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लॉकडाउन: कोटा में फंसे छात्रों की आपबीती, ATM कार्ड का PIN तक मांग रहे मकान-मालिक

कोटा. राजस्थान का एक छोटा-सा शहर. आईआईटी और मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी करवाने वाले इंस्टीट्यूट का हब. 2019 में एक वेब सीरीज आई थी. नाम था- कोटा फैक्ट्री. फिक्शन थी. इसमें वैभव पांडे मेन कैरेक्टर था. वैभव के ‘कोटा सर्वाइवल’ और ‘अस्तित्व के संकट’ को दिखाया गया था. ये तो एक बेव सीरीज की कहानी थी. लेकिन इस लॉकडाउन में कोटा में फंसे हजारों स्टूडेंट के सामने सर्वाइवल का संकट पैदा हो गया है.

घर से हजारों किलोमीटर दूर रह रहे इन बच्चों को डर लग रहा है कि कहीं उन्हें भी कोरोना न हो जाए. कोटा में अब तक कोरोना के 50 से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं. ऐसे में ये बच्चे अपने घर जाना चाहते हैं. कैसे भी करके. कोटा में रहने वाले बच्चों ने ‘दी लल्लनटॉप’ को मेल किए. इनमें से कुछ लोगों से हमने बात की. जानिए वो क्या कह रहे हैं?

नाम- रूमा परवीन
कहां से हैं- गया, बिहार
कहां रहती हैं- कोटा लैंडमार्क सिटी

रूमा को ट्यूबरक्लोसिस यानी टीबी की शिकायत है. दवा चलती है. लॉकडाउन में उनकी दवाई खत्म हो गई थी. वो बताती हैं कि बड़ी मुश्किल से किसी तरह अरेंज किया. उनका कहना है कि हॉस्टल में बहुत मुश्किल से दिन कट रहे हैं. खाना भी नहीं मिलता. रूमा बताती हैं,

हॉस्टल में थोड़ा-थोड़ा खाना मिल रहा है. पेट नहीं भरता. साफ-सफाई बंद हो गई है. वॉशरूम गंदा रहने लगे हैं. एक छोटे से कमरे में दिनभर बंद रहना पड़ता है. घर जाने के लिए गाड़ी का इंतजाम नहीं हो पाया. मम्मी-पापा से बात कर इमोशनली फ्रस्टेट हो रहे हैं. पढ़ाई नहीं हो पा रही है. हम किसी भी तरह घर जाना चाहते हैं.

नाम– सग्निका भट्टाचार्य
कहां से हैं– अगरतला-त्रिपुरा
कहां रहती हैं– कोटा लैंडमार्क सिटी

लॉकडाउन की घोषणा से साथ ही सग्निका ने घर जाने के लिए फ्लाइट टिकट बुक कराई. 25 मार्च की, लेकिन कैंसिल हो गई. उन्हें उम्मीद थी कि 21 दिनों का लॉकडाउन खत्म होने के बाद वो अपने घर जा सकेंगी. उन्होंने 17 अप्रैल का टिकट बुक कराया. लेकिन लॉकडाउन बढ़ने से फ्लाइट कैंसिल हो गई. सग्निका कहती हैं,

मैं अपने घर जाना चाहती हूं. मेरे राज्य में कोरोना के मामले बहुत कम हैं. कोटा में लगातार मामले बढ़ रहे हैं. हमें डर लग रहा है, कहीं हमें भी न हो जाए. रेंट के लिए हमें बार-बार बोला जा रहा है. बाहर नहीं जा सकते. इसलिए एटीएम कार्ड मांगा जा रहा है. साथ ही पिन बताने के लिए कहा जा रहा है, ताकि वो रेंट के पैसे निकाल लें. हम क्यों दें अपना एटीएम कार्ड और क्यों बताएं अपना पिन किसी को?

नाम– अमित भगत
कहां से हैं- महाराष्ट्र नांदेड़
कहां रहते हैं- कोटा-इंद्रविहार

कोटा से लगभग 850 किलोमीटर दूर नांदेड़ के रहने वाले अमित भगत भी बाकी बच्चों की तरह किसी तरह घर जाना चाहते हैं. उनका कहना है कि अगर बच्चों में कोरोना फैलना शुरू हुआ, तो दिक्कत बढ़ जाएगी. अमित भगत कहते हैं,

हम दोस्तों में से किसी को कोरोना नहीं है. यहां पढ़ाई नहीं हो रही है. खाना भी नहीं मिल रहा है. कोचिंग वाले भी सपोर्ट नहीं कर रहे हैं. हम एक छोटे-से कमरे में बंद होकर रह गए हैं. मेंटली डिस्टर्ब हैं. कर्फ्यू पास के लिए हमने कोशिश की, लेकिन नहीं मिला. अब हमें नहीं पता कि हम कब घर जाएंगे. एक-एक दिन काटना मुश्किल हो रहा है.

