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'लल्लनटॉप कहानी कंपटीशन' में चुनी गई कहानी, दी ब्लू कॉमरेड

लल्लनटॉप कहानी प्रतियोगिता का चौथा संस्करण 2019 में आयोजित किया गया था. इसमें सैकड़ों लोगों ने भाग लिया. कई चरणों के क्रमबद्ध चयन के बाद हमने 15 टॉप कहानियां सेलेक्ट कीं, जिनको फिर से हमारे तटस्थ निर्णायक दल ने जांचा. 


Web Story Band 02
कई चरणों के क्रमबद्ध चयन के बाद हमने 15 टॉप कहानियां सेलेक्ट कीं, जिनको फिर से हमारे तटस्थ निर्णायक दल ने जांचा.

निर्णायक दल को इसमें से तीन कहानियां एक ही मयार की लगीं. इसलिए हर बार जहां प्रथम विजेता एक लेखक/लेखिका और उसकी एक कहानी को घोषित किया जाता था, अबकी बार हम घोषित करेंगे तीन विजेता. आपको उन्हीं तीन विजेताओं में से एक अनुराग अनंत की कहानी ‘द ब्लू कॉमरेड’ पढ़ा रहे हैं. यूनिवर्सिटी के कैंपस से निकलती हुई ये कहानी कितनी सहजता से सत्ता के गलियारों में समा जाती है, हमें पता भी नहीं चलता. इसी सहजता से ये कहानी कई मौकों पर हमें असहज भी करती है और करती है मजबूर सोचने पर.

दी ब्लू कॉमरेड
अनुराग अनंत

मैं उससे मिली थी इसलिए उसकी कहानी कहते हुए मेरे माथे पर एक अदृश्य आंख उग आई है. जिससे मैं वो भी देख पा रही हूं, जो मैंने नहीं देखा. आप जो उसकी कहानी पढ़ रहे हैं. आपके माथे पर भी एक अदृश्य आंख उग आएगी. शब्द चित्र बन जाएंगे और आंख पढ़ना छोड़ कर देखने लगेगी. माथे पर उगी ये तीसरी आंख संवेदना की आंख है. इसके ना रहने पर सब कुछ भ्रम के कुहासे में खो जाएगा. आंखें सब कुछ पढ़ तो लेंगी पर देख कुछ नहीं पाएंगी. तो अब यहां से क़रार होता है कि कहानी पढ़ते हुए आपकी तीन आखें हैं. और कहानी कहते हुए मेरी भी तीन आंखें.
वो जनवरी का महीना था. क़त्ल के लिए एकदम मुफीद महीना. कुहासे में एक हाथ की दूरी पर खड़ा आदमी पेट में खंज़र घोंप दे और आप उसका चेहरा भी न देख सकें. रात में सितलहरी चलती थी और सुबह फुटपाथ पर पलने वाले गरीब बच्चे और उनके मां-बाप ईश्वर को प्यारे हो जाया करते थे. दिल्ली का दिल पत्थर था और आंख बंजर. न दिल पसीजता था और ना आंख रोती थी. मैं एक चिड़िया थी जो उत्तर प्रदेश के इलाहबाद से उड़ कर दिल्ली के एक बड़े विश्वविद्यालय की मुंडेर पर आ कर बैठ गई थी. यहां पढ़ने वाले लड़के-लड़कियां दुनिया बदलने के लिए ज़मीन के भीतर सुरंग खोदने से लेकर आसमान में सुराख़ करने तक सब काम कर जाना चाहते थे. इनकी हवा में लहराती हुई मुट्ठियां देख कर कवि ने कहा था

“हीलेले झकझोर दुनिया…”

और एक उदास सी शाम हॉस्टल के कत्थई अंधेरे में डूबे अपने कमरे में फांसी लगा ली थी. दुनिया को झकझोरने का सपना देखने वालों के हिस्से मौत लिखने का दस्तूर बहुत पुरना था और कवि इस दस्तूर का अपवाद नहीं हो सका था.

कवि के अधूरे सपने का सारथी, इस कहानी का नायक उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले से था. भारत का एकमात्र जिला जो चार राज्यों – मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार से घिरा हुआ है. शहरों की सच्चाई, समझ और शिक्षा उसके गांव पहुंचते-पहुंचते कोहनियों के बल रेंगने लगती थी. उसके गांव में क़ानून की किताब सर के बल खड़ी थी. व्यवस्था के ज़िस्म में कांटों से सिवाय कुछ नहीं था. वो जब अपने बारे में बताने लगता तो तीसरी चौथी लाइन में ही कह देता था,

“मेरी जिंदगी में गन्दगी की मात्रा कुछ ज़्यादा ही है, इसलिए मेरे खुरदुरे हाथ आपके मन का मखमल मैला कर सकते हैं. आपको अपने ख्याल की ख़ूबसूरती बचानी है तो मुझसे बातें मत करिए. मेरे यहां सब कुछ ख़ूबसूरत नहीं है…”

मैं उसकी इसी बात पर मर मिटी थी. वैसे यूनिवर्सिटी की कमोबेश सभी लड़कियां उसकी किसी न किसी बात पर मरती थीं. हमने उसे टुकड़ों में बांट लिया था. जैसे उसके होंठ हर्षिता को पसंद थे. नताशा उसकी हाथों की उभरी हुई नसों पर जान देती थी. बबली उसके बालों की दीवानी थी. वो जब अपने घुंघराले बालों में हाथ फेरता था तो हमारी दुनिया डोल जाती थी. वो बातें करते वक़्त जब ख्यालों में खो जाता तो हम उसकी ख़ामोशी में डूबने लगते थे.

