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जो लड़का कश्मीर का नाम कर सकता था, वो आतंकवादी बन गया है

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जब हम बच्चे होते हैं, तब मां-बाप पढ़ने को कहते हैं. दिन-रात. बस पढ़ाई की रट. पढ़ाई, होमवर्क, परीक्षाएं. कहते हैं, पढ़-लिख लेने से समझ बनती है. जिंदगी बन जाती है. कई बच्चों को जिंदगी बनाने का ये मौका मयस्सर नहीं होता. दुनियादारी और गरीबी उनको पढ़ने नहीं देती. कई ऐसे भी होते हैं जिन्हें मौका तो मिलता है, मगर वो इसे गंवा देते हैं. 20 साल का माजिद खान इस दूसरी कैटगरी के लोगों में आता है. पढ़ा-लिखा कश्मीरी नौजवान. अच्छा-खासा फुटबॉलर. उसकी बात चलती थी, तो लोगों की उम्मीद जगती थी. वादी में लोग कहते थे, माजिद एक दिन बहुत आगे जाएगा. माजिद आगे बढ़ा और आतंकवादी बन गया. देखने में उसका चेहरा एकदम बेन स्टोक्स जैसा लगता था. वो ब्रिटेन के क्रिकेटर. मैंने उसकी कई तस्वीरें देखीं. किसी में हाथ में माइक थामे कुछ बोल रहा है. गले में आई कार्ड है. किसी तस्वीर में खेलता हुआ दिख रहा है. शायद फैशन का भी शौक था उसको. कई तस्वीरें दिखीं उसकी. बालों में जैल लगाए हुए. फैशनेब जैकेट पहने. लुभाने के अंदाज में कैमरे की ओर झांकता हुआ. ये सारी तस्वीरें अब बेमानी हो गई हैं. माजिद आतंकवादी बन गया है.

आतंकवादी बनकर ज्यादा से ज्यादा कितना जी लेगा?
माजिद के पैरों में फुटबॉल का हुनर था. खूब खेलता था. गोलकीपिंग करता था. शायद लेव याशिन और ओलिवर कान बनने के सपने देखता हो. फुटबॉल तो था ही. साथ-साथ पढ़ाई भी चल रही थी. अनंतनाग के सरकारी डिग्री कॉलेज से ग्रेजुएशन कर रहा था. सबकुछ ठीक चल रहा था कि एकाएक सारी चीजें बंजर हो गईं. खबर आई कि माजिद ने हथियार उठा लिए हैं. लश्कर-ए-तैयबा में चला गया है. खबर पढ़ने वाले हैरान हैं. माजिद की फुटबॉल टीम के बाकी लड़के हैरान हैं. माजिद का मुहल्ला हैरान है. बाकी लोगों से कहीं ज्यादा माजिद का परिवार हैरान और परेशान है. कश्मीर में जो लोग आतंकवादी बनते हैं, उनकी बची जिंदगी करीब-करीब तय है. ज्यादा से ज्यादा एक-दो साल. बस. एक दिन शायद माजिद के परिवार के पास खबर आएगी. कि उनका बेटा नहीं रहा. किसी मुठभेड़ में मारा गया. फिर क्या होगा? एक जनाजा निकलेगा. सैकड़ों-हजारों के हुजूम के साथ. शायद वैसे ही जैसे बुरहान वानी का निकला था. कुछ लोग कहेंगे, एक और मुजाहिदीन शहीद हो गया. कुछ लोग कहेंगे कि एक आतंकवादी मर गया. मरने वाले को कोई भी नाम दो, मगर वो मर चुका है ये हकीकत तो नहीं बदल जाएगी.

माजिद का बेस्ट फ्रेंड भी इसी राह पर चलकर मरा था
माजिद ने जो किया, वो कभी उसके दोस्त ने भी किया था. यावर निसार. माजिद और यावर पक्के यार थे. जुलाई 2017 में खबर आई. यावर हिजबुल मुजाहिदीन में चला गया. उसे आतंकवादी बने एक पखवाड़ा भी नहीं गुजरा कि फिर उसके मारे जाने की खबर आई. 3 अगस्त को फौज से साथ लड़ते हुए यावर मारा गया. मतलब अमावस का चांद पूर्णिमा तक पहुंच भी नहीं पाया कि यावर दुनिया से चला गया. अब माजिद भी उसी रास्ते बढ़ गया है. सोशल मीडिया पर उसकी तस्वीर घूम रही है. हाथ में एके-47 थामे. उसने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा. कि वो दुनिया में अच्छा वक्त गुजारने आया है, न कि लंबा वक्त. उसके हिसाब से आतंकवादी बनना अच्छा वक्त गुजारना है. अच्छा, एक दिल दुखाने वाली बात बताएं. ये जो माजिद है न, वो कभी इंसानों के जख्मों पर मरहम लगाने वाली संस्था के लिए काम करता था. स्वयंसेवक था.

