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जब लोगों ने अपने प्यारे नेता को सुनने से मना कर दिया और फिर उसे गोलियों से भून दिया गया

रोमानिया का नाम सुना है? यूरोप के दक्षिण-पूर्व में एक छोटा सा देश है. आबादी की हिसाब से दिल्ली से भी छोटा होगा शायद. आजकल यूरोपियन संघ का सदस्य है पर शीत युद्ध के समय सोवियत संघ का साथी था. द्वितीय विश्वयुद्ध के समय रोमानिया ने हिटलर की नाज़ी पार्टी का साथ दिया था पर 1944 में पार्टी बदल के रूस के साथ हो गया. 1947 में सत्ता परिवर्तन हुआ, वामपंथी सरकार आई. उसके बाद रोमानिया बहुत दिनों तक रूस के दबाव में रहा. 1965 में निकोलाइ चाउसेस्कु सत्ता में आए और रूस से अलग रोमानिया की अपनी राष्ट्रीय पहचान बनानी शुरू की. चाउसेस्कु बहुत ही पॉपुलर नेता साबित हुआ पर धीरे-धीरे तानाशाह बन गया और अगले पच्चीस साल तक रोमानिया की सत्ता पर क़ाबिज़ रहा. आज की कहानी चाउसेस्कु के आखिरी दिनों की.

नवम्बर 1989 में सारे यूरोप में वामपंथ के ख़िलाफ़ विद्रोह होना शुरू हो गया था. रोमानिया के एक शहर तिमिसोआरा में सरकार के समर्थन से शुरू हुआ प्रदर्शन धीरे-धीरे सरकार के विरुद्ध हो चला था. निकोलाइ चाउसेस्कु की सेना और सीक्रेट सर्विस सिक्योरिटी ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं. इसमें कई लोग मारे गए. रोमानिया में सेंसेरशिप होने के कारण, लोगों को यह ख़बरें या तो वॉइस ऑफ अमेरिका से मिल रही थीं या फिर एक दूसरे की ज़ुबानी.

80 हज़ार लोग बन गए बागी

चाउसेस्कु ने अपनी ताक़त दिखाने के लिए करीब 80 हज़ार लोगों को बखरेस्ट के सेंट्रल स्क्वॉयर पर जमा करवाया. कम्युनिज़्म के ख़िलाफ़ उठ रही आवाज़ों के बीच चाउसेस्कु सारी दुनिया को दिखाना चाहता था कि रोमानिया की जनता उसे अब भी उतना प्यार करती है या कम से कम डरती तो है ही. बाक़ी जनता को आदेश दिया गया कि सारा काम-धाम छोड़कर अपने टीवी या रेडियो पर भाषण सुनें.

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निकोलाइ चाउसेस्कु. Photo: Youtube

हर बार की तरह तालियों की गड़गड़ाहट के बीच चाउसेस्कु ने देशभक्ति से ओत-प्रोत कम्युनिज़्म की उपलब्धियों पर बोलना शुरू किया. ब-मुश्किल ढाई मिनट हुए होंगे भाषण शुरू हुए. किसी ने भीड़ में से सीटी बजाई, हूटिंग शुरू हो गई. भीड़ की आवाज़ का सुर बदल गया था. चाउसेस्कु का भाषण उसकी ज़ुबान में ही अटक गया. उसने हाथ उठाकर लोगों को रोकना चाहा. कैमरामैन ने कैमरा आकाश की तरफ़ कर दिया ताकि चाउसेस्कु की टीम की घबराहट टेलीकॉस्ट न हो, पर आवाज़ की रिकॉर्डिंग चलती रही. चाउसेस्कु, उसकी पत्नी इलेना और बाक़ी के लोग चिल्लाते रहे. लोगों को चुप करने की कोशिश करते रहे.

