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वो स्वतंत्रता सेनानी जिसकी मां ने उनका नाम लेना ही बंद कर दिया था

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बचपन में इतिहास बोरिंग सब्जेक्ट लगता था. ढेर सारी तारीखें जो याद करनी पड़ती थीं. बस एक ही चैप्टर था जो बार-बार पढ़ने का मन करता था. भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की शहादत का चैप्टर. इस चैप्टर से थ्रिल और इमोशंस की भरपूर खुराक मिल जाया करती थी. ख़ास तौर से राजगुरु से अलग सा लगाव होता था. वजह शायद ये रही हो कि उनका जन्मस्थान पुणे ज़िले में आता था और मेरी खुद की पैदाइश पुणे में हुई थी. खेड नाम की वो जगह जिसका बाद में नाम बदल कर राजगुरुनगर कर दिया गया.

राजगुरु के बारे में और जानने की लालसा ने उनपर बहुत कुछ पढ़वाया. बचपन में भी पढ़ा और बड़े होने के बाद भी खोज-खोज कर पढ़ा. जहां से जो मिला और उनमें से जो याद रहा सब प्रस्तुत है.

पेशवाई वाले पुणे में जन्म 

महाराष्ट्र हमेशा इस बात में गर्व महसूस करता आया है कि उसकी धरती पर कई विख्यात लोगों ने जन्म लिया. ख़ास तौर से पुणे का इलाका. महाराष्ट्र में देवता का दर्जा रखने वाले शिवाजी महाराज भी पुणे और उसके आसपास सक्रिय रहें. उनके बाद पुणे की पेशवाई का लंबा दौर रहा. ऐसी ऐतिहासिक ज़मीन पर 24 अगस्त, 1908 को एक बालक का जन्म हुआ. भीमा नदी के किनारे बसे खेड में. जो पुणे शहर से महज़ 40 किलोमीटर दूर था. वो बच्चा जो आगे चलकर भारत के घर-घर में पहचाना जाने वाला था. जो महज़ 22 साल की उम्र में फांसी का फंदा चूमने वाला था. जिसका नाम रखा गया शिवराम.

शिवराम अपने पिता की दूसरी पत्नी की संतान थे. उनका एक भाई था दिनकर. और तीन बहनें थीं. चंद्रभागा, वारिणी और गोदावरी. जब वो छह साल के थे तभी उनके पिता की डेथ हो गई. घर की सारी ज़िम्मेदारी बड़े भाई दिनकर के कंधों पर आ पड़ी, जो उस वक़्त दसवीं कक्षा के छात्र थे.

जब मां ने नाम लेना ही छोड़ दिया

राजगुरु के बचपन का एक दिलचस्प किस्सा है. एक बार इलाके में एक साधु घूमते हुए आया. वो काफी देर तक राजगुरु को घूरता रहा और उनकी मां से बोला-

“मां, तुम्हारा बेटा साधारण मनुष्य नहीं है. ये काशी के भगवान विश्वनाथ का वंशज है. ऐसे अवतार पापियों का नाश करने के लिए होते हैं. तुम्हारा बेटा एक दिन बहुत नाम कमाएगा.”

सादा दिल मां ने साधु के हर शब्द को दिल पर ले लिया. इसको उन्होंने इस बात से भी जोड़ लिया कि बालक का नाम शिवराम है और जो सावन के पावन महीने में पैदा हुआ है. वही महीना जो भगवान शिव का होता है. उस दिन से उन्होंने तय कर लिया कि वो बेटे को कभी नाम से पुकारने की गुस्ताखी नहीं करेंगी. उन्होंने राजगुरु को ‘बापू साहेब’ कहना शुरू कर दिया. तबसे लेकर राजगुरु की शहादत तक उन्होंने कभी उनको किसी बात के लिए नहीं टोका. मां का ये अटूट विश्वास राजगुरु की मानसिक मज़बूती का एक बड़ा कारण रहा.

अंग्रेज़ी से बेरुखी

राजगुरु बड़े ही तेज़तर्रार छात्र थे. पढ़ाई में उनकी रूचि देख घरवालों ने उन्हें संस्कृत पढ़ाने की सोची. उन्होंने उसमें भी महारत हासिल कर ली. उसके बाद उन्हें अंग्रेज़ी पढ़ाने के लिए पुणे भेजा गया. नाना का वाडा में स्थित न्यू इंग्लिश हाई स्कूल में. बड़े भाई समेत, सारे परिवार का कहना था कि उन्हें इंग्लिश में महारत हासिल करनी चाहिए. जबकि राजगुरु इंग्लिश को लो-क्लास की भाषा मानते थे. वो अपने भाई से बहस करते कि उन्हें अंग्रेज़ों की गुलामी नहीं करनी है.