मैंने उसे पहली बार एडमिन ब्लाक पर एक धरने में देखा था. लम्बे घुंघराले बाल, अच्छा-ख़ासा कद, गठी हुई काठी, हाथ में हंसिए का टैटू, नीली जींस, आसमानी कुर्ता और लाल गमछा पहने हुए था वो. शरीर को ख़ास तरीके से थोडा सा झुका कर आसमान में मुट्ठी लहराकर वो नारा लगा रहा था –

“ज़ोर-ज़बर पर लगे लगाम
जय भीम लाल सलाम!!
सबको शिक्षा सबको काम
जय भीम लाल सलाम!!
ज़ुल्मी तेरा काम तमाम
जय भीम लाल सलाम!!
फूले-पेरियार-भगत सिंह
वी शैल फाइट वी शैल विन…’’

मैं ख़ुद को उससे बात किए बिना नहीं रोक सकी. मैं उसका इंतज़ार करती रही. शाम को जब वो धरने से फ्री हुआ. मैं उसके पीछे दौड़ते हुए पहुंची. मैंने हिचकिचाते हुए कहा,

‘‘क्या मैं आपसे बात कर सकती हूं?’’
‘‘आप मुझसे बात क्यों करना चाहती हैं?”, उसने सवाल के जवाब में सवाल किया.

‘‘पता नहीं, बस करने का मन है”, मैंने उत्तर दिया.
‘‘ये एक ख़ूबसूरत और मासूम वजह है”, कहते हुए वो खिलखिलाकर हंस पड़ा.

हम वहीं पेड़ के नीचे बेंच पर बैठ गए. तब मेरे माथे पर अदृश्य आंख नहीं उगी थी. पर आज जब मैं उसकी कहानी कह रही हूं, मेरे पास वो अदृश्य आंख है. मैं देख पा रही हूं कि जब मैंने उससे उसका नाम पूछा था, तब उसकी स्मृति में उसके गांव का दक्खिन टोला उभर आया था. उसका अपना मोहल्ला. अधनंगे पुरुषों और नंगे बच्चों का झुण्ड एक मादा सूअर के पीछे दौड़ा जा रहा था. सूअर ऐसे चीख़ रही थी कि आत्मा में छेद हो जाए.

उसके पिता ने खूब दारु पी थी. और वो अपनी पत्नी और उसकी मां को बेतहाशा पीट रहा था. उसकी छोटी बहन मां से लिपट कर रो रही थी. बीच बीच में ख़ुद भी पिट जाया करती थी. छोटी बहन से थोड़ी-सी बड़ी बहन खाना बना रही थी. वो इस मारपीट के दृश्य की इतनी आदी हो गई थी कि उसके लिए उसके मां-बाप और बहन अदृश्य हो गए थे.

उसके लिए ये सब कुछ इतना सामान्य था कि उसके सामने ‘कुछ नहीं’ हो रहा था.

वो एक धुन में बंधी हुई खाना बनाए जा रही थी. वो ठीक उसी समय वहां से उठा और जिधर सूअर काटने की आवाज़ आ रही थी उधर निकल गया. उसकी उम्र उस समय बारह साल थी. उसने अब तक कई बार सूअर को कटते और अपनी मां को पिटते देखा था. उसकी उम्र से आप उसकी सबसे छोटी बहन और उससे थोड़ी-सी बड़ी बहन की उम्र का अंदाज़ा लगा सकते हैं. ये दृश्य जो आप अभी देख रहे हैं. मेरे बात करने के दौरान उसकी स्मृतियों में तैर रहे थे.

मैंने पूछा,

“तुम्हारा नाम क्या है?”
‘‘खेतराम मुसहर…’’
‘‘इसका क्या मतलब होता है?’’
‘‘मेरे नाम का कोई मतलब नहीं है. मैं अपने काम से अपने नाम को मतलब देना चाहता हूं.’’

मेरी तीसरी आंख देख रही है. मई-जून की चिलचिलाती धूप में एक गर्भवती औरत गेहूं काट रही है. गेहूं की बालियां सुर्ख लाल हैं. औरत के पेट में दर्द होता है और वो रेंग कर खेत के भीतर चली जाती है. गेहूं की कमर तक की पकी हुई बालियों के बीच दर्द से कराहती हुई, औरत रोती-तड़पती एक बच्चे को जन्म देकर बेहोश हो जाती है. बच्चा गेहूं की बालियों के बीच खून में लिथड़ा हुआ पड़ा है. औरत बेहोश है और बच्चा रो रहा है. औरत एक घंटे बाद बेहोशी से उठती है और जिस हंसिये से गेहूं काट रही थी उसी से अपने बच्चे की नाल काट देती है. अब आप देखिए वो औरत सर पर गेहूं का बोझ रखे, एक हाथ से बोझ संभालती और दूसरे हाथ में अपने नवजात बच्चे को उठाए घर वापस आ रही है. गेहूं के बोझ में हंसिया धंसी हुई है और बच्चा औरत की सूखी हुई छाती में समाया हुआ है.

