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मदरसों में आखिर पढ़ाया क्या-क्या जाता है?

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11 जून, 2019. केंद्र में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने दो घोषणाएं की. पहली घोषणा ये कि सरकार अगले पांच साल में पांच करोड़ अल्पसंख्यक छात्रों को प्री-मैट्रिक और पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप देगी. इस स्कॉलरशिप में 50 फीसदी हिस्सा लड़कियों का होगा. सरकार के फैसले के मुतबिक आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग की लड़कियों के लिए बेगम हजरत महल बालिका स्कॉलरशिप दी जाएगी.

मुख्तार अब्बास नक़वी केंद्र में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री हैं. (फोटोःपीटीआई)
मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा है कि अगले पांच साल में अल्पसंख्यकों के बच्चों के लिए नई स्कॉलरशिप शुरू की जाएगी.

सरकार की ओर से दूसरी घोषणा ये की गई कि देश भर के मदरसों का आधुनिकीकरण किया जाएगा. अब इन मदरसों में हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और कंप्यूटर जैसे सब्जेक्ट्स पढ़ाए जाएंगे. इसके लिए मदरसों के शिक्षकों को अलग से ट्रेनिंग दिलवाई जाएगी. सरकार ने फैसला किया है कि अल्पसंख्यक बच्चों की शिक्षा के लिए पढ़ो और बढ़ो जागरूकता अभियान चलाया जाएगा. इस कड़ी में पहले चरण में देश के 60 अल्पसंख्यक बहुल जिलों को चयनित किया जाएगा. इन दोनों फैसलों के बाद सबसे बड़ा सवाल मदरसों को लेकर शुरू हो गया है.

क्या होते हैं मदरसे?

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मदरसे भी और दूसरे सरकारी या प्राइवेट स्कूलों की ही तरह होते हैं. इनमें इस्लामी तालीम के अलावा और भी विषयों की पढ़ाई होती है.

मदरसे आम सरकारी और प्राइवेट स्कूलों की तरह ही होते हैं. इन्हें इस्लाम की तालीम देने के लिए बनाया गया था. वक्त के साथ जब मदरसों में छात्रों की संख्या बढ़ी तो सबको ये महसूस हुआ कि इस्लामी तालीम हासिल करके ज़िंदगी की रोजमर्रा की ज़रूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता है. इसलिए 80 के दशक में कुछ मदरसों में दूसरे स्कूलों की तरह हिंदी, अंग्रेजी और दूसरी भाषाएं भी पढ़ाई जाने लगीं. लेकिन ये व्यवस्था कुछ ही मदरसों तक कायम रहीं. देश के अधिकांश मदरसों में अब भी सिर्फ इस्लामिक शिक्षा ही दी जाती है.

कैसे होती है पढ़ाई?

मदरसों में भी बच्चे कोई तराना गाकर या खुदा की इबादत करके दिन की शुरुआत करते हैं.
मदरसों में भी बच्चे कोई तराना गाकर या खुदा की इबादत करके दिन की शुरुआत करते हैं.

मदरसों में भी ठीक उसी तरह से पढ़ाई होती है, जैसे किसी कॉन्वेंट स्कूल में होती है. जैसे कुछ कॉन्वेंट या प्राइवेट स्कूलों में दिन की शुरुआत सरस्वती वंदना से होती है, जो या कुंदेनदुतुषार हार धवला हो होती है या फिर वर दे वीणा वादिनी वर दे होती है या फिर ओ माई गॉड, ऑल ऑनर इज इन यू होती है. ठीक वैसे ही मदरसों में भी अलग-अलग तरीके से शुरुआत होती है. कुछ मदरसों में अल्लामा इकबाल के लिखे गीत सारे जहां से अच्छा गाया जाता है, तो कुछ जगहों पर लब पे आती है बन के तमन्ना मेरी गाया जाता है. जो कुछ बड़े मदरसे हैं, उनके अपने तराने होते हैं. जो मदरसे सूफी परंपरा के हैं, उनमें सुफियाना सलाम गाया जाता है. कुल मिलाकर मदरसों में भी दिन की शुरुआत तराने से होती है, जैसे और दूसरे स्कूलों में प्रार्थना से होती है.

