई फिक्शन रोमांटिक नावेल पढ रहा था. बिल्कुल मस्त और निश्चिंत. मैंने पूछा- दोस्त क्या चक्कर है ये? बिना न्यूज के, बिना व्हाटसऐप के, बिना फेसबुक के और सबसे बडी बात बिना फोन को आसपास रखे कैसे रह लेते हो? ऐसे बोर नहीं होते?

मकालू मेरी बात सुन कर मुस्करा उठा, बोला- गुरु क्या तुम सच में मानते हो कि टीवी और सोशल मीडिया से जीवन में मौज आती है?

हां !!

लेकिन हकीकत बिल्कुल इसके विपरीत है- मकालू गंभीर मुद्रा में आ गया .

मैं समझा नहीं.. फिर मैंने एक्सप्लेन करने की कोशिश की. मैं तो हर दो मिनट में फेसबुक और व्हाट्सप्प चेक करता रहता हूं. अब तो ये हालत है की हाथ खुद ही हर दो मिनट में फ़ोन को वजह बेवजह उठा लेते हैं और मैं खुद को सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करते हुए पाता हूं. सब देख कर फ़ोन वापस रख देता हूं. थोड़ी देर में फिर हाथ किसी रोबोट की तरह फ़ोन उठा लेते हैं और उंगलियां ऐप खोल कर स्क्रॉल करना शुरू कर देती हैं. पूरे दिन ये सिलसिला चलता है. अब तो बिना इंटरनेट के सब सूना लगता है. बिना टीवी पर न्यूज़ देखे डिनर नहीं करता हूं. खैर मैं यहां कुछ और ही बात करने आया था और पता नहीं किन बातों में उलझ गया.

हम्म्म ….गुरु अब तो पहले इसी सबजेक्ट पर बात होगी फिर तुम्हारी वाली भी सुन लेंगे. ये कहते हुए मकालू ने टीवी चालू कर के एक न्यूज़ चैनल लगा दिया. बोला- देखो इस एंकर की भाव भंगिमाओं को, सुनो इसकी चीखें. इसके साथ बैठे पैनलिस्टो को सुनो. कैसे एक दूसरे को जलील करने में लगे हैं. अव्वल तो इनका मुद्दा ही नेगेटिव नोट पर है, और फिर ये सारे मिल कर रोज शाम को नेगेटिविटी का सोप ओपेरा प्रस्तुत करते हैं. दरअसल गुरु तुम रात में डिनर के साथ साथ इनकी परोसी नेगेटिविटी भी खाते हो, और अब तुम्हें इसकी लत पड़ गयी है.

फिर बारी बारी से मकालू ने फेसबुक और और व्हाट्सप्प खोल कर दिखते हुए बोला- ये पोस्ट पढ़ो, ये वीडियो देखो, अधिकांशतः इनमें झूठ, नफरत, धार्मिक उन्माद, और अन्धविश्वास भरा हुआ है. गुरु फेसबुक पर एक से बढ़कर एक तलवार बाज़ बैठे हुए हैं, जिनकी अपनी कुंठाएं हैं अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं. अगर मजबूत ढाल लेकर नहीं बैठे तो ये तुमको घायल कर देंगे. उनकी लच्छेदार भाषा से लोग ऐसे प्रभावित होते हैं कि पता ही नहीं चलता कब वो खुद उनके प्रोपेगंडा के हिस्सा बन जाते हैं और खुद तलवार उठा के भांजना शुरू कर देते हैं. थोड़ा औरो को और ज्यादा खुद का नुकसान करते हैं.

और व्हाट्सप्प झूठ फ़ैलाने का यन्त्र बन गया है. और इस पर बने ग्रुप राजनीतिक और धार्मिक ठेकेदारों का कचराघर है. जहां ये अपना वैचारिक कचरा डंप करते हैं, और ये सारी नेगेटिविटी फ़ोन से होते हुए सीधे हमारे दिल और दिमाग में बैठ जाती है.

मैं एक टक मकालू को बोलते हुए देख रहा था और बहुत ध्यान से उसकी बातें सुन रहा था.

गुरु हमारा शरीर तो दिन भर के खाये खाने से जरुरी विटामिन और प्रोटीन वगैरह पचाकर बाकी का कचरा सुबह सुबह बाहर निकल देता है, कुछ गलत खा लिया तो लूज मोशन हो जाता है. या दिन भर गैस बनकर इधर उधर से निकलता रहता है लेकिन ये वैचारिक कचरा कहा से निकालते हो? दिमाग में ऐसा कोई सिस्टम नहीं है जो दिन भर के इकठ्ठा किये हुए कूड़े को फ्लश आउट कर दे. फिर ये कूड़ा दिल और दिमाग में बेचैनी पैदा करता है और कई बार बाहर निकालने की प्रक्रिया में लोग भाषा की शालीनता खोने लगते हैं और फिर अंत में मार काट की नौबत आ जाती है. पेट की पेचिश कम मुसीबत है जो दिमाग में भी पेचिश को न्योता दें.

बात तो बिल्कुल सही कह रहे हो मकालू, अच्छा मैं चलता हूं, घर में कुछ काम है- कहते हुए मैं उठ गया.

कैसी बात कर रहे हो गुरु अभी तुम्हारी वाली बात तो रह ही गयी- मकालू ने मुझे रोकने की कोशिश की .

लेकिन मेरे पास कोई सवाल नहीं बचे थे, सब रेत के बनाये किले की तरह ढह गए थे, मेरी बेचैनी की उलझन सुलझ गयी थी, मैं तेज कदमो से निकल आया.

गुरु कम से कम पानी तो पीते जाओ – मकालू की आवाज बैक ग्राउंड स्कोर की तरह सुनाई दे रही थी.


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