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महेंद्र सिंह धोनी की रिटायरमेंट पर क्या बोले 'लल्लनटॉप' के लोग?

महेंद्र सिंह धोनी. उन चुनिंदा क्रिकेटर्स में से एक, जिनका नाम लिख दो तो काम हो जाता है. विशेषण, फैक्ट इत्यादि औपचारिकताओं की जरूरत नहीं पड़ती. वही धोनी इंटरनेशनल क्रिकेट से रिटायर हो गए हैं. मुझे याद नहीं, आखिरी बार कब किसी रिटायरमेंट की ख़बर सुनकर मैं कुछ मिनटों के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ रह गया था.

ख़ैर, ख़बरों के पेशे में हैं और यहां किंकर्तव्यविमूढ़ रहने की इज़ाज़त नहीं होती. सो हम भी झटके से उबरे और पहला काम ये किया- दी लल्लनटॉप के खूबसूरत न्यूज़रूम से गुज़ारिश करी कि वह धोनी के रिटायरमेंट पर अपने अनगढ़ विचार बताएं. इसके रेस्पॉन्स में हमारे साथियों ने अपने विचार रखे. इन विचारों को आप नीचे पढ़ सकते हैं.

सबसे पहले अमितेश का मैसेज आया,

यार मैंने अपनी लाइफ में कोई ऐसी चीज नहीं की, जिसे ये कहूं कि हां मैं यही करना चाहता था. पढ़ाई से लेकर जॉब और लल्लनटॉप में आने तक सबकुछ. पर एक चीज है जो मैंने खुद से की- क्रिकेट को इंट्रेस्ट से देखना. धोनी की वजह से. सब जानते हैं कि धोनी में तथाकथित क्लास नहीं है, वो कमाल की कवर ड्राइव नहीं लगाता, पर सचिन के बाद भी अगर किसी के लिए क्रिकेट सबकुछ था, तो इसमें धोनी का बड़ा रोल था.

इसके बाद हमारे साथी ओमप्रकाश ने लिखा

क्रिकेटर्स तो बहुत हुए हिंदुस्तान में. कई क्रिकेटर्स ने लोगों के दिलों पर राज किया. लेकिन लोगों के दिल में धोनी के लिए जो प्यार है वो शायद इकलौता है. धोनी के लिए लोगों के दिल में सिर्फ एक क्रिकेटर के तौर पर प्यार नहीं है बल्कि एक इंसान के तौर पर लोग धोनी से मोहब्बत करते हैं. धोनी की सिम्पलीसिटी, धोनी का टीम के लिए समर्पण, धोनी के बोलने का अंदाज़, धोनी के ज़िन्दगी की कहानी. सब लोगों के सीधे दिल तक पहुंचती है.

MS धोनी मूवी के बाद धोनी के लिए लोगों का प्यार और बढ़ गया. हाल के सालों में धोनी भले ही बल्ले से अच्छा प्रदर्शन न कर पा रहे हों, लेकिन उनके फैन्स का उनके प्रति प्यार कभी कम नहीं हुआ. धोनी ने इंडियन क्रिकेट को सिर्फ़ खिताब नहीं दिलाए हैं. धोनी ने गांगुली की विरासत को वहां तक पहुंचा दिया है जहां से टीम इंडिया कभी पीछे मुड़कर नहीं देखेगी.

गांगुली ने लड़ना सिखाया तो धोनी ने हर हाल में जीतना, और बड़ी से बड़ी जीत को चिल होकर सेलिब्रेट करना. ना जीत में ज्यादा जश्न मनाना और ना ही हार में ज्यादा गुस्सा करना और निराश होना. यही ख़ासियत धोनी को सबसे महान कप्तान बनाती है. धोनी अब 22 गज़ की पट्टी पर नीली जर्सी में ना विकेट के आगे दिखेंगे ना पीछे. लेकिन इंडियन क्रिकेट का जब इतिहास लिखा जाएगा. तो धोनी पर उसमें सबसे बड़ा चैप्टर होगा.

हमारी दोस्त मेघना का संदेश था,

धोनी का मैदान पर होना मेरे लिए सब कुछ था. जिस मैच में धोनी नहीं होते थे उस मैच को मैंने शायद ही देखा हो. टीम कितना ही बुरा खेल रही हो, मगर जब तक धोनी ग्राउंड पर रहते थे मुझे हमेशा ये आस रहती थी कि हम जीतेंगे.

