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उद्धव ठाकरे की मुश्किल बढ़ाने वाले इन 5 पुलिसवालों में से किसकी बात सच है?

IPS और IAS देश की सबसे ऊंची, सबसे प्रतिष्ठित नौकरियां होती हैं. सालों के परिश्रम से ये नौकरियां मिलती हैं. लेकिन अक्सर हम देखते हैं कि इन अफसरों का भी सरकारें अपने मुताबिक इस्तेमाल करती हैं. जब सरकार बदलती है, कोई नई पार्टी सत्ता में आती है तो अफसरों के ताबड़तोड़ तबादले होते हैं. मनमुताबिक अफसरों को अच्छी पोस्ट दी जाती हैं. ये प्रैक्टिस राज्य सरकारों भी में होती है और केंद्र सरकार में भी. सरकार कई खास अफसरों के लिए या कई अफसर किसी खास पार्टी की सरकार में ज्यादा सहज होते हैं. ये रिश्ता हम सब जानते हैं. लेकिन कभी-कभी समीकरण सही नहीं बैठता है तो ये अफसर सरकारों के लिए मुश्किल भी खड़ी कर देते हैं. और फिर वो राजनीति शुरू हो जाती है कि ये अफसर तो इस पार्टी के लिए काम करता है या उस पार्टी के लिए काम करता है. आज हम उन 5 अफसरों की बात करेंगे जो महाराष्ट्र के इस पूरे झगड़े में अलग भूमिकाओं में हैं.

Paramvir Singh

परमबीर सिंह

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर. 1988 बैच के आईपीएस अफसर. एंटिलिया केस में सचिन वाझे का नाम आने के बाद परमबीर सिंह को मुंबई पुलिस कमिशनर के पद से हटाया गया. और उसके बाद परमबीर सिंह ने भी महाराष्ट्र के गृह मंत्री के खिलाफ मोर्चो खोल दिया. तो पहले बात इस पर कि परमबीर सिंह ने क्या आरोप लगाए, और फिर उन पर क्या आरोप लग रहे हैं, वो बताएंगे.

20 मार्च को परमबीर सिंह ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और राज्यपाल भगतसिंह कोश्यारी को चिट्ठी लिखी. चिट्ठी में उन्होंने कहा कि गृह मंत्री अनिल देशमुख ने सचिन वाझे और कई पुलिस अधिकारियों को अपने निवास पर बुलाकर हर महीने 100 करोड़ रुपये जुटाने के लिए कहा था. अपने दावे के सबूत के तौर पर उन्होंने उन अफसरों से चैट का ज़िक्र किया जिन्हें गृह मंत्री की तरफ से बुलाया गया था और पैसे उगाहने के लिए कहा गया था. जांच की मांग को लेकर वो सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गए. सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में भी उन्होंने कहा कि गृह मंत्री के निवास के पास लगे सीसीटीवी की जांच से भी साबित होगा कि उनका दावा सही है. पूर्व इंटेलिजेंस कमिश्नकर रश्मि शुक्ला की चिट्ठी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने गृह मंत्री देशमुख पर ट्रांसफर-पोस्टिंग में भ्रष्टाचार का भी आरोप लगाया. आज परमबीर की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से मना कर दिया. कहा कि आप बॉम्बे हाईकोर्ट में जाइए.

तो ये परमबीर सिंह के हिस्से की कहानी हो गई. अब आते हैं उन आरोपों पर जो परमबीर सिंह पर लगाए जा रहे हैं. सबसे पहला सवाल तो ये पूछा जा रहा है कि जब उन्हें पहले से जानकारी थी कि गृह मंत्री मुंबई पुलिस को वसूली के लिए कह रहे हैं, तो फिर उन्होंने इतने दिन ये बात दबा कर क्यों रखी. मुंबई पुलिस कमिशनर से हटाने के बाद ही ये बात क्यों बता रहे हैं? यानी क्या उनकी भी इस घटनाक्रम में मौन सहमति थी? एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा कि वो ग़लत दावे कर रहे हैं. गृह मंत्री के पुलिस अफसरों से मिलने के बारे में जो जानकारी वो झूठी है. शिवसेना के मुखपत्र सामना में परमबीर सिंह को बीजेपी का प्यादा कहा गया. लिखा गया कि महाराष्ट्र की सरकार गिराने के बीजेपी के प्लान का हिस्सा है परमबीर सिंह.