मैंने फिर सवाल किया, “आपके पिता क्या करते हैं?”

वो मुस्कुराया और मैं देखती हूं कि एक तालाब में गर्दन तक के पानी में धंसे बुद्ध मद्धम-मद्धम हंस रहे हैं.

‘‘मेरे पिता आप सबके पिताओं की तरह टीचर, प्रोफ़ेसर, एडवोकेट, जर्नलिस्ट, बिजिनेसमैन, क्लर्क, बैंकर या ऐसे कुछ भी नहीं हैं. वो जीने के लिए कुछ भी करते हैं.’’
‘‘कुछ भी. मतलब?’’
‘‘आपको मुझसे बात करते हुए हर बात कर मतलब पूछना पड़ेगा. और मुझे आपको हर बात का मतलब समझाना पड़ेगा. ये आपके लिए भी कठिन होगा और मेरे लिए भी. हम एक ही देश में दो अलग अलग दुनिया में जीने वाले लोग हैं.’’

मैं उसकी बातों में खो गई. वहां नदियां थीं. बड़े छायादार वृक्ष थे. ख़ूब अंधेरा था. जुगनू चमक रहे थे. और चांद-सितारे ज़मीन पर कुदाल चला रहे थे. मेरी ख़ामोशी लम्बी खिंचती देख उसने कहा,

‘‘मेरे पिता ठाकुर हरदयाल सिंह के खेत में मज़दूर हैं. त्योहारों में ढपली बजा कर भीख मांगते हैं. लोगों की शादी में छाती में संतरे लगा कर और पांव में घुंघरू पहन कर नाचते भी हैं. इसके अलावा वो खूब दारु पीते हैं और मां को पीटते हैं. गांव वाले मेरे बाप को मंगता मुसहर कहते हैं. और अब अपने मन का मखमल बचाना मैंने जिस आदमी के बारे में अभी बताया, वो मेरा बाप है पर मैं उसका बच्चा हूं ठीक-ठीक नहीं कह सकता. सब कहते हैं मैं किसी ठाकुर की औलाद हूं. मेरी कद-काठी, शक्ल-सूरत, रंग-रूप देख कर गांव में सब यही कहते हैं और मुझे भी यही लगता है, इसलिए तुम देखना मैं अपनी इस देह को ऐसे खत्म करूंगा कि कहानी हो जाऊंगा. आग के दरिया में छलांग लगाऊंगा और खाक हो जाऊंगा. मैंने एक बार अपनी मां से पूछा था कि मैं किसकी औलाद हूं? सवाल के जवाब में मेरी मां गीली लकड़ी की तरह सुलगने लगी थी. तुम जानती हो इसका मतलब क्या होता है? मैं जानता हूं. जब कोई मेरी देह की तारीफ़ करता है तो मेरा दुश्मन हो जाता है. मैं इस देह में कैद हूं और कैदी के सामने जेल की तारीफ करने वाला कैदी का दुश्मन होता है.’’

वो लगातार बोले जा रहा था. मेरा जी किया कि मैं उसे सीने से भींच लूं और जी भर के रोऊं, लेकिन मैं चुपचाप बैठी रही. वो गीली मिट्टी की तरह महकने लगा था.

मेरी तीसरी आंख देख रही है. एक कोठरी में उसकी मां पड़ी हुई है और उसके ऊपर एक मर्द जानवरों की तरह लदा हुआ. कमरे में ख़ूब अंधेरा है. रह-रह कर एक रौशनी मर्द के चेहरे पर पड़ती है. और हर बार उसका चेहरा बदल जाता है. मैं चेहरा ठीक से रट पाऊं उससे पहले ही रौशनी हट जाती है. और अंधेरे कमरे से रोने पीटने की आवाज़ें आने लगतीं हैं. उन सारे मर्दों में से किसी की नाक, किसी का बाल, किसी के होंठ, किसी की कद काठी खेतराम से मिलते हैं. अब दूसरा चित्र उभरता है गंगा नदी में बहुत सारे नाले मिल रहे हैं सब गंगा हो जा रहे हैं.

उसने मुझसे पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”.

मैंने खोए-खोए ही जवाब दिया, “स्वाति शुक्ला.’’

वो मुस्कुराया और कहने लगा, “इसीलिए मुझे हर बार मतलब समझाना पड़ रहा था.’’

मैंने फिर पूछा, “मतलब?”

उसने जवाब में कहा, ‘‘पुलिस आ रही है स्वाति, तुम जाओ. ये मुझे पकड़ने आए हैं, पर पकड़ नहीं पाएंगे. मैंने ऐसे खाकी चूहों को खेत में बिल से निकाल के भूजकर खाया है. खेतराम मुसहर नाम है मेरा.’’

पुलिस उसकी ओर झपटी और वो झाड़ियों-पगडंडियों के बीच पुलिस को छकाते हुए, ओझल हो गया. मैं वहीं बेंच पर बैठे-बैठे खेतराम मुसहर उर्फ़ यूनिवर्सिटी के प्यारे छात्रनेता कॉमरेड खेतू दा को खेत में चूहों को पकड़ते उन्हें उनके बिलों से निकाल कर भूनते और खाते देखती रही. मैंने कभी नहीं सोचा था कि पंडित शक्ति शुक्ला की इकलौती बेटी स्वाति शुक्ला को चूहा खाने वाले आत्महंता नायक से प्रेम हो जायेगा.