IPL में भी सब अपने स्टेट की टीम को सपोर्ट करते थे मगर मैं चेन्नई सुपर किंग्स को सपोर्ट करती थी,  क्यूंकि धोनी उस टीम के कैप्टन थे.  धोनी का रिटायर होना व्यक्तिगत हानि जैसा लगता है.

हमारे ‘बेस वाले भैया’ अभिषेक त्रिपाठी ने लिखा,

आहां. ये तरीका नहीं है एमएस धोनी को ट्रिब्यूट देने का. अगर मैं कहता कि मैं धोनी का फैन या फॉलोअर हूं तो मुझे धोनी की रिटायरमेंट पर एक भी शब्द लिखना, या कहना नहीं चाहिए. क्योंकि “It’s all part and parcel of the game”. धोनी की रिटायरमेंट पर तो मैं वो ट्रिब्यूट देता कि चुप-चाप खड़ा रहता. ‘पल-दो पल का शायर’ सुनकर मुंह के भीतर थूक निगलता रहता कि आवाज भर्राने न पाए. की-बोर्ड पटर-पटर मारकर ms dhoni retire का की-वर्ड भुनाता रहता क्योंकि I am on duty, everything else can wait.

यही किया भी. ये लिख रहा हूं तो पहले ख़बरें निपटाके आया हूं धोनी वाली. क्योंकि ये भी धोनी से ही सीखा है. कि We do feel emotional at times, but I think I am good at hiding them. मैं कितना कुछ लिख देना चाहता हूं महेंद्र सिंह धोनी तुम पर. लेकिन तुम पर लिखा हर एक शब्द मुझे तुमसे दूर कर रहा है. ये जो लिख भी रहा हूं, ये मेरा काम है इसलिए लिख रहा हूं. इसके अलावा कुछ नहीं लिखूंगा तुम पर. नहीं रिएक्ट करूंगा तुम्हारे रिटायरमेंट पर. यही ट्रिब्यूट है तुम्हें.  धोनी. पूर्णता और परफेक्शन के छद्म दंभ को तोड़ने वाला. अब नहीं लिखूंगा.

ह्यूमन कम्प्यूटर अभिषेक जी की पहली टिप्पणी कुछ यूं थी,

90 के दशक में मोइन खान, रोमेश कालूवितर्णा और एडम गिलक्रिस्ट ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में बैटिंग की परिभाषा बदल कर रख दी थी. अब सभी टीमों में नंबर सात तक स्टैब्लिश बैट्समैन रखने की परंपरा शुरू हो चुकी थी और इसी को देखते हुए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने भी नयन मोंगिया से आगे देखना शुरू किया. कई लोगों को आजमाया गया.

सबा करीम, एमएसके प्रसाद, अजय रात्रा, पार्थिव पटेल, दिनेश कार्तिक आदि-आदि. लेकिन कोई भी मोइन, कालूवितर्णा और गिलक्रिस्ट जैसा मारक नहीं बन पा रहा था. ऐसे में महेन्द्र सिंह धोनी का भारतीय टीम में आना एक सुखद अहसास था. फारूख इंजीनियर के बाद पहली बार भारत ने ढंग का विकेटकीपर-बैट्समैन देखा और इसके बाद भारत की क्रिकेट का रूख बदल गया.

धोनी ने न सिर्फ विकेट-कीपर बैट्समैन की जिम्मेदारी निभाई बल्कि भारत के लिए लांस क्लूजनर और माइकल बेवन जैसे फिनिशर की कमी भी पूरी की. कभी कपिलदेव ने कहा था कि ‘यदि उनके पास सचिन तेंदूलकर जैसा प्लेयर होता तो वे कम से कम एक और विश्व कप जीतते’ लेकिन मैं कहता हूँ कि 90 के दशक में यदि धोनी जैसा विकेट-कीपर बैट्समैन होता तो मोहम्मद अजहरुद्दीन की टीम तीन में से एक विश्व कप हर हाल में जीतती.

