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वसीम अकरम: जिसे खेलने के लिए स्पेयर पार्ट्स चाहिए थे

Wasim Akram का आज जन्मदिन है

एक लड़का. पाकिस्तान की पैदाइश. 3 जून 1966. घर पर स्पेयर पार्ट्स का कारोबार होता था. आगे चलकर खुद उस लड़के को स्पेयर पार्ट्स की ज़रुरत मालूम पड़ने लगती है. उसका शरीर जवाब दे रहा था. वो पाकिस्तान की ओर से क्रिकेट खेल रहा था. स्विंग का बादशाह. दुनिया का महानतम स्विंग गेंदबाज.

लेकिन अपने शरीर से परेशान. ग्रोइन, इंटरकोस्टल मसल, पेल्विक बोंस, कंधा. सब कुछ जवाब दे रहा था. हर्निया का ऑपरेशन, अपेंडाईक्टिस और डायबिटीज. डायबिटीज की वजह से आंखों की रोशनी पर भी असर पड़ता ही जा रहा था. ऐसे में वो स्पेयर पार्ट्स चाहता था. अपने शरीर की खातिर. अपने क्रिकेट की खातिर.

वसीम अकरम. लेफ़्ट आर्म स्विंग बॉलिंग. गेंद की हरकतों को स्विंग कहना गलती लगती है. वो जादू होता है. काला जादू. ये जादू शुरू हुआ था 25 जनवरी 1985 में. जब वसीम ने अपना पहला टेस्ट मैच खेला था. न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़. ऑकलैंड में. मेरी उमर इतनी नहीं है. अपनी याददाश्त के हिसाब से मैंने पहली बार वो जादू देखा सन 97 में.

मेलबर्न. पाकिस्तान वर्सेज़ ऑस्ट्रेलिया. कार्ल्टन ऐंड यूनाइटेड सीरीज़. बारहवां मैच. स्ट्राइक पर था वो आदमी जिसे वर्ल्ड क्रिकेट में वन डे का बेस्ट फिनिशर कहा जाता था. डैरेन लीमन. 11 गेंदें खेल चुके थे. रन थे 10. वसीम अकरम लेफ़्ट आर्म ओवर द विकेट. गेंद को ऑफ स्टम्प के कहीं बाहर छोड़ा गया था. पिच आधी क्रॉस होते-होते गेंद लोहे की सी हो गयी. और स्टम्प चुम्बक. चुम्बक ने गेंद को खींचना शुरू कर दिया. अपनी ओर.

इसे विद्वानों ने नाम दिया स्विंग का. इस स्विंग की बदौलत गेंद ऑफ स्टम्प से बाहर छूटने पर मिडल और लेग स्टम्प पर पड़ती है. लीमन के साथ भी यही हुआ. गेंद पैड पर लगी. लीमन बैलेंस खो चुके थे. हल्का सा गिर पड़े. लीमन के साथ ऐसा पहले शायद ही कभी हुआ था. अकरम के हाथ खड़े हो पड़े. अपील में. फैसले में अम्पायर का भी हाथ खड़ा हो गया. लीमन आउट.

फिर एक नया जादू आया. रिवर्स स्विंग. 90 के दशक में रिस्ट स्पिन जैसा एक नया ट्रेंड. रिवर्स स्विंग के लिए काफी कुछ चाहिए होता था. जो वसीम अकरम देते थे. तेज़ स्पीड बेहद ज़रूरी थी. जिससे गेंद को स्विंग होने का मौका ही न मिले. और साथ ही गेंद का जितना हो सके उतना खुरदुरा होना. बाकी सब कुछ सूखे मौसम पर छोड़ देते थे.

रिवर्स स्विंग ने टेस्ट मैचों को हमेशा के लिए बदल के रख दिया. फ़ास्ट बॉलर्स को अब पुरानी गेंद से गेंद फेंकने में मज़ा आने लगा था. कई पुरानी गेंद के स्पेशलिस्ट आगे आ गए थे. और साथ ही फुल लेंथ बॉलिंग को भी बढ़ाया जाने लगा. अब खतरनाक गेंदबाजी की केटेगरी में महज़ छोटी गेंदें फेंकना ही नहीं रह गया था.