नाम- अभिनव जायसवाल
कहां से हैं- छत्तीसगढ़, अंबिकापुर
कहां रहते हैं- खालसा हॉस्टल

अभिनव का कहना है कि हॉस्टल में हमेशा से ही खाना अच्छा नहीं मिलता है, लेकिन लॉकडाउन में ये और खराब हो गया है. उनका कहना है,

हॉस्टल में 30 बच्चे हैं. हमने ट्रेन का टिकट बुक नहीं कराया, क्योंकि पता था कि फंस जाएंगे. हम उम्मीद कर रहे थे कि कुछ दिन में लॉकडाउन खत्म हो जाएगा और हम अपने घर चले जाएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. जब पास बन रहा था, हमने कोशिश की, लेकिन बन नहीं पाया. घरवाले अलग परेशान हो रहे हैं.

नाम- वर्तिका गोयल
कहां से हैं- उत्तराखंड, देहरादून
कहां रहती हैं- जवाहर नगर

वर्तिका अन्य 25 स्टूडेंट के साथ हॉस्टल में रह रही हैं. लॉकडाउन की वजह से क्लास बंद हैं. मेंटली इतनी डिस्टर्ब हैं कि खुद से पढ़ाई नहीं कर पा रही हैं. वो किसी तरह देहरादून जाना चाहती हैं अपने मम्मी-पापा के पास. वो कहती हैं,

रहने में उतनी दिक्कत नहीं है. लेकिन कोरोना के केस बढ़ने के साथ ही हमारा डर भी बढ़ रहा है. मेस में काम करने वाले लोग हैंड सेनेटाइजर, ग्लव्स और मास्क भी नहीं लगाते. ऐसे में खाने को लेकर डर लगा रहता है. हम चाहते हैं कि सरकार हमारे माता-पिता को कोटा आने और हमें वापस लेकर जाने की इजाजत दें.

नाम- दिव्य प्रकाश
कहां से हैं- बिहार, किशनगंज
कहां रहते हैं- जवाहर नगर

दिव्य प्रकाश वेस्ट बंगाल के तीन दोस्तों के साथ रह रहे हैं. उनका कहना है कि रहने में दिक्कत नहीं है. समस्या खाने की है. खाने को लेकर माता-पिता परेशान हैं. नीतीश कुमार बाहर से लोगों को बिहार में आने नहीं दे रहे हैं.

पहले पास मिल रहा था, लेकिन अब पास मिलना बंद हो गया है. ऐसे में घर जाना और असंभव हो गया है. उनकी भी यही शिकायत है कि मेस में खाना बनाने वाले सेनेटाइजर और मास्क का इस्तेमाल नहीं करते. उन लोगों की वजह से कहीं कोरोना न फैल जाए.

ये अपने घर पहुंच गए

लेकिन सुल्तानपुर के रहने वाले जियाउर रहमान खुद को लकी मानते हैं कि वो अपने घर पहुंच गए. वो बताते हैं कि पहले चरण के लॉकडाउन खत्म होने से एक दिन पहले, यानी 13 अप्रैल को वो अपने घर पहुंच गए. 12-13 घंटे की दूरी तय करने के बाद. 14 अप्रैल से पहले जिले के डीएम पास बना कर दे रहे थे, जिससे बच्चे अपने घर पहुंच जाएं. रहमान ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर पास बनवाया और गाड़ी का इंतजाम करके अपने घर पहुंच गए.

इस समय वो होम क्वारंटीन में हैं. उनके साथ आने वाले सभी लोगों को होम कारंटीन किया गया है और मेडिकल स्टाफ नजर रख रहा है.

किस राज्य से कितने फंसे हैं

कोटा साउथ से बीजेपी के विधायक संदीप शर्मा का कहना है कि यहां छात्रों के लिए किसी चीज की कमी नहीं है. लेकिन पीएम मोदी के संदेश के बाद, जिला प्रशासन उन्हें यहां से बाहर नहीं जाने दे रहा है.

इंजीनियरिंग और मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी कर रहे लगभग 30,000 से अधिक छात्र कोटा में फंसे हुए हैं. इनमें से लगभग 7500 उत्तर प्रदेश से हैं. 6500 बिहार से, 2000 हरियाणा से, 2000 महाराष्ट्र से, 4000 मध्य प्रदेश से और बाकी अन्य राज्यों से हैं. ये छात्र चाहते हैं कि उनका टेस्ट हो. रिपोर्ट निगेटिव आने पर उन्हें घर भेज दिया जाए. इसके लिए ट्विटर छात्रों ने  #SendUsBackHome ट्रेंड चलाया, ताकि सरकार तक अपनी बात पहुंचा सकें. वहीं सरकार का कहना है कि ऐसे में लॉकडाउन का कोई मतलब नहीं रह जाएगा. जो जहां है, उसे वहीं रहना होगा.


लॉकडाउन की गाइडलाइन्स में शिक्षा, स्कूल, डिस्टेंस लर्निंग पर सरकार ने क्या कहा है?

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