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लिंगायत समाज के बीएस येदियुरप्पा को सीएम पद से हटाने से BJP कर्नाटक में खत्म हो जाएगी?

बीएसवाय. यानी कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा (BS Yediyurappa). वहां चल रहे सियासी उठापटक के केंद्र में हैं. विवाद मुख्यमंत्री की कुर्सी छिन जाने के ख़तरे से जुड़ा है. बताया गया है कि पीएम मोदी के साथ हुई हालिया मुलाकात के बाद येदियुरप्पा को सीएम पद से हटाए जाने की चर्चा शुरू हुई है. येदियुरप्पा ने खुद भी कुछ ऐसे संकेत दिए हैं. उन्होंने राजधानी बेंगलुरु में गुरुवार 22 जुलाई को पत्रकारों से बात करते हुए कहा,

“मैं 25 जुलाई का इंतजार कर रहा हूं. उस दिन बीजेपी आलाकमान जो भी फैसला लेगी, मैं उसका पालन करूंगा. मैं कर्नाटक में पार्टी को मजबूत करने और सत्ता में वापस लाने के लिए काम करूंगा.”

लेकिन इन खबरों के बीच येदियुरप्पा को विपक्षी पार्टी कांग्रेस के कई नेताओं से खुला समर्थन मिल रहा है. कारण है उनकी जाति. येदियुरप्पा वीरशैव-लिंगायत समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. इस समुदाय से कर्नाटक में बीजेपी को मज़बूत आधार मिलता है. राज्य की कुल आबादी में इनकी क़रीब 17 प्रतिशत हिस्सेदारी मानी जाती है. समुदाय के मठाधीश येदियुरप्पा के समर्थन में उतर चुके हैं. आइए समझते हैं कि इस समुदाय का कर्नाटक की राजनीति में क्या प्रभाव है.

Bs Yediyurappa Karnataka
बीजेपी नेता और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा (फाइल फोटो- PTI)

8 मुख्यमंत्री लिंगायत समुदाय से

1956 से कर्नाटक ने जिन 20 मुख्यमंत्रियों को देखा है, उनमें से 8 लिंगायत समुदाय से आते हैं. इसी से ये अनुमान लगाया जा सकता है कि कर्नाटक में राजनीतिक रूप से ये समाज कितना प्रभावशाली है. माना जाता है कि कर्नाटक की 224 विधानसभा सीटों में से लगभग 140 सीटों पर जीत के लिए लिंगायत समाज का वोट महत्वपूर्ण है. वहीं, इन 140 सीटों में से लगभग 90 ऐसी हैं जिमें लिंगायत वोट निर्णायक रहता है.

ये भी बता दें कि मौजूदा समय में कर्नाटक की 224 विधानसभा सीटों में से 100 से ज़्यादा सीटों पर लिंगायत समुदाय के नेताओं का ही कब्जा है.

इतिहास भी कुछ ऐसा ही रहा है. 1989 के चुनाव में कांग्रेस ने राज्य की 224 सीटों में से 178 सीटें जीती थीं. ये कर्नाटक में अब तक किसी भी पार्टी द्वारा जीती गई सबसे ज़्यादा सीटें हैं. तब की जीत के सूत्रधार थे लिंगायत समुदाय के नेता वीरेंद्र पाटिल. जो आगे चलकर राज्य के मुख्यमंत्री भी बने. उस वक़्त 178 कांग्रेस विधायकों में से 60 लिंगायत समुदाय से थे. हालांकि, महज़ एक साल के बाद 1990 में कांग्रेस के लिए हालात खराब हो गए. वहां रथ-यात्रा के नाम पर सांप्रदायिक दंगे भड़क गए, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने खुद राज्य का दौरा किया और उसके बाद मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल को घटना के लिए नैतिक तौर पर ज़िम्मेदार मानते हुए बर्खास्त कर दिया.

इस कदम से लिंगायत समुदाय काफी नाराज हुआ था. जानकारों के मुताबिक, ये बड़ा कारण रहा कि 1994 में हुए चुनाव में कांग्रेस 178 सीटों से खिसक कर सिर्फ 36 सीटों पर आ गई. वहीं, बीजेपी का वोट शेयर 13 प्रतिशत बढ़ गया था. 1989 के चुनाव में उसे महज 4 फीसदी वोट मिले थे, जो 1994 में 17 फीसदी हो गए. ऐसा बीजेपी को लिंगायतों का समर्थन मिलने की वजह से हुआ.

