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'मैंने प्रण लिया था कि अब मैं कभी इस दुनिया में कदम नहीं रखूंगा'

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पिछले साल 2017 में 10 से 12 नवंबर तक आज तक ने तीन दिवसीय आयोजन ‘साहित्य आजतक’ के जरिए साहित्यिक हलचल बढ़ाई. सरगर्मियां बढ़ाने में बड़ा किरदार लल्लनटॉप कहानी कंपटीशन का भी रहा. इस  प्रतियोगिता का पहला इनाम एक लाख रुपए था. 15 दूसरी कहानियों को भी पांच-पांच हज़ार  रुपए का पुरस्कार दिया गया.  आज पढ़िए इन्हीं 15 कहानियों में से एक- शहनाई. इसे लिखा है सर्वोत्तम कुमार सिंह ने.  सर्वोत्तम स्टूडेंट हैं. दिल्ली के भारती विद्यापीठ कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग से बीटेक कर रहे हैं. ग़ाज़ियाबाद में रहते हैं. वैसे बिहार के लखीसराय से हैं. इंजीनियरिंग की बिज़ी रखने वाली पढ़ाई में लिखने का शौक पूरा नहीं कर पाते. इंग्लिश सीखने के लिए इंग्लिश में कविता लिखनी शुरू की. वहां से हिंदी कहानी तक पहुंचे हैं. पब्लिश होने वाली उनकी ये पहली कहानी है.


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शहनाई

रमेश सड़क किनारे खड़ा गाड़ी का इंतजार कर रहा था. शहनाई को हाथ में लिए उसका छोटा बेटा रवि उसके इर्द-गिर्द घूम रहा था. उसकी पत्नी और बड़ी बेटी घर के दरवाजे के पास खड़ी उन्हें देख रही थीं. रमेश का घर सड़क के किनारे ही था, जहां से हर कुछ घंटों बाद एक गाड़ी गुजरती, जो शहर की ओर जाती थी. कुछ ही साल पहले बनी इस सड़क ने शहर जाने वाले लोगों की राह आसान कर दी थी.

बिहार के लखीसराय जिले के इस छोटे से गांव में रमेश अपने छोटे से परिवार के साथ रहता था. रमेश एक शहनाईवादक है और वह हर कुछ महीनों बाद शादी में प्रदर्शन के लिए शहर जाता था. उस गांव से और भी लोग उसके साथ जाते थे, जो अलग-अलग यंत्र बजाते थे. रमेश एक ‘महबूब बैंड’ नाम की कंपनी के लिए काम करता था, जो उसे तभी बुलाते थे जब शादी का माहौल या सीजन शुरू होता था. अपना काम खत्म करने के बाद वो अपने गांव लौट आता.

कुछ देर बाद गाड़ी आई, तो रमेश ने अपने छोटे बेटे रवि से अपनी शहनाई मांगी और पीछे मुड़कर अपनी पत्नी और बड़ी बेटी कामिनी को देखा. फिर वो गाड़ी में बैठ गया. रवि गाड़ी को दूर तक देखता रहा, जब तक गाड़ी एक मोड़ से मुड़ न गई और उसकी आंखों से ओझल नहीं हो गई.

रवि अपने पिता के जाने से बहुत खुश था और दौड़ता हुआ अपने घर के अंदर गया और वहां से एक और शहनाई निकाली, जो उसने छुपाकर रखी थी. रवि शहनाई लेकर गांव के खेतों की ओर चल पड़ा. रवि अक्सर अपने पिता से छुपकर यह दूसरी शहनाई, जो थोड़ी खराब थी, को खेतों में ले जाकर अकेले अपने एक पसंदीदा पेड़ के ऊपर चढ़कर बजाया करता था. उसका बहुत मन था कि वह भी अपने दादा और पापा की तरह एक अच्छा शहनाईवादक बने. रवि के पिता ने कभी उसको इसे बजाना सिखाया नहीं था. वह जब भी इसे हाथ में लेता या इसे बजाने की कोशिश करता, तो रमेश हमेशा उसे डांट देता. कहता कि इसे बजाने से कुछ नहीं होगा, तुम पढ़ाई करो तभी कुछ बड़ा कर सकते हो.