परमबीर सिंह पर ये भी आरोप है कि सचिन वाझे को वो ही 16 साल बाद दोबारा मुंबई पुलिस में लेकर आए. और सिर्फ जॉइनिंग ही नहीं कराई, बल्कि उन्हें क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट का चीफ बनाकर सारे हाईप्रोफाइल केस दिए गए. इनमें भी परमबीर सिंह की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं.

फरवरी 2019 में मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनने से पहले परमबीर सिंह एंटी करप्शन ब्यूरो के डीजी थे. और नवंबर 2019 में अजित पवार के सहयोग से फडणवीस मुख्यमंत्री बने थे तो ACB ने सिंचाई घोटाले में दर्ज केस वापस ले लिए. इस आधार पर कहा जा रहा है कि वो हमेशा से सत्ता के हिसाब से काम करते रहे हैं.

डेक्कन हेरोल्ड अखबार की एक ख़बर के मुताबिक परमबीर सिंह पर अंडरवर्ल्ड से जुड़े लोगों को बचाने के आरोप हैं. रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई पुलिस के ही एक निलंबित पुलिस इंस्पेक्टर अनूप डांगे ने भी 2 फरवरी को महाराष्ट्र के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी को एक चिट्ठी लिखी थी. इसमें चिट्ठी उसने आरोप लगाए हैं कि जब वो ACB के डीजी थे तब अंडरवर्ल्ड से जुड़े लोगों को बचाते थे. डांगे ने ये भी कहा है कि उसका निलंबन वापस करने के लिए परमबीर सिंह के सहयोगी ने 2 करोड़ रुपये मांगे थे.

Sachin Waje

सचिन वाझे

असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर रैंक का एक अफसर. 1990 में महाराष्ट्र पुलिस जॉइन करता है. कई सारे एनकाउंटर्स में नाम आता है. अखबार सचिन वाझे के नाम के आगे एनकाउंटर्स स्पेशिलिस्ट लिखने लगते हैं. फिर 2002 में मुंबई में हुए धमाकों के बाद कुछ लोगों को गिरफ्तार किया जाता है. उनसे पूछताछ की जाती उस टीम में सचिन वाझे भी होता है. पुलिस कस्टडी में एक की मौत हो जाती है और सचिन वाझे पर हत्या का केस दर्ज होता है. इस मामले में चार्जशीट दायर हो चुकी है लेकिन मामला कोर्ट में पेंडिंग है. पुलिस छोड़ने के बाद सचिन वाझे 2008 में शिवसेना में शामिल हो जाता है. दो किताबें भी लिखी. कई रिपोर्ट्स के मुताबिक उसने सिक्योर कम्यूनिकेशन वाला ऐप भी बनाया था. जून 2020 में मुंबई पुलिस कोरोना की वजह से अफसरों की कमी बताकर सचिन वाझे को वापस ले लेती है. और फिर क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट का हेड बनाया जाता है, जिसमें टीआईपी स्कैम से लेकर फर्ज़ी फॉलोवर्स बढ़ाने वाले कई हाईप्रोफाइल केस हैंडल करता है. 25 फरवरी को मुकेश अंबानी के घर एंटिलिया के बाहर विस्फोटक मिलते हैं. उसकी जांच भी सचिन वाझे की अगुवाई में क्राइम इंटेलिजेंस यूनिट ही शुरू करती है. लेकिन 5 मार्च को मनसुख हिरेन की मौत के बाद सचिन वाझे की कहानी पलट जाती है. इस मामले में उसके शामिल होने के आरोप लगते हैं. NIA गिरफ्तार कर लेती है, लेकिन सचिन वाझे लिखता है कि उसके खिलाफ साजिश चल रही है, फंसाने की कोशिश है. हालांकि महाराष्ट्र ATS और NIA की जांच में सचिन वाझे के खिलाफ कई सबूत मिले हैं. मनसुख हिरेन की मौत मामले में भी उसे मुख्य आरोपी माना गया है. एंटिलिया के बाहर विस्फोटक रखने का शक भी उसी पर है.

