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तूतीकोरिन: स्टरलाइट कॉपर कंपनी को फिर से खोलने की याचिका खारिज, ये पूरा मामला क्या है

तूतूकुड़ी, प्रचलित नाम- तूतीकोरिन. तमिलनाडु का शहर. तटीय शहर. छोटा सा शहर है. करीब 90 हजार वर्ग किमी में फैला. आबादी भी यही करीब तीन से चार लाख की. बंगाल की खाड़ी के कोरोमंडल तट के किनारे बसा शहर है.

Tutikorin Power Plant
तूतीकोरिन थर्मल पावर प्लांट रात में कुछ ऐसा दिखता है. (फोटो- Wikipedia)

ये छोटा-सा, खूबसूरत-सा शहर अभी ख़बरों में है. वजह- वेदांता समूह का यहां स्थित प्लांट- स्टरलाइट कॉपर प्लांट. ये तांबा गलाने का प्लांट है. मद्रास हाईकोर्ट ने 18 अगस्त को वेदांता लिमिटेड को बड़ा झटका देते हुए स्टरलाइट कॉपर प्लांट को बंद करने का अपना फैसला बरकरार रखा है. वेदांता ने कोर्ट के इस फैसले के ख़िलाफ कुछ समय पहले पुनर्विचार याचिका दायर की थी. लेकिन कोर्ट ने अपने पुराने फैसले को बरकरार रखते हुए ये याचिका ख़ारिज कर दी है.

पूरा मामला समझते हैं.

1996 से ही प्लांट बंद करने की मांग

प्लांट 1996 में शुरू हुआ था. स्थापना के बाद से ही इसे लगातार विरोध का सामना करना पड़ रहा था. पर्यावरण की सुरक्षा से जुड़े लोगों का कहना था कि ये इससे वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण, दोनों में इजाफ़ा होगा.

लेकिन 2018 में ये विरोध काफी बड़ा हो गया. फरवरी में कई स्थानीय लोग इसके ख़िलाफ धरने पर बैठ गए. इस धरने के 100 दिन पूरे होने पर मई में तूतीकोरिन में ही सैकड़ों लोग प्लांट के ख़िलाफ प्रदर्शन कर रहे थे. इसी दौरान कथित तौर पर प्रदर्शन कुछ हिंसक हो गया और पुलिस की गोलीबारी में 13 लोगों की मौत हो गई. हिंसा और आगजनी के आरोप में 200 से ज़्यादा लोगों के ख़िलाफ मामला भी दर्ज किया गया.

आदेश- सील करो प्लांट

तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी कि टीएनपीसीबी का 23 मई 2018 को एक आदेश आया-स्टरलाइट कॉपर प्लांट को सील किया जाए. 28 मई को ही तमिलनाडु सरकार का भी प्लांट को बंद रखने का आदेश आ गया. वेदांता समूह ने आदेश को अवैध और असंवैधानिक बताते हुए इसे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में चुनौती दी. एनजीटी ने अपने आदेश में कहा –

“कुछ विशेष प्रतिबंधों और नियमों के साथ प्लांट को दोबारा खोला जा सकता है. लेकिन इससे पहले वेदांता ग्रुप को अपनी पिछली ग़लतियों के लिए 2.50 करोड़ रुपए टोकन अमाउंट जमा करना होगा. साथ ही तीन साल में 100 करोड़ रुपए का एक फंड तैयार करना होगा, जिससे यहां के लोकल लोगों के हितों के लिए काम किए जा सकें.”

Anti Sterlite Protest
मई-2018 में स्टरलाइट कॉपर प्लांट के विरोध में हुए प्रदर्शन की तस्वीर. (फोटो- India Today)

तमिलनाडु सरकार पहुंची सुप्रीम कोर्ट

एनजीटी के इस फैसले के ख़िलाफ तमिलनाडु सरकार पहुंच गई सुप्रीम कोर्ट. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि किसी ट्रिब्यूनल को ये अधिकार नहीं है कि वो राज्य सरकार के फैसले को रद्द कर दे. कोर्ट ने सभी पक्षों को मद्रास हाईकोर्ट जाने के निर्देश दिए. इसी के बाद मामला मद्रास हाईकोर्ट के पास आ गया था. और अब हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले को बरकरार रखते हुए प्लांट को सील रखने के फैसले पर मुहर लगा दी है.

लोकल लोग और स्टरलाइट का क्या कहना है

स्टरलाइट का पक्ष

‘द हिंदू’ की एक स्टोरी के मुताबिक, स्टरलाइट कॉपर के सीईओ पंकज कुमार का कहना है –

“ये फैसला स्टरलाइट कॉपर के हजारों कर्मचारियों और छोटे व्यवसायियों के लिए निराशाजनक है. वे इस प्लांट के संचालन पर ही निर्भर हैं. हमारा देश तांबे के आयात के लिए शत्रु पड़ोसियों पर निर्भर होने के लिए मजबूर है, तब कुछ ताकतें देश के एक स्वतंत्र तांबा निर्माता की क्षमता को बेकार करने की साजिश कर रही हैं.”

स्थानीय लोगों का पक्ष

लोकल लोग तो करीब दो दशक से ही इस प्लांट से नाख़ुश हैं. बेशक उन्हें इससे रोजगार मिल रहा है, लेकिन इसकी बड़ी कीमत गंदी हवा-पानी के रूप में चुकानी पड़ रही है. इस प्लांट का अनुमान के मुताबिक, हर साल करीब चार लाख टन का प्रॉडक्शन है. इतनी बड़ी यूनिट से बड़ी मात्रा में ही कचरा हवा-पानी में मिल रहा है. आरोप है कि अंडरग्राउंड वाटर की स्थिति काफी ख़राब हो चुकी है.

पर्यावरणविदों का भी कहना रहा है कि भारी मात्रा में तांबा गलाए जाने के कारण यहां ग्राउंड वॉटर प्रदूषित हो रहा है, जिससे कई गंभीर बीमारियां हो रही हैं.

क्या वाकई प्लांट से प्रदूषण हो रहा था?

इसका जवाब चेन्नई के एनजीओ चेन्नई सॉलिडेरिटी ग्रुप की एक रिपोर्ट में छिपा है. दिसंबर-2019 में ये रिपोर्ट आई थी, जो कह रही थी –

“जबसे प्लांट बंद हुआ है, तब से तूतीकोरिन की हवा काफी साफ हुई है. अप्रैल-2017 से मार्च-2018 के बीच 56 फीसदी समय यहां का एयर इंडेक्स पूअर (खराब) रहा था. वहीं अप्रैल-2018 से मार्च-2019 के बीच ये आंकड़ा गिरकर 27 फीसदी पर आ गया. यानी आधे पर. क्योंकि मई-2018 में प्लांट ही सील हो गया था.”

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, असल में ये कॉपर स्मलेटिंग (गलाने का) प्लांट 90 के दशक की शुरुआत में महाराष्ट्र के रत्नागिरि में लगाने की योजना थी. लेकिन वहां के निवासियों को पहले ही आभास हो गया कि ये प्लांट पर्यावरण और उनकी सेहत के लिए लंबे समय में हानिकारक सिद्ध हो सकता है. वहां पर प्लांट का तब तक विरोध किया गया, जब तक कि ये हटा नहीं. आख़िरकार राज्य सरकार ने 15 जुलाई 1993 को रत्नागिरि प्लांट की अनुमति को रद्द कर दिया. इसके बाद ही वेदांता ने प्लांट को तूतीकोरिन ले जाने का फैसला किया था.


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