रात में जब मैं हॉस्टल पहुंची सारी यूनिवर्सिटी में चर्चा हो गई थी,

“खेतू दा के कमरे में छापा पड़ा है.’

पुलिस को कुछ किताबें मिलीं थीं जिन्हें संदिग्ध बताया जा रहा था. पुलिस खेतराम मुसहर को किसी भी कीमत पर गिरफ़्तार करना चाहती थी. यूनिवर्सिटी के लड़के-लड़कियां अपने नेता के बचाव में पुलिस मुख्यालय धरना देने जा रहे थे. मैं भी उनके साथ हो ली. टीवी पर हमारी यूनिवर्सिटी के खिलाफ पहले से चल रहे प्रोपेगंडा को एक और मसाला मिल गया था. खेतराम मुसहर एक झटके में नक्सली घोषित किया जा चुका था. एंकर ख़बरें पढ़ते हुए दहाड़ रहे थे. रात और काली होती जा रही थी. टीवी वालों को कुछ ही घंटे में खेतराम के लिंक चाइना, पकिस्तान और अलकायदा से होने का दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया था. देश के प्रधानमंत्री को खेतराम से जान का ख़तरा हो गया था और अभी शाम तक मेरे साथ बैठा एक मासूम-सा उलझा हुआ लड़का रात बीतते-बीतते राष्ट्रीय सुरक्षा पर संकट की तरह मंडराने लगा था. एक भीड़ ‘मार दो, मार दो’ चीख रही थी और हम लड़ते हुए भी असहाय थे.

हम सब छात्र थे. हमारे अपने अपने भविष्य थे. अपने-अपने सपने, अपनी पानी मजबूरी और अपनी अपनी कायरता भी. सुबह होते होते हम सब हॉस्टल वापस आ गए.

टीवी अपना काम करता रहा और व्यवस्था अपना. खेतराम मुसहर लापता हो गया. पता नहीं कहां गया. लोग कहते हैं अंडरग्राउंड हो गया. अंडरग्राउंड होने का क्या मतलब होता है? खेतराम नहीं था, नहीं मैं अंडरग्राउंड होने का मतलब पूछती. वो सब चीज़ों का मतलब समझता था. वो सब चीज़ों का मतलब समझा भी सकता था.

खेतराम बहुत समझदार था और यही उसकी त्रासदी थी.

समय बीत रहा था. छ: महीने बीत गए जैसे छ: अंधेरी रातें बीतीं हों. मैंने सपनों के अकाल के उस मौसम में एक सपना देखा कि मैं सिविल सर्विसेज़ में जा कर देश की सेवा करूंगी. मैंने तर्क गढ़ा बिना ताकतवर बने मजलूमों के हक़ की बात नहीं की जा सकती. दुनिया सफल लोगों की बात सुनती है. मैं सफल होने के लिए दिन रात एक करने लगी. क़िताबों में डूब गई. और फिर जनवरी का वही महीना आया जहां से कहानी शुरू हुई थी.

29 जनवरी का दिन – “हीलेले झकझोर दुनिया” लिखने वाले कवि की बरसी का दिन. वो मनहूस तारीख जब हॉस्टल के किसी कमरे में कवि ने फांसी लगा ली थी. हम यूनिवर्सिटी के उस लाडले कवि को याद कर रहे थे. उसके गीतों और कविताओं का कार्यक्रम था. सितलहरी वाली सर्दी फुटपाथों और झुग्गियों में हत्याएं कर रही थी. और पत्थर दिल, दिल्ली की छाती के बीचों-बीच उगे संसद का सत्र चल रहा था.

मेरा फ़ोन बजा. उधर से खेतराम बोल रहा था. अब उसे यूनिवर्सिटी में सब प्यार से ब्लू कॉमरेड कहते थे.

‘‘स्वाति मैं पुरानी दिल्ली स्टेशन पर हूं. तुमसे मिलना चाहता हूं.’’
मैंने पूछा,
“कौन?”
उधर से जवाब आया, “खेतू! खेतराम मुसहर बोल रहा हूं…”

मेरी सांस में सांस आई. देह में आत्मा. मैं ख़ुशी में हड़बड़ा-सी गई.

“हां हां, खेतू! मैं आती हूं…”

कह कर मैं पुरानी दिल्ली स्टेशन की ओर चल पड़ी.

खेतराम ने लम्बी दाढ़ी और लम्बे बाल रखे थे. रंग भी काफी सांवला हो गया था. देह आधी बची थी. पहचाना नहीं जा सकता था एक बार में. मुझे उसे देख कर बहुत दया आई. मैं पहुंचते ही उसके गले लग गई.

‘‘कैसे हो खेतू?’’, मैंने भर्राए गले से कहा.
‘‘अभी इतना अच्छा नहीं बन सका कि इस व्यवस्था में खप सकूं. मैं ऐसा हूं कि इस सिस्टम को बर्दाश्त नहीं.’’
‘‘कहां थे तुम?’’
‘‘अपनी राह पर, युद्ध के मोर्चे पर.’’
‘‘तो क्या तुम सच में नक्सली हो गए हो?’’
‘‘मैं क्या हूं, अभी नहीं जानता. नक्सली हूं कि नहीं ठीक-ठीक नहीं कह सकता. पर इस व्यवस्था के गले की फांस जरूर हूं.’’
‘‘खेतू! तुम चाहते क्या हो?’’