भाई ने घर-निकाला दिया तो उसे वरदान माना

बढ़ती उम्र के साथ राजगुरु के हीरो बदल रहे थे. पहले आध्यात्मिक गुरुओं में शांति तलाशने का इच्छुक ये बालक बाद में बाल गंगाधर तिलक, चाफेकर बंधू और महर्षि रानडे जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को अपना आदर्श मानने लगा था. बड़े भैया दिनकर को ये बात नागवार गुज़रती. उनका आग्रह होता कि शिवराम इन नेताओं के चक्कर से दूर रहकर पढ़ाई पर ध्यान दें. और पढ़-लिखकर अंग्रेज़ी हुकूमत में कोई नौकरी पा लें. दिनकर का अंग्रेज़ी हुकूमत से लगाव शिवराम के राष्ट्रवाद के सामने खड़ा हो गया, तो ज़ाहिर है टकराव होना ही था.

1924 में किसी दिन दोनों भाइयों में तगड़ी लड़ाई हुई. दिनकर ने गुस्से में अपने 16 साल के भाई को घर से निकल जाने का फरमान सुना दिया. इस विपत्ति को राजगुरु ने अवसर माना. परिवार के बंधनों से आज़ाद होकर मुल्क की सेवा करने का अवसर. उन्होंने तुरंत मां और बड़े भाई के पैर छुए और घर से निकल गए.

इंटरनेट की भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की सबसे फेवरेट तस्वीर.
इंटरनेट की भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की सबसे फेवरेट तस्वीर.

काशी में तीन साल

जब राजगुरु ने घर छोड़ा था, तब उनके शरीर पर महज़ एक शर्ट, एक धोती और एक टोपी थी. और जेब में थे तीन आने. जिनमें से आठ पैसे उन्होंने घर से निकलते ही एक भिखारी को दे दिए थे, जो रास्ते में टकरा गया था.

घर से निकलने के बाद उनके हिस्से बहुत भटकन आई. पहला पड़ाव था नाशिक. उसके बाद तो उन्होंने झांसी, लखनऊ, कानपुर, प्रयाग सब नाप डाला. आखिरकार वो काशी पहुंचे. काशी की अपनी रिहायश के दौरान उन्होंने कई जाने-माने पंडितों से पढ़ाई की. जिनमें वेद मूर्ति बाबा पटवर्धन, मुकुंद शास्त्री पुणतांबेकर, वेद शास्त्री पाठक और वेद शास्त्री पेंद्रे जैसे दिग्गज़ शामिल थे. इन्हीं में से एक पुणतांबेकर ने आगे चलकर लाहौर षड्यंत्र केस में गवाही दी कि राजगुरु ने उनसे ही ढाई साल तक संस्कृत की पढ़ाई की थी.

बनारस के दोस्त ने आज़ाद से परिचय कराया

बनारस की रिहायश के दौरान राजगुरु की दोस्ती एक और मराठी माणूस से हुई. नाम था श्रीराम सावरगांवकर. पराई जगह जब कोई अपनी भाषा बोलने वाला मिल जाता है, तो एक मीठा सा भाईचारा स्थापित हो जाता है. ऐसा ही हुआ. दोनों की खूब जमने लगी. इसी दोस्त के सदके राजगुरु के आगे क्रांतिकारियों के संपर्क में आने का रास्ता खुला. सावरगांवकर के वीर सावरकर के भाई बाबा राव सावरकर से अच्छे रिलेशंस थे. एक और क्रांतिकारी मुनीश्वर अवस्थी से उसकी घनिष्ठता थी. अवस्थी गोरखपुर से निकलने वाले साप्ताहिक स्वराज्य के सह-सम्पादक थे. उन्हें उनके ऊंचे कद और लंबी गर्दन की वजह से ‘ऊंट साहेब’ के नाम से जाना जाता था. तो एक दिन ऊंट साहेब के सदके सावरगांवकर चंद्रशेखर आज़ाद से मिल आएं. जब लौटे तो सातवें आसमान पर थे. बल्लियों उछलते हुए उन्होंने राजगुरु को उस ख़ास मुलाक़ात के बारे में बताया. राजगुरु के दिल की धड़कन मिस हो गई. बरसों से संजोए सपने के पूरे होने की राह नज़र आने लगी.

सपना पूरा भी हुआ. एक म्यूच्यूअल फ्रेंड की मेहरबानी से कानपुर में राजगुरु की आज़ाद से वो बहुप्रतीक्षित मुलाक़ात हुई. संवाद कुछ ऐसा हुआ:

आज़ाद ने पूछा, “तो तुम क्रांतिकारी बनना चाहते हो?”

