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सही कहता है शाहरुख़, 'हर पल यहां जी भर जियो'

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भावनाओं के, अनुभवों के उतार-चढ़ाव को पूरी शिद्दत से जीते चले जाना ही जीवन है. ढेर सारे, अनगिनत लम्हे और उन लम्हों से हासिल हुए कड़वे-मीठे अनुभव ही ज़िंदगी है. और ज़िंदगी कोई लंबा-चौड़ा सफ़र नहीं, महज़ एक लम्हे का किस्सा है. वो लम्हा जो जारी है. वो लम्हा जिसे आप जी रहे हैं. अतीत की ढेरों यादें और भविष्य के लाखों सपने भी उस एक पल का मुकाबला नहीं कर सकते, जो जिया जा रहा है. आपकी मुकम्मल ज़िंदगी आपको इस एक पल के नुक्तानिगाह से ही दिखेगी.

अगर इस पल आप खुश हैं, मुक्त महसूस कर रहे हैं तो आपको अपना तमाम जीवन उमंग का, आशा का दस्तावेज़ लगेगा. और अगर ये लम्हा आप पर भारी गुज़र रहा है तो पूरी ज़िन्दगी ही मनहूसियत के साये का इश्तेहार लगेगी. तो साहेबान तमाम खेला इसी एक पल का है. किसी गुज़रे हुए या आने वाले कल में वो ताकत नहीं कि आपके इस एक पल का मिज़ाज बदल सके. 

कितनी ही विरोधाभासी घटनाएं इसी जीवन में होती रहती है.

कई बार आप भयानक रूप से तनहा होते हैं. ऐसा लगता है कि करोड़ों-अरबों लोगों की इस दुनिया में आपका कोई नहीं. आप रात के तीन बजे अचानक जागते हैं. कमरे की तारीक़ी को घूरते हुए खामोश आवाज़ में चीख़ते हैं. शिद्दत से चाहते हैं कि आपकी अंदरूनी टूट-फूट को महसूस करने वाला कोई तो एक हो. कहीं तो हो. नहीं होता वो मयस्सर. खुद का सलीब बड़ी मुश्किल से ढोते-ढोते आपकी रूह थक जाती है. ऐसे लम्हों में ज़िंदगी दर्द का मुसलसल शाहकार प्रतीत होती है. हयात का तमाम सफ़र बेमानी लगता है. लगता है कि इस ज़िंदगी में कुछ नहीं रखा. ख़त्म क्यों नहीं हो जाता सबकुछ!

वहीं दूसरी ओर, कोई-कोई दिन ऐसा भी आता है जब आपको अपने पैर ज़मीन पर टिकाए रखना मुहाल दिखाई देता है. कोई ख़ुशी टप्प से टपकती है आपके दामन में और आप बौरा जाते हैं. बड़ी-बड़ी और लाइफ बदल देने वाली अचीवमेंट्स तो छोड़ ही दीजिए, कोई नाकाबिलेज़िक्र घटना भी आपको चेतना से भर देती है. हर तरफ एक अद्भुत सकारात्मकता दिखाई देने लगती है आपको. बात-बेबात मुस्कुराने का मन करता है. आपको यकीन हो जाता है कि इस जीवन से ख़ूबसूरत और कोई चीज़ नहीं.

इन विरोधाभासी क्षणों से हुई मुठभेड़ ही वो चीज़ है जिसे ज़िंदगी कहते हैं.

किसी रोज़ आप अपने दुखड़े को सुनाने के लिए कोई कंधा ढूंढते हो. कभी मिल जाता है, कभी नहीं भी मिलता. तो किसी और दिन किसी दोस्त की तकलीफ़ से आपकी मुठभेड़ हो जाती है. आप चुनते हो उसे सुनना, उसके साथ मौजूद रहना. उसके आंसू रोकने की, उनका वजूद ख़त्म करने की कूव्वत भले ही ना हो आप में, लेकिन उसे देने के लिए आपके पास रुमाल ज़रूर होता है. और ये बेआवाज़ भरोसा भी कि ‘घबरा मत, मैं हूं खड़ा हुआ तेरी बगल में.’ ऐसे किसी लम्हे लगता है कि ज़िंदगी इतनी बेमक़सद भी नहीं. अभी इसका दामन निचोड़ कर मसर्रत हासिल की जा सकती है. ऐसा लम्हा एक रोशनी से, एक नूर से भर देता है ज़हन को. हयात का सफ़र मानीख़ेज़ लगने लगता है.

तो मुद्दे की बात ये कि हंसी, ख़ुशी, आंसू, दुःख, तकलीफें, अज़ीयतें, निराशा, उम्मीद, भरोसा, धोख़ा, कद्र, नफ़रत या मुहब्बत जो भी है, बस इसी एक लम्हे में है जो साथ मौजूद है. और आपका चाहे जैसा मूड हो, आप चाहो ना चाहो इसे आपको जीना ही जीना है. इन्ही लम्हों का रंगबिरंगा कोलाज ही ज़िंदगी है. 

इसके अलावा भी होगी कहीं कोई और जन्नत, अपन को इससे क्या!

शाहरुख़ भी यही कहता है:


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