‘‘आजादी.’’

‘‘ये सब नारे-वारे में सही लगता है. यूनिवर्सिटी के भीतर का फैशन है ये खेतू. बाहर देश आजाद हो चुका है. आजादी मिल चुकी है.’’

‘‘स्वाति! किससे आजादी मिली है? और किनको मिली है? जिन्हें आजादी मिली है वो कभी गुलाम ही नहीं थे स्वाति, और जो गुलाम थे उन्हें अब तक आजादी मिली ही नहीं है. कहां है भूख से आजादी? भेदभाव से आजादी? अवसरों के अपहरण से आजादी? कहां है? मुझे आजादी चाहिए स्वाति! किसी भी कीमत पर चाहिए.’’

‘‘पर कैसे खेतू?’’
‘‘मुझे नहीं मालूम स्वाति.’’
‘‘फिर अब तुम क्या करोगे?’’
‘‘आजादी के लिए लड़ाई.’’

‘‘कैसे? और किससे?’’
‘‘कैसे का जवाब मेरे पास नहीं है, पर किससे का जवाब जानता हूं. मेरी लड़ाई इस व्यवस्था से है. इसके स्ट्रक्चर से है. मेरी लड़ाई किसी व्यक्ति, किसी पार्टी से नहीं है. इस पूरी शोषक व्यवस्था से है.’’
‘‘वो तुम और भी तरीके से कर सकते हो. देखो मैं कर रही हूं. मैंने आईएएस का प्री क्लियर किया है. मैं अफ़सर बनके गरीबों की सेवा करुंगी खेतू!’’
‘‘यही अंतर है स्वाति तुममें और मुझमें. तुम सेवा करना चाहती हो और मैं संघर्ष. तुम सहानुभूति से संचालित हो और मैं अनुभूति से. तुम्हारे अन्दर दान का भाव है और मेरे अन्दर स्वाभिमान का. तुम इस व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहती हो और मैं इस व्यवस्था का विरोधी हूं.’’

‘‘खेतू! तुम पागल हो गए हो.’’
‘‘स्वाति मुझे पागल बनाया किसने है?’’
‘‘तुम ग़लत कर रहे हो खेतू!’’
‘‘मेरे साथ ग़लत हुआ है स्वाति!’’
‘‘तुम कोई अनोखे नहीं हो बहुतों के साथ होता है.’’
‘‘वही तो मैं कह रहा हूं स्वाति! बहुतों के साथ होता है और किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता. इसी को स्ट्रक्चरल वॉयलेंस कहते हैं. इसे सबने स्वीकार कर लिया है. मैं नहीं कर पा रहा हूं. मुझे ये बर्दाश्त नहीं है इसीलिए मैं लड़ रहा हूं.’’

‘‘तुम समझते क्यों नहीं खेतू!’’ (मेरी आंखों में आंसू थे…)
‘‘मैं सब कुछ समझ गया हूं स्वाति! इसलिए ऐसा हो गया हूं.’’ (उसका गला रुंधा हुआ था…)

मैं खीझ गयी थी. खेतू समझ नहीं रहा था. मैंने झुंझलाहट में चीखते हुए कहा,

“खेतू! तुम किस खेत की मूली हो? जो व्यवस्था ख़तम कर दोगे.’’

‘‘स्वाति! मैं मूली नहीं हूं ठाकुर हरदयाल सिंह के खेत का गेहूं हूं. मेरी मां ने फसल काटते हुए मुझे जन्म दिया है. हंसिए से मेरी नाल काटी है. मेरे हाथों में गुदा हुआ ये हंसिया इसीलिए मुझे प्यारा है. इसने दुनिया से मेरा रिश्ता जोड़ा है. मैं इसी हंसिए से इस व्यवस्था की नसें काट दूंगा.’’

‘‘मैंने खेतू का चेहरा अपनी हथेलियों में लेते हुए कहा, “खेतू अब तुम कहीं नहीं जाओगे. तुम अपनी पीएचडी पूरी करो और लोकतान्त्रिक लड़ाई लड़ो. मैं तुम्हारे साथ हूं.’’

‘‘स्वाति क्या मेरी लड़ाई आलोकतांत्रिक है? लोकतंत्र की सबसे ज़्यादा जरूरत किसे है? ग़रीब, निर्बल, वंचित, निर्धन, हाशिए के लोगों को न? ताक़तवर और बलवान को अपनी बात कहने के लिए, अपना काम करवाने के लिए किस लोकतंत्र की जरूरत पड़ती है. तुम जिसे लोकतंत्र कह रही हो, उसमें क्या हो रहा है? ग़रीब अपनी बात नहीं कह सकता. कहता भी है तो कोई सुनने वाला नहीं है. शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, न्याय उसकी पहुंच से दूर हैं. उसकी बेटी का बलात्कार भी हो जाए तो कोई मुकदमा तक लिखने वाला नहीं है और अमीर का कुत्ता भी खो जाए तो सारे महकमे लगा दिए जाते हैं. तुम मिडिल क्लास के सड़कों पर निकल आने को लोकतांत्रिक लड़ाई कहती हो? ये कभी आदवासियों की ज़मीन छीनी जाने पर घरों से बाहर निकलते हैं. किसी मजदूर, ग़रीब, दलित की बेटी का बलात्कार होने पर दिल्ली की सड़कें जाम क्यों नहीं होतीं? कभी ये लोग मेनहोल में इनकी गन्दगी साफ़ करते हुए मरे किसी गरीब की मौत पर आंदोलित हुए? इन्होंने किसी बच्चे के भूख से मरने पर सरकारों से अदावतें कीं? देश की आधी से ज़्यादा दौलत एक प्रतिशत पूंजीपतियों के पास है और ये लोग क्रिकेट मैच जीतने पर झंडे फहरा कर देशभक्त हो रहे हैं. देश के 70 प्रतिशत लोग दो वक़्त का भरपेट खाना नहीं पा रहे हैं और ये इनका सवाल तक नहीं है. स्वाति हमारे सवाल अलग हैं. हमारी लड़ाई अलग होगी.’’