राजगुरु ने कहा, “हां, लंबे समय से मेरी कोशिशें जारी हैं.”

आज़ाद का प्रतिसवाल था, “ये जानने के बावजूद कि इसका अंजाम या तो गोलियों में बिंधी लाश होगा या फांसी का तख्ता?”

राजगुरु ने बेख़ौफ़ होकर कहा, “हां, ये जानने के बावजूद. इन छोटी-मोटी बातों की मैं परवाह नहीं करता.”

इतना काफी था. आज़ाद को लड़का पसंद आ गया और राजगुरु का बतौर क्रांतिकारी सफ़र शुरू हो गया. कहते हैं कि आज़ाद उन्हें अपने साथ ओरछा के जंगलों में ले गए और शूटिंग की ट्रेनिंग दी. इस ट्रेनिंग के नतीजे से आज़ाद खूब खुश हुए. यही वजह थी कि जब सॉन्डर्स की हत्या करने का प्लान बना तब राजगुरु को ही याद किया गया.

लाला की हत्या का बदला

आज़ाद से करीबियत होने का मतलब था भगत सिंह से मुलाकात. जल्द ही राजगुरु भगत सिंह से ऐसे घुल-मिल गए जैसे हाथ में दस्ताना फिट होता है. अब राजगुरु आज़ाद के संगठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य थे. साल आया 1928.

इस फोटो पर इनके नाम भी लिखे हुए हैं.
इस फोटो पर इनके नाम भी लिखे हुए हैं.

भारत के राजनीतिक हालात की रिपोर्ट लेने के लिए ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन को भारत भेजा. जिसकी मुखालफ़त लाला लाजपतराय ने शांति मार्च निकालकर की. पुलिस सुपरिंटेंड़ेंट जेम्स स्कॉट ने मार्च पर लाठी चार्ज करवाया. लाला लाजपत राय ने तमाम लाठियां अपने शरीर पर झेलीं. वो बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए और 17 नवम्बर, 1928 को दम तोड़ दिया. राजगुरु और भगत सिंह ने बदला लेने की ठानी. साथ थे सुखदेव थापर और चंद्रशेखर आज़ाद. उन्होंने तय किया कि लाला लाजपत राय के अंतिम शब्द कम से कम स्कॉट के संदर्भ में तो सच करने ही करने हैं. लाठियां खाते हुए लाला ने कहा था,

“मेरे शरीर पर पड़ रही एक-एक लाठी अंग्रेज़ी हुकूमत के ताबूत की कील बनेगी.”

हालांकि प्लान गड़बड़ा गया. भगत सिंह से शिकार पहचानने में चूक हो गई और उन्होंने ग़लत आदमी की तरफ इशारा कर दिया. नतीजा ये हुआ कि जेम्स स्कॉट के बदले जे.पी.सॉन्डर्स नाम का अफसर मारा गया.

आगे का इतिहास ज़माना जानता है. भगत, राजगुरु और सुखदेव पकड़े गए. उनपर केस चला और उन्हें फांसी की सज़ा सुनाई गई. डेट मुक़र्रर हुई 24 मार्च 1931.

मौत से क्या डरना?

मज़ाकपसंद राजगुरु मौत की सज़ा मिलने के बाद और भी ज़्यादा हंसने-हंसाने लगे थे. लोगों को लगा कि वो मौत के खौफ को काउंटर करने के लिए ओवर रिएक्ट कर रहे हैं. लेकिन ऐसा नहीं था. ये उनका रेग्युलर ऐटीट्यूड ही था. एक साथ कैदी ने जब उनसे सीधे पूछ लिया कि क्या उनको मौत से डर लगता है, तो उनका जवाब था, “मैंने जो किया मुझे उसपर गर्व है. और इस सच का एहसास मुझे मौत को चैलेंज देने के बाद ही हुआ है. हमारी मौत आने वाले क्रांतिकारियों का रास्ता प्रशस्त करेगी. और इस वजह से हमारी मौत सार्थक हो जाएगी.”

यूं तो 24 मार्च की तारीख तय थी लेकिन एक दिन पहले ही तीनों को फांसी दे दी गई. तीनों की बढ़ती लोकप्रियता से ब्रिटिश सरकार घबरा जो गई थी.


नोट: इस किताब में वर्णित कुछ किस्से अनिल वर्मा की किताब ‘राजगुरु: दी इनविंसिबल रेवोलुशनरी’ से लिए गए हैं.


 

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