क्या होती है पढ़ाई?

उत्तर प्रदेश में अंबेडकरनगर के एक मदरसे से तालीम हासिल करने वाले मोहम्मद सलीम ने दी लल्लनटॉप से बातचीत में बताया कि दूसरे स्कूलों की तरह यहां भी पढ़ाई होती है. जैसे किसी स्कूल में क्लासेज 1, 2 या फिर पहली दूसरी होती है, उसी तरह से मदरसों में भी क्लासेज चलती हैं. शुरुआत ऊला से होती है. फिर सानिया होता है, उसके बाद सालसा, राबया, खामेशा, सादेसा, साबेया और सामेन की क्लास होती है. आम फहम भाषा में सानिया को हाई स्कूल कहा जा सकता है. राबया और खामेशा तक पढ़ने वाले को मौलवी की डिग्री दे दी जाती है. सादेसा को ग्रैजुएशन माना जा सकता है, जिसमें आलिम की डिग्री मिल जाती है. साबेया और सामेन को फाजिल की डिग्री दी जाती है और ये एमए के बराबर कही जा सकती है. इसके बाद अगर किसी को पढ़ना होता है, तो वो रिसर्च करता है और उसे मुफ्ती की डिग्री मिल जाती है.

मदरसों में भी स्कूलों की तरह अलग-अलग क्लास होती हैं.
मदरसों में भी स्कूलों की तरह अलग-अलग क्लास होती हैं.

लखनऊ के नदवा मदरसे के मौलाना रहमान ने बताया कि अलग-अलग मदरसों में क्लासेज के नाम अलग-अलग है. कुछ मदरसों में प्राइमरी, जूनियर और हायर एजुकेशन में पूरी शिक्षा को बांटा गया है. प्राइमरी एजुकेशन को इब्तिदाइया कहा जाता है, जो पांच या छह साल का होता है. जूनियर एजुकेशन के लिए सानविया का इस्तेमाल होता है, जो चार साल का होता है. इसके बाद आलिया होता है, जिसकी मदरसों में मान्यता ग्रैजुएशन तक होती है, लेकिन सरकारी तौर पर इसकी मान्यता इंटरमीडिएट की ही है. इसके बाद हायर एजुकेशन के लिए उलिया होता है, जो दो साल का होता है.

लखनऊ के एक रिसर्च स्कॉलर तारिक ने बताया कि कुछ मदरसों में दो तरह से पढ़ाई होती है. एक होता है मकतब, जिसमें एक से पांच तक की पढ़ाई होती है. अगर किसी को इस्लामिक शिक्षा लेनी हो तो वो पांचवी क्लास के बाद आलमियत में चला जाता है. फिर वहां से वो आलिम और आगे की पढ़ाई कर सकता है. अगर किसी को इस्लामिक शिक्षा के अलावा और भी दुनियावी तालीम लेनी हो तो उसे मदरसे में और आगे पढ़ना पढ़ता है. आम तौर पर किसी मदरसे में और दूसरे स्कूलों की तरह 8 क्लासेज होती हैं, जिनमें इस्लामिक थियॉलजी, इस्लामिक रिवोल्यूशन, अरबी, कुरआन और अरबी साहित्य पढ़ाते हैं. इसके अलावा मदरसे में पांच वक्त की नमाज़ भी पढ़ाई जाती है. तारिक ने बताया कि देश में करीब 37,000 मदरसे हैं और देश में करीब 30,000 ऐसे लोग हैं, जिन्हें कुरआन पूरी याद है.

स्कूलों से कैसे अलग होते हैं मदरसे?