खेतराम ही आंखें लाल हो गई थीं. सांसें फूल रही थीं. वो एक सांस में इतना सब कुछ किसी रटे-रटाए भाषण की तरह बोल गया था. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूं. मैं ख़ामोश थी. खेतराम कुछ देर चुप रहा फिर एक गहरी सांस लेते हुए बोला,

‘‘स्वाति! तुम हमारे जीवन का गणित नहीं समझ सकती. जब हमारे घरों से हमारे भाई-बाप सीवरों में गन्दगी साफ़ करने उतरते हैं तो जानती हो हमारे दिलों में क्या समीकरण उभरता है?—‘निकल आए तो बोनस, नहीं आए तो माइनस..’ इस क्रूर समीकरण के आगे लोकतंत्र की सब मध्यवर्गीय दलीलें बेमानी हैं.’’

मुझे कुछ समझ नहीं आया. इसलिए मैंने गांधी जी का नाम लेना सही समझा. मैंने कहा,

“खेतू! देखो, मेरी बात सुनो. समझो. गांधी जी ने भी भूख हड़ताल से देश आज़ाद कराया था.
‘‘स्वाति! जो लोग पहले से भूखे हैं, वो क्या भूख हड़ताल करेंगे. उनकी भूख हड़ताल न जाने कब से चल रही है. जिसका पेट भरा है. उसकी भूख हड़ताल ख़बर है. जो पहले से भूखा है उसकी भूख की किसको फिकर?’’, इस बार उसकी आवाज़ में हताशा थी.

मैं उसे कुछ नहीं समझा सकी. मैं ख़ामोश हो गई. कुछ-कुछ शर्मिंदा-सी. कुछ-कुछ हारी हुई-सी. मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे.

खेतू ने पूछा, ‘‘क्या हुआ स्वाति?’’
‘‘मैं तुमसे प्यार करने लगीं हूं. तुम्हें खोने से डरती हूं. वापस आ जाओ खेतू.’’
‘‘स्वाति मैंने तुम्हारी आंखों में अपने लिए प्यार देखा था, इसीलिए जाने से पहले आया हूं. तुमसे विदा लेने. तुम मुझे विदा करो स्वाति!’’
‘‘मैं तुमको विदा नहीं करूंगी’’, मैंने किसी छोटी बच्ची की तरह कहा.
‘‘तुमको मुझे विदा करना होगा. तुम मुझे विदा करोगी.’’

मेरी आंखों से लगातार आंसुओं की धार बह रही थी और खेतराम बुदबुदा रहा था :

‘‘आई डू नॉट वांट टू फॉल इन लव रादर आई वांट टू राइज़ इन रेवोलुशन… मैं जानता था कि मैं तुमको नहीं समझा सकूंगा पर समझाने आया हूं. हमारा प्यार सच्चा होगा तो हम फिर मिलेंगे. तुम्हारी विदा उधार है स्वाति.’’
मैं वहीं खड़े-खड़े उसे देखती रही और वो देखते-देखते खो गया.

मेरी तीसरी आंख देख रही है. खेतू की सबसे छोटी बहन से बड़ी बहन अपनी मां को खोजते हुए हरदयाल सिंह के यहां पहुंची है. वह भूखी है और उसे उम्मीद है कि उसकी मां उसे कुछ खाने के लिए कुछ देगी. खेतू की बहन हरदयाल सिंह के यहां पहुंचती है और कुछ लड़कों की परछाइयां उसे एक अंधेरे कमरे में घसीट ले जाती हैं. अन्दर से आवाज आती है,

“एका बइठाय के लेव, बड़ा मजा आई.’’

बाहर खेतू खडा है. एक परछाई उसके गालों पर थप्पड़ जड़ रही है. दूसरी परछाई हुकुम देती है, “चल उठक-बैठक कर.’’ खेतू उठक-बैठक करने लगता है. पहले लड़की की चीख़ आती है फिर ख़ामोशी. चीख़ के साथ डर आता और ख़ामोशी के साथ बेचैनी. परछाइयां खेतू को वहां से भगा देती हैं. लड़की अगली सुबह नाले में मिलती है. पूरा शरीर ज़ख़्मी. योनि में गन्ना डाला गया था. वहां सिर्फ़ ज़ख्म था. चेहरे पर तेज़ाब और शरीर पर खून ही खून.