क्विज मास्टर अभिषेक सोनू ने लिख भेजा,

धोनी लंबे समय से आंखों से दूर हैं. साल भर से ऊपर हो गए. आखिरी बार वर्ल्ड कप सेमीफ़ाइनल में वापस लौटते देखा था. बेपनाह टीस ओढ़े हुए. नौकरीशुदा जीवन में कदम रखे हफ़्ता भर भी नहीं हुआ था. तब कतई नहीं सोचा था कि नीली जर्सी में वो अंतिम बार दिख रहे हैं. सैकड़ों हेडलाइन्स सामने से गुज़र कर रह गईं, धोनी इस सीरीज़ से वापसी करेंगे. वो नहीं आए, मगर उम्मीदों का बल्ब टिमटिमाता रहता था. उन उम्मीदों का स्विच अब ऑफ़ हो गया है.

क्रिकेट से इश्क़ का एक बड़ा हिस्सा उनके नाम है. बिछोह में जैसे आंखों के कोर भीग जाते हैं, शब्द गीले होने लगे हैं. माही रिटायर हो गया है. उसने अपनी बंद मुट्ठी खोल दी है. जुगनू टिमटिमाने लगे हैं.

विदा कप्तान!

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जापानी भाषा का एक शब्द है – कोडोकुशी. कोडोकुशी माने? माने जैसे 69 साल का वो बुज़ुर्ग, जो 1998 में एक रोज़ अपने घर के अंदर मर गया. वो मर गया है, ये बात किसी को नहीं पता चली. न उसके किसी दोस्त ने उसको मिस किया, न परिवार ने कभी याद किया. वो यूं मर गया, जैसे कभी था ही नहीं. वो यूं दुनिया से गया, जैसे कभी आया ही नहीं था. तीन साल तक उसकी लाश घर के अंदर पड़ी रही. फिर एक दिन उसके घर का गेट खुलवाया गया. क्यों? क्योंकि उसका बैंक खाता खाली हो चुका था. मालिक मकान को पैसे मिलने बंद हो गए थे.

कहते हैं जापान में हर रोज़ एक दर्जन से ज़्यादा लोग यूं ही मरते हैं. अकेले. विस्मृत. ऐसी ही निर्जन और एकांत मौतों को जापान में कोडोकुशी कहते हैं. धोनी का रिटायरमेंट ऐसी ही कोई कोडोकुशी है.

जवान खिलाड़ी खेलने आते हैं. खेलते हैं. बहुत अच्छा खेलते हैं. बहुत साल तक अच्छा खेलते हैं.

जवान खिलाड़ी अधेड़ होने लगते हैं. रफ़्तार घटने लगती है. रफ़्तार, फुटवर्क मंद होने लगता है. गेंद फिसलने लगती है, शॉट की टाइमिंग बिगड़ने लगती है. कभी उसके नाम पर स्टेडियम को सिर पर उठा लेने वाली जनता उसकी हूटिंग करने लगती है. उसकी दिलाई जीतें भुला दी जाती हैं. हर हार को उसकी दिलाई हार बता दिया जाता है. उसपर मज़ाक बनाए जाते हैं. उसकी खिल्ली उड़ाई जाती है.

लगता ही नहीं कि यही दर्शक थे, यही खेल था और यही खिलाड़ी जिसको इतनी मुहब्बत मिलती थी. सब कुछ बेहद क्रूर हो जाता है.

धोनी को हमसे यही क्रूरता मिली. उसके रिटायर होने की दुआएं मांगी गईं. उसके खेलने को उसकी बेशर्मी बताया गया. लोग यूं लिखने लगे कि ख़ुद निकल जाओ, वरना धकियाकर निकाल दिया जाएगा. लोगों ने कहा, आत्मसम्मान की ज़रा भी परवाह होगी तो निकाले जाने के पहले ख़ुद निकल जाएगा.

देखिए, निकल गया वो. ले लिया उसने रिटायरमेंट. अब तो आपकी शिकायतें ख़तम हो गई होंगी?

हमारे खास साथी अमन ने लिखा,

धोनी ने कभी किसी टूर्नामेंट को छोटा नहीं समझा. कैप्टन के तौर पर लगातार परफॉर्म किया. सबसे बढ़िया मैच फिनिशर है, आज भी. कप्तान के रूप में बेहद शांत बंदा है, कभी गुस्सा नहीं किया, कभी नर्वस नहीं हुआ. बहुत धीरज के साथ फैसला लेने वाला बंदा. ट्रेंड के चक्कर में नहीं पड़ता, लेकिन खुद के स्टाइल का ट्रेंड बना लेता है.

हार को भी पॉजिटिव लेता है. कड़े फैसले लेना तो कोई धोनी से सीखे. धोनी जैसा दूसरा क्रिकेटर मिलना बेहद मुश्किल है.


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