लेकिन बीजेपी भी लिंगायत समुदाय की नाराज़गी के कारण हार का स्वाद चख चुकी है. 2013 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में. तब पार्टी ने बीएस येदियुरप्पा के बिना चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया था. क्योंकि वो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे थे. इसका ख़ामियाज़ा बीजेपी को भुगतना पड़ा. और बीजेपी सत्ता से बाहर हो गई. बाद में 2019 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने ये गलती नहीं की. येदियुरप्पा के लिंगायत होने के महत्व को समझते हुए उसने उन्हीं के चेहरे पर चुनाव लड़ा और सबसे ज्यादा सीटें लाने में कामयाब हुई. बाद में राज्य की सत्ता में पार्टी की वापसी में भी येदियुरप्पा की भूमिका अहम साबित हुई. उन्हीं के नेतृत्व में बीजेपी 2019 में जेडीएस-कांग्रेस सरकार के गठबंधन को तोड़ने में कामयाब रही और किसी तरह सत्ता हासिल करने में सफल हुई.

लिंगायत संत और कांग्रेसी नेता येदियुरप्पा का समर्थन क्यों कर रहे हैं?

अब वापस मौजूदा परिस्थितियों की ओर लौटते हैं. कांग्रेस विधायक और भारत वीरशैव महासभा के अध्यक्ष शमनूर शिवशंकरप्पा खुल कर येदियुरप्पा का समर्थन कर चुके हैं. उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि येदियुरप्पा को हटाना बीजेपी के लिए खुद को नष्ट करने वाला कदम साबित होगा. इंडिया टुडे को दिए एक साक्षात्कार में शिवशंकरप्पा ने कहा,

“बीजेपी नेतृत्व को इतिहास याद रखना चाहिए. पूर्व मुख्यमंत्री एस निजलिंगप्पा, वीरेंद्र पाटिल, जेएच पटेल और एसआर बोम्मई सभी लिंगायत समुदाय से थे. अगर बीजेपी बीएस येदियुरप्पा को हटाने का प्रयास करती है तो बीजेपी खुद को नष्ट कर देगी.”

BS Yediyurappa
सीएम कुर्सी छिनने की अटकलों के बीच बुधवार को अलग-अलग समुदायों के पुजारियों से मिले बीएस येदियुरप्पा. (तस्वीर- पीटीआई)

इस बीच पूर्व मंत्री और कांग्रेस विधायक एमबी पाटिल ने ट्वीट करते हुए येदियुरप्पा को अपना समर्थन दे दिया. उन्होंने  लिखा,

“बीजेपी को लिंगायतों के ग़ुस्से का सामना करना पड़ सकता है अगर वो बड़े नेता येदियुरप्पा के साथ बुरा व्यवहार करते हैं. बीजेपी को येदियुरप्पा के योगदान को महत्व देना चाहिए, और उनके साथ सम्मान से पेश आना चाहिए. नेतृत्व में प्रस्तावित बदलाव बीजेपी का आंतरिक मामला है, लेकिन ये मेरी निजी राय है.”

हाल ही में बीएस येदियुरप्पा ने दिल्ली आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की थी. उसके बाद उन्होंने कई लिंगायत संतों से भी मुलाक़ात की. बालेहोसुर मठ के डिंगलेश्वर स्वामीजी ने ऐसी ही एक मुलाक़ात के बाद इंडिया टुडे से कहा,

“सीएम ने कहा कि वे ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं और बीजेपी आलाकमान जो भी फैसला लेगा, उसके सामने सिर झुकाएंगे. लेकिन लिंगायत मठों के जो मुखिया हैं, उनका मानना है कि अगर बीजेपी कर्नाटक में सत्ता में है तो ये सिर्फ़ और सिर्फ़ बीएस येदियुरप्पा और उनके सहयोगियों द्वारा किए गए प्रयासों की वजह से है.”

डिंगलेश्व स्वामीजी ने ये भी कहा कि भाजपा नेतृत्व ने पहले भी येदियुरप्पा को अपना कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया था. उनके मुताबिक, इससे जो ‘दर्द’ येदियुरप्पा को हुआ, उसे अभी भी समुदाय द्वारा महसूस किया जाता है. इसके बाद स्वामीजी ने कहा कि अगर बीएस येदियुरप्पा को फिर से अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले हटा दिया जाता है, तो बीजेपी कर्नाटक में नष्ट हो जाएगी. स्वामीजी का दावा है कि ऐसा कहने वाले वे अकेले नहीं हैं. उनकी मानें तो आम लोग भी यही कह रहे हैं.


वीडियो- कर्नाटक में सीएम बीएस येदियुरप्पा की कुर्सी को खतरा क्यों है?

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