Rashmi Shukla

रश्मि शुक्ला

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह और रश्मि शुक्ला दोनों एक ही बैच के IPS हैं. 1988 बैच के. जब परमबीर सिंह मुंबई पुलिस के कमिश्नर थे तो रश्मि शुक्ला स्टेट इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट में इंटेलिजेंस कमिश्नकर के पद पर तैनात थीं. रश्मि शुक्ला का नाम इस पूरे मामले में परमबीर सिंह ही लेकर आए. सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में परमबीर सिंह ने कहा कि पिछले साल अगस्त में इंटेलिजेंस कमिश्नर रहते हुए रश्मि शुक्ला ने भी ट्रांसफर्स और पोस्टिंग्स में भ्रष्टाचार और गड़बड़ी की शिकायत डीजीपी को दी थी. रश्मि शुक्ला ने कॉल रिकॉर्ड्स के आधार पर ये दावा किया था. रश्मि शुक्ला के जानकारी देने पर डीजीपी ने गृह विभाग के ए़डिशनल चीफ़ सेक्रेटरी को जानकारी दी थी. इन चिट्ठियों के आधार पर पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उद्धव ठाकरे सरकार को घेरा. उन्होंने कहा कि इसमें गृह मंत्री के दफ्तर के लोगों के नाम थे. सरकार ने कार्रवाई करने के बजाय रश्मि शुक्ला को ही पद से हटा दिया.

गृह मंत्री अनिल देशमुख पर ये नए आरोप लगे थे तो उद्धव सरकार में मंत्री और एनसीपी के प्रवक्ता नवाब मलिक ने रश्मि शुक्ला पर ही आरोप लगा दिया. कहा कि रश्मि शुक्ला की रिपोर्ट गृह विभाग ने देखी थी, उसमें कोई सच्चाई नहीं थी. नवाब मलिक ने कहा कि रश्मि शुक्ला बीजेपी के कहने पर ये फोन टैपिंग कर रही थी.

इस पूरे विवाद में रश्मि शुक्ला का नाम बाहर आने से पहले ही वो डेप्युटेशन पर केंद्र में चली गई थीं. अभी वो सीआरपीएफ में एडीजी के पद पर तैनात हैं. इससे पहले सिविल डिफेंस में डीजी थीं. रश्मि शुक्ला ईमानदार अफसर मानी जाती हैं. यूपीए की सरकार के दौरान 2013 में उन्हें गणतंत्र दिवस पर पुलिस मेडल से नवाज़ा गया था. उस वक्त वो मुंबई में जॉइंट कमिशनर थीं.

Subodh Kumar Jaiswal

सुबोध कुमार जायसवाल

महाराष्ट्र के पूर्व डीजीपी. जब रश्मि शुक्ला इंटेलिजेंस कमिश्नर के पद पर थीं और उन्होंने ट्रांसपर, पोस्टिंग्स में भ्रष्टाचार पर चिट्ठी लिखी थी, तब सुबोध कुमार जायसवाल ही महाराष्ट्र के डीजीपी थे. अब एनसीपी कह रही है कि रश्मि शुक्ला और सुबोध सिंह दोनों बीजेपी के लिए काम करते थे. सुबोध जायसवाल के नाम पर महाराष्ट्र के सत्तारूढ़ महाविकास अघाड़ी और बीजेपी में पहले भी झगड़ा हुआ था. पिछले साल दिसंबर में जायसवाल को सीआईएसएफ का डीजी बनाया गया था. खुद सुबोध कुमार जायसवाल ने केंद्र सरकार में डेप्यूटेशन की अर्ज़ी लगाई थी. इस पर महाराष्ट्र सरकार ने भी क्लियरेंस दे दिया था. बीच में खबर आई थी कि उद्धव ठाकरे सरकार से उनकी अनबन चल रही थी. जिस तरह से आईपीएस अफसरों का सरकार तबादला कर रही थी उससे वो नाराज़ थे. उनकी सीआईएसएफ डीजीपी के पद पर नियुक्ति के वक्त बीजेपी ने भी फडणवीस सरकार को घेरा था. पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने आरोप लगाया था कि जिस तरह से उद्धव ठाकरे सरकार काम कर रही थी, उससे सुबोध कुमार जायसवाल फ्रस्ट्रेट हो गए थे, और डीजीपी का पद इसीलिए छोड़ना चाहते थे.