अब दृश्य बदल गया है. खेतू की मां दरोग़ा के पैरों में पड़ी है. खेतू इस दृश्य में भी किनारे खड़ा है. खेतू के पिता हाथ जोड़े उकडू बैठे हैं. सबसे छोटी बहन पागल कुत्ते की तरह रो रही है. दरोग़ा सिपाही से कहता है,

“अबे दुई ठो संतरा और घुंघरू का इंतज़ाम करो, ई मंगतवा नाचत बहुत सही है.’’

मंगता मुसहर छाती पर संतरे लगाकर और पैरों में घुंघरू बांध कर नाच रहा है. खेतू भावशून्य-सा सब देख रहा है.

अब तीसरा दृश्य उभरता है. हरदयाल सिंह ने खेतराम की मां को डायन घोषित कर दिया है. लोग एक पेड़ से बांध कर उसके बाल काट रहे हैं. कुछ लोग उस पर कोड़े बरसा रहे हैं. उसका बाप मंगता मुसहर चोरी के इलज़ाम में वहीं बगल में हाथ पांव से बंधा जमीन पर पड़ा है. यहां भी खेतराम सब कुछ बस देख ही रहा है—भावशून्य-सा.

दृश्य बदलता है. खेतराम के मां-बाप हरदयाल सिंह से माफ़ी मांग रहे हैं. दरोग़ा खड़ा-खड़ा मुस्कुरा रहा है. हरदयाल सिंह हंसते हुए कहता है,
“अब ज़्यादा हीरो तो नहीं बनोगे न? भूल जाओ कि कोई लौंडिया थी तुम्हारी.’’

सारे दृश्य एक तालाब में कंकड़ की तरह गिरते हैं और जब लहरें ठहरती हैं तो मेरी तीसरी आंख देखती है कि खेतराम कॉमरेड अजीत के साथ गांव छोड़ कर जा रहा है. उसे 20 तक पहाड़ा याद है और वो किसी संख्या का वर्गमूल, घनमूल निकाल लेता है. कॉमरेड अजीत ने उसे इतना पढ़ाया कि वो सभ्यता के पिरामिडों की तलहटी में दबी मज़लूमों और महकूमों की हड्डियां देखने लगा है. हज़ारों साल की चुप्पी उसे साफ़ सुनाई देने लगी है. वो इतना आत्महंता हो गया है कि असंभव को लांघ जाना चाहता है. वो लड़ते-पढ़ते गांव की पगडंडियों से निकल कर विश्वविद्यालय के फलक पर और फिर इस फलक को छोड़ कर बीहड़ जंगलों में खो जाना चाहता है.

खेतू से बिछड़े दो साल हो गए हैं. अभी भी उसकी याद आती है. मेरा सिलेक्शन हो चुका है. अब मैं आईपीएस हूं और एक बलात्कारी मंत्री की सुरक्षा में लगा दी गई हूं. ये मंत्री पहले धर्मगुरु था फिर नेता हुआ और अब मंत्री है. इसकी आंखों से लार चूती है. मैंने इसकी आंखों में अपने लिए हवस देखी है. इसने कल्पना में मेरे साथ क्या-क्या नहीं किया होगा.। मैं जब सोचती हूं तो भीतर तक कुछ लिजलिजा-सा भर जाता है. इसके साथ रहते हुए मेरी आत्मा बलत्कृत-सा महसूस कर रही है.

मैं अफ़सर बनकर ताक़तवर बनना चाहती थी. मैं अफ़सर बन कर कमज़ोर महसूस कर रही हूं. मैं गरीबों की सेवा करना चाहती थी, पर इस बलात्कारी मंत्री की सेवा कर रही हूं. मैं इस विचार बोध के चलते मंत्री की शान में गुस्ताखी करने लगी हूं. इसकी सजा मुझे मिलेगी. मेरा तबादला कर दिया जाएगा. खेतू ने सब पहले ही बताया था. खेतू सब समझता था. खेतू सब जानता था.

समय ज्यादा नहीं बीता और मुझे मेरे किए की सज़ा मिल गई. मेरा तबादला कर दिया गया. दंडकारण्य में. नक्सलियों का इलाका. छत्तीसगढ़ का बस्तर जिला. ये मेरी सज़ा थी. मुझे मरने-मारने के लिए छोड़ दिया गया था. वहां नक्सलियों के कई गुट थे. इनकी आपसी मुठभेड़ भी हो जाया करती थी. पर मुख्यतः भारतीय राजसत्ता के ख़िलाफ़ ही ये युद्ध लड़ रहे थे. जनता सरकार और नक्सलियों की ख़ूनी लड़ाई में मारी जा रही थी. मैं सरकारी नौकर थी इसलिए गांधी जी पर मेरी आस्था थी और मैं सरकार के ख़िलाफ़ उठी बन्दूक को आतंक मानती थी.

मुझे ख़बर लगी पास के जंगल में नक्सलियों का एक कैम्प चल रहा है. नक्सलियों की टुकड़ी घेर ली गई. दो दिन तक नक्सली गोलियां चलाते रहे. उस टुकड़ी में महिलायें और बच्चे भी थे. दो दिन के बाद उनकी गोलियां ख़तम हो गईं. हमने कॉर्डन लगा दिया. सर्च आपरेशन चलने लगा. नक्सलियों की लाशें मिलने लगीं. महिलाओं और बच्चों के भी मृत शरीर मिले. गोली से छलनी. लहूलुहान. हमें जानकारी थी. ग्रुप का कमांडर अभी बचा हुआ है और यहीं कहीं छिपा है. घनी झाड़ियों के पीछे एक टीले में उस कमांडर की छिपे होने का पता चला. कॉर्डन क्लोज़ हो रहा था. सिपाही करीब आ रहे थे. मैंने माइक लिया और आवाज़ लगाई,

“तुम घेरे जा चुके हो, हथियार रख दो. मैं तुम्हारी मदद करूंगी. आत्मसमर्पण कर दो.’’

