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शिवराज ने 'मध्य प्रदेश के बच्चों' को नौकरी देने की बात कही, दूसरे राज्यों में क्या स्थिति है

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि राज्य में सरकारी नौकरियां ”मध्य प्रदेश के बच्चों” को ही मिलेंगी. उन्होंने बताया कि इसके लिए वो आवश्यक कानूनी प्रावधान कर रहे हैं. उनका ये भी कहना है, ”मध्य प्रदेश के संसाधन मध्य प्रदेश के बच्चों के हैं.”

यहां एक टर्म है- प्रदेश के बच्चे. सन ऑफ सॉइल. भूमिपुत्र. ये कोई नई बात नहीं है. इनसाइडर-आउटसाइडर वाली आजकल की सोशल मीडिया वाली बहस सिर्फ बॉलीवुड तक महदूद नहीं है. क्षेत्रीय अस्मिता वाली राजनीति में इसका अपना हिस्सा रहा है. शिवराज मामा ने बस इसे आगे बढ़ाया है.

कहा जा रहा है कि राज्य में आगामी उपचुनाव भी ‘संभालने’ हैं. शिवराज से पहले जुलाई 2019 में एमपी के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा था कि प्राइवेट सेक्टर में 70 फीसदी नौकरियां मध्य प्रदेश के युवाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी. कमलनाथ ने कहा था कि इसके लिए कानून भी लाया जाएगा. हालांकि तब शिवराज ने इस पर कमलनाथ को घेरा था. यही राजनीति है.

क्या राज्य क्षेत्र के आधार पर आरक्षण दे सकते हैं 

हमारे देश में नौकरियों में जाति आधारित आरक्षण की व्यवस्था पहले से है. इसके अलावा आर्थिक आधार पर सामान्य वर्ग के लिए 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान भी हाल ही में लागू किया गया. इसके पीछे तर्क है कि समाज में हाशिए वाले वर्गों को हिस्सेदारी और प्रतिनिधित्व मिले. लेकिन क्या क्षेत्र के आधार पर किसी को नौकरियों में आरक्षण दिया जा सकता है?

कई राज्य ‘अपने’ लोगों को सरकारी नौकरियां देने की वकालत करते रहे हैं. जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, झारखंड, आंध्र प्रदेश, मेघालय, असम समेत कई राज्यों में ऐसी व्यवस्थाएं या तो लागू हैं या इन्हें लागू करने की कोशिशें चल रही है. इसके लिए ‘मूल निवासी’ या ‘डोमिसाइल’ शब्द प्रयोग होते हैं. मतलब स्थानीय लोगों को नौकरियों में या किसी सुविधा में वरीयता देना. कहीं इसका प्रतिशत ज़्यादा होता है, कहीं कम. मध्य प्रदेश के मामले में इसे 100 फीसदी स्थानीय लोगों के लिए लागू करने की बात कही गई है.

लेकिन संविधान क्या कहता है

जिस संविधान से देश चलता है या चलना चाहिए, उसमें राज्य की तरफ से ‘जन्मस्थान’ के आधार पर भेदभाव न करने और ‘अवसर की समानता’ की बात कही गई है. इसके लिए संविधान के तीन आर्टिकल का ज़िक्र यहां ज़रूरी है. संविधान के भाग-3 में मूल अधिकारों की बात है. इनमें एक मूल अधिकार समता का अधिकार है. आर्टिकल 14 में कहा गया है कि राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता से या कानून के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा. आर्टिकल 15 में लिखा है कि राज्य किसी नागरिक से धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, ‘जन्मस्थान’ या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा.

भारत का संविधान कहता है कि राज्य को जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए. फोटो: Twitter
भारत का संविधान कहता है कि राज्य को जन्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए. फाइल फोटो.

वहीं, इस बहस में आर्टिकल-16 (1) काफी अहम है. इसके मुताबिक, राज्य के अधीन किसी जगह पर रोज़गार या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समानता होगी.