एक महीने पहले तक बिल्कुल आम इंसानों जैसा था माजिद
हमने माजिद का फेसबुक अकाउंट देखा. एक ंमहीने तक बिल्कुल ढंग का आदमी हुआ करता था वो. खेलना, दोस्तों के साथ खाना. सब आम हरकतें. वो फेसबुक पर चल रहा था न पिछले दिनों. रक्तदान वाला वादा. इसमें माजिद ने भी किया था खुद को रजिस्टर. सोचकर ही अजीब लगता है. औरों की इतनी परवाह करने वाला एक संवेदनशील इंसान ऐसे कैसे आतंकवादी बन सकता है? एकाएक इतना कैसे बदल सकता है? रातोरात आतंकवादी कैसे बन सकता है? यावर के अलावा भी माजिद के कई दोस्त आतंकवादी बने. शायद उन सबने माजिद को भी बहला लिया होगा. बहलाया ही होगा. वरना समझते-बूझते मौत की ओर कौन पैर बढ़ाता है!

हाफिज सईद जश्न मना रहा है
उधर, पाकिस्तान में कई जगह जश्न मन रहा है. हाफिज सईद है न. आतंकवादी. उसका एक संगठन है. तहरीक-ए-आजादी. सोशल मीडिया पर भी मौजूद है. आप इस आतंकवादी संगठन का ट्विटर हैंडल देखिए. मालूम चल जाएगा कि हाफिज और उसके जैसे आतंकवादी किस तरह लड़कों को बरगलाते हैं. उन्हें आजादी और शहादत जैसे शब्दों से रिझाकर मरने के लिए राजी करते हैं. इसपर और ऐसे अकाउंट्स पर भारत के खिलाफ झूठ फैलाया जाता है. कश्मीर की आजादी का वास्ता दिया जाता है. इनके कुछ ट्वीट्स देखिए.

माजिद का दोस्त यावर निसार इसी साल हिजबुल मुजाहिदीन के साथ जुड़ा था. एक महीना भी नहीं बीता था कि एक मुठभेड़ में यावर मारा गया.
माजिद का दोस्त यावर निसार इसी साल हिजबुल मुजाहिदीन के साथ जुड़ा था. एक महीना भी नहीं बीता था कि एक मुठभेड़ में यावर मारा गया.

घाटी में 90 के दशक का वो मनहूस मौसम लौट आया है!
पिछले दिनों खबर आई थी. घाटी में 90 के दशक का पुराना मौसम लौट आया है. खूब सारे कश्मीरी लड़के और जवान आतंकवादी बन रहे हैं. बीच में लंबे वक्त तक इस चलन में काफी कमी आई थी. पाकिस्तान की ओर से घुसपैठ करके आतंकवादी आते थे. मगर, लोकल लड़कों का उनकी राह चलना कम हो गया था. पिछले एक-दो सालों से चीजें बदलने लगीं. जुलाई 2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद ये काफी बढ़ गया है. बड़ी तादाद में कश्मीरी लड़के बुरहान के अंदर अपना नायक तलाशते हैं. उनके लिए वो शहीद है. लड़के ही क्या, काफी तादाद में बड़े-बुजुर्ग भी बुरहान में नेकी खोजते हैं. उनके लिए बुरहान उनकी आजादी की जंग का हीरो है. जैसे हम लोग अपने पसंदीदा खिलाड़ी और फिल्मी हीरो की नकल करते हैं, उसके जैसे बाल कटवाते हैं, वैसे ही ये लोग बुरहान के नक्शे कदम पर चल रहे हैं. ये उनकी हार है. कश्मीर की भी हार है. और इन दोनों से ज्यादा ये भारत की हार है. इतने साल बाद भी कश्मीर की स्थितियां इतनी बदहाल हैं, तो यकीनन हमें शर्मिंदा होना चाहिए. आखिरकार, कश्मीरियों के भी अपने तर्क हैं. सौ पैसा सही नहीं हैं, तो सौ पैसा गलत भी नहीं हैं. हमने उन तर्कों को लंबे वक्त तक अनसुना किया. ये हमारी चूक थी.

माजिद को जानने वाले कह रहे हैं कि जिस दिन उसने यावर की लाश देखी थी, उस दिन से ही लग रहा था कि वो खुद भी आतंकवादी बन जाएगा. हालांकि बड़ी संख्या में कश्मीरी युवा उसके फैसले पर अफसोस भी जता रहे हैं.
माजिद को जानने वाले कह रहे हैं कि जिस दिन उसने यावर की लाश देखी थी, उस दिन से ही लग रहा था कि वो खुद भी आतंकवादी बन जाएगा. हालांकि बड़ी संख्या में कश्मीरी युवा उसके फैसले पर अफसोस भी जता रहे हैं.

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