रवि हमेशा अपने पिता से यह सवाल करता कि आप और दादाजी भी तो यही बजाते हैं, तो फिर मैं क्यों नहीं बजा सकता इसे? मगर रमेश हमेशा उसको डांट देता था और कहता था कि संगीत बजाने से जिंदगी नहीं चलेगी अब, तुम पढ़ाई पर ध्यान दो. रमेश जानता था कि इस बदलती दुनिया में अब एक शादी में शहनाईवादक की कोई अहमियत नहीं है. इस आधुनिक दुनिया में लोग अब नए युग का संगीत सुनना पसंद करते हैं. अब शादियों में कोई बैंड-बाजे वालों को नहीं बुलाता था, बल्कि अब तो लोग तेज संगीत, डीजे या फिल्मी गाने सुनाने वालों को बुलाते हैं. नई-नई टेक्नॉलजी के आ जाने से अब लोग बैंड-बाजे वालों को बुलाने की जगह खुद ही मोबाइल से संगीत बजा कर काम चला लेते हैं. वैसे भी शहनाई शादी में बजाने से उसको उतने पैसे भी कहां मिलते थे कि वो अपने परिवार को लेकर शहर में रह सके या गांव में रहकर भी रवि को अच्छे स्कूल में भेज सके. शादियों का मौसम भी कुछ महीनों तक ही रहता था और उसके बाद उसे गांव वापस आना पड़ता था. कभी-कभी तो महीनों तक उसे कोई बुलाता नहीं था.

मगर रवि जब भी अपने दोस्त के घर में लगे टीवी के अंदर कलाकारों को शहनाई बजाते देखता, तब-तब उसके अंदर शहनाई बजाने की उत्सुकता और भी बढ़ जाती थी. फिर वह अपने दादा की शहनाई लेकर खेतों की ओर अकेले निकल पड़ता था. रवि गांव के ही एक सरकारी स्कूल में पढ़ता था. कक्षा छह में पहुंच जाने के बाद भी वह पढ़ाई को सिर्फ एक रिवाज की तरह निभाया करता था. उसका मन तो हमेशा शहनाई की उस आवाज में खोया रहता, जिसकी गूंज आज शादियों में बजने वाले इलेक्ट्रिक गीतों में कहीं खो चुकी थी.

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रवि हमेशा अपने पिता से जिद करता कि वह भी उनके साथ शहर जाना चाहता है. वो भी शादियों में अपने पिता और उनके साथियों के साथ अलग-अलग तरह का संगीत बजाना चाहता है. रवि ने अपनी मां से सुना था कि कैसे उसके पिता और दादा जी शादियों में एक साथ जाते थे. रमेश ने शहनाई बजाना अपने पिता से ही तो सीखा था. रमेश के पिता उमेश बहुत ही प्रख्यात शहनाईवादक थे. शहर में हर बैंड-बाजे वाला उन्हें जानता था. उनकी शहनाई की गूंज हर शादी में गूंजती थी और उसके बिना तो कोई शादी पूरी ही नहीं मानी जाती थी. रमेश भी बचपन से ही अपने पिता के साथ शादियों में जाता और शहनाई बजाना सीखता. मगर उनके देहांत के बाद मानो रमेश की दुनिया ही नहीं, बल्कि संगीत की दुनिया भी पलट गई हो. उसी समय आधुनिक तेज संगीत और प्रफेशनल कलाकारों के हस्तक्षेप ने लोगों की पसंद का रुख बदल दिया. जहां कभी उन्हें कई-कई शादियों में जाने से मना करना पड़ता था, वहां अब उन्हें शादियों में बुलाया भी नहीं जाता था. उनके बैंड-बाजों की जगह अब नए-नए यंत्रों ने ले ली थी. बहुतों ने तो अब कहीं और काम करना शुरू कर दिया था, तो वह जैसे-तैसे कहीं-न-कहीं से काम ढूंढ ही लेता था. अब वह सिर्फ महबूब बैंड के लिए काम करता था.

रवि यह नहीं जानता था कि शादियों में शहनाई वादक की अहमियत अब कम हो गई है और उनको उतने पैसे भी नहीं मिलते हैं. मगर वो जब भी टीवी पर कलाकारों को शहनाई या कोई और उपकरण बजाते देखता, तो उसका मन होता कि वह भी कभी टीवी पर आए और बहुत सारा पैसा कमाए, ताकि अपनी इस हालात को सुधार सके. वह जानता था कि उसके माता-पिता अक्सर परेशान रहते हैं और इस परेशानी की वजह गरीबी है. वह इस गरीबी को मिटाने और अपनी बड़ी बहन की शादी कराने के लिए कमाना चाहता था. वह भी अपने पिता के साथ शादियों में प्रदर्शन से खूब सारा पैसा जमा करना चाहता था, ताकि अपनी बहन की शादी के लिए दहेज जमा कर सके. उसने कई बार देखा था लड़केवालों को शादी से इनकार करते हुए, वो भी सिर्फ दहेज के पैसे न दे पाने की वजह से. वो जब भी अपने माता-पिता को परेशान देखता, तब वह अपनी छुपी हुई शहनाई निकालता और खेतों की ओर निकल पड़ता. इस सोच में कि वह सबसे अच्छा शहनाई बजाने वाला बन सके और अपनी सारी तकलीफों को दूर कर सके.