कुछ राज्यों की स्थिति

संविधान की बातें आदर्शवादी हैं. हकीकत ये है कि क्षेत्र, भाषा के आधार पर आरक्षण देने के पीछे वोट बैंक की राजनीति और तमाम तरह के समीकरण काम करते हैं. कहीं ऐतिहासिक कारण भी हैं. कई जगह अपनी संस्कृति बचाने का हवाला दिया जाता है, खासकर आदिवासी बहुल इलाकों में.

कुछ राज्यों में सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों को लेकर क्या व्यवस्थाएं हैं, स्थानीय निवासी कौन हैं, इसके नियम राज्य के हिसाब से बदलते भी हैं.

जम्मू-कश्मीर

डोमिसाइल को लेकर नियमों के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर में सरकारी नौकरियां स्थानीय निवासियों के लिए आरक्षित हैं. लेकिन इसके अलावा कौन यहां का निवासी है, इन नियमों में हाल ही में कुछ बदलाव भी किए गए हैं. कोई व्यक्ति, जो 15 साल तक राज्य में रहा है, वो और उसके बच्चे यहां के निवासी हैं.

वो लोग जो सात साल तक जम्मू-कश्मीर में पढ़े हों और यहां की कक्षा 10 और 12 की परीक्षाओं में शामिल हुए हों, वो यहां के निवासी हैं. केंद्र सरकार के कर्मचारी, जिन्होंने 10 साल तक राज्य में सेवा दी हो, वो राज्य के निवासी हैं. इन कर्मचारियों के बच्चे भी सरकारी नौकरी के लिए अप्लाई कर सकते हैं. आर्टिकल 370 हटने से पहले जम्मू-कश्मीर में राज्य के विषयों के लिए नौकरियां आरक्षित थीं.

जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 हटने के बाद डोमिसाइल नियमों में बदलाव किए गए हैं. सांकेतिक फोटो: India Today
जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 हटने के बाद डोमिसाइल नियमों में बदलाव किए गए हैं. सांकेतिक फोटो: India Today

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के संदर्भ में इनसाइडर-आउटसाइडर वाली डिबेट खूब होती है. ये बात वहां की राजनीति पर भी हावी है और नौकरियों में भी. यहां मराठी भाषा में पारंगत स्थानीय निवासियों को सरकारी नौकरी दी जाती है. स्थानीय का मतलब, किसी शख्स का यहां घर हो और वो 15 साल से ज़्यादा समय से यहां रहा हो. हालांकि नौकरियों में आवेदन के लिए कर्नाटक के बेलगाम ज़िले के निवासियों को छूट दी गई है. बेलगाम में बड़ी संख्या में मराठीभाषी रहते हैं और इस वजह से महाराष्ट्र लंबे समय से बेलगाम पर अपना दावा करता आया है.

गुजरात

राज्य के श्रम और रोजगार विभाग का 1995 का सरकारी प्रस्ताव कहता है कि राज्य सरकार के किसी उपक्रम-उद्योग में कर्मचारियों, कारीगरों के चयन में कम से कम 85 फीसदी और मैनेजर, सुपरवाइजर जैसे पदों पर 60 फीसदी स्थानीय निवासी होंगे.

असम

असम में स्थानीय निवासियों के लिए कोई आरक्षण तो नहीं है, लेकिन गृह मंत्रालय की तरफ से नियुक्त कमिटी ने राज्य सरकार के अलग-अलग स्तरों और प्राइवेट सेक्टर में असम अकॉर्ड की धारा 6 के तहत असम के लोगों के लिए 80 से 100 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की है.

मेघालय

राज्य सरकार की नौकरियों में खासी, जयंतिया और गारो जनजातियों को मिलाकर 80 फीसदी का आरक्षण मिलता है. दूसरी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को 5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है.

अरुणाचल प्रदेश

यहां अनुसूचित जनजातियों के लिए सरकारी नौकरियों में 80 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है.

