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क्लर्कों, हुक्कामों को उनकी औकात बताने वाले अकबर इलाहाबादी

हर घर को अकबर इलाहाबादी सा एक बुजुर्ग चाहिए

पूछो क्यों चाहिए? घर को पटरी पर रखने के लिए. ऐसा बुजुर्ग जो पूरे घर को एक करके रखता है. सबको आंखें तरेर तरेर सही रास्ते पर रखता है. घर की देहरी पर बैठा ये बुजुर्ग हर संगीन साये से घर को महफूज़ रखता है. अकबर इलाहाबादी ऐसे शायर हैं जिनका लिखा हर ज़माने में मौजूं रहेगा. मसलन ये तकरीबन सौ साल पहले लिखा शेर लो. आज पब्लिक हलकान है. सरकार की एक पहल से. पहल सही थी. गलत सिस्टम की भेंट चढ़ गई. तो इस सिस्टम में दब आदमी क्या करे? ये पढ़े.

थी शबे तारीक(अंधियारी रात), चोर आए जो कुछ था ले गए
कर ही क्या सकता था बंदा खांस लेने के सिवा

तो आदमी दबा हुआ खांस रहा है. उसे उसके हाल पर छोड़ अकबर इलाहाबादी के किस्से पढ़ते सुनते हैं. भाषाई रूमानियत में उनको ढालने की जरूरत हमें जान नहीं पड़ती. जैसे बाकी शायरों के बारे में लिखते हुए एक मजबूरी सी बन जाती है. हमारी अपनी भाषा में उनको पढ़ लिख सकते हैं. क्योंकि ये शायर हमारे आपके बीच में अपनी भाषा के साथ मौजूद था. जहां जरूरत हुई, जमके हिंग्लिश और उर्दू का प्रयोग किया. सोसाइटी को उसकी औकात बताने के लिए अगर वजनदार शब्दों का सहारा लेते तो समाज तक उनकी बात पहुंचती ही कैसे. ये शेर पढ़ो.

कौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ

16 नवंबर, 1846 की पैदाइश और 15 फरवरी, 1921 को दुनिया से रुखसती. इलाहाबाद में जन्मे, इलाहाबाद में मरे. इसीलिए ताउम्र इलाहाबादी रहे. असली नाम था सैयद हुसैन. समाज को आइने की चकाचौंध में रखने वाले दमदार शायर के अलावा वो सरकारी आदमी थे भाई. वकालत की पढ़ाई की थी. इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेशन जज रहे.

उनका एक किस्सा बड़ा मशहूर है. जो ये दिखाता है कि वो खुद हाई एजुकेटेड थे. लेकिन डिग्री को गर्द बराबर समझते थे. डिग्री से न हुनर आता है न तमीज. ऐसी उनकी समझ थी. इसलिए डिग्री की धौंस दिखाने वालों को हमेशा निशाने पर रखते थे. एक बार एक हजरत उनके घर पहुंचे. अंग्रेजी में छपा विजिटिंग कार्ड था उनके पास. जिसमें नीचे फाउंटेन पेन से लिखा था बीए पास. तो अकबर साहब के घर वो विजिटिंग कार्ड पहुंचाकर इंतजार करने लगे. थोड़ी देर में अंदर से पर्ची आई. लिखा था.

शेख जी निकले न घर से और ये फरमा दिया
आप बीए पास हैं तो बंदा बीवी पास है

माने हुजूर बेगम की खिदमत में हैं अभी. डिस्टर्ब न करें, तशरीफ ले जाएं. मुसलमानों के अंदर फैली कूड़मगजी से उनको चिढ़ थी. बहुत ज्यादा. उनको लिबरल बनाने के लिए ताउम्र कलम घिसते रहे. अमूमन जज का फर्ज़ फैसला सुनाने का होता है. लेकिन सीढ़ी तो वकालत से होकर जाती है न. तो सवाल पूछने की अदा न भूले थे. धरती पर जीवन के विकास का सिद्धांत देने वाले चार्ल्स डार्विन को भी नहीं छोड़ा था. न मानो तो खुद पढ़ो.

डारून साहब हकीकत से निहायत दूर थे
मैं न मानूंगा कि मूरिस(पूर्वज) आपके लंगूर थे

एक हमारे गांव में हैं रज्जब अली. टेलर हैं. पार्ट टाइम मौलवी. मिलाद वगैरह में न्योते पर आते हैं. उनको रंज है तो सिर्फ मौका चूक जाने का. वो कहते हैं कि आज वो भी टेलीफोन विभाग में क्लर्क होते. सरकारी तनख्वाह पर ऐश कर रहे होते. लेकिन जब वैकेंसी थी तब नए रंगरूट टेलीफोन के खंभे गाड़ने के लिए गड्ढे खोदते थे. रज्जब को नहीं जमा तो मना कर दिया. आज हाल ये है कि सरकारी नौकर भले फोर्थ क्लास एंप्लॉई हो. लेकिन एमबीए और सीए वाले उनकी तरफ रश्क से देखते हैं. डिग्री पर फूलने वालों की तरह ही सरकारी नौकरी पर फूलने वालों को भी कायदे से दवा दी थी.

चार दिन की ज़िंदगी है कोफ़्त से क्या फायदा
कर क्लर्की, खा डबल रोटी, खुशी से फूल जा

आज बात होती है नारी सशक्तिकरण की. बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ. सेल्फी विद डॉटर. एक तरफ उनको ऊपर लाने की बात होती है. दूसरी तरफ परदे, घूंघट, बुरके में बंद करने की तरकीबों पर तर्क किए जाते हैं. पहले उनकी कंडिशनिंग की जाती है. कि परदेदारी उनकी आदत बन जाए. फिर उसे उनकी मर्जी कहकर आजादी का लॉजिक ही गायब कर दिया जाता है. ये अभी तक मौजूद है. जबकि इसे मिटाने की कोशिश अकबर इलाहाबादी सौ साल पहले कर गए.

बेपर्दा नज़र आईं जो कल चंद बीवियां

अकबर ज़मीं में हैरते क़ौमी से गड़ गया

पूछा जो उनसे आपका परदा वो क्या हुआ

कहने लगीं कि अक्ल पे मर्दों की पड़ गया

जज साहब मय के शौकीन नहीं थे. मय मतलब बादा. यानी शराब, दारू. कभी पी या नहीं, गंगाजल उठाकर नहीं कह सकते. लेकिन पीने का रिकॉर्ड नहीं मिलता. शायरी मोहब्बत, मजहब, फिलॉसफी के साथ शराब वाली भी करते थे. उनकी सबसे मशहूर गजल शराब पर ही है. जिसे गुलाम अली ने गाकर अमर कर दिया है. गुलाम अली की आवाज में अकबर इलाहाबादी के पिरोए शब्दों के साथ आपको छोड़ रहे हैं. संभालिए.


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