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महेश शर्मा ने इतनी गलत बात नहीं की है, जितना हल्ला मचा है

पहले यह जान लें कि इस आर्टिकल का लेखक भारत में फेमिनिज्म के उभार से बहुत उत्साहित है. वह पहनने की आजादी का समर्थक है. औरतों पर पाबंदियां लगाने के खिलाफ है. स्त्री विषयों पर उसकी राय अकसर कॉमन फेमिनिस्ट विचारों से मेल खाती है. लेकिन इस बार वह विनम्रता से एक असहमति जताना चाहता है.

कल्चर मिनिस्टर डॉक्टर महेश शर्मा का इतिहास ऐसा नहीं कि उनकी सामाजिक समझदारी पर बहुत भरोसा किया जा सके. उनके खाते में गैरजिम्मेदार बयानों की पूरी लिस्ट है. फिर भी विदेशी महिला टूरिस्टों और स्कर्ट से जुड़ा उनका बयान मुझे गैरजिम्मेदार नहीं, प्रैक्टिकल लगा.

पहले पूरा बयान पढ़ लें, फिर बताता हूं क्यों:

महेश शर्मा ने कहा, ‘पर्यटकों को, जब वो एयरपोर्ट पर आते हैं, उनको एक वेलकम किट दी जा रही है. एक कार्ड है उसमें. उसमें डूज एंड डोन्ट्स (क्या करें, क्या न करें), जैसी छोटी-छोटी बातें हैं. हमने उन्हें बताया कि आप छोटी जगह पर रात-वात में अकेले न निकलें. स्कर्ट्स न पहनें. दूसरा हमने उन्हें बताया कि आप जिस गाड़ी में बैठें, उस गाड़ी की नंबर प्लेट का फोटो ले लें और अपने किसी दोस्त को फॉरवर्ड कर दें.’

इस बयान पर बवाल हुआ तो महेश शर्मा सफाई देने आए. इस सफाई में उन्होंने आधा गुड़-गोबर कर दिया. अब तक ये मसला औरतों की सुरक्षा से जुड़ा था, उन्होंने इसे परंपरा के सम्मान से भी जोड़ दिया. वो बोले कि भारत एक सांस्कृतिक देश है और वे धार्मिक जगहों पर ड्रेस कोड की बात कर रहे थे. उन्होंने कहा, ‘मैं किसी को नहीं कह रहा कि क्या पहनें और क्या नहीं.’

ऊपर वाली इस लाइन से मेरी असहमति नोट की जाए.

इसके आगे महेश शर्मा ने कहा, ‘अगर मैंने महिला टूरिस्टों को रात में घूमते वक्त अतिरिक्त सतर्क रहने को कहा है तो इसमें क्या गलत है? मैं सिर्फ चिंतित हूं.’ महेश शर्मा की दिक्कत ये है कि वो शायद गलत जगह ये बात कह गए. शायद कुछ लोगों को खुश करने के मकसद से. लेकिन मैं पॉलिटिकल मायने में नहीं, सामाजिक आइने में ‘महेश निरपेक्ष’ होकर इसे समझना चाहता हूं. 

मोटा-मोटी मैं इस बयान से आहत नहीं हूं. क्योंकि,

धार्मिक स्थलों के सम्मान वाली बात मेरे लिए जरूरी नहीं है. ये न होती तो भी चलता. मैं इसे सिर्फ और सिर्फ औरतों की सुरक्षा के नजरिये से देखना चाहता हूं. महेश शर्मा ने ये बात ‘छोटी जगहों’ और रातों के लिए कही है. बड़ा क्लीशे सा डिस्क्रिप्शन है, लेकिन इस समय शब्दों से ज्यादा महेश शर्मा के मंतव्य पर ध्यान देना चाहिए. छोटी जगहों से उनकी मुराद कस्बों या गांवों से है, जो शहरी इलाकों के मुकाबले कम सुरक्षित माने जाते हैं. ऐसी जगहों पर जाते हुए विदेशी टूरिस्ट छोड़िए, हमारी शहरी भारतीय औरतें भी पर्याप्त सावधानियां बरतती हैं.

फर्ज कीजिए कि दिल्ली में काम करने वाली कोई रिपोर्टर मेवात, मुजफ्फरनगर या कैथल के किसी गांव में रिपोर्टिंग करने मिनी स्कर्ट पहनकर जाए, जहां खापवादी सोच मजबूत है तो वह अपनी सुरक्षा के लिए बिलाशक एक खतरा पैदा कर रही है. बल्कि मैंने अच्छी खासी नारीवादी एक्टिविस्टों को राजधानी से दूर-दराज के इलाकों, जंगलों और पहाड़ों में छोटे कपड़े पहनकर एक्टिवज्म करते नहीं देखा. मेरी कितनी फेमिनिस्ट दोस्त हैं जो दिल्ली में शॉर्ट्स पहनती हैं, लेकिन जब छुट्टियों में अपने छोटे शहर लौटती हैं तो सूट निकाल लेती हैं. 