चाउसेस्कु कहता है कि ये उकसाने वाली घटना है. शायद ख्याल आ रहा होगा कि अभी वो सेना से अपने विरोधियों को कुचलवा देगा. वो बार बार हैलो-हैलो चिल्लाता रहा. जैसे कि कोई तकनीकी ख़राबी आ गई है पर मौक़ा हाथ से निकल गया था. सारा मामला यूट्यूब पर देखा जा सकता है. Ceausescu last speech सर्च करें. बहुत सारे वीडियो है जिनसे कहानी जोड़ी जा सकती है.

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क़रीब 6 मिनट बाद आज़ादी, एकता और स्वराज जैसे भारी शब्दों का प्रयोग करते हुए फिर से भाषण चालू होता है. कैमरा फिर से नेताओं को दिखाता है. इतना शोर हो रहा है कि कहना मुश्किल है, कि लोग समर्थन में बोल रहे हैं या विरोध में. धीरे-धीरे विरोध की आवाज़ तालियों पर हावी होने लगती है. चाउसेस्कु अब लोगों को बताता है कि सुबह ही एक निर्णय लिया गया है. न्यूनतम आय बढ़ा दी जाएगी. ज़ाहिर है, यह मूल भाषण का हिस्सा नहीं था, क्योंकि चाउसेस्कु यह पढ़ नहीं रहा है. बौखलाई जनता को झुनझुना थमाने की कोशिश की जा रही है. तिमिसोआरा में हुई सारी घटना को विदेशी हाथ बताकर सिरे से नकार दिया. चाउसेस्कु अपना भाषण देता गया. पार्टी के सदस्य पंक्ति में आगे खड़े तालियां बजाते रहे पर पीछे की जनता धीरे-धीरे पार्टी के हेडक्वॉर्टरों में जमा होने लगी.

सेना ने गोली चलाने से इनकार कर दिया

भाषण तो ख़त्म हो गया पर जनता बाहर निष्पक्ष चुनाव के नारे लगा रही थी. सड़क पर सेना बुला ली गई पर सेना ने लोगों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया. ख़बर फैली कि सेना के जनरल ने कम्युनिस्ट पार्टी के आदेश मानने के बजाय आत्महत्या करना बेहतर समझा. अब तक जनता हेडक्वॉर्टर में घुस गई थी. कहते हैं कि उस रोज चाउसेस्कु बाल-बाल बचा. लोगों को पता नहीं था कि चाऊचेसको अपनी पत्नी ऐलेना के साथ सामने ही लिफ्ट में फंसा हुआ है.

रात भर लड़ाई होती रही. हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए. 22 दिसंबर की सुबह चाउसेस्कु अपनी पत्नी और सहयोगियों के साथ पॉयलट की कनपट्टी पर बंदूख रखकर हेलिकॉप्टर में भाग निकला. दिसंबर 24 को उससे ढूंढ निकाला गया और 2 घंटे के फौजी कोर्ट मार्शल के बाद गोलियों से भून दिया गया.

सारे समय उसको लगता रहा कि सीक्रेट सर्विस सिक्योरिटेट आकर उसे बचा लेगी. अपने आख़िरी समय तक चाउसेस्कु मानने को तैयार नहीं था कि वो अब देश का प्रमुख नहीं है. सैनिकों में गोली चलाने की ऐसी जल्दी थी कि जब तक कैमरा बाहर आता, दो लाशें गिर चुकी थीं. चाउसेस्कु ने अपनी जनता की नब्ज़ समझने में ग़लती कर दी थी. कितना भी प्यारा नेता हो, जनता के बर्दाश्त की भी हद होती है. पिछले पच्चीस साल से भेड़ बनी जनता ने अब इनकार कर दिया था.

जैसा कहा भी गया है. कितने सूरमा आए गए, पर चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढलता है ढल जाएगा.


Background idea inspired from “Home Deus, A Brief History of Tomorrow” by Yuval Noah Harari.


शैलेंद्र
शैलेंद्र

ये स्टोरी ‘दी लल्लनटॉप’ के लिएशैलेन्द्र ने की थी.


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