मदरसों को मदरसा बोर्ड से एफिलेशन मिलता है. ठीक वैसे ही, जैसे किसी और स्कूल को राज्य के बोर्ड या सीबीएसई बोर्ड या आईसीएसई बोर्ड से एफिलेशन मिलता है.
मदरसों को मदरसा बोर्ड से एफिलेशन मिलता है. ठीक वैसे ही, जैसे किसी और स्कूल को राज्य के बोर्ड या सीबीएसई बोर्ड या आईसीएसई बोर्ड से एफिलेशन मिलता है.

जिस तरह से कोई स्कूल या तो राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त होता है या फिर वो सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड से मान्यता प्राप्त होता है, ठीक उसी तरह से मदरसों को भी अलग-अलग राज्य सरकारों के मदरसा बोर्ड से मान्यता मिली होती है. जैसे उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद है, जिसे यूपीएमएसपी कहते हैं. आम फहम भाष में इसे लखनऊ बोर्ड भी कहा जाता है. दूसरे राज्यों के भी ऐसे ही मदरसा बोर्ड होते हैं. उच्च शिक्षा के लिए कई अलग-अलग यूनिवर्सिटीज ने मदरसों को मान्यता दे रखी है. जैसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिल्लिया यूनिवर्सिटी, जेएनयू और हैदराबाद की मौलाना आजाद यूनिवर्सिटी ने कई मदरसों को मान्यता दे रखी है. मदरसों से निकलने वाले छात्रों का इन यूनिवर्सिटीज में दाखिला हो जाता है. लखनऊ का नदवा तुलुम हो या फिर सहारपुर का दारुल उलूम देवबंद या फिर आजमगढ़ के बिलरियागंज का जमीयत-उल-दावा, यहां से पढ़कर निकले लोग आईएएस और आईपीएस से लेकर मेडिकल के क्षेत्रों में भी काम कर रहे हैं.

दो तरह के होते हैं मदरसे

पूरे देश में दो तरह के मदरसे हैं. एक मदरसे तो वो हैं, जो चंदे से चलते हैं और दूसरे वो हैं जिन्हें सरकार की ओर से फंड मिलता है. मदरसों में भी बोर्डिंग की सुविधा होती है. यानी की मदरसों में रहकर भी पढ़ाई की जा सकती है. इसके अलावा लड़कियों के लिए अलग से मदरसे होते हैं, जिन्हें कुल्लिया कहा जाता है. देश में इनकी संख्या बेहद ही कम है. अब सरकार ऐसे ही मदरसों को मॉडर्न बनाने और उनमें कंप्यूटर के साथ ही अंग्रेजी शिक्षा देने की बात कह रही है.

1996 से ही चल रही है बात

देश में मुस्लिमों की हालत पता करने के लिए बनी सच्चर कमिटि के मेंबर रहे और फिलवक्त जकात फाउंडेशन चलाने वाले रिटायर्ड आईआरएस जफर महमूद ने बताया कि मदरसों के आधुनिकिकरण की बात तो 1996 से ही चल रही है. इसकी शुरुआत तो तभी हो गई थी, जब एचडी देवेगौड़ा प्रधानमंत्री थे. लेकिन उसके बाद इंद्रकुमार गुजराल से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह तक की सरकारें आईं और गईं. नरेंद्र मोदी सरकार ने भी पांच साल पूरे कर लिए, लेकिन कोई भी सरकार इस दिशा में आगे नहीं बढ़ पाई.

स्मृति ईरानी 2014 में अमेठी से चुनाव हार गई थीं. इसके बावजूद उन्हें मोदी कैबिनेट में शामिल किया गया. वो मानव संसाधन विकास मंत्री रहीं. टेक्सटाइल मिनिस्ट्री भी रही उनके पास.
स्मृति ईरानी ने 2014 में लोकसभा में बताया था कि मदरसों के आधुनिकीकरण के लिए पैसे दिए जा रहे हैं.

तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने 3 दिसंबर, 2014 को लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि केंद्र सरकार की ओर से 2008-09 से ही मदरसों के लिए दो तरह के कार्यक्रम चला रही है. पहला है मदरसों में अच्छी शिक्षा देना (Scheme for Providing Quality Education in Madarsas-SPQEM) और दूसरा है प्राइवेट ऐडेड या नॉन ऐडेड माइनॉरिटी इंस्टीट्यूट्स के इन्फ्रास्ट्रक्टर का विकास करना (Scheme for Infrastructure Development in Private Aided/Unaided Minority Institutes). स्मृति ईरानी ने उस वक्त बताया था कि SPQEM के तहत उन मदरसों को आर्थिक मदद दी जाती है जिनमें आधुनिक विषय जैसे विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान, हिंदी और अंग्रेजी जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं. स्मृति ईरानी ने कहा था कि 2014-15 में मदरसों के आधुनिकिकरण के लिए 100 करोड़ रुपये दिए गए थे.

स्मृति ईरानी की बात की पुष्टि करने हुए पत्र सूचना कार्यालय ने ये प्रेस रीलीज़ जारी की थी.
स्मृति ईरानी की बात की पुष्टि करने हुए पत्र सूचना कार्यालय ने ये प्रेस रीलीज़ जारी की थी.

क्या है एसपीक्यूईएम?

एसपीक्यूईएम के तहत केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने मदरसों के आधुनिकीकरण की सिफारिश की थी. इसके तहत मदरसों में गणित, विज्ञान, अंग्रेज़ी, कंप्यूटर और सामाजिक विज्ञान पढ़ाने की सिफारिश की गई थी. मदरसा बोर्ड ने मदरसों के बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए एनसीईआरटी की किताबें भी सिलेबस में शामिल करने की बात कही गई थी. इस योजना के तहत केंद्र सरकार पोस्ट ग्रैजुएट शिक्षकों को 12 हज़ार रुपये और ग्रैजुएट शिक्षकों को 6 हज़ार रुपये हर महीने देती भी है.

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कुछ मदरसों में कंप्यूटर की व्यवस्था हो गई है और वहां बच्चों को इसकी शिक्षा भी दी जा रही है.

जफर महमूद ने दी लल्लनटॉप से बातचीत में कहा-

सरकार की ये पहल बेहद अच्छी है. इसकी कोशिश तो 1996 से ही हो रही है, लेकिन मदरसा चलाने वालों में आत्मविश्वास की इतनी कमी है कि वो उसे आधुनिक नहीं बना पा रहे हैं. उन्हें लगता है कि अगर सरकार मदरसों का आधुनिकिकरण करेगी, तो फिर मदरसे में दी जाने वाली इस्लामी तालीम पर भी असर पड़ेगा. ऐसे में सरकार भी घोषणा के अलावा कुछ नहीं कर पा रही और मदरसे भी इसके लिए आगे नहीं आ रहे.

जफर महमूद के मुताबिक-

सरकारें घोषणाएं करती हैं. अंग्रेजी में उसका ड्राफ्ट भी तैयार कर देती हैं. लेकिन जब तक उसका ट्रांसलेशन उर्दू या अरबी में नहीं होता, कोई फायदा नहीं होगा. ऐसा इसलिए है, क्योंकि अगर मदरसों में पढ़ने वालों को या फिर पढ़ाने वालों को ही इतनी अंग्रेजी आती, तो फिर इस बात की ज़रूरत ही नहीं पड़ती कि मदरसों में अंग्रेजी पढ़ाई जाए. या फिर कंप्यूटर पढ़ाया जाए.

जफर महमूद ने बताया कि मदरसों में अंग्रेजी और विज्ञान की शिक्षा की शुरुआत तो 80 के ही दशक में हो गई थी. लेकिन जब बाबरी मस्जिद गिरी तो देश में एक अलग तरह का माहौल बन गया. और इसकी वजह से आजादी के करीब 45-50 सालों में हिंदु-मुस्लिम के बीच की जो खाई भरती नज़र आ रही थी, वो और भी बढ़ गई. इसके बाद से जब भी मदरसों के आधुनिकिकरण की बात होती, मदरसा चलाने वाले कुछ लोगों को ये लगने लगता कि इसी के सहारे उनकी धार्मिक आस्थाओं को चोट पहुंचाई जा सकती है. ऐसे में मदरसों के आधुनिकिकरण की कोई कोशिश नहीं हुई.