अब पुछल्ले बल्लेबाजों और स्विंग बॉलर्स के बीच में वही रिश्ता बन चुका था जो आग और पानी में. रिवर्स स्विंग आग थी जो टेल-एंड बैटिंग के पानी को भाप बना के उड़ा देती थी. जिस तरह से 80 का दशक खतम होते-होते हेलमेट और बाकी प्रोटेक्टिव सामान बढ़ते और बनते जा रहे थे, लगने लगा था टेल-एंड बैटिंग सुधर जाएगी. लेकिन रिवर्स स्विंग ने आकर सारा मामला बिगाड़ दिया. हेलमेट कहां रिवर्स स्विंग से किसी को बचाने वाला था? और इसी क्रम में वसीम अकरम सबसे बड़े शिकारी बन चले थे.

अकरम की टेक्नीक क्रिकेट में किसी आश्चर्य से कम नहीं है. उसके ठीक उलट है जो कोच सिखाते हैं. सारी थ्योरियों के खिलाफ़ जाता एक बेहतरीन ऐक्शन. वसीम के ऐक्शन में सबसे ख़ास बात थी उनकी दौड़. रन अप में जितनी तेज़ी हो सकती थी, उतनी होती थी. उस दौड़ के बाद वैसे क्रीज़ पर पहुंचते थे जैसे बैरेल से गोली निकलती है. उनका पिछला पैर साइट-स्क्रीन की ओर होता था और अगला पिच की ओर. नीचे देखता हुआ. उनका हाथ दिखता ही नहीं था. बहुत तेज़ घूमता था. और ये सब कुछ हुआ 40,000 बार. इंटरनेशनल लेवल पर. आश्चर्य को परिभाषित करता हुआ एक ऐक्शन.

अकरम को शोल्डर और ग्रोइन इंजरी ने हमेशा परेशान किया. पहली बार उनका ग्रोइन का ऑपरेशन हुआ 1988 में. वो ऑपरेशन तो सफ़ल रहा लेकिन ज़्यादा टिकाऊ नहीं था. गेंद फेंकने में अभी भी तनाव मालूम देता था. रिकवरी पूरी होने के बाद भी. दो साल में ही दूसरा ऑपरेशन. और इस बार मुश्किलें ऑपरेशन टेबल पर ही बढ़ गयीं. कॉप्लीकेशन हो गए. उनकी पेल्विक मसल खिंच गयी जिसकी वजह से दाहिना पैर बायें से आधा ही मजबूत रहा.

ये गेंदबाज क्या किसी भी खिलाड़ी के लिये अच्छी खबर नहीं थी. वसीम अकरम के लिए तो कतई नहीं. गेंद भले ही अंगुलियों और कलाइयों की मोहताज थी लेकिन उन्हें क्रीज़ तक धकेलने का काम उन्हीं टांगों का था जो ऑपरेशन में कमजोर हो गयी थीं. इस आफ़त से छुटकारा दिलाया फ़िज़ियोथेरपी ने. कड़ी मालिश और पाकिस्तान की दुआओं ने. पाकिस्तान भी पागल देश है. क्रिकेट के पीछे. वसीम भी थे. अभी उन्हें और भी गेंदें फेंकनी थीं. लिहाज़ा, मैदान में वहां से वापस आये जहां से कम ही आ पाते हैं.

अपने रिटायरमेंट से आठ साल पहले वसीम अकरम इंग्लैण्ड में खेल रहे थे. लंकाशायर टीम. काउंटी क्रिकेट. ठंडा मौसम. स्विंग बॉलिंग की जन्नत और वसीम के रहते बल्लेबाजों की कब्रगाह. वहां पहली बार वसीम को कंधे में जकड़न मालूम हुई. ठंड का असर सोच ध्यान नहीं दिया. सोचा आदत हो जायेगी. गेंद फेंकते रहे. दर्द बढ़ा तो ऑपरेशन की सलाह दी गयी.