सुबोध कुमार जायसवाल 1985 बैच के आईपीएस अफसर हैं. 8 साल वो R&AW में रहे थे. मुंबई के कमिशनर भी रहे थे.

Shivdeep Lande

शिवदीप लांडे

ये महाराष्ट्र ATS में डीआईजी हैं. मनसुख हिरेन की मौत और गाड़ी चोरी होने वाले मामले की जांच महाराष्ट्र की ATS भी कर रही है. शिवदीप लांडे 2006 बैच के बिहार कैडर के IPS अधिकारी हैं. बिहार में पहली पोस्टिंग नक्सल प्रभावित मुंगेर ज़िले में हुई थी. बाद में कई और ज़िलों में एसपी रहे. राजधानी पटना में एसपी रहे. कभी भेस बदलकर, पुलिस वालों को घूस लेते पकड़ना हो या पत्थर माफिया के खिलाफ कार्रवाई के मामले हो, बिहार में शिवदीप लांडे ने खूब सुर्खियां बनाई. ईमानदार और तुरंत एक्शन लेने वाले पुलिस अधिकारी की छवि उन्होंने बनाई. अखबारों में सिंघम और दबंग कहकर उनका नायकत्व गढ़ा गया. लेकिन फिर शिवदीप लांडे ने अपने गृह राज्य महाराष्ट्र में पोस्टिंग की अर्ज़ी लगाई. अपॉइंट्स कमेटी ऑफ कैबिनेट ने शिवदीप लांडे की महाराष्ट्र में डेप्यूटेशन की अर्ज़ी पर 2016 में मुहर लगा दी. अंदरखाने बात ये भी आई थी कि शिवदीप लांडे के लिए उस वक्त महाराष्ट्र के सीएम रहे देवेंद्र फडणवीस ने केंद्र से सिफारिश की थी. IPS लेवल के अधिकारी को डेप्यूटेशन पर भेजना बड़ा फैसला होता है और ये पॉलिटिकल डिसीजन होते हैं.

महाराष्ट्र में शिवदीप लांडे कई अलग अलग पोस्ट्स पर रहे. नार्कोटिक्स विभाग में डीसीपी भी रहे और उसके बाद अब ATS में डीआईजी हैं. शिवदीप लांडे ATS की उस टीम के हेड हैं जो मनसुख हिरेन मामले की जांच कर रही है. पूरे एंटिलिया केस की जांच NIA की टीम भी कर रही है. लेकिन मनसुख हिरने की मौत और कार चोरी होने के मामले की जांच ATS भी कर रही है. और इसी जांच को लेकर दो दिन पहले शिवदीप लांडे ने फेसबुक पर एक पोस्ट लिखा. उन्होंने लिखा कि अति संवेदनशील मनसुख हिरेन केस की गुत्थी ATS ने सुलझा ली है. इस केस को उन्होंने करियर का सबसे जटिल केस बताया. रविवार को ये पोस्ट लिखी गई और उसी दिन ATS ने हत्या मामले में कुछ आरोपियों को गिरफ्तार किया था. सस्पेंडेड पुलिस कॉन्स्टेबल विनायक शिंदे और सट्टेबाज़ नरेश धारे को गिरफ्तार किया. इसके अलावा गुजरात से भी एक आदमी को गिरफ्तार किया है जिस पर आरोप है कि वो आरोपियों को फर्ज़ी सिम देता था.