देश में रोजगार की स्थिति के बीच कोई राज्य सरकार क्षेत्र वाला कार्ड खेलकर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश भी करती हैं. सांकेतिक फोटो: India Today
देश में रोजगार की स्थिति के बीच कोई राज्य सरकार क्षेत्र वाला कार्ड खेलकर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश भी करती हैं. सांकेतिक फोटो: India Today

कर्नाटक

यहां जाति आधारित आरक्षण की ही व्यवस्था है. हालांकि अप्रत्यक्ष तरीके से देखें, तो राज्य सरकार की नौकरियों में 95 फीसदी लोग स्थानीय हैं.

छत्तीसगढ़

बस्तर इलाके को छोड़कर दूसरे किसी ज़िले में सरकारी नौकरी में स्थानीय लोगों के आरक्षण का प्रावधान नहीं है. आदिवासी बहुल बस्तर के सात ज़िलों में, केवल तीसरी और चौथी श्रेणी की सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों को 100 फीसदी आरक्षण दिया गया है.

उत्तराखंड

कक्षा 3 और कक्षा 4 में खाली जगहें सिर्फ स्थानीय निवासियों से भरी जाती हैं. अप्लाई करने वालों को एक निवास प्रमाण पत्र देना होता है कि वो कम से कम 15 साल से राज्य में रह रहे हैं.

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश में कोई भी व्यक्ति सरकारी नौकरी के लिए अप्लाई कर सकता है.

पश्चिम बंगाल

यहां नौकरियों के लिए स्थानीय लोगों के लिए कोई आरक्षण नहीं है, लेकिन राज्य सरकार के कुछ पदों के लिए बांग्ला लिखना और पढ़ना आना अनिवार्य है.

केरल

यहां भारत का कोई भी नागरिक नौकरियों के अप्लाई कर सकता है.

देश में क्षेत्र के आधार पर आरक्षण के कई मामलों में अलग-अलग कोर्ट ने इसे असंवैधानिक माना है. सांकेतिक फोटो: India Today
देश में क्षेत्र के आधार पर आरक्षण के कई मामलों में अलग-अलग कोर्ट ने इसे असंवैधानिक माना है. सांकेतिक फोटो: India Today

कोर्ट और कानून का क्या स्टैंड है

ज़्यादातर मामलों में कोर्ट की तरफ से जन्म या क्षेत्रीय आधार पर आरक्षण दिए जाने को लेकर सख्ती दिखाई गई है. कुछ उदाहरण-

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2019 में उत्तर प्रदेश सबऑर्डिनेट सर्विस सेलेक्शन कमीशन (UPSSC) के नौकरी वाले नोटिफिकेशन को रद्द कर दिया था. इसमें राज्य की निवासी महिलाओं को तरजीह देने का नियम रखा गया था.

झारखंड में 100 फीसदी स्थानीय लोगों के लिए आरक्षण की कोशिशें जारी हैं. आदिवासी बहुल झारखंड के 24 में से 13 ज़िले अधिसूचित क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं. राज्य सरकार ने पिछले दिनों शिक्षक नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की और इन 13 ज़िलों में 100 फीसदी पद स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित कर दिए. हाई कोर्ट में इसे चुनौती दी गई. सितंबर 2019 में कोर्ट ने माना कि 100 फीसदी आरक्षण ठीक नहीं है और नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी.

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी की सरकार ने एक ऐक्ट पारित किया था, जिसका नाम था ‘आंध्र प्रदेश एंप्लॉयमेंट ऑफ लोकल कैंडिडेट इन इंडस्ट्रीज/फैक्ट्रीज एक्ट, 2019.’ इस ऐक्ट के जरिए जगनमोहन रेड्डी की सरकार ने राज्य के लोगों के लिए नौकरी में 75 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू की थी. हालांकि इसे आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है. कोर्ट ने कहा था कि ये कानून असंवैधानिक हो सकता है.

2002 में सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में सरकारी शिक्षकों की नियुक्ति को अवैध करार दिया था. कहा गया कि यहां स्टेट सेलेक्शन बोर्ड ने एक खास ज़िले और उसके आस-पास के ग्रामीण क्षेत्र के आवेदकों को भर्ती में तरजीह दी.

# इसके अलावा हरियाणा सरकार भी राज्य के युवाओं को 75 फीसदी आरक्षण देने की बात कह रही है.


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