कुछ महीनों के बाद रमेश घर लौट चुका था. उस रोज जब रमेश अपने परिवार के साथ शाम को खाना खाने बैठा, तो कमरे में सन्नाटा पसर गया. कमरे में सिर्फ उसके सांसों की सिसक और बर्तनों की खनखनाहट ही मौजूद थी. उसकी पत्नी ने भी उससे कोई सवाल नहीं किया, शायद उसने रमेश के अंदर छुपी उन तमाम बातों को पढ़ लिया था जो रमेश अपने परिवार वालों को बताना नहीं चाहता था.

रमेश जिस बैंड में काम करता था, वह बैंड अब बंद हो चुका था. उस कंपनी के मालिक के मरने के बाद उसके दोनों बेटों में लड़ाई के चलते महबूब बैंड बंद हो गया. शादियों का मौसम भी समाप्त हो चुका था, तो रमेश अब गांव वापस आया था. लेकिन वह अब यह नहीं जानता था कि अगले सीजन में उसे काम मिलेगा या नहीं, कोई बैंड उसे बुलाएगा या नहीं और नए बैंड में शामिल होने की वजह से क्या उसे फिर से कम पैसे मिलेंगे. उसने ज्यादा न सोचते हुए कहा कि भगवान जरूर कुछ-न-कुछ रास्ता निकालेगा, जैसा उसके पिता कहते थे. उसने पूरा समय गांव में रहकर खेती में बिताने का निश्चय किया. उसे आज वो बात बिल्कुल गलत और झूठी लग रही थी, जो उसके पिता ने एक रोज उससे कही थी. वह कहते थे कि जमाना कितना भी नया हो जाए, मगर वो शादियां अधूरी हैं जिसमें तुरही की तरंगें, बैस और डुबा का मेल, सैक्सोफोन का संगीत, ढोली की दिल धड़काने वाले बीट और शहनाई का संगीत न गूंजे. ये संगीत, जो हर किसी को पैर थिरकाने पर मजबूर कर देता है इसके बिना तो हर जोड़ी का संगम अधूरा है. शादी के बंधन में बंधने वालों की जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं और ये संगीत उनको स्वर्ग ले जाने का काम करता है. जिस दिन यह बैंड बजना बंद हो जाए, समझ लेना शादी में रौनक लाने वाले एक अहम किरदार का समापन हो गया है.

आज अपने पिता की कही सारी बातें रमेश को एक कांटे की तरह चुभ रही थीं. आज यह संगीत शादी में शामिल नहीं है, पर फिर भी हर एक शादी पूरी हो रही है. हर एक शादी में लोग वाद्य यंत्र के बिना इलेक्ट्रिक म्यूजिक पर थिरक रहे हैं. रमेश अब सिर्फ जमाने में हो रही सच्चाई पर विश्वास करने लगा और वो हर उस बात को भुलाना चाहता था, जो उसके पिता ने उससे कही थी. वो अपने बेटे रवि को इस क्षेत्र में कभी भटकने नहीं देना चाहता था और गांव में रहकर अपने बेटे को पढ़ाना चाहता था. दिन-रात खेती कर अपनी बेटी की शादी के लिए पैसा जमा करना चाहता था.

अगली सुबह रमेश, शत्रुघ्न प्रसाद के पास पहुंचा. शत्रुघ्न प्रसाद गांव का सबसे धनी आदमी था. वह अपने खेतों में काम करने के लिए गांव में इच्छुक लोगों को पैसे देता था. रमेश ने भी उसके खेतों में काम करने का निर्णय लिया. हालांकि ज्यादा पैसे नहीं मिलते थे खेतों में दिन-रात काम करने से, पर उसके पास कोई चारा भी तो नहीं था. ऐसा नहीं था कि रमेश के पास अपनी कोई जमीन नहीं थी. उसके पिता के मरने के बाद जब उसके घर में बंटवारा हुआ था, तो उसके हिस्से छोटी-सी जमीन आई थी, जो बहुत ही उपजाऊ थी. परंतु कई-कई महीने शहर में काम करने की वजह से उसकी गैरमौजूदगी में उसके बड़े भाई ने जमीन ताकत के बल पर हड़प ली थी. अपने बड़े भाई के सामने कमजोर होने के चलते वो कुछ न कह सका. हालांकि घर से भी बेघर होने के बाद उसने यहीं सड़क के किनारे एक छोटा सा घर बनाया था. दोनों भाई एक ही गांव में रहते थे, लेकिन एक-दूसरे से नजर भी नहीं मिलाते. उसका बड़ा भाई दबंग इंसान था, तो उसके सामने रमेश कुछ बोल भी न पाता था.

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महीनों बीत गए, पर रमेश को किसी काम का ऑफर नहीं आया. अब शायद दुनिया भी भूल चुकी थी कि वह एक शहनाईवादक है.