इन गिरफ्तारियों के बाद शिवदीप लांडे का ये फेसबुक पर ऐलान करना कि उन्होंने केस सुलझा लिया है, इस पर कई तरह के सवाल उठे. सवाल ये कि जब NIA इस केस की जांच अभी कर ही रही है तो शिवदीप लांडे ने केस सुलझा लेने का दावा क्यों किया, और इसके बारे में सोशल मीडिया पर क्यों बताया? लोगों ने पारिवारिक रिश्ते भी खंगालना शुरू कर दिया. कुछ वेबसाइट्स पर लिखा गया कि शिवदीप लांडे शिवसेना नेता के दामाद हैं. उनकी पत्नी ममता शिवतारे, शिवसेना नेता विजय शिवतारे की बेटी हैं. विजय शिवतारे 2019 में विधानसभा का चुनाव हार गए थे लेकिन इससे पहले फडणवीस सरकार में शिवसेना कोटे से जल संसाधन राज्य मंत्री थे.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 2 दिन NIA को आदेश दिया था कि मनसुख हिरेन की मौत का मामला भी ATS से लेकर जांच करे. लेकिन ये केस ATS ने NIA को नहीं सौंपा तो NIA ने कोर्ट में शिकायत की. और आज NIA स्पेशल कोर्ट ने ATS को आदेश दिया है कि जांच की फाइल दी जाएं.

ये मुंबई पुलिस के पांच वो अफसर हैं जिनके नाम विवादों में आ रहा है. महाराष्ट्र पुलिस की साख पर सवाल उठ रहा है, नेताओं-पार्टियों की मदद का आरोप लग रहा है. लेकिन मुंबई के पुराने पुलिस कमिश्नर्स की लिस्ट पर नज़र डालते हैं तो एक नाम दिखता है जूलियो रिबेरा का. जिनकी ईमानदारी का इकबाल आज भी बुलंद है. परमबीर सिंह वाले पूरे मामले की जांच के लिए एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने जूलियो रिबेरो का ही नाम लिया लेकिन उन्होंने जांच करने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि वो 92 साल के हो चुके हैं और इस तरह की जांच करने में अब सक्षम नहीं हैं. अगर कर सकते हैं तो भी इतने धुंधले मामले की जांच नहीं करेंगे.

जुलिया रिबेरो मुंबई पुलिस कमिश्नर के अलावा गुजरात और पंजाब के डीजीपी भी रहे हैं. देश के अच्छे पुलिस अफसरों में उनका नाम गिना जाता है. पुलिसिंग कैसे बेहतर हो सकती है, इस पर भी वो लगातार अखबारों में लिखते रहते हैं. सचिन वाझे वाले पूरे मामले पर इंडियन एक्सप्रेस में 18 मार्च को उन्होंने एक लेख लिखा था. इसमें उन्होंने एनकाउंटर्स स्पेशिलिस्ट को समाज में हीरो बनाने वाले चलन पर सवाल उठाए है. सचिन वाझे की बहाली पर भी वो गंभीर सवाल उठाते हैं. पूछते हैं कि उनकी बहाली ही क्यों होनी चाहिए थी, और अगर कोरोना के नाम पर उनकी बहाली हुई थी तो कोरोना वाली ड्यूटी में क्यों नहीं लगाया. ये कुछ गंभीर सवाल हैं जो जूलियो रिबेरो के अलावा बाकी लोग पूछ रहे हैं.

पुलिस की भूमिका को शुरू हुए इस पूरे विवाद के बाद महाराष्ट्र पुलिस की साख पर सवाल हैं, महाराष्ट्र सरकार की साख पर सवाल हैं. लेकिन क्या पहले की सरकारों में पुलिस का इस तरह से इस्तेमाल नहीं होता है था, उद्धव सरकार में क्या फर्क आया.

एक एपीआई अफसर की भूमिका से शुरू हुआ ये विवाद अब गृह मंत्री तक पहुंच चुका है. ये बाकी सरकारों और अफसरों के लिए भी सीख है. ये सीख कि संवैधानिक के दायरे में ही अगर चीज़ें होती रहे हैं, तो सबके भले में है.


विडियो- क्या अंबानी के घर के बाहर मिली कार खड़ी होने के पीछे मनसुख हिरेन ही नहीं, बल्कि और भी कई लोग हैं?

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