उधर से आवाज़ आई,

“स्वाति! मैंने रखने के लिए हथियार नहीं उठाए थे.’’

मैं ख़ुशी से चीख़ उठी. मैंने एक पल के लिए पागलों की तरह व्यवहार किया और फिर तुरंत ही संयत हो गई. मैंने आवाज़ दी,

“खेतू! तुम बाहर आ जाओ. तुमको कुछ नहीं होगा.’’
“स्वाति! मेरे लोगों को जो होना था हो चुका है. मेरे लोग मारे जा चुके हैं. मेरे सारे साथी शहीद हो गए हैं. मैं बस तुमसे इतना चाहता हूं कि मुझे पांच मिनट बाद गोली मारी जाए…”,

उसने भर्राए गले और स्वाभिमानी आवाज़ में कहा.

“हम तुमको नहीं मारेंगे. तुम आत्मसमर्पण कर दो खेतू…”,

मैंने अधीरता में कहा.

यह व्यवहार एक सरकारी अफ़सर का व्यवहार नहीं था. यह व्यवहार उस लड़की का था, जो खेतराम मुसहर उर्फ़ खेतू दा उर्फ़ ब्लू कॉमरेड से प्रेम करती थी. मैंने अपने आपको संभाला और मेरे भीतर एक पठार फैल गया. खेतराम मुस्कुराते हुए झाड़ियों से बाहर निकला. चेहरे पर शहीद होने से पहले वाली चमक. दुबला-पतला मगर मजबूत शरीर. हरी वर्दी. निहत्था आदमी. खेतराम मुसहर. नक्सली. देश की सुरक्षा के लिए खतरा. लाल आतंकी और न जाने क्या क्या.

वह मेरे सामने खड़ा था. पुलिस ने उसे चारों तरफ से घेर लिए था. बंदूकें उसकी तरफ तनी हुई थीं. मेरी स्मृतियों में पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की जनवरी की वो सर्द रात थी जब खेतराम मुझसे विदा लेने आया था और मैंने उसे विदा नहीं दी थी. उसकी विदा मुझ पर उधार थी.

खेतराम ने एक ख़ास तरीके से कमार झुकाई, और मुट्ठी बांध कर हवा में लहराते हुए ठीक वैसे नारे लगाने लगा जैसे वो यूनिवर्सिटी में लगता था. जैसे नारे लगाते हुए मैंने उसे पहली बार देखा था. मैं रोती हुई कह रही थी,

“खेतू आत्मसमर्पण कर दो.’’

आंखों से आंसू की धार बह रही थी. खेतराम और तेज़ से नारे लगाने लगा. झूम-झूम के. बुलंद आवाज़ में –

‘‘जय भीम लाल सलाम!
सबको शिक्षा सबको काम
जय भीम लाल सलाम!!
ज़ुल्मी तेरा काम तमाम
जय भीम लाल सलाम!!
फूले-पेरियार-भगत सिंह
वी शैल फाइट वी शैल विन…’’

मैंने रोते हुए आंखें बंद कर लीं. अभी भी उसका जूनून कम नहीं हुआ था. अभी भी वो उतना ही पागल था जितना उस वक़्त. सिपाही उसे गोली मारने ही वाले थे, उनसे पहले मैंने उसका उधार चुका दिया. मैंने उसे सदा के लिए विदा कह दिया. मैंने उसकी छाती पर गोली मार दी. चारों तरफ से उस पर गोलियां बरसने लगीं.

आकाश में गोलियों की आवाज़ के साथ जय भीम लाल सलाम गूंज रहा था और फिर सब कुछ एक ख़ामोशी में डूब गया.

मैं खेतराम मुसहर की मृत देह के पास गई और घुटने के बल बैठ गई. मैंने उसके कानों में कहा,

“जाओ मेरे आत्महंता नायक. असंभव लांघ जाओ. ये दुनिया तुम्हारे रहने के काबिल नहीं है. हमारा प्रेम सच्चा था. हम फिर मिले. तुम्हारी विदा उधार थी. मैंने तुम्हें विदा कर दिया…”

और फिर मैं उसके गले लग कर रोने लगी. सरकारी आंखों का एक नक्सली के लिए रोना अपराध था. मुझे सजा मिलनी थी. इन्क्वाइरी कमिटी बनी और मुझे सस्पेंड कर दिया गया.

मैं इस समय ये कहानी मुंबई के एक होटल के 15वीं मंजिल पर बैठे हुए लिख रही हूं और मेरी खिड़की से मुझे एक तरफ देश के सबसे अमीर आदमी की सबसे ऊंची बिल्डिंग दिख रही है और दूसरी तरफ़ एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी धारावी. जहां इंसान कीड़ों की तरह रहते हैं. मेरी स्मृति में खेतराम का चेहरा है और उसके हाथों में गुदा हुआ हंसिये का निशान भी.


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