सरकार से अपेक्षित है कि वो अपने नागरिकों और मेहमानों दोनों को जरूरी सलाह देती रहे. और चूंकि यह सिर्फ सलाह है, बाध्यता नहीं. इसलिए किसी नागरिक अधिकार या आजादी का उल्लंघन नहीं है. बल्कि हमारे समाज के पिछड़ेपन और नाकामी को स्वीकारते हुए एक व्यावहारिक सी सावधानी है.

आप कहेंगे कि क्या मैं ये कह रहा हूं कि छोटी जगहों के पुरुष ज्यादा पोटेंशियल रेपिस्ट होते हैं? एकदम नहीं. लेकिन क्या सभी रेप रात में होते हैं? नहीं ना! फिर भी रात में अकेली महिला ज्यादा असुरक्षित महसूस करती है. भविष्यवक्ता तो कोई होता नहीं, इसलिए संभावनाओं और आशंकाओं के मद्देनजर ही आप फैसले करते हैं. अलग-अलग समयकाल और जगहों पर समझदारी के मायने अलग रहे हैं. एक समय बॉलीवुड में हिरोइन की जांघें दिखना  बड़ी बात मानी जाती थी. लेकिन समाज के तौर पर हम इवॉल्व हुए और आज ऐसे पचासियों दृश्य आंखों के आगे से गुजर जाते हैं और परदे पर इसे स्वीकार कर लिया गया है.

ये है वो एडवाइजरी, जिसकी बात कर रहे थे महेश शर्मा

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पिछड़ेपन के आइने में देखिए इस बयान को

मुझसे असहमत मेरी एक दोस्त कहती है कि सरकार को चाहिए कि वो हमारे पुरुषों को ट्रेन करे और ‘बेटी बचाओ’ के साथ ‘लड़कों को सिखाओ’ वाले विज्ञापन भी बनाए. ऐसी कोशिश की जानी चाहिए, लेकिन क्या इसके नतीजे कितने असरदार होंगे, इस पर मुझे शक है. मैं सिस्टम औऱ समाज दोनों की बात कर रहा हूं. क्या दोनों मिलकर ऐसी व्यवस्था दे पाएंगे कि हमारे पुरुष एकदम से सेंसिटाइज हो जाएं. मुझे लगता है कि इस काम में अभी कई दशक लगने हैं.

हां! आने वाले सालों में हम जैसी दुनिया बनाना चाहेंगे, उसमें लड़कियां दुनिया के हर कोने में मनचाही ड्रेस पहनेंगी और उनके खिलाफ हर तरह के अपराध की आशंका शून्य होगी. लेकिन फिलहाल प्रगतिशीलता के जिस स्तर पर हमारा समाज है, उसमें तात्कालिक दुर्घटनाओं से बचने के लिए ये सावधानी कर ली जाए तो क्या बुरा है! मेरी चिंता है कि भारत की आजादख्याल लड़कियां भी ये सावधानी करती ही हैं, फिर विदेशी टूरिस्टों को सलाह देने पर बखेड़ा क्यों है.

हां, ये दुखद है कि महिला ही पीड़ित है और सतर्क भी उसे ही रहना पड़ रहा है. यह बात मुझे भी पर्याप्त परेशान करती है. लेकिन क्या करें! इसका उल्टा करके देखें तो क्या नतीजे मिलेंगे?

दरअसल हम अपने समाज को वैसा बना चुके हैं, जैसा उसे बनना था. कुंठित मर्दों की बेहूदा फंतासियों वाला समाज. पिछड़ी सोच और आपराधिक हकीकतों वाला समाज. जिसे लड़कियों की टांगे देखकर सिर्फ सेक्स सूझता है. ये उस सिस्टम की नाकामी का सबूत भी है जो छोटी जगहों पर औरतों की सुरक्षा की गारंटी नहीं ले सकता. फिर सफेद चमड़ी के लिए हमारे यहां कैसा सनकपन है, सब जानते हैं.

जब हम विदेशी पर्यटकों को कैब का नंबर नोट करने और अजनबियों से लिफ्ट न लेने की सलाह देते हैं, तो उसका मकसद सिर्फ उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है. इसलिए कुछ-एक जगहों पर जाते समय परिधान की सावधानी को मैं इसी क्रम में देखता हूं.

महेश शर्मा जी, आपने जो कहा वो न ही ‘नैतिक’ मसला है, न ही परंपरा के सम्मान का. ये समाज और सिस्टम के तौर पर हमारी सामूहिक नाकामी की स्वीकारोक्ति है. वो दुनिया काश हम जल्द बना पाएं, जिसमें औरतों को किसी सावधानी की जरूरत न हो.

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