मदरसों के सिलेबस में बदलाव की बात लंबे समय से हो रही है.
मदरसों के सिलेबस में बदलाव की बात लंबे समय से हो रही है.

वहीं दिल्ली के फतेहपुरी मस्जिद में चल रहे मदरसे में पढ़ाने वाले कारी इसरारुल हक कासमी ने कहा-

सरकार का ये फैसला अच्छा है. लेकिन सरकार को इस बात का ध्यान रखना ही होगा कि वो धार्मिक मसले में हस्तक्षेप न करे. सरकार मदरसों के लिए बजट अलाट करे, मदरसों के शिक्षकों के लिए ट्रेनिंग की व्यवस्था करे, मदरसों को हाई टेक करे, इससे किसी को ऐतराज नहीं है. लेकिन धार्मिक मसलों से छेड़छाड़ किसी कीमत पर नहीं होनी चाहिए. आप अपने धर्म का पालन करिए, हम अपने धर्म का पालन करें और संविधान हमें इस बात की इज़ाजत देता है.

कासमी ने कहा-

मदरसे अपने दीनी तालीम देने के मकसद में तो कामयाब हैं, क्योंकि इस्लाम जीने का सलीका सिखाता है. लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नौकरी चाहिए और नौकरी सिर्फ आधुनिक शिक्षा से मिलेगी. इस दिशा में मदरसे पीछे हैं. ऐसे में अगर मोदी सरकार मदरसों और उसके शिक्षकों को मॉर्डन बनाती है, तो ये एक बेहतर कदम है.

दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष और मुस्लिमों के लिए कई शिक्षण संस्थान चला रहे कमाल फारूकी ने भी इसरारुल हक कासमी की ही बात को आगे बढ़ाया है. उन्होंने कहा कि अगर मोदी सरकार मदरसों में बिना किसी छेड़छाड़ और बदलाव किए आधुनिक शिक्षा की व्यवस्था करती है, तो यह स्वागत योग्य कदम है. उन्होंने कहा कि मदरसों के शिक्षकों को ट्रेनिंग देने के साथ-साथ अगर सरकार वहां इग्नू और NIOS (nation institute of open schooling) के सेंटर खोलकर आधुनिक शिक्षा से जोड़ती है, तो कोई ऐतराज नहीं है. कमाल फारुकी ने कहा कि अगर सरकार ये एक आदेश जारी कर दे कि मदरसे से निकलने वाले छात्रों को देश के अलग-अलग यूनिवर्सिटी में एडमिशन दिया जाएगा, तो ये एक बड़ा कदम होगा.

जामिया जैसी यूनिवर्सिटी मदरसे से तालीम पाने वाले बच्चों को एडमिशन देती है.
जामिया जैसी यूनिवर्सिटी मदरसे से तालीम पाने वाले बच्चों को एडमिशन देती है.

लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस मुशावरत के महासचिव मौलाना हामिद नोमानी पीएम मोदी के इस कदम से इत्तेफाक नहीं रखते हैं. उन्होंने कहा कि मदरसों को मॉडर्न एजुकेशन से जोड़ने के लिए किसने रोक रखा है. लेकिन मोदी सरकार कुछ करने के बजाय सिर्फ मुद्दा बनाकर चर्चा में रहना चाहती है.

कुल मिलाकर केंद्र सरकार एक बार फिर से मदरसों के आधुनिकीकरण की योजना बना रही है. सरकार योजना को कितना अमलीजामा पहना पाती है, ये तो नहीं पता, लेकिन देश के अधिकांश लोग और खास तौर से मुस्लिम नेता केंद्र सरकार की इस पहल की तारीफ ही कर रहे हैं.


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