परंतु एक शाम जब रमेश खेत में मचान पर सोया था, तो रवि दौड़ा-दौड़ा उसके पास आया और चहकते हुए बोला, ‘पापा, संजय अंकल आए थे. उन्होंने कहा कि शहर से फिरदौस बाबू का कॉल आया था.’

‘कब?’ रमेश ने चौंककर पूछा.

‘पता नहीं, पर उन्होंने शहर जाकर उनसे मिलने को कहा है.’

‘अच्छा ठीक है, तुम घर जाओ मैं आता हूं.’ रमेश ने अपनी खुशी छुपाते हुए कहा.

फिरदौस बाबू, जो बंगाल के एक जाने-माने कलाकार हैं, यहां लखीसराय जिले में एक स्टूडियो चलाते हैं. रमेश उनसे बंगाल में मिला था, जब वो अपने पिता के साथ एक शादी पर परफॉर्म करने गया था. वो उसके पिता के काफी अच्छे मित्र थे. उन्होंने उसके पिता को कहीं रहकर फिल्मों में संगीत बजाने की राय दी थी, परंतु उस समय का जमाना कुछ और था. रमेश के पिता यह समझते थे कि शादी में संगीत बजाना एक पुण्य का काम है क्योंकि यहां हम भगवान की बनाई जोड़ियों को स्वर्ग पहुंचाते हैं. उस दिन फिरदौस बाबू ने पहली बार मेरे सिर पर हाथ फेरकर ये कहा था कि अगर कभी समय बदले, तो इधर का रुख जरूर करना.

और आज रमेश फिरदौस स्टूडियो के सामने खड़ा था. जहां उसके पिता ने कभी न जाने को कहा था और कुछ महीने पहले ही उसने कभी इस शहनाई को न पकड़ने की कसम खाई थी.

फिरदौस रमेश की कहानी जानता था, तो उसने ज्यादा वक्त न लेते हुए उसके सामने एक नौकरी का प्रस्ताव रखा. उसने बताया कि बंगाल में उसने शादी में बजाने वाली एक बहुत बड़ी बैंड कंपनी खोली है, जिसमें तमाम छोटे-छोटे बैंड जो कि विलुप्त होने की कगार पर हैं, सभी फिरदौस बैंड में सम्मिलित हो गए है. इसमें सभी पुराने सदस्यों, जिन्होंने इस दुनिया से मुंह मोड़ लिया था, उन्हें इकट्ठा किया जा रहा है. नए-नए लोगों को भी आने का मौका दिया जा रहा है. वह एक ऐसा बैंड बनाना चाह रहा है, जिसमें पुराने और अनुभवी लोग नए-नए लोगों को भी हर यंत्र और उपकरण अच्छे से बजाना सिखाएंगे.

फिरदौस ने बताया कि वह चाहता है कि बिजली पर चलने वाले गीत और संगीत की दुनिया में उस संगीत को भी उजागर करे, जो धीरे-धीरे अपनी समाप्ति की ओर बढ़ रहा है. वह चाहता है कि इस संगीत को बेहतर तरीके से पेश करे, ताकि लोग इसे फिर से उतना ही सराहें जितना पहले सराहते थे. फिरदौस चाहता था कि रमेश एक अनुभवी और बेहतर शहनाईवादक होने के नाते इस बैंड में शामिल हो और नए लोगों को इसका महत्व और इसे बजाना सिखाए.

‘मगर फिरदौस बाबू, मैंने प्रण लिया था कि अब मैं कभी इस दुनिया में कदम नहीं रखूंगा.’

‘देखो रमेश, ये मैं भी जानता हूं कि और तुम भी कि दूसरों के खेत में काम करके तुम कभी अपनी सारी जरूरतें पूरी नहीं कर सकते. अगर तुम इस बैंड में शामिल होते हो, तो मैं तुम्हें यह विश्वास दिलाता हूं कि तुम कुछ ही महीनों में अपनी बेटी की शादी में खुद शहनाई बजा रहे होगे. आगे तुम्हारी मर्जी, जो तुम करना चाहो.’

‘मैं कल आकर बताता हूं,’ यह कह कर रमेश गांव की तरफ निकल गया.

घर पहुंचकर रमेश ने चारों ओर देखा. उसकी पत्नी चूल्हे के पास खाना बना रही थी और उसकी बड़ी बेटी बगल में बैठी उसके साथ रोटियां बेल रही थी. रवि कुछ दूरी पर चटाई के ऊपर बैठा मोमबत्ती और चूल्हे से आती हुई मंद रोशनी के बीच किताबों में कुछ तलाश रहा था. बगल में कपड़े से आधी ढकी शहनाई दिखाई दे रही थी.

रवि ने रमेश की ओर देखा, तो रमेश ने मुस्कुराते हुए अपनी पत्नी से कहा, ‘सामान बांध लो, हम बंगाल जा रहे हैं.’


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