डॉक्टर की सलाह पर भी ध्यान नहीं दिया. इंटरनेशनल टूर्नामेंट नज़दीक था. पाकिस्तान उनपर भरोसा कर रहा था. ऐसे में ऑपरेशन का मतलब 6 महीने की छुट्टी थी. 1997 में सिंगर-अकाई कप शुरू हुआ. वसीम अकरम गेंद फेंकने दौड़े. एक बाउंसर पटकी. गेंद बैट्समैन के सर तक पहुंची लेकिन वसीम फिर से ऑपरेशन टेबल पर लेट गए. एक और ऑपरेशन. इस बार कंधे का. 6 महीने तक कोई क्रिकेट नहीं. सिर्फ पेन-किलर्स.

एक वक़्त था जब प्लेयर्स की चोट उनके करियर के खत्म होने का सबब बनती थीं. पहली बड़ी चोट उनकी आखिरी होती थी. माइक कॉम्पटन का घुटना, रिची बेनॉड का कन्धा और डेनिस लिली की पीठ. इन तीन चोटों ने तीन बड़े नाम मैदान से हमेशा के लिए किनारे कर दिए. वसीम शायद पहले खिलाड़ी थे जो ऑपरेशन दर ऑपरेशन चलते जा रहे थे. उस वक़्त शायद वसीम एक थीसिस का सब्जेक्ट बन सकते थे. कि कैसे एक प्लेयर मेडिकल साइंस और स्पोर्ट्स का सबसे खतरनाक कॉकटेल बन अपने सामने पड़ने वाले हर विरोधी पर बीस ही साबित हो रहा है. आज के वक़्त में जब प्लेयर्स का इंजर्ड होना और उनका ऑपरेशन उतना ही ज़रूरी हो गया है जितना मैच में एक अंपायर का होना, वसीम इस ज़रूरत के पहले शिकार कहे जा सकते हैं.

वसीम को सिर्फ डॉक्टरों ने ही नहीं, उनके पॉलिटिकल कॉन्टैक्ट्स ने भी क्रिकेट के मैदान में जिलाए रक्खा. 1992 से 1995 का पाकिस्तान क्रिकेट का वो काला पीरियड जिसमें 10 कप्तान हुए. इस दौरान इन 10 कप्तानों में से एक वसीम भी थे. इसी दौरान मैच फिक्सिंग के भी आरोप लगे. मैच फिक्सिंग वो कीड़ा है जो पाकिस्तान क्रिकेट में काफ़ी पहले ही लग चुका था. वसीम पर भी सवाल उठे. कय्यूम रिपोर्ट ने उन्हें दोषी भी ठहराया और उन्हें तगड़ा फाइन भी भरना पड़ा. लेकिन पॉलिटिकल कांटैक्टस ने बचाये रखा. टीम से निकलने नहीं दिया.

साल 2002. वसीम अकरम का आखिरी दौर. मेलबर्न में ऐडम गिलक्रिस्ट, रिकी पोंटिंग को मैच की पहली तीन गेंदों में पवेलियन तक छोड़ के आये. और सीरीज़ के एक और मैच में 32 गेंद पर 49 रन पीट दिए. जिन्हें वसीम चुके हुए लगते थे, वो जानते नहीं थे कि एक वर्ल्ड कप और खेला जाना बाकी है. हवा में नमी थी, गेंद की एक साइड में खुरदुरापन था, कलाई में लचक थी, तो वसीम को भी रहना था. वसीम था, वसीम है, वसीम रहेगा. जब तक क्रिकेट रहेगा. जब तक गेंदें स्विंग होंगी.

वसीम अकरम से जुड़ी बातें-

1. जावेद मियांदाद ने अकरम का टेलेंट बहुत कम उम्र में परख लिया था. 18 साल के अकरम को 1984-85 में पाकिस्तान के लिए चुना गया, उस वक्त मियांदाद टीम के कप्तान थे. पाकिस्तान के पूर्व प्लेयर हसीब अहसान का भी अकरम के सेलेक्ट होने में बड़ा योगदान रहा था.

2. अकरम न्यूज़ीलैंड के दौरे के लिए अपना बैग तैयार कर रहे थे. उन्होंने अपने कैप्टन मियांदाद से पूछा उन्हें कितने पैसे लेकर चलना चाहिए? वो इस बात से बिलकुल अंजान थे कि क्रिकेट बोर्ड उन्हें अपने देश के लिए खेलने के पैसे देगा. इस बात का ज़िक्र ओस्मान सामीउद्दीन की किताब ‘दी अनक्वाइट वन्स’ में किया गया है.

3. फिट रहने के बावजूद, अकरम को 30 साल में डाइबिटीज़ हो गया था. नेशनल हैल्थ सर्विसेज़ वेबसाइट के मुताबिक अकरम ने बताया, ‘मेरा बस दो महीनों में 8 किलो से ज़्यादा वज़न घट गया था. लेकिन मैंने इस पर कड़ी ट्रेनिंग करके, खूब सारा पानी पीकर और अच्छी नींद लेकर काबू पा लिया. मैंने ऐसी हालत में ही वेस्टइंडीज़ से मुकाबला किया. डाइबिटीज़ के बावजूद वसीम और 6 सालों तक पाकिस्तान के लिए खेले. 

4. अकरम अपने समय के खतरनाक बॉलर थे. वो बॉल को इस ढ़ंग से हैंडल करते थे जैसे कोई नहीं कर सकता.  अकरम ने 4 बार हैट्रिक ली थी. दो बार टेस्ट में और दो बार वन डे इंटरनेशनल में. 1999 में इन्होंने एक के बाद एक श्रीलंका के खिलाफ़ टेस्ट मैचों में दो हैट्रिक्स ली थीं. इससे पाकिस्तान को एशियन टेस्ट चैम्पियनशिप में जीत हासिल हुई थी.

5. 2003 में साउथ अफ्रीका में हुए विश्व कप में अकरम, वन डे इंटरनेशनल में 500 से ज़्यादा विकेट लेने वाले पहले खिलाड़ी बने. उन्होंने अपने वन डे करियर में कुल 502 विकेट लिए जिसे बाद में श्रीलंका के स्पिन बॉलर मुथैया मुरलीधरन ने तोड़ा.

6. अकरम के पिता चौधरी मोहम्मद अकरम का 1990 के दशक के आखिर में एक दिन के लिए अपहरण हो गया था. ये उस समय की बात है जब पाकिस्तान क्रिकेट पर मैच-फिक्सिंग के इल्ज़ाम लग रहे थे. इसके कुछ साल बाद ‘डेली मिरर’ से हुई बात चीत में अकरम ने कहा, ‘मेरे भाई ने मुझे फोन किया और बताया कि पापा को दिल का दौरा पड़ा है, इसका कारण मुझे यकीन है उनका एक दिन के लिए अपहरण होना था. उन लोगों ने उन्हें एक दिन तक पकड़कर रखा और मारते रहे. पापा की उम्र 65 थी.

7. अकरम की शादी हुमा से हुई थी, वो एक साइकॉलजिस्ट थीं. 2009 में जब उन्हें इलाज के लिए लाहौर से सिंगापुर ले जाया जा रहा था, उसी बीच चैन्नई में उनके विमान की इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई. लेकिन उनके मल्टीपल ऑर्गन खराब होने की वजह से चेन्नई के अपोलो अस्पताल में मौत हो गई. अकरम ने 2013 में एक ऑस्ट्रेलियाई महिला शनीरा से शादी की.

8. 5 अगस्त, 2015 में अकरम पर कुछ अंजान लोगों ने कराची के नेशनल स्टेडियम के पास कसराज़ रोड पर हमला कर दिया